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असमिया के मूल निवासियों के लिए बांग्लादेश से आकर बसे मुसलमान एक बड़ा खतरा बन गए है, लेकिन स्थानीय लोग खतरे की भयावहता महसूस नहीं कर रहे हैं। उन्हीं लोगों के खिलाफ 1979 में असम आंदोलन आरंभ हुआ था। उन्हीं की पहचान के लिए राष्ट्रीय नागरिक पंजीयन के अद्यतन का काम भी आरंभ हुआ था।
नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ असम में व्यापक आंदोलन चल रहा है, लेकिन यह आंदोलन असम के लोगों को किस राह की तरफ लेकर जा रहा है, उस पर आंदोलन के नेतृत्व की नजर नहीं है, यह जान-बूझकर उस तरफ देखा नहीं जा रहा है। नागरिकता (संशोधन) कानून पारित होने के बाद असम में तीन दिनों तक हिंसा होती रही है। जो नजारा 19 दिसंबर को लखनऊ में था, वैसा ही गुवाहाटी की सड़कों पर 11 दिसंबर से 13 दिसंबर की रात था। इस कानून को लेकर लोगों को केंद्र से नाराजगी है, लेकिन आंदोलन के दौरान गुवाहाटी के श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र में घुसकर तोड़फोड़ की कार्रवाई किस ओर संकेत कर रही है, यह सोचने की जरूरत है। असमिया लोगों के लिए श्रीमंत शंकरदेव अराध्य हैं। शंकरदेव से जुड़े संस्थान उनके लिए मंदिर की तरह हैं। उस संस्थान में तोड़फोड़, असमिया सम्मान चिह्न- सराई को तोड़कर गिराना किसी असमिया का काम नहीं हो सकता है। आखिर वे कौन लोग हैं, जो आंदोलन के नाम पर असम में अराजकता पैदा करना चाहते हैं? इस सवाल पर विचार करना जरूरी है।
इसमें दो राय नहीें है कि नागरिक (संशोधन) कानून के खिलाफ असम के आम लोगों को गुस्सा है। उन्होंने यह समझाया गया कि इस कानून के लागू होते ही बांग्लादेश से हिंदू शरणार्थी पूरे असम में फैल जाएंगे, असमिया लोग अल्पसंख्यक हो जाएंगे, उनकी भाषा लुप्त हो जाएगी, उनकी संस्कृति पर खतरा आएगा, युवकों को रोजगार नहीं मिलेगा और असमिया अस्मिता समाप्त हो जाएगी। सच्चाई यह है कि नागरिक (संशोधन) कानून के बारे में विस्तार से आम लोगों को पता नहीं है। उनके नेताओं और बुद्धिजीवियों ने जो समझाया है, वही समझ रहे हैं। यही वजह है कि 10 दिसंबर के बंद का व्यापक प्रभाव दिखा। विधेयक के संसद में पारित होते ही लोगों को लगा कि भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार संख्याबल के आधार पर असम के लोगों पर जबरन नागरिक (संशोधन) कानून लादने जा रही है। इसी भावना के साथ छात्र सड़कों पर उतर आए और विरोध प्रकट करने लगे। शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।
लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि उनके आंदोलन के बेजा इस्तेमाल के लिए पीछे से एक बड़ी साजिश की गई है। शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रह छात्रों के बीच धीरे-धीरे उपद्रवी घुसपैठ करने लगे। गुवाहाटी महानगर हिंसा फैल गई। सड़क रणक्षेत्र बन गए। गुवाहाटी मुख्य सड़क- गुवाहाटी शिलोंग रोड पर जगह-जगह टायर इस तरह से जलाए जा रहे, मानो श्मशान में एक साथ कई चिताएं जल रही हों। फुटपाथ पर लगे बाड़ को उखाड़कर सड़क पर फेंका जाने लगा। सरकारी संपत्तियों को बेहिसाब नुकसान पहुंचाया गया। ऐसा करने वाले छात्र नहीं थे। मैं खुद उस समय मौजूद था। वे लोग आंदोलन की आड़ में हिंसा फैलाने के लिए लाए गए थे। इसलिए आंदोलनकारी छात्र वापस लौट गए औ उपद्रवी कुहराम मचाते रहे। उनके हाथ में पेट्रोल भरे बोतल थे। पुलिस की वाहन को जला दिया। सुरक्षाबलों पर पत्थर मारने लगे। यह स्थिति तीन दिनों तक बनी रही। कर्फ्यू के बाद भी यही स्थिति रही। सेना को बुलाना पड़ा। फिर भी स्थिति सुधर नहीं रही थी। उन्होंने रास्ते को इस तरह से अवरुद्ध किया था कि सुरक्षाबल के वाहन रास्ते में फंसी रहीं।
आखिर उपद्रव करने वाले ये कौन लोग थे, जो नागरिक (संशोधन) कानून के खिलाफ चल रहे आंदोलन की आड़ में अपना मकसद पूरा करना चाहते थे? राज्य के वित्तमंत्री और राज्य सरकार के प्रवक्ता डा हिमंत विश्वर शर्मा ने बताया कि श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र और जनता भवन के समक्ष हुए हिंसक आंदोलन में तीसरी और चौथी शक्तियों के हाथ रहने की सरकार को फीडबैक मिला है। इन दो विशेष जगहों में तोड़फोड़ करने वालों में 24 लोगों के शामिल रहने की सूचना है। कई लोगों को पकड़ा गया है। उनमें से ज्यादातर लोग मुसलमान हैं। उन्होंने बताया कि गड़चुक, फटाशील आमबाड़ी, जालुकबाड़ी, दिसपुर, सोनापुर आदि अंचलों में सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट कर आंदोलन को अधिक हिंसक बनाने वालों में अब तक जितने लोगों की गिरफ्तारी हुई है, उनमें अधिकांश निचली असम के ग्वालपाड़ा, बरपेटा और नलबाड़ी के लोग शामिल हैं। उनका मानना है कि आंदोलन की आड़ में जनता भवन को ही आग के हवाले कर देने की भयानक साजिश रची गई थी। मंत्री हिमंत ने किसी का नाम लिए बगैर आरोप लगाया कि एक केंद्रीय शिक्षा संस्थान में कार्यरत एक शिक्षाविद, जिनका कैब विरोधी आंदोलन के साथ कोई नाता ही नहीं था, अपने मोबाइल फोन के जरिए जनता भवन के समक्ष इकट्ठी भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे और जनता भवन में प्रवेश कर उसे आग के हवाले करने को उकसा रहे थे। हिंसा को उकसाने के लिए कट्टरवादी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंड़िया (पीएफआई) की तरफ उंगलियां उठने के बाद पुलिस ने बुधवार को संगठन के असम प्रमुख अमीनुल हक को गिरफ्तार किया गया है।
असमिया के मूल निवासियों के लिए बांग्लादेश से आकर बसे मुसलमान एक बड़ा खतरा बन गए है, लेकिन स्थानीय लोग खतरे की भयावहता महसूस नहीं कर रहे हैं। उन्हीं लोगों के खिलाफ 1979 में असम आंदोलन आरंभ हुआ था। उन्हीं की पहचान के लिए राष्ट्रीय नागरिक पंजीयन के अद्यतन का काम आरंभ हुआ था। लेकिन कांग्रेस की वोटबैंक राजनीति की वजह से उनके पास सभी सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं, जिनके आधार पर उनके नाम एनआरसी में शामिल हो गए। उन्होंने असमिया समाज में खुद को शामिल करवाने के लिए असमिया भाषा सीख ली और अपनी मातृभाषा असमिया लिखवाते हैं। जबकि हिूंद शरणार्थी अपनी मातृभाषा बांग्ला रखते हैं। इसलिए ‘का’ खिलाफ आंदोलन कर रहे समूहों को बांग्लादेश से आने वाले हिंदू शरणार्थियों से नफरत है। यदि उन्हें नागरिका नहीं मिली तो राज्य के कई और विधानसभा क्षेत्र में बांग्लादेशी मुस्लिमों का बहुमत हो जाएगा।
भाजपा नेता डा हिमंत विश्वध शर्मा मानते हैं कि यदि नागरिकता (संशोधन) कानून लागू नहीं हुआ तो एक दिन बदरुद्दीन अजमल जैसे लोग असम के मुख्यमंत्री होंगे। असमिया लोगों का चलना मुश्किल होगा। असमिया समाज में शामिल होने के लिए बांग्लादेश मूल के मुस्लिम अपना नाम हिंदू जैसा रखने लगे हैं और किसी असमिया युवती से शादी करने अपनी उपाधि भी असमिया रख लेते हैं। ऐसे लोग भी नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ आंदोलन में शामिल हैं और आगे बढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

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