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मकर संक्रांति पर्व को भारत के ही समान नेपाल में भी सुख, शान्ति और उन्नति का प्रतीक और शुभ कार्यों का वाहक माना जाता है। अच्छी फसल देने के लिए किसान इस दिन ईश्वर का धन्यवाद करते हैं। यही कारण है कि इस त्यौहार को किसानों का त्यौहार भी कहा जाता है।

मनुष्य को जीवन में सदा सक्रिय रहना चाहिए ऐसा संदेश देता है, मकर संक्रांति का ये त्यौहार।

हिन्दू धर्म में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक ये त्यौहार है जो कि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है। सुन्दर संयोग है कि ये पर्व केवल भारत में ही नहीं बल्कि हमारे पड़ोसी देश नेपाल में भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

कहते हैं कि जब पौष के महीने में सूर्य धनु राशि से हटकर मकर राशि में प्रवेश करने लगता है, तो इसे एक पर्व के रूप में दोनों ही देशों – भारत और नेपाल में एक भव्य त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। ये दिन अक्सर जनवरी के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है।

इस दिन पूरे भारतवर्ष में मकर संक्रांति का ये त्यौहार पूरे हर्षो उत्साह के साथ मनाया जाता है और हर प्रान्त में भिन्न – भिन्न  तरीके से मनाया जाता है। कहीं से उड़द की घी वाली खिचड़ी की ख़ुशबू, तो कहीं ऊँची पतंगों की पेंचबाज़ी के बीच आतीं ’काई पो चे’ की आवाज़ें, कहीं से तिल और गुड़ की सुगंध तो कहीं पोंगल के रंग, कहीं लोहड़ी की गर्मी तो कहीं गंगा स्नान की ठंडक, सत्य ही तो है – भारत देश की इसी विशिष्टता में इसका सौन्दर्य निहित है।

एक त्यौहार के अनेक नाम और उसे मनाने के अनेक तरीके भी हैं यहां। अलग-अलग प्रान्तों की भिन्न-भिन्न मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार इस त्यौहार के पकवान भी अलग-अलग हैं, किन्तु दाल और चावल की खिचड़ी इस त्यौहार का मुख्य व्यंजन ही नहीं बल्कि इसकी पहचान है। इस दिन घी के साथ इस खिचड़ी को खाने का विशेष महत्व है। साथ ही, तिल और गुड़ भी इस पर्व में अत्यंत महत्व रखते हैं। तिल और गुड़ के लड्डू इस त्यौहार में सबसे महत्वपूर्ण मिठाई मानी जाती है।

इस पर्व पर गंगा स्नान भारत की सर्वाधिक पुरानी परम्पराओं में से एक है। इस दिन दान पुण्य का भी विशेष महत्व है। उन्नति, सुख और शान्ति का प्रारंभ इस पर्व से होता है ऐसी दृढ़ मान्यता देश में है।

मकर संक्रांति के इस पर्व को मनाने का तरीका भारत के अन्य सभी त्यौहारों से आगे है। जितनी विभिन्नता के साथ इसे मनाया जाता है उतना शायद ही किसी दूसरे त्यौहार को मनाया जाता हो। जैसे कि –

उत्तर प्रदेश में इस पर्व को ’दान के पर्व’ के रूप में मनाया जाता है। माघ के मेले का महत्व इसी त्यौहार से जुड़ा है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर हर साल ये मेला लगाया जाता है। चौदह जनवरी को ये मेला यहां लगता है। सभी श्रद्धालु यहां नदी के पवित्र जल में स्नान करते हैं। माघ के महीने का ये पहला, मकर संक्रांति का स्नान होता है जो कि फिर शिवरात्रि के अंतिम स्नान तक चलता है। इस दिन स्नान करके लोग अपने जीवन की एक नई शुरुआत करते हैं। इस दिन पर स्नान का बड़ा महत्व माना जाता है क्योंकि इस दिन से सभी शुभ कार्यों का प्रारंभ होता है ऐसी भी मान्यता है। स्नान के बाद दान करने से भी मनुष्य पुण्य प्राप्त करता है ऐसी भी मान्यता है और इसलिए उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों में इसे दान का पर्व भी कहा जाता है। इसमें दान करने के लिए विशेष रूप से उड़द की दाल और चावल की ’खिचड़ी’ प्रमुख है। उत्तराखंड राज्य के बागेश्वर में भी भव्य मेले का हर वर्ष आयोजन होता है। गंगा और रामगंगा नदियों के घाट पर भी इस अवसर पर बड़े-बड़े मेले लगते हैं। इस दिन इन राज्यों में लोग खूब घी डालकर खिचड़ी खाते हैं और दान भी करते हैं।

बिहार में भी इस पर्व को मनाया जाता है और इसे ’खिचड़ी’ कहा जाता है। यहां भी इस दिन दान का पुण्य कमाने की मान्यता है। चावल, उड़द, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी कपड़े और कम्बल इत्यादि जैसी वस्तुओं को दान में दिया जाता है और शुभ कार्यों की शुरआत की जाती है।

इसी  प्रकार गंगा स्नान और फिर दान देने की प्रथा बंगाल राज्य में भी है। दान में यहां तिल दान करना बहुत शुभ माना जाता है। हर वर्ष गंगासागर पर यहां भव्य मेला लगता है। और इसका महत्व इतना है कि अक्सर लोग कहते हुए सुनाई पड़ते हैं कि ़सारे तीर्थ बार – बार, गंगा सागर एक बाऱ। इसी कारण से मकर संक्रांति पर गंगा स्नान के लिए लाखों की संख्या में दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।

इस दिन को लेकर यहां मान्यता है कि भगीरथ जी के पीछे चलते हुए और कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए माँ गंगा सागर में विलीन हो गईं थीं। और तभी से गंगा सागर में स्नान का विशेष महत्व है। साथ ही एक और मान्यता है कि मकर संक्रांति के इसी दिन भगवान श्री कृष्ण की प्राप्ति के लिए यशोदा जी ने व्रत किया था। और इसलिए ये दिन तब से और भी पावन हो गया।

महाराष्ट्र राज्य में मकर संक्रांति के इस पर्व पर हलवा बांटने की परंपरा है जिसे ’तिल गूड़’ कहा जाता है। सभी एक दूसरे को तिल और गुड़ बांटते हैं और मीठी वाणी हो सबकी ऐसी कामना करते हैं, मराठी में कुछ इस तरह कहते हैं –  ’तिळ गूळ घ्या आणि गोड़-गोड़ बोला’ जिसका अर्थ है कि ’तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो’।

महिलाओं के लिए इस दिन तिल और गुड़ बांटने के साथ-साथ रोली और हल्दी बांटने की भी परंपरा महाराष्ट्र में है। और जो नवविवाहित होती हैं, वे अपनी पहली मकर संक्रांति पर तेल, नमक, कपास जैसी वस्तुएं भी दूसरी सुहागनों को देतीं हैं।

कुछ इसी तरह, राजस्थान में इस दिन सुहागनें  चौदह ब्राह्मणों को चौदह शुभ सूचक वस्तुओं का पूजन कर, दान करती हैं। साथ ही अपनी सास को वायना देकर उनका आशीर्वाद लेती हैं। और पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं।

गुजरात और राजस्थान में इस पर्व पर पतंग उत्सव पर पतंगबाज़ी के बड़े-बड़े आयोजन किये जाते हैं। उत्साह से जुड़े इस पर्व पर पतंग उड़ाने का बेहद महत्व होता है। हर गली नुक्कड़ इस दौरान ’काई पो छे’ कहते स्वरों से गूंज उठता है। पूरे उत्साह के साथ ये शब्द सामने वाले पतंगबाज़ को हराने पर और जीत हासिल करने के लिए प्रयुक्त होते हैं।

हरियाणा राज्य और पंजाब में इस पर्व को लोहड़ी का नाम दिया गया है। तेरह जनवरी को शाम जब गहरा जाती है तो इन राज्यों में अग्नि पूजा की जाती है। लोग अपने घरों के आँगन में आग जलाते हैं और अग्नि पूजा करते हैं। इस पूजा में अग्निदेव को गुड़, तिल, भुने हुए मक्के और चावल अर्पित किये जाते हैं। इस पूजन सामग्री का विशेष नाम भी है -’तिलचौली’।

खुशियों के इस पर्व पर एक दूसरे को मीठा खिलाकर लोग अपनी खुशियां बांटते हैं। हाँ, लेकिन मीठा भी कोई साधारण मिठाई नहीं होता – मूँगफली, तिल की बनी हुई गज़क और रेवड़ी इस पर्व का ख़ास मीठा व्यंजन होता है। इस दिन मक्के की रोटी और सरसों का साग बनाकर अपने पारम्परिक भोजन का भी लोग आनन्द उठाते हैं। कहते हैं कि नई दुल्हन और नवजात शिशु के लिए इस पर्व का विशेष महत्व होता है। साथ ही, घर की स्त्रियां घर-घर में लोकगीत गाती हैं और लोहड़ी मांगती हैं।

असम राज्य में मकर संक्रान्ति के इस त्यौहार को माघ-बिहू या भोगाली-बिहूके नाम से मनाया जाता है।

दक्षिण भारत में भी बड़े उत्साह के साथ मकर संक्रांति के इस पर्व को मनाया जाता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल और आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में इसे संक्रांति कहा जाता है।

तमिलनाडू में इस त्यौहार को बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है और यहां इसका रूप होता है – ’पोंगल’। इस दिन स्नान करके सूर्य देव के लिए मिट्टी के बर्तन में खीर बनाई जाती है जो कि सूर्य देव को अर्पित करने के बाद सभी लोगों में प्रसाद के रूप में बांट दी जाती है। इस खीर को पोंगल कहते हैं।

पोंगल चार दिनों तक लगातार मनाया जाता है और इन चार दिनों को भी अलग-अलग अंदाज़ से मनाया जाता है, जैसे, प्रथम दिन को भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन को सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन को मट्टू-पोंगल या केनू-पोंगल और अन्तिम दिन को कन्या-पोंगल के रूप में मनाया जाता है।

इस प्रकार पहले भोगी-पोंगल यानी इस त्यौहार के प्रथम दिन सभी कूड़ा करकट इकठ्ठा करके जलाया जाता है। सूर्य-पोंगल के दिन माता लक्ष्मी का पूजन होता है। मट्टू-पोंगल या केनू-पोंगल के दिन पशु धन का पूजन किया जाता है।

हमारे पड़ोसी देश नेपाल से हमारा ये त्यौहार काफ़ी मेल खाता है। वहां इस पर्व को माघे-संक्रान्ति, माघी कहा जाता है। और वहां भी अलग-अलग राज्यों की मान्यताओं और परम्पराओं के अनुसार ये त्यौहार मनाया जाता है।

मकर संक्रांति का महत्व नेपाल में इस बात से स्पष्ट पता चलता है कि इस दिन वहां सार्वजनिक अवकाश होता है। लोग नदियों में स्नान करते हैं और तिल और घी, शर्करा और कन्दमूल दान देते हैं। तीर्थस्थलों में मेले लगते हैं। देवघाट और त्रिवेणी मेले नेपाल के सबसे प्रसिद्ध मेले हैं।

इस पर्व को भारत के ही समान नेपाल में भी सुख, शान्ति और उन्नति का प्रतीक और शुभ कार्यों का वाहक माना जाता है। अच्छी फसल देने के लिए किसान इस दिन ईश्वर का धन्यवाद करते हैं। यही कारण है कि इस त्यौहार को किसानों का त्यौहार भी कहा जाता है।

पड़ोसी राज्य होते हुए भी नेपाल और भारत में बहुत सी समानताएं भी देखी जा सकती हैं। शायद वहां की कुछ जातियों का हमारे तराई क्षेत्र में बसना भी है।

हाँ लेकिन, एक ही त्यौहार को दो देशों में पूरे उल्लास के साथ एक साथ मनाया जाना, इस बात का प्रतीक है कि मानवीय भावनाओं, दुःख और सुख, खुशी और उल्लास किसी सरहद के मोहताज नहीं होते।

मकर संक्रान्ति हमारी भारतीय सभ्यता और हमारी परम्परा का सुंदर प्रतीक है। इससे जुड़ी हर अलग मान्यता, अलग रीति, अलग रिवाज़ का अपना सौंदर्य है और महत्व भी, लेकिन सार एक ही है- एक दूसरे के लिए मंगल कामना और एक पावन मन से नए सुखद, समृद्ध जीवन का आरम्भ करना। आशा है, इस मकर संक्रांति आपके जीवन में भी सुख शांति उन्नति और समृद्धि का नव प्रारम्भ होगा।

 

 

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