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बिना किसी आधार या सहायता के सामाजिक समस्याओं से सरोकार एवं उनके निवारण के लिये कार्य करने वाली संस्थाओं एवं उनके कार्यकर्ताओं की जानकारी देनेवाली मालिका याने “तपस्या”। जिनके पास न पैसा है न ही नाम परंतु समाज के लिये कुछ अच्छा कार्य कर रहे हैं, ऐसी संस्थाओं को समाज के सामने लाकर लोगों तक उनकी जानकारी पहुंचाना याने “तपस्या”।

जब कोई संस्था स्वत: के फायदे का विचार न करते हुए किसी निश्चित ध्येय की प्राप्ति हेतु प्राणपण से काम करती है, तब उसके द्वारा सर्वोत्तम कार्य संपादित होता है। ऐसा ही कार्य आरुषा क्रिएशन संस्था द्वारा किया जा रहा है।

ऐसा कहा जाता है कि 100 वर्ष जीने के लिये 100वर्ष जिंदा रहने की आवश्यकता नही होती। कुछ सामाजोपयोगी काम इस प्रकार किजीये कि लोग आपको या संस्था को 100 वर्ष तक याद रखें। क्रियेशन का कार्य इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

वरिष्ठ दिग्दर्शक श्री राजदत्त जी से उत्तम मार्गदर्शन प्राप्त श्री एकनाथ सातपूरकर ने आरुषा क्रियेशन नामक संस्था की स्थापना की। हम समाज के ऋणी है एवं उससे मुक्त होने हेतु हमने समाज को हमेशा कुछ ना कुछ देते रहना है इस उद्देश्य को सामने रखकर श्री सातपूरकर जी ने स्वयं को पूर्ण रुप से संस्था के लिये अर्पित कर दिया। इस कार्य में भी उन्हे अनेक अड़चनों का सामना करना पड़ा। परंतु जब ध्येय को ही सर्वस्व मानलिया तब सातपूरकर एवं उनकी टीम उस ध्येय को प्राप्त करने के लिये प्राणपण से कार्य करने लगी।

इ.टी.वी के लिये विजया मेहता और सई परांजपे इन दो दिग्गज कलाकरों पर “बहुरंगी” कार्यक्रम किया तथा एक ही नाटक मे अनेक भूमिका करने वाले कलाकारों का कार्यक्रम रसिक दर्शकों को देखने मिला। सारड़ा समान संधि पुरस्कार फिल्म बनाते समय उन्हे छत्तीसगढ़, केरल, तमिलनाडू ऐसे विविध भागों में घूमते हुए आतंकवादियों से भी मुलाकात करना पड़ा था। परंतु यदि ध्येय की ओर बढ़ने की इच्छा तीव्र हो तो सामने आने वाली अड़चनों को देखकर इच्छा और भी तीव्र हो जाती है और उसीसे एक सुंदर कलाकृति का निर्माण होता है। “तपस्या” यह मालिका आरुषा क्रियेशन की इसी इच्छा का प्रतिफल है।

इलेक्ट्रानिक प्रसार माध्यम केवल मनोरंजन के साधन अथवा डेली सोप या सनसनी खबरों के लिये हैं। ऐसी समझ के लोगों में “आरुषा क्रियेशन” ने बनलाव लाने में सफलता पाई है।

बिना किसी आधार या सहायता के सामाजिक समस्याओं से सरोकार एवं उनके निवारण के लिये कार्य करने वाली संस्थाओं एवं उनके कार्यकर्ताओं की जानकारी देनेवाली मालिका याने “तपस्या”। जिनके पास न पैसा है न ही नाम परंतु समाज के लिये कुछ अच्छा कार्य कर रहे हैं, ऐसी संस्थाओं को समाज के सामने लाकर लोगों तक उनकी जानकारी पहुंचाना याने “तपस्या”। न लोभ, ना लाभ, न ही मोक्ष या व्यक्तिगत स्वार्थ की आकांक्षा परंतु केवल मानव धर्म के पालन हेतु “तपस्या” इस मालिका का निर्माण किया गया।

ऐसा कहा जाता है कि यदि किसी बात मे सफलता प्राप्त करनी हो तो प्रथम ध्येय निश्चित करना, फिर उस ध्येय को अपने मे समाहित करना और उसकी प्राप्ति हेतु अक्षरश: पागल हो जाना, जब यह हो जाता है तब सफलता निश्चित ही प्राप्त होती है। इसका एक उत्तम उदाहरण है। मायकेल अन्ज्जोलो इस मूर्तिकार ने पत्थर की एक बहुत सुंदर मूर्ति का निर्माण किया। जब उससे पूछा गया कि उसने इतनी सुंदर मूर्ति का निर्माण कैसे किया तो उसका उत्तर था, पत्थर मे मूर्ति तो पहले से ही थी, मैने पत्थर का अनावश्यक भाग हटा दिया। मूर्ति पत्थर मे थी यह सत्य होते हूए भी वह मूर्ति उसके मस्तिष्क में पहले ही बन गई और उसका ध्येय निश्चित हो गया था।

ऐसा ही कुछ सातपूरकर जी के साथ हुआ। “तपस्या” निर्माण के ध्येय ने उन्हे पागल बना दिया था। इस मालिका में दिव्यांग, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, आरोग्य, अंध, पारथी, बनवासी ऐसे अनेक विषयों पर काम करने वाली संस्थाओं की जानकारी चित्रीकरण के माध्यम से समाज के सामने प्रस्तुत की गई है। ऐसी 52 भागों की यह मालिका “सह्याद्री दूरदर्शन” (मराठी) पर प्रसारित की गई थी। उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री एवं वर्तमान मे भारत के प्रधानमंत्री मा. मोदीजी ने इसे नोटिस किया था एवं कहा था कि यह मालिका युवाओं के लिये बहुत प्रेरणादायी है।
“तपस्या” इस दूरदर्शन मालिका की प्रथम सी.डी का विमोचन डॉक्टर अनिल काकोडकर, अरुण नलावडे, डॉक्टर अशोक कुकडे इन मान्यवरों के हस्ते हुआ था। दूसरे भाग की सीडी का विमोचन सरसंघचालक मा. मोहनजी भागवत के हाथों हुआ।

समाज मे अलग ही दिखाई पड़ने वाले सफल पुरुषों का राज याने उनके काम करने की अमर्यादित क्षमता। हमारी संस्कृति में दान का बहुत महत्व है एवं उसके लिये कर्ण का उदाहरण सर्वश्रुज्ञ है। दान देने की इच्छा यदि मन मे है तो समर्पण की भावना का निर्माण होता है। सातपूरकर जी के विषय में यह सब पूर्णरुप से लागू होता है। “तपस्या”का जो फल उन्हें प्राप्त हुआ उसिसे उन्हे समर्पण के निर्माण की इच्छा हुई। क्यों कि सफल होने के लिये जो चाहिये वह प्राप्त करने हेतु उम्र कोई बाधा नही है। सफलता और कुछ न होकर निश्चित ध्येय, ध्येयप्राप्ती की ज्वलंत इच्छा, और जब तक ध्येय प्राप्त न हो तब तक उसके लिये सतत प्रयत्नशील रहना, इन सबका मिश्रण है। कोई भी सफलता बिना प्रयास नहीं मिलती।

समर्पण यह केवल एक भावना नही वरन एक विचार है, एक आंदोलन है। हमारी भारतीय संस्कृति का आधार है। हमारे इतिहास में भी समर्पणकी अनेक कथायें है। “समर्पण” यह मालिका भी एक समर्पण ही है। इसमे ऐसी संस्था एवं व्यक्ति है जिनके मनों में केवल एक ही भाव है…..समर्पण….।

हमारे संतो ने भी समाज प्रबोधन के माध्यम से लोगों के मन मे समर्पण का भाव जागृत किया, लोगों के मन मे उस भाव को स्थायी किया। मराठी भाषा में अभंग तथा कविता के अन्य प्रकार तथा हिन्दी एवं अन्य भाषाओं मे दोहे, चौपाई, कवितायें इ. के माध्यम से समाज मन को जीवित रखने का काम किया है। अब समय बदल गया है। संतो का स्थान समाज सेवकों ने ले लिया है।

समर्पण यह मालिका भी ऐसी संस्थाओं एवं व्यक्तियों का परिचय करने वाली है, जिनके लिये समर्पण यह एक भावना ही नही वरन विचार है, गतिविधि है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि पृथ्वी पर जब जब मेरी आवश्यकता होगी मै आऊंगर। परंतु भारतीय समाज उस श्रीकृष्ण का इंतजार करते हुए पही बैठा रहता। समाज स्वयं श्रीकृष्ण बनकर समस्यायें सुलझाने हेतु उपयुक्त होता है और उस कार्य मे ही श्रीकृष्ण के दर्शन करता है।
ये संस्थायें एवं व्यक्ति उसी श्रीकृष्ण का एक रुप है। शिक्षा, स्वास्थ्य, अनाथ बच्चे, दिव्यांग, महिला कोई भी हो, इनकी समस्यायें अपार हैं परंतु साथ ही साथ इन समस्याओं से लड़ने वाले समाजसेवकों की भी कमी नही है।

समर्पण यह मालिका ऐसी ही संस्थाओं एवं व्यक्तियों का हमसे परिचय कराती है।

“तपस्या” मालिका देखकर बहुतों के मन मे चलबिचल हुई। उन्हे इन कामों की जानकारी चाहिये थर, संस्था को देखना था, संस्था को मदद करनी थी। परंतु मालिका का यह उद्देश्य नही था। उद्देश्य था कि आपके गांव या आसपास यदि ऐसी कोई संस्था या संस्थायें हो तो उनकी मददत करें। यह लिखते हुए आनंद होता है कि यह मालिका देखकर वास्तव में अनेक लोगों ने समाजोपयोगी संस्थाओं की स्थापना की।

समय के साथ साथ समर्पण की पद्धति भी बदल गई है परंतु भाव वही है। यह एक यज्ञ कुंड है और प्रत्येक पीढ़ी उसमे आहुति डाल रही है। इस धधकती अग्नि से व्यक्ति की अंतरात्मा प्रकाशित हो रही है और समाज मे नवचेतना का संचार हो रहा है। इसके कारण समस्याओं का निदान भी हो रहा है। हमारी पर मालिका केवल एक माध्यम है आपके सामने इस परंपरा को प्रस्तुत करने का। इस मालिका के माध्यम से पूरे भारत भर मे ऐसी संस्थाओं की खोज की गई है।

इस मालिका की शुटिंग हेतु पांच यूनिट कार्यरत है, जिसके माध्यम से 50 से 60 लोग दिनरात काम कर रहे है।

सिनेमा जगत के नामचीन लेखकों ने इसकी पटकथा लिखी है जिसमें अभिराम भडकमकर, प्रसाद गर्भे, अनुरीचा सिंह, चिद्धिलास क्षीरसागर, विजयलक्ष्मी सिंह, केतकी कुलकर्णी इ. शमिल है।

मालिका का दिगर्शक प्रसाद पत्की, चंद्रशेखर कुलकर्णी एवं कमाल ना्ानी कर रहे है।

मालिका का शीर्षक गीत सुरेश वाडकर एवं देवकी पंडीत द्वारा गाया गया है एवं संगीत अशोकजी पत्की ने दिया है।

मालिका मे शामिल संस्थाओं का कार्यपरिचय परेश रावल, मनोज जोशी, सचिन खेडेकर, सोनाली कुलकर्णी जैसे जानेमाने कलाकारों द्वरा दिया जा रहा है।

स्वप्ना सातपूरकर, शलाका पत्की, सविता कुलकर्णी, प्रशांत कुलकर्णी, महेश लिमये, सायली कुलकर्णी, मीडिया विद्याके अजिंक्य कुलकर्णी, रुद्र गोसावी, युवराज, अर्जून इ. का मालिका निर्मित में सहयोग मिल रहा है।

इस मालिका के निर्माता एकनाथ सातपूरकर है एवं राष्ट्रीय सेवा भारती के ऋषिपाल दडवल एवं उदयजी जोगलेकर का निर्माण में मूल्यवान सहयोग प्राप्त हो रहा है।

अच्छे काम की शुरुआत होने के बाद हजारों हाथ मदद के लिये उठते हैं उन सब का नामोल्लेख करना संभव नही है परंतु यह जगन्नाथ का रथ हजारों हाथों द्वारा ही खींचा जा रहा है।

17 नवंबर 2019 से यह मालिका डीडी1 नेशनल पर प्रति रविवार सुबह दस बजे प्रसारित की रही है।
कृपया आवश्य देखें, देखना न भूलें….समर्पण….

This Post Has One Comment

  1. आर्टिकल बहुत अच्छा है सातपुरकर द्वारा निर्मित मालिका सभी देखे यह आवश्यक है।

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विगत 6 वर्षों से देश में हो रहे आमूलाग्र और सशक्त परिवर्तनों के साक्षी होने का भाग्य हमें प्राप्त हुआ है। भ्रष्ट प्रशासन, दुर्लक्षित जनता और असुरक्षित राष्ट्र के रूप में निर्मित देश की प्रतिमा को सिर्फ 6 सालों में एक सामर्थ्यशाली राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अभूतपूर्ण भूमिका रही है।

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