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महाराज अस्पतालों की महिमा बहुत व्यापक है। कई जगह, बिना डिग्री वाला नकली डॉक्टर भी मिले। जीरो नंबर मिला पर लक्ष्मी जी की महिमा स कई डॉक्टर बण जाव। पेट दर्द का नाम पर गुर्दा निकाल लेव। एक बार एक महिला मिली वो बताई, एक अस्पताल में कर्क रोग याने कैंसर का इलाज का लिए ऑपरेशन करना वाला था। मालूम पड्या कि उसने कैंसर ना है बल्कि क्षयरोग (टी.बी.) है।

वैसे हमारे देश में जो होता है छप्पर फाड़के होता है। ऐसी छप्पर फाड़ बेईमानी और अव्यवस्था देख हम गदगद हो जाते हैं और तुलसीदास की तरह कह उठते हैं, ‘आज प्रभु मोहि दीन्ही आहारा।’ क्योंकि व्यंग्य लिखने के लिए यहां कभी विषयों के टंटे नहीं होते। प्रभु आपसे विनती है, हमें अगले जन्म में भी इसी महान देश में जन्म देना, और व्यंग्य के कीटाणु भी जरूर प्रविष्ट करा देना।
तो ऐसे ही किसी विषय का मुआयना करने हम एक अस्पताल पहुंचे। हमारा सिर चकराया और कोई हमारे भीतर प्रविष्ट कर गया। अचानक हम एक शानदार महल में पहुंच गए। अरे! ये तो महाराज धृतराष्ट्र और आंखों पर पट्टी बांधे महारानी गांधारी हैं। हम छोटे में श्री बी.आर.चोपड़ा जी महाराज की महाभारत में इनके दर्शन कर चुके हैं। तो अब हमारे मन का रहस्य खुला कि जैसे हमारे भीतर आज कोई प्रविष्ट हुआ वैसे ही इन निर्माता निर्देशकों में होता होगा फिर ऐतिहासिक पौराणिक चरित्रों से मिलवाता होगा। महारानी गांधारी कुछ कह रही थीं, हमने अपने कानों को उस और घुमाया।
महाराज इत्ता परेशान क्यूं हो रए स आप?
गांधारी ना जाने संजय कठे रह गया स ?
हमने सोचा, वेदव्यास ने तो संस्कृत में लिखा था, पर ये कौन सी भाषा में बात कर रहे हैं। हमारे भीतर जो प्रविष्ट हुआ था, उसने कहा-‘तुम पृथ्वीवासी दिमाग नहीं चलाते। ये कुरूक्षेत्र की हरियाणवी बोली है। ये यहां के वासी हैं, अपनी बोली में ही बात करेंगे ना।’
ओ हां –
इतने में दासी ने प्रवेश करते हुए कहा –
महाराज संजय कक्ष में पधारने की अनुमति चावे स।
धृतराष्ट्र- दासी, तुरंत भेज उसने।
धृतराष्ट्र- संजय कठे रै गया था भई तू।
संजय- महाराज भोत भटकना पड़ रैया था। जगह-जगह ट्रैफिक जाम हो गया स। महाराज ऐसा है, अब इत्नी कम तनखा मैं काम ना कर सकता।
धृतराष्ट्र- क्यूं भई अत्ते साल में तो तू कुछ ना बोला, अब क्या होया तन्ने।
संजय-महाराज आजकल मेरा उपग्रह बराबर काम ना कर रया स।
धृतराष्ट्र-तो तू उपग्रह खरीद्देगा?
संजय- न महाराज चल यंत्र, क्या कवे उसे मोबाइल खरीदूंगा।
धृतराष्ट्र- संजय देख मंहगे शौक ना पाल तू। हम तनखा ना बढ़ावेंगे।
संजय- तो ठीक है, महाराज इतनी कम तनखा में मैं ना सुना सकता आंखों देखा हाल। मैं चला। आप एक काम करो एक दूरदर्शन मतलब टी.वी. मंगा लो। दुनिया, जहान की खबरें मिल जांगी।
धृतराष्ट्र- ना संजय ना, शकुनि बता रया था, उनकी खबरें बड़ी मेनिपुलेटेड होवें।
संजय- अच्छा शकुनि मामा से भी जादा ताऊ।
धृतराष्ट्र- हां भई, जिस पार्टी का सूटकेस पौंच जावे, चैनल बीका ई हो जावे। अच्चा ठीक है, तेरी तनखा बढ़ा देंगे।
संजय- ताऊ महाराज ना नौ मण तेल होग्गा, न राधा नाचेगी।
धृतराष्ट्र- अरे नौ मण तेल बी होगा, राधा बी नाचगी। कई परकाशक और चैनल वाले आजकल फोन कर रया स।
संजय- वो क्यूं महाराज –
धृतराष्ट्र- वो यूं कि कृष्ण हम सबने बड़ा पापुलर कर दिया स। दैवभूमि भारत और विदेसो मं भी महाभारत छप रई स। और अब वेदव्यास और कृष्ण दोनों बोले स कि भई धृतराष्ट्र ताऊ के 100 बच्चे मर गए स उन्ने जरूरत है, रॉयल्टी उनने ई दे द्यो।
संजय- हिंदी वाला परकासक के रायल्टी देगा आपणे?
धृतराष्ट्र- संजय अंग्रेजी का प्रकाशक भी महाभारत छाप रहे स। पर कोई बात ना, अगर तू नई सुणाणा चाता, तो मैं आज ही अश्वत्थामा ने बोल देता हूं कि उठा लाएगा एक टी.वी. कठे से।
संजय- महाराज देखोगे कैसे?
धृतराष्ट्र- आंखों की शल्य क्रिया करा लेंगे।
संजय- ना महाराज मैं आपको अस्पताल ना जाणे दूंगा। एक बार जो अस्पताल पौंच गए, तो वापस आणे की गैरंटी ना है।
गांधारी- यो अस्पताल के होवे संजय?
गंभीर वाणी में संजय बोले –
माते अस्पताल को रणभूमि होवे, जहां लोग अपने जीवन मृत्यु की लड़ाई लड़े स। जिसके चक्रव्यूह में एक बार जो फंस जावे, बार ना निकल पावे।
गांधारी- अच्छा आपणे अभिमन्यू की तरह।
संजय- ना माते अभिमन्यू तो बार निकल आता, अगर उसकी माता सोई न होती तो। पर यहां तो जागती आंखों से सब फंस जावें।
धृतराष्ट्र- वो कैसे संजय?
संजय- ताऊ, माते पिछले दिनों मैंणे इनका एक विज्ञापन देखा।
धृतराष्ट्र- विज्ञापन के होवे संजय?
संजय- ताऊ महाराज विज्ञापन यो होवे, जिसके रास्ते, सड़े गले, खराब माल ने भी सुंदर बनाकर बेच दिया जावे। आदमियों के उपयोग के सामान में भी जहां सुंदर महिला दीखे, तो सब खरीदन लाग जाते।
गांधारी- ओ… ये बात स।
संजय- हां माते, तो अस्पताल का विज्ञापन यूं था – भाईयों और बहनों, इच्छा मृत्यु अस्पताल आप सबका तारणहार। हम है मौत के सौदागर। हमारे यहां अनेकों प्रकार की मृत्यु है। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक आदि-आदि। हमारे अस्पताल में भर्ती होते ही आप तरह-तरह की मृत्यु के हकदार बन सकते हैं। अपनी पसंद की मृत्यु चुनने की सुविधा भी है, उसके लिए आपको अतिरिक्त पैसा देना होगा। हमारे यहां बहुत से ऐसे लोग आते हैं, जो आत्महत्या करना चाहते हैं। पर वे ट्रेन से कटकर, चूहामार दवा खाकर, पानी में कूदकर, नस काटकर या बुराड़ी कांड के जैसे अंधविश्वास में फंसकर, जलकर आदि तरीकों से मरने से डरते हैं। क्योंकि उसमें तकलीफ भी होती है, बदनामी भी। पर हमारे अस्पताल में मरने पर आपको और आपके परिवार को सहानुभूति मिलेगी। आप मीडिया की खबर बनकर अमर भी हो सकते हैं, सरकार मुआवजा भी दे सकती है। चाहते हैं ना ये सब तो आइए, हमारे अस्पताल में भर्ती हो जाइए। हमारे अस्पताल ने देश भर में अपनी शाखाएं खोल रही हैं, यदि आप फ्रैंचाइजी लेने के इच्छुक हैं, तो सूटकेस भर नोट के साथ अपना प्रोफाइल लाएं, जिसमें ये प्रमाणपत्र साथ हो, कि आप पर लोगों की दु:ख, तकलीफों का कुछ असर नहीं होता। आपके लिए पैसा ही माई बाप है।
महाराज, महारानी यह सब सुन गहरी सोच में डूब गए… फिर बोले, संजय आगे बता –
संजय- माते कभी-कभी ये अस्पताल तारणहार बी बन जावें –
धृतराष्ट्र- वो कैसे संजय,
संजय- ताऊ महाराज बहुत से ऐसे बुजुर्ग दंपति है जो जिनका काई ना है, कोई का है, तो बी वो अकेले हैं। वे जगह-जगह अपनी दरखास्त लेके घूम रए स कि हमें दया मृत्यु दे दो। हाथ पैर चलते, फिरते, दोनों साथ ही मर जावें। पर वहां के राजा जी लोग के यहां कोई सुनवाई ना हो री स। एक दंपति के घर तो मैं जाके बी आया।
ये सुन के माता गांधारी बोली, सच में बुढ़प्पा और अकेलापन – सहा नई जाता। तो संजय के होया, उन दंपति का –
संजय- माता उनणे इच्छा मृत्यु अस्पताल में नाम लिखा लिया स।
धृतराष्ट्र- भगवान भला करे इन अस्पतालों का बड़ा पुण्य का काम करते दिखे –
संजय- हां महाराज दो मीने पैले की बात होगी। एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का था, प्राइवेट इच्छा मृत्यु अस्पताल में उसके इलाज पे घर वालों ने दस लाख खरच दिए। कोमा में था कोमा से बाहर आया ई नई। पूरे निचुड़ गए बिचारे इनके पास पैसे भी ना थे, प्राइवेट अस्पताल खातिर, तो ये सरकारी इच्छा मृत्यु दवाखाणे में ले आए। उस अस्पताल वालों ने चूहों से कांट्रैक्ट कर रख्या है, कोमा में पड़े इस लड़के की आंख पर काट लिया चूहे ने, और तकलीफ देह जीवन से उस लड़के ने और उसके परिवार वालों ने मुक्ति दिला दी।
धृतराष्ट्र- और के करें संजय अस्पताल?
संजय- ताऊ महाराज कभी-कभी बड़े गलत लोगों ने भी मार देवे।
धृतराष्ट्र- वो कैसे?
संजय- वो ऐसे महाराज पिछले दिनों डायर अस्पताल में 20-22 साल के स्वस्थ लड़के न एम.आर. मशीन लील गई।
धृतराष्ट्र- हैं, या के होवे –
संजय- महाराज जो शरीर के अंदर का आंखों देख्या हाल बतावे। इसी अस्पताल में अभी कल ई एक मरीज केंटीण में मरया मिल्या।
धृतराष्ट्र- वहां तो खाणो बणे ना –
संजय- हां महाराज 40 मरीज की जगा, 70-80 मरीज ने भरती कर लेवे। जैथे जगहै मिलेगी वथे ही तो रखेंगे। महाराज अस्पतालों की महिमा बहुत व्यापक है। कई जगह, बिना डिग्री वाला नकली डॉक्टर भी मिले। जीरो नंबर मिला पर लक्ष्मी जी की महिमा स कई डॉक्टर बण जाव। पेट दर्द का नाम पर गुर्दा निकाल लेव। एक बार एक महिला मिली वो बताई, एक अस्पताल में कर्क रोग याने कैंसर का इलाज का लिए ऑपरेशन करना वाला था। मालूम पड्या कि उसने कैंसर ना है बल्कि क्षयरोग (टी.बी.) है। महाराज पाणी की शीशी में कुछ और रख देव, इनका डॉक्टर बिचारा कदे कदे मर जाव स ई पाणी न पीने।
धृतराष्ट्र- संजय या अस्पताल वाला यमराज स सांठ-गांठ कर राखी लाग।
संजय- वो तो मन्ने ना पता। पर मूनसिपालटी सा, बिजली वाला सा, रेलवे वाला सा, पी.डब्लू.डी. वाला सा कर राखी लागे। अस्पताल के आस-पास ग- े खोद राखन लाग रहे हैं। मेनहोल खोल देवे लोग चलते-चलते गिर जावें दो पहिया वाहन वाले गिर जावें, हाथ पैर सिर फोड़ लेवें, दिखता ना क्या इन लोगों ने –
महाराज बारिस का, नालों का पाणी भर जावे। रेलवे के पुल गिर जावें। बिजली के खुले तार से करंट लाग जावे। फिर अस्पताल पहुंचें तो, अस्पताल इन सबने मोक्ष दे देवे।
कुछ देखकर संजय का गला रूंध आया।
गांधारी- संजय तेरी आवाज ने के होया?
माते, एक आदमी बेचारा सब्जी बेचने जा रया था, पाणी भरा पड्या था, खुले तार थे, करंट लाग गया। अस्पताल था वहां ले जाया गया। मर गया। पर अस्पताल वाले, उसके मृत शरीर को ले जाणे के ताईं एम्बूलेंस ना दे रहे। रिक्शे में ढकेलकर उसके परिवार वाले ले के जा रए हैं।
अब संजय के आंसू और तेज हो गए।
संजय के होया…हमण बी बता…
संजय- महाराज, एक मां-बाप का एकई बेटा था। अस्पताल म गलत इलाज कर दिया। दो दिन से वेंटिलेटर (याणे कि सांस चलाकर रखना वाली मशीन) पर रख्या था उस मरे हुए बच्चे न बी। उसका मां-बाप सबकुछ बेच दिया पर बचा नईं पाया बेटा न। आज निर्जीव बेटे के शरीर न लेकर निकल्या है अस्पताल।
महाराज धृतराष्ट्र की दृष्टिहीन आंखें और महारानी गांधारी की आंखों की पट्टी नम थी। बस संजय आगे और ना सुण सकते। फिर सिसकते हुए धृतराष्ट्र बोले –
संजय तू म्हाने ले चलेगा, इस अस्पताल में।
क्यूं-
संजय अत्ते सालों से अकेले जीते-जीते थक गए हम। और अश्वस्थामा, बिचारा गले हुए शरीर के साथ न जाणे कठे-कठे भटक रया स। तू हम तीणों ने भी वहां भर्ती कर दे –
संजय उनके पैरों पड़ गया –
न महाराज मैं ना मांगूगा, जादा तनखा। आप लोग अस्पताल में भर्ती होणे की बात ना करो। मैं हमेशा आप लोग के साथ रहूंगा, और आंखों देख्या हाल सुणाऊंगा।
रूंधी आवाज में दोनों बोले –
संजय ऐसा आंखों देखा हाल सुणणे से तो मौत भली। तू तो ले चल म्हाणे इच्छा मृत्यु अस्पताल में।
अचानक हमें झटका लगा, और हमारे भीतर प्रविष्ट हुई आत्मा बाहर निकल गई हम वर्तमान में थे, और ऐसे एक अस्पताल में बिखरे हुए आंसू, भावनाए, आशाएं, कलम में लपेट कर बाहर निकल आए थे।

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