चीन की प्रकृति है, दगाबाजी व दोगलाई

चीन की दोगलाई कूटनीति तमाम राजनीतिक मुद्दों पर साफ दिखाई देती है। चीन बार-बार जो आक्रामकता दिखा रहा है, इसकी पृष्ठभूमि में उसकी बढ़ती ताकत और बेलगाम महत्वाकांक्षा है। यह भारत के लिए ही नहीं दुनिया के लिए चिंता का कारण बनी हुई है।

भारत और चीन की परस्पर मेल खाती हुई सभ्यता पांच हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है। करीब ढाई हजार साल से भारत-चीन के सांस्कृतिक संबंध बने हुए हैं। भारत ने संस्कृति के स्तर पर चीन को हमेशा नई सीख दी है। करीब दो हजार साल पहले बौद्ध धर्म भारत से ही चीन गया था। इसके पहले वहां कन्फ्यूशियसी धर्म था। दोनों को मिलाकर ’नवकन्फ्यूशसवाद’ बना। जिसे चीन ने स्वीकार किया।  संस्कृति के इसी मेल-मिलाप के बूते चीन ने ’हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा सृजित कर भाईचारे का राग अलापा। लेकिन 1962 में युद्ध छेड़कर भारत की पीठ में छुरा घोंपने का काम भी किया। तब से चीन की कटुता निरंतर बनी हुई है। चीन की बढ़ती सामरिक ताकत के साथ उसकी महत्वाकांक्षा भी बेलगाम हुई है। इसी कारण चीन जब चाहे तब दोगली कूटनीति पर उतर आता है।

संस्कृति के क्षेत्र में तो चीन का यह दोगलापन हर कहीं दिखाई देता है। जाहिर है पंचशील सिद्धांतों का आदर उसकी कार्यशैली में नहीं है। इसीलिए भारत ही नहीं चीन के ज्यादातर पड़ोसी देशों से मधुर संबंध नहीं हैं। चीन-सीमा से 14 देश जुड़ते हैं। दरअसल डोकलाम के बाद चीन को गलवान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जबरदस्त चुनौती मिल रही है। इसीलिए चीन के मुखपत्र ’ग्लोबल टाइम्स’ में धमकी दी गई है कि कोरोना से क्षतिग्रस्त अर्थव्यवस्था से कमजोर हुए भारत को अमेरिका के इशारों पर चीन से युद्ध मंहगा पड़ेगा। दरअसल चीन अब तक धोखाधड़ी करके भारत समेत अन्य देशों की सरजमीं में घुसपैठ कर हड़प नीति को अंजाम देता रहा है। किंतु अब उसकी इन कुटिल मंशाओं के मुकाबले में भारत खड़ा हो गया है।

1962 में चीन ने भारत पर अचानक हमला बोलकर पूर्वोत्तर इलाके की 40 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन हड़प ली थी। यही वह भू-भाग है, जिसमें कैलाश मानसरोवर स्थित है। यह स्थल भगवान शिव के आराध्य स्थलों में से एक है। इसका धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में दर्ज है। इन ग्रंथों में कैलाश मानसरोवर को अखंड भारत का हिस्सा बताया गया है। लेकिन भोले भंडारी अब चीन के कब्जे में हैं। चीन ने इतनी छूट जरूर दी हुई है कि वह वर्ष में एक बार भारतीय श्रद्वालुओं को भोले शंकर के दर्शन का अवसर दे देता है। वह भी अपनी शर्तों और चीनी सेना की देखरेख में।

हिमालय क्षेत्र में सीमा विवाद निपटाने के लिए 1914 में भारत-तिब्बत शिमला सम्मेलन बुलाया गया था। इसमें मैकमोहन रेखा से भारत-तिब्बत के बीच सीमा का बंटवारा किया गया था। चीन इसे गैरकानूनी औपनिवेशिक और पारंपरिक मानता है, जबकि भारत इस रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा का दर्जा देता है। 3488 किमी लंबी यही रेखा जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणचल और भूटान तक विवाद की जड़ बनी हुई है।

इस संबंध में 1890 में पहली बार सीमा समझौता हुआ था। इसके बाद तीन बड़े समझौते और भी हुए, लेकिन चीन इन्हें अपने अनुसार तोड़-मरोड़कर पेश करके अपना हक जमाता  रहता है। दरअसल चीन भारत के बरक्श बहुरूपिया का चोला ओढ़े हुए है। एक तरफ वह पड़ोसी होने के नाते दोस्त की भूमिका में पेश आता है और दूसरी तरफ ढाई हजार साल पुराने भारत चीन के सांस्कृतिक संबंधों के बहाने हिंदी-चीनी भाई-भाई का राग अलाप कर भारत से अपने कारोबारी हित साध लेता है।

चीन का तीसरा मुखौटा दुश्मनी का है, जिसके चलते वह पूरे अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोकता है। साथ ही उसकी यह मंशा भी हमेशा रही है कि भारत न तो विकसित हो और न ही चीन की तुलना में भारतीय अर्थवयवस्था मजबूत हो। इस दृष्टि से वह पाक अधिकृत कश्मीर, लद्दाख और अरुणचल में अपनी नापाक मौजदूगी दर्ज कराकर भारत को परेशान करता रहता है। इन बेजा हरकतों की प्रतिक्रिया में भारत द्वारा विनम्रता बरते जाने का लंबा इतिहास रहा है, इसी का परिणाम है कि चीन आक्रामकता दिखाने से बाज नहीं आता।

यही नहीं ‘गूगल अर्थ’ से होड़ बररते हुए चीन ने एक ऑनलाइन मानचित्र सेवा शुरू की है। जिसमें भारतीय भू-भाग अरुणाचल और अक्साई चिन को चीन ने अपने हिस्से में दर्शाया है। विश्व ़मानचित्र खण्ड में इसे चीनी भाषा में दर्शाते हुए अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताया गया है, जिस पर चीन का दावा पहले से बना हुआ है। वह अरुणाचलवासियों को चीनी नागरिक भी मानता है। यही नहीं चीन की एक साम्यवादी रुझान की पत्रिका में वहां की एक कम्युनिस्ट पार्टी के नेता का लेख छपा था कि भारत को पांच टुकड़ों में बांट देना चाहिए।

अब सवाल उठता है कि भारत इस कुटिल मंशा का जबाव किस लहजे और भाषा में दे? देश की विविधता को सांस्कृतिक एकरूपता से जोड़े रखने के लिए जज्बातों की मुखरता जरूरी है, क्योंकि अरुणाचल समेत समूचा पूर्वोत्तर भारत, प्राचीन समय से ही भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है। परशुराम और कार्तवीर्य अर्जुन के बीच जो भीषण युद्ध हुआ था, उसके अंतिम आततायी को परशुराम ने अरुणाचल की धरती पर ही मौत के घाट उतारा था। भगवान श्रीकृष्ण ने पूर्व से पश्चिम तक सामरिक व सांस्कृतिक दृष्टि से यात्राएं की थीं और मणिपुर व द्वारिका में सैनिक अड्ढे स्थापित किए थे। इसीलिए पूर्वोत्तर की सभी जनजातियां अपने पूर्वज रामायण और महाभारत के नायकों को मानती हैं। सूर्यदेव को आराध्य मानने वालीं अरुणाचल की 54 जनजातियों में से एक मिजो-मिश्मी अपने रक्त संबंध कृष्ण की पटरानी रुक्मिणी से जोड़ती हैं। इस लिहाज से अरुणाचल वासी आनुवंशिक दृष्टि से भारतीयों के निकटतम रक्त संबंधी हैं। लिहाजा चीन को अरुणाचल पर दावा थोपने की हरकतों से बाज आना चाहिए।

चीन की दोगलाई कूटनीति तमाम राजनीतिक मुद्दों पर साफ दिखाई देती है। चीन बार-बार जो आक्रामकता दिखा रहा है, इसकी पृष्ठभूमि में उसकी बढ़ती ताकत और बेलगाम महत्वाकांक्षा है। यह भारत के लिए ही नहीं दुनिया के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। दुनिया जनती है कि भारत-चीन की सीमा विवादित है। सीमा विवाद सुलझाने में चीन की कोई रुचि नहीं हैं। वह केवल घुसपैठ करके अपनी सीमाओं के विस्तार की मंशा पाले हुए है। चीन भारत से इसलिए नाराज है, क्योंकि उसने जब तिब्बत पर कब्जा किया था, तब भारत ने तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा के नेतुत्व में तिब्बतियों को भारत में शरण दी थी। जबकि चीन की इच्छा है कि भारत दलाई लामा और तिब्बतियों द्वारा तिब्बत की आजादी के लिए लड़ी जा रही लड़ाई की खिलाफत करे। दरअसल भारत ने तिब्बत को लेकर शिथिल व असंमजस की नीति अपनाई हुई है। जब हमने तिब्बतियों को शरणर्थियों के रूप में जगह दे दी थी, तो तिब्बत को स्वंतत्र देश मानते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच पर सर्मथन की घोषणा करने की जरूरत  थी। डॉ. राममनोहर लोहिया ने संसद में इस आशय का बयान भी दिया था। लेकिन ढुलमुल नीति के कारण नेहरु  ऐसा नहीं कर पाए।

    2016 में भारत का चीन से डोकलम क्षेत्र में सामरिक सड़क के निर्माण को लेकर विवाद हुआ था। डोकलम क्षेत्र को चीन ने चीनी नाम डोगलांग दिया है, जिससे यह क्षेत्र उसकी विरासत का हिस्सा लगे। इस क्षेत्र को लेकर चीन और भूटान के बीच कई दशकों से विवाद जारी है। चीन इस पर अपना मालिकाना हक जताता है, जबकि वास्तव में यह भूटान के स्वामित्व का क्षेत्र है। चीन अरुणाचल की तरह सड़क के बहाने इस क्षेत्र में स्थायी घुसपैठ की कोशिश में है। जबकि भूटान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है। दरअसल चीन अर्से से इस कवायद में लगा है कि चुंबा घाटी जो कि भूटान और सिक्किम के ठीक मघ्य में सिलीगुड़ी की ओर 15 किलोमीटर की चैड़ाई के साथ बढ़ती है, उसका एक बड़ा हिस्सा सड़क निर्माण के बहाने हथिया ले। चीन ने इस मकसद की पूर्ति के लिए भूटान को यह लालच भी दिया था, कि वह डोकलाम पठार का 269 वर्ग किलोमीटर भू-क्षेत्र चीन को दे दे और उसके बदले में भूटान के उत्तर पश्चिम इलाके में लगभग 500 वर्ग किलोमीटर भूमि ले ले। 2001 में जब यह प्रस्ताव चीन ने भूटान को दिया था, तभी वहां के शासक जिग्में सिग्ये वांगचूक ने भूटान की राष्ट्रीय विधान सभा में यह स्पष्ट कर दिया था कि भूटान को इस तरह का कोई प्रस्ताव मंजूर नहीं है। छोटे से देश की इस दृढता से चीन आहत है। इसलिए घायल सांप की तरह वह अपनी फुंकार से भारत और भूटान को डस लेने की हरकत करता रहता है।

अर्से से इन्हीं कूटिल कूटनीतिक चालों के चलते कम्युनिस्ट विचारधारा के पोषक चीन ने माओवादी नेपालियों को अपनी गिरफ्त में लिया और नेपाल के हिंदू राष्ट्र होने के संवैधानिक प्रावधान को खत्म करके प्रचंड को प्रधानमंत्री बनवा दिया था। चीन नेपाल की पाठशालाओं में चीनी अध्यापकों से चीनी भाषा मैंडरिन भी मुफ्त में सिखाने का काम कर रहा है। माओवादी प्रभाव ने ही भारत और नेपाल के प्राचीन रिश्ते में हिंदुत्व और हिंदी की जो भावनात्मक तासीर थी, उसका गाढ़ापन ढीला किया। गोया, चीन का हस्तक्षेप और प्रभुत्व नेपाल में लगातार बढ़ता रहा है। चीन की कू्रर मंशा यह भी है कि नेपाल में जो 20-22 हजार तिब्बती शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं, यदि वे कहीं चीन के विरुद्ध भूमिगत गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं तो उन्हें नेपाली माओवादियों के कंधों पर बंदूक रखकर नेस्तनाबूत कर दिया जाए।

भारत के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने कभी भी चीन के लोकतांत्रिक मुखौटे में छिपी साम्राज्यवादी मंशा को नहीं समझा। यही वजह रही कि हम चीन की हड़प नीतियों व मंसूबों के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े नहीं हो पाए और न ही कड़ा रुख अपनाकर विश्व मंच पर अपना विरोध दर्ज करा पाए। अलबत्ता हमारे तीन प्रधानमंत्रियों, जवाहरलाल नेहरू, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत को चीन का अविभाजित हिस्सा मानने की उदारता ही जताई। इसी खूली छूट के चलते ही बड़ी संख्या में तिब्बत में चीनी सैनिकों की घुसपैठ शुरू हुर्ह। इन सैनिकों ने वहां की सांस्कृतिक पहचान, भाषाई तेवर और धार्मिक संस्कारों में पर्याप्त दखलंदाजी कर दुनिया की छत को कब्जा लिया। अब तो चीन तिब्बती मानव नस्ल को ही बदलने में लगा है। दुनिया के मानवाधिकारी वैश्विक मंचों से कह भी रहे हैं कि तिब्बत विश्व का ऐसा अंतिम उपनिवेश है, जिसे हड़पने के बाद वहां की सांस्कृतिक अस्मिता को एक दिन चीनी अजगर पूरी तरह निगल जाएगा। ताइवान का यही हश्र चीन कर चुका है।

चीन कूटनीति के स्तर पर भारत को हर जगह मात देने की फिराक में रहता है। पाकिस्तान ने 1963 में पाक अधिकृत कश्मीर का 5180 वर्ग किमी क्षेत्र चीन को भेंट कर दिया। तब से चीन पाक का मददगार हो गया। चीन ने इस क्षेत्र में कुछ सालों के भीतर ही 80 अरब डॉलर का पूंजी निवेश कर दिया। चीन की पीओके में शुरू हुई गतिविधियां सामाजिक दृष्टि से चीन के लिए हितकारी हैं। यहां से वह अरब सागर पहुंचने की जुगाड़ में जुट गया है। इसी क्षेत्र में चीन ने सीधे इस्लामाबाद पहुंचने के लिए काराकोरम सड़क मार्ग भी तैयार कर लिया है। इस दखल के बाद चीन ने पीओके क्षेत्र को पाकिस्तान का हिस्सा भी मानना शुरू कर दिया। यही नहीं चीन ने भारत की सीमा पर हाइवे बनाने की राह में आखिरी बाधा भी पार कर ली है। चीन ने समुद्र तल से 3750 मीटर की उंचाई पर बर्फ से ढके गैलोंग्ला पर्वत पर 33 किमी लंबी सुरंग बनाकर इस बाधा को दूर कर दिया है। यह सड़क सामारिक नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि तिब्बत में मोशुओ काउंटी भारत के अरुणाचल का अंतिम छोर है। अभी तक यहां कोई सड़क मार्ग नहीं था। ये सभी कार्य चीन ने समझौतों के साथ छल करके किए हैं। अपने हितों के लिए चीन समझौतों की इबारत की परिभाषा अपने ढंग से गढ़ लेता है। चीन की ये साम्राज्यवादी मंशाएं उसके बहुरुपिए मुखौटे में छिपी धोखेबाजी की चालों से फलीभूत हो रही हैं।

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