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***अनिल सौमित्र****
ह कहने में कोईअितश्ायोिक्त नहीं हैकि धरती के अस्ितत्व के साथ अस्ितत्व में आईगंगा अब अपना अस्ितत्व खोज रही है। गंगा युगों-युगों से भारत की पिवत्रता का प्रतीक रही है। उत्त्ार भारत का उपजाऊ मैदानी क्षेत्रगंगा की पिवत्रिमट्टी सेनििर्मत है। भारत की सभ्यता-संस्कृति का िवकास गंगा और सहायक निदयों के ईर्द-िगर्दहुआ है। गंगा और उसकी पारिवारिक सहायक निदयां; और सहायक की सहायक निदयों से िमलकर बनता है‘गंगा परिवार’। गंगा परिवार में लगभग १००० छोटी-ब़डी निदयांशािमल हैं। गोदा यािन गोदावरी को तो गंगा का ही एक दूसरा रूप ‘दिक्षण गंगा’ कहा जाता है। नर्मदा, कृष्णा, कावेरी उसकी बहनें हैं। ब्रह्मपुत्रगंगा का भाईहै। ‘छत्त्ाीसग़ढ की गंगा’- महानदी; गंगा की सहेली है। जैसे गंगा की माया अपरम्पार है, वैसे ही हिमालयपुत्री गंगा को लेकर चिंताएंभी अपार हैं। राज और समाज की चिंता का सामूिहक उद्घोष है- नमािमगंगा परियोजना। स्वतंत्रभारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ हैकि निदयों के िवकास और कायाकल्प के लिए एक अलग मंत्रालयशुरू िकया गया है। केन्द्रकी भाजपानीत नरेंद्रमोदी सरकारने सर्वोच्चन्यायालयको आश्वस्त िकया हैिक गंगा नदी की सफाईसरकार के इसी कार्यकाल यें २०१८ तक पूरी हो जाएगी। केन्द्रसरकार के अनुसार, गंगा नदी के किनारे बसे ३० शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की योजना है, तािक गंदे पानी को नदी में जाने सेरोका जा सके। इस समय२४ प्लांट कार्यकर रहे हैंजबकि ३१ का निमर्ाण िकया िकया जा रहा है। २५०० किलोमीटर लंबी गंगा की सफाईके लिए नदी के तट पर बसे ११८ नगरपालिकाओं की िशनाख्त की गईहैजहांवेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट और सॉिलड वेस्ट मैनेजमेंट सिहत पूरी साफ सफाईका लक्ष्यहासिल िकया जाएगा। नेशनल ग्रीन िट्रब्यूनल एनजीटी ने यमुना में पूजा और निमर्ाण सामग्री तथा अन्यकचरा डाले जाने पर ५० हजार रूपये तक का जुमर्ाना लगाने का निर्देश िदया है। एनजीटी ने क़डे निर्देश देते हुए प्रदूषण िनयंत्रण बोर्ड से औद्याेिगक इकाइयों को नदी में कचरा बहाने की इजाजत नहीं देने को कहा है। नरेन्द्रमोदी सरकार के िवत्त्ा मंत्री अरुण जेटली ने वर्ष२०१४-१५ के बजट में पिवत्रगंगा नदी को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए ‘नमािमगंगे िमशन’ के तहत २०३७ करो़ड रुपए का प्रावधान िकया है। इसके अलावा गंगा के िलए प्रवासी भारतीयनििध बनाने का तथा इलाहाबाद से हल्िदया तक वािणज्यिक नौवहन शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया है। केंद्रीयजल संसाधन मंत्री उमा भारती ने कहा ‘गंगा सिर्फ धािर्मक नदी नहीं है, बल्िक करीब ५० करो़ड लोग इस पर िनर्भर हैं। देश कीअर्थव्यवसस्था को मजबूत करने के िलए इसे रोटी और रोजगार से जो़डा जाना चािहए।’ उन्होंने कहा िक गंगा की उत्पित्त्ा उत्त्ाराखंड में होती हैऔर राज्यको हर्बल राज्यमें बदला जा सकता है, क्योंिक यहांसमृद्धजैव वििवधता है। सुश्री भारती ने कहा, ‘मैंबांध के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन कुछ खास डिजाइनों के खिलाफ हूं, जो गंगा के िलए नुकसानदायक है।’
गंगा का मामला सिर्फ पैसे के खर्चऔर लेन-देन का ही नहीं, बल्िक हमारे अपने अस्ितत्व का भी है। भला कौन सोच सकता था िक जो गंगा, माता के रूप यें मुिक्तदाियनी हैं, वही स्वयंकी मुिक्त के िलए आर्तनाद कर रही हैं। शोषण और प्रदूषण से गंगा छलनी हैं। िजस गंगा का पानी बरसों रखने के बाद भी शुद्धऔर स्वच्छ रहता था, वह आज दुिनया की सर्वािधक गंदी और प्रदूषित नदियों में शुमार है। दरअसल गंगा में ७०-७५ प्रितशत प्रदूषण नगरीय और शहरीिनकायों का गैर-उपचारित सीवेज छो़डे जाने के कारण है। किंतु गंगा की स्वच्छता के लिए सीवेज िनयंत्रण, अपिशष्ट उपचार और औद्योिगक प्रदूषण रोकने के अलावा नदी के जल-ग्रहण क्षेत्रका उपचार, बा़ढ क्षेत्रके संरक्षण और खेतों से नदी में आने वाले गैर-घुलनशील कीटनाशकों को भी रोकने की जरूरत है। सच्चाईये हैिक गंगा का संकट मानव-नििर्मत है। नगरीय समाज ज्यादा से ज्यादा अनागरिक कामों में लगा हुआ है। मल-जल और औद्योिगक कचरा और जल निदयों के हालात बद से बदत्त्ार कर रहा है। मुद्दा सिर्फ राशि के उपयोग भर कानहीं, उससे ज्यादा संकल्प और िवकल्प का है। गंगा के प्रित आस्था, श्रद्धा और समर्पण को बनाए और बचाये रखने का है। गंगा सरकारी न हो जाए, बल्िक हमारी थी, हमारी ही बनी रहे। भारत में निदयांऔर अन्य प्राकृितक जल स्रोत सिर्फ आस्था या पूजा का िवषय नहीं रहे हैं, बिल्क यह सम्पूर्णजीवन शैली से जुडे रहे हैं। मैदानी क्षेत्रों के लिए निदयांजीवन-रेखा हैं। िवकास का हर पहलू इनसे जु़डा होता है।
निदयों की सफाईके बारे में उदासीनता और अज्ञानता ऊपर से नीचे तक है। प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में नेशनल रिवर कंजरवेशन अथॉरिटी (एनअारसीए) का गठन १९९५ में हुआ था और इसकी अंितमबैठक २००३ में तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल िबहारी वाजपेयी के नेतृत्व में हुईथी। यूपीए शासन के दौरान तयिकया गया था िक हर वर्षप्रधान मंत्री की अध्यक्षता में एनआरसीए की बैठक होगी, लेकिन मनमोहन सिंह के नेतृत्वमें एक भी बैठक नहीं हुई। न केवल एनआरसीए की बैठक नहीं हुईवरन इसकी स्टीयरिंग कमेटी की बैठक भी २००७ के बाद से नहीं हुई। स्टीयरिंग कमेटी का प्रमुख मंत्रालयका सिचव होता हैऔर इसकी हर तीन महीने में बैठक करना अिनवार्यथा। गंगा रिवर बेसिन अथाॅरिटी का २००९ में गठन िकया गया था, लेिकन इसके द्वारा एक भी ठोस फैसला नहीं िकया गया। हालांिक भाजपानीत एनडीए सरकार ने प्रधान मंत्री नरेन्द्रमोदी की अगुआईमें पहल की है। लेिकन केन्द्रऔर राज्यों में अलग-अगल दलों के शासन के कारण भी गंगा सफाईअिभयानमें की अडचनें हैं्।
अडचन सिर्फ परस्पर िवरोधी दलों की सरकारों के कारण ही नहीं है। इसके अलावा भी कईअडचनें हैं। भाजपा के भीतर भी पानी और नदी को लेकर कईसैद्धांितक मतभेद हैं। यद्यिप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा की नदी संरक्षण पहल से सहमत है, लेकिन सरकार की सोच और तौर-तरीकों को लेकर वह अपनी असहमित भी जता चुका है। लेकिन नमािमगंगा परियोजना के िलए सबसे ब़डी चुनौित इसे जनमानस का अिभयान बनाने को लेकर है। जबतक यह सरकारी परियोजना के रूप में रहेगी इसकी सफलता संिदग्ध है। आवश्यकता इस बात की हैिक गंगा के मुद्दे पर सरकार और समाज का मन एक बनें। चुंिक नदियों के पुनर्जीवन में िवदेशी संगठनों की रूिच भी है। िवश्वबैंक से लेकर जापान और अन्य देशों की अनेक संस्थानों ने गंगा स्वच्छता में अपनी भूिमका के िलए रूिच प्रदिर्शत की है, जरूरी नहीं उनकी रूिच, तौर-तरीकों और शर्तों को भारत का समाज स्वीकार करे। समाज के लिए निदयांतीर्थहैं, सरकार इसे पर्यटन में तब्दील करना चाहती है। गंगा सहित तमामनिदयांिवकास को अपनी शर्तों पर स्वीकार करती रही हैं, पता नहीं गंगा सरकार या व्यापारियों की शर्तों को स्वीकार करेंगी या नहीं। ये स्िथितयांवर्तमान सरकार की चुनौितयांहैं। इन िवरोधाभासी परिस्िथितयों में सतत प्रयास को सरकार का दुस्साहस भी कहा जा सकता है। मोदी और भारती के प्रयासों को इसिलए दुस्साहसी कहा जा सकता हैिक पूर्वकी सरकारों ने भी गंगा सफाईके िलए कईसफल प्रयास िकए। राजीव गांधी ने प्रधान मंत्री पद पर आसीन होते ही राष्ट्र के नामअपने पहले संबोधन में ६ जनवरी, १९८५ को गंगा को निर्मल करने संबंधी एक प्रमुख कार्यक्रमकी घोषणा की थी। फरवरी, २००९ में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित िकया था। साथ ही, अपनी अध्यक्षता में नेशनल गंगा रिवर बेिसन अथॉरिटी (एनजीआरबीए) के गठन की घोषणा की थी। इसमें उत्त्ाराखंड, उत्त्ार प्रदेश, िबहार, झारखंड और पिश्चमबंगाल के मुख्य मंत्रियों के अलावा प्रिसद्धकार्यकर्ताओं और पेशेवरों को शािमल किया गया।
फरवरी, २००९ और मार्च२०१४ के बीच एनजीआरबीए ने क्लीन गंगा िमशन िक्रयान्िवत किया। इसका मुख्य उद्देश्य २०२० तक सुनििश्चत करना था कि नगर िनकायों का गैर-उपचारित सीवेज या औद्योगिक अपिशष्ट नदी में नहीं बहाया जाए। इस िमशन के दो लक्ष्य थे-निर्मल धारा और अिवरल धारा। दोनों उद्देश्यों को पूरा करने के िलए एनजीआरबीए ने पांच दूरगामी फैसले किए। पहला यह िक इसने उत्त्ार प्रदेश में सीवेज िनयंत्रण और उपचार के िलए २,७०० करो़ड रुपए की ८१ परियोजनाओं को मंजूरी दी। बिहार के िलए १,४०० करो़ड रुपए, प. बंगाल के िलए १,२०० करो़ड रुपए, उत्त्ाराखंड के िलए २५० करो़ड रुपए तथा झारखंड के िलए १०० करो़ड रुपए की मंजूरी दी गई। यह प्रयास नदी के ३,६०० किमी. से ज्यादा लंबे िहस्से के िलए सीवेज नेटवर्क बनाने तथा प्रितदिन ७०० िमिलयन लीटर सीवेज उपचार की क्षमता का विकास करनेके मद्देनजर किया गया था। वाराणसी के िलए अलग से ५०० करो़ड रुपए की परियोजना मंजूर की गई। दूसरे फैसले के तहत एनजीआरबीए के िलए आईआईटी-कानपुर के मार्गदर्शन में आईआईटी संकाय स्थापित किया गया। इसे समग्रगंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान तैयार करने की िजम्मेदारी दी गई। तीसरा फैसला यह किया गया िक गांगेय डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव माना गया तािक नदी को पुनःस्वच्छ बनाने का यह प्रतीक बन सके। चौथे िनर्णय के तहत केंद्रीय प्रदूषण िनयंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने पहली बार अनेक प्रदूषणकारी उद्योगों काे नोटिस जारी िकया। पांचवें फैसले के अंतर्गत भागीरथी के ऊपरी तरफ तीन पनबिजली परियोजनाओं लोहारिनाग पाला, पाला-मनेरी तथा भैरोंघाटी को परिस्िथतिकीय कारणों से रोक दिया गया। साथ ही, गोमुख से उत्त्ारकाशी तक के १०० किमी. लंबे िहस्से को नियिमत पिरस्िथितकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रघोषित कर दिया गया। निर्मल और अिवरल गंगा के लक्ष्य की ओर ये कुछ शुरूआती प्रयास हैं।
अगर सच में हमभारते के अस्ितत्व को बचाए रखने के आग्रही हैंतो हमें गंगा को हर हाल में निर्मल और अिवरल करना ही होगा। गंगा की अविरलता, उसे निर्मल रखने की पहली शर्तहै। भारत में गंगा निदयों की प्रतीक है, प्रितनििध हैं। गंगा के प्रित आस्था हो, और अन्य निदयों के प्रित अनास्था यह सम्भव नहीं। भारतीय प्रत्येक नदी को गंगा मानता है। वह प्राकृितक संसाधनों को समाज की थाती मानता है। यहांका मानस िवश्वास करता हैकि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’ इसलिए एक बार अगर भारतीय मानस गंगा के प्रित सजग और चैतन्य हो गया तो वह देश की सभी निदयों के प्रित आस्थावान और संवेदनशील हो जाएगा।

मो. : ९४२५०१४२६०

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