डिजिटल रनवे से एक नई उड़ान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने जिस तरह से डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है और पोर्ट ब्लेयर ही नहीं, देश की ढाई लाख ग्राम पंचायतों को इंटरनेट के ब्रॉडबैंड कनेक्शन से जोड़ने के लक्ष्य के मद्देनजर काम हो रहा है, उससे उम्मीद है कि देश के समग्र विकास की राह निश्चित ही खुलेगी।

देश के शहरों से गांव-कस्बों की तरफ बढ़ते हुए जब ऊंची रिहायशी और कॉरपोरेट इमारतों का सिलसिला खत्म होता है और खेत-खलिहान दिखने लगते हैं तो गांवों की इस तस्वीर को देखकर लगता नहीं है कि वहां इंटरनेट के बारे में किसी ने कुछ सुना भी होगा। शायद आज से 12 या 15 साल पहले भारत के गांवों की दुनिया ऐसी ही थी। लेकिन अब तो गांव-देहात में भी बच्चा-बच्चा इंटरनेट, स्मार्टफोन, ओटीटी आदि तमाम उन चीजों से परिचित है, जिनकी हम सिर्फ शहरों में कल्पना कर रहे थे। कोरोना काल के इस संकटकालीन दौर में तो इंटरनेट पढ़ाई और खरीदारी से लेकर तमाम चीजों का सहारा बन गया है। ऐसे में जब हमें यह खबर मिलती है कि हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चेन्नई और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (पोर्ट ब्लेयर) को जोड़ने वाली सबमरीन ऑप्टिकल फाइबर केबल (जऋउ) का उद्घाटन किया है, तो एक आश्वस्ति जगती है कि देश के दूरदराज और दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए भी इंटरनेट अब कोई पराई या अनजानी चीज नहीं रह जाएगी। खास तौर से वह ब्रॉडबैंड, जिसके जरिए राजकाज ही नहीं, पर्यटन और सूचना प्रौद्योगिकी की उन चीजों में काफी सहूलियत हो जाएगी, जिसके लिए तेज रफ्तार वाले इंटरनेट की जरूरत होती है।

तथ्य बताते हैं कि इस ब्रॉडबैंड सेवा के तहत समुद्र के नीचे बिछे केबल से चेन्नई और पोर्ट ब्लेयर के बीच 2200 गीगाबिट्स प्रति सेकंड (ॠलिी) और पोर्ट ब्लेयर से अन्य द्वीपों के बीच 2100 ॠलिी की बैंडविड्थ इंटरनेट उपयोगकर्ताओं (यूजर्स) को मिल सकेगी। चूंकि तेज इंटरनेट आज दूरसंचार की बढ़ती जरूरतों के मद्देनजर एक जरूरी सेवा बन गया है, यह उम्मीद कर सकते हैं कि गहरे समुद्र की तलहटी में बिछाई गई 2,300 किलोमीटर लंबी केबल के सहारे मिलने वाले ब्रॉडबैंड से पोर्ट ब्लेयर के साथ-साथ स्वराज द्वीप (हैवलॉक आइलैंड), लिटिल अंडमान, कार निकोबार, कामोरता, ग्रेट निकोबार, लांग आईलैंड और रंगट आदि द्वीपों पर रोजगार और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। जिस तरह एक जमाने में रेल, सड़क, बिजली-पानी की सहूलियत को लोगों के जीवन स्तर में बढ़ोत्तरी से जोड़ा जाता था, कह सकते हैं कि उसी तरह अंडमान निकोबार द्वीप समूह के निवासियों के जीवन में भी यह ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी एक नया परिवर्तन लाएगी। एक उल्लेखनीय बात पोर्ट ब्लेयर तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाने के काम को तेजी की भी है। इस योजना को करीब डेढ़ साल पहले 30 दिसंबर, 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिलान्यास के साथ शुरू किया था। इस बीच वर्ष 2020 की पहली तिमाही से कोरोना संकट के कारण देश के विकास के ज्यादातर रुके हुए हैं, लेकिन पोर्ट ब्लेयर को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी दिलाने के काम में कोई ढिलाई नहीं बरती गई। सवाल है कि इस योजना में आखिर ऐसा क्या खास है जो लोगों को इतना आकर्षित कर रही है। असल में चेन्नई से पोर्ट ब्लेयर तक 23 किलोमीटर सबमरीन ऑप्टिकल केबल बिछाने का काम भारत ने अपने दम पर पूरा किया है। इसके लिए जहाजों की मदद से पहले समुद्र के भीतर रास्ता (वे या लिंक) तैयार किया गया, फिर उसमें अंडर-सी ऑप्टिकल केबल डाला गया। करीब सवा 1200 करोड़ रुपये के खर्च से डाली गई इस केबल का सबसे बड़ा फायदा यही है कि अब पोर्ट ब्लेयर में ब्रॉडबैंड इंटरनेट की स्पीड 10 गुना बढ़ गई है, जिससे वहां के यूजर्स पहले के मुकाबले 20 गुना ज्यादा डाटा आसानी से डाउनलोड कर सकेंगे। इससे सरकारी दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल के सभी प्लान की स्पीड 2-10 गुना तक बढ़ जाएगी और लोग एक महीने में 60 जीबी की बजाय 1500 जीबी तक डाटा डाउनलोड कर सकेंगे।

आंकड़ों से अलग होकर देखें तो कह सकते हैं कि हमारे देश में कुछ वर्ष पहले डिजिटल इंडिया की जो मुहिम लोगों का जीवन स्तर उठाने के अंतिम लक्ष्य के साथ शुरू की गई थी, अब उसका ठोस असर दिखने लगा है। हालांकि इसमें भी संदेह नहीं है कि हमारे देश में अभी इंटरनेट शहरी और अमीर तबके को संबोधित करने वाली सुविधा है। इंटरनेट के नेटवर्क, कंटेंट और रेट- इन तीनों पर शहरों के अमीरों और प्रभुत्वशाली तबके का कब्जा है। यानी भारत में इंटरनेट का अभी जो नेटवर्क मौजूद है वह शहरी व संपन्न इलाकों में है। इस पर जो कंटेंट यानी सामग्री है, उसके ग्राहक या उपभोक्ता यही शहरी लोग हैं। और तीसरी महत्वपूर्ण चीज यानी इंटरनेट की लागत (रेट) भी अभी अमीरों की जेब मुताबिक ही है। गांव-कस्बों में बसने वाले इस भारत का डिजिटल संसार में पिछड़ापन इतना अखरने वाला है कि एक ओर आज जहां हमारे शहर शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और खरीदारी से लेकर रेल आरक्षण तक में मोबाइल, इंटरनेट के जरिये घर बैठे सुविधा पा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण और दुर्गम इलाकों की जनता का ज्यादातर हिस्सा इन सारी सहूलियतों के कोसों दूर रही है। यही नहीं, खेती-किसानी से आपदाओं तक के मामलों में यह कई बार साफ हुआ है कि दूरदराज के इलाकों में रहने वाली जनता को अगर तेज व सस्ते इंटरनेट जैसी सहूलियतें मिल जाती हैं तो वह न केवल सरकारी योजनाओं का फायदा उठाने लगती है, बल्कि अपने विकास का कोई रास्ता भी खोज लेती। ऐसे में मोदी सरकार की इस संबंध में की गई पहलकदमियां काफी राहत देती हैं।

वैसे तो पिछली यूपीए सरकार के शासन काल में देश की ढाई लाख ग्राम पंचायतों को ब्रॉडबैंड इंटरनेट से जोड़ने का संकल्प किया गया था। लेकिन कई बार डेडलाइनें (आखिरी तारीखें) आगे बढ़ाने के बावजूद यह संकल्प अधर में ही लटका रहा क्योंकि इस दावे की हकीकत यह रही कि वर्ष 2015 तक सिर्फ 60 गांवों में इंटरनेट पहुंचाया जा सका है। 2011-12 के बजट में नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क (एनओएफएम) के तहत देश के लाखों गांवों को इंटरनेट से जोड़ने का प्रस्ताव किया गया था। पहले यह प्रोजेक्ट 2012 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, जिसकी समय सीमा 2013 और फिर बढ़ाकर 2015 तक दी गई। इस लेटलतीफी के बारे में पहले यह बहाना बनाया गया कि इस प्रोजेक्ट से जुड़ी निजी कंपनियां वित्तीय सुस्ती की शिकार हैं लिहाजा यह काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है। बाद में इस प्रोजेक्ट को सार्वजनिक क्षेत्र के टेलिकॉम कंपनी- बीएसएन से जोड़ दिया गया, तो भी इस परियोजना में कोई गति नहीं आ पाई। यह स्थिति तब बनी थी जबकि इसके लिए पैसे का इंतजाम यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (यूएसओएफ) के जरिये किया जाता रहा। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने जिस तरह से डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है और पोर्ट ब्लेयर ही नहीं, देश की ढाई लाख ग्राम पंचायतों को इंटरनेट के ब्रॉडबैंड कनेक्शन से जोड़ने के लक्ष्य के मद्देनजर काम हो रहा है, उससे उम्मीद है कि देश के समग्र विकास की राह निश्चित ही खुलेगी।

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