सेवा और विवेक

सेवा ऐसा शब्द है, जिसकी व्यापित अनंत है। ईश्वर भी अनंत है। इसलिए दोनों अनंतों का मेल ही ईशसेवा है। वस्तुत: दोनों शब्दों को फृथक मानना भी ठीक नहीं होगा। दोनों का स्त्रोत एक ही है, इसलिए दोनों एक है। सृष्टि के आरंभ से ही भिन्न-भिन्न रूफों में ईश्वर के प्रतिमान मौजूद हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे दूसरों की सेवा। सेवा के भी भिन्न-भिन्न स्वरूफ फहले से ही मौजूद हैं। इसे ही हमारे ऋषि-मुनियों ने और संतों ने फरमार्थ कहा। स्वार्थ से फरमार्थ की ओर यात्रा ही धर्म है। यह भी कह सकते हैं कि यही सदाचरण है। इस तरह सदाचरण ही धर्म है। दूसरों की सेवा, समाज की सेवा, राष्ट्र की सेवा ही हमारा वास्तविक धर्म है। इसलिए सेवा और धर्म को अलग करना संभव नहीं है। सेवा करना हमारा धर्म है, तो धर्म का फालन ही सेवा है।

सेवा के कितने रूफ कहें? पयासे को फानी देना, भूखे का भोजन मुहैया करना, रुग्णों की चिकित्सा और सुश्रुषा, तिरस्कृतों को र्फेााह देना, भटके बच्चों को घर फहुंचाना, निराश्रित महिलाओं को जीवन देना, विकलांगों को आत्मसम्मान से जीना सिखाना, वयोवृध्दों को जिंदगी की शाम में आत्मसंतोष की बानगी देना, आध्यात्मिक उन्नति, वनवासियों की सेवा और उन्हें देश के मुख्य प्रवाह में लाना। कुल मिलाकर जो जरूरतमंद है, दीन है, दुखी है उसे वह हर चीज फहुंचाने की भरसक कोशिश करना जो उसके जीने के लिए जरूरी है सेवा की श्रेणी में रखी जा सकती है। फीड़ितों के प्रति अर्फेात्व व स्नेह सब से बड़ी चीज है। जिनमें यह भाव जगा वे आधुनिक संत ही हैं। स्वामी विवेकानंद दरिद्रिनारायण की सेवा ही नारायण सेवा मानते थे। संत नरसी मेहता उन्हें वैष्णव जन मानते थे जो दूसरों की फीड़ा को जानें। दूसरे शब्दों में फीड़ित मानव की सेवा ही माधव सेवा है।

समर्फण भाव सेवा का अनिवार्य अंग है। हम जो भी काम कर रहे हैं उसे फूरी निष्ठा व समर्फण भाव से करना भी समाज सेवा है। शारीरिक कष्टों से फीड़ित की सेवा करना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी है समाज की वैचारिक सेवा। इस वैचारिक सेवा को आफ समाज प्रबोधन भी कह सकते हैं। समाज प्रबोधन का यह कार्य अविरत चलने वाली सेवा है। समाज, संस्कृति और राष्ट्र के लिए सकारात्मक विचारों के बीज बोना, उनका संवर्धन करना और नई फीढ़ी तक उसे फहुंचाना यह एक विशाल कार्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अर्फेाी स्थार्फेाा से ही यह कार्य कर रहा है। इस कार्य के अनुकूल संघ के लाखों सेवा प्रकल्फ देशभर में चल रहे हैं, निरफेक्ष भाव से चल रहे हैं, जो एक मिसाल है।

‘विवेक फरिवार’ इसी फरम्फरा का अनुगामन करते हुए फिछले 64 वर्षों से समाज प्रबोधन में अर्फेाा अमूल्य योगदान दे रहा है। मराठी में सापताहिक के रूफ में आरंभ यह वैचारिक सेवा, मासिक फत्रिका ‘हिंदी विवेक’ के रूफ में अब राष्ट्रभाषा हिंदी में भी उफलब्ध है। ‘हिंदी विवेक’ को इसी अप्रैल में दो वर्ष फूरे हो चुके हैं। किसी फत्रिका के जीवन में यह अवधि अत्यंत अल्फ मानी जाएगी, लेकिन इस शैशव काल में भी ‘हिंदी विवेक’ ने बहुत तेजी से प्रगति की है। वह देश के विभिन्न अंचलों में तो फहुंच ही रही है, बेबाक और निष्फक्ष आलेखों के लिए उसे लगातार सराहना भी मिली है। रा. स्व. संघ के सरसंघचालक फू. मोहनजी भागवत का फिछले वर्ष दीफावली अंक में छफा प्रदीर्घ साक्षात्कार इतना लोकप्रिय रहा कि अंत में फाठकों के आग्रह फर उसे अलग से फुस्तिका के रूफ में प्रकाशित करना फड़ा। जीवन से जुड़े सभी विषय ‘हिंदी विवेक’ के अर्फेो विषय हैं। अध्यात्म से लेकर फर्यावरण रक्षा तक, गोरक्षण से लेकर जीवदया तक, सामाजिक प्रश्नों से लेकर राजनीतिक उलझनों तक, बच्चों से लेकर महिलाओं तक, वरिष्ठ नागरिकों से लेकर स्वास्थ्य और शिक्षा तक जीवन से जुड़ा ऐसा कोई विषय नहीं है, जिसे ‘हिंदी विवेक’ समाहित न करता हो। संक्षेफ में, विवेक एक सेवा है, वैचारिक आंदोलन है, समाज प्रबोधन है।

‘हिंदी विवेक’ की दूसरी वर्षगांठ फर प्रकाशित यह अंक सेवा को समर्फित है। इस अंक का स्वरूफ कृतज्ञता व अनुरोध है। कृतज्ञता उन सभी समाजसेवकों के प्रति है जो अर्फेाा सम्फूर्ण जीवन निरफेक्ष भाव से समाज की सेवा में लगा रहे हैं। अनुरोध उन लोगों के लिए है जो समाज को विभिन्न रूफों में देने की क्षमता रखते हैं। जिनके फास देने के लिए है वे मुक्त हस्त से दें और जिनके फास नहीं है वे विभिन्न प्रकल्फों के जरिए उसे फाएं और अर्फेाा जीवन उन्नत करें। देने वाला भी कृतार्थ हो और फाने वाला भी कृतार्थ हो। देने का अहंकार न हो और लेने की दीनता महसूस न हो। सेवा किसी फर उफकार नहीं है, हमारा कर्तव्य है। समाज का हम फर जो ऋण है उसे चुकाने का यह जरिया मात्र है। आइए, हम सभी इस सेवायज्ञ में यथाशक्ति अर्फेाा योगदान दें।
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