अकबर बीरबल की नई कहानी

शाहंशाह, जिल्ले सुभानी, बादशाह अकबर छोटे दरबार में बिराजे थे। वहां एक समस्या पर विचार चल रहा था। बात स्वयं बादशाह ने ही आरंभ की थी। उस दरबार-कक्ष के बीच पानी से कुछ भरी बाल्टी और लोटा रखा था। दरबारी, जो पंद्रह-बीस की संख्या में थे वे आपस में बतिया रहे थे। बीच-बीच में बादशाह सलामत भी कुछ बोलते थे। हंसी-मजाक भी होती थी। पर सभी की नजरें बार-बार बाल्टी और लोटे पर अटक जाती। सभी के मन में यह प्रश्न उठता कि आज ये पानी बीचों-बीच क्यों रखा है? बादशाह का क्या विचार है? किसी तीर्थ का पवित्र जल तो नहीं है? किसी से कपड़े धुलवाने का या किसी को स्नान कराने का विचार तो नहीं है? ये भी बातें वे दरबारी आपस में कर रहें थे। अकबर भी ये सुन रहे थे पर बोले कुछ नहीं। आखिर अपने आसन से उठकर वे बाल्टी-लोटे के पास आये और लोटे का सारा पानी बाल्टी में उ़ंडेल कर अपने आसन की तरफ आने लगे। सारे दरबारी यह देख आवाक रह गये। बादशाह हुजूर यह क्या कर रहे हैं? थोड़ा सा रुककर बादशाह ने दरबारियों से पूछा, ‘‘आप में से कौन है जो वह पानी अलग करके दिखायेगा, जो मैने लोटे में से बाल्टी में मिलाया है? उसे हम कल के दरबार में एक हजार दीनार बख्शीस के रूप में देंगे। और यदि वह नहीं कर सका,तो उसका मुंह काला करके फजर से तीन घड़ी तक चांदनी चौक में खड़ा रखा जाएगा!!’’ दरबारी यह सुन कर गर्दन नीचे लटकाए चुपचाप बैठे रहे। काफी समय बीत गया, तो अकबर ने मुल्ला दो प्याजा से पूछा, ‘‘अबे मुल्ला, तू अब कुछ बोल क्यों नहीं रहा है?’’

मुल्ला ने नम्रता से कहा, ‘‘हुजूर मैं क्या कहूं? जनाब बीरबल अभी तशरीफ नहीं लाए हैं। उनके आने के बाद हम सोचेंगे!’’ मुल्ला दो प्याजा बड़ा हंसोड़ तथा मजाकिया दरबारी था। पर वह बीरबल से बहुत जलता था। बादशाह सहित सभी यह बात जानते थे। फजल ने ये ध्यान में रखकर कहा, ‘‘मियां, बादशाह हुजूर ने आप से पूछा है,बीरबल को क्यों बीच में घसीटते हो?’’ सब लोग हंसने लगे। तभी अकबर ने कहा, ‘‘अरे, ये बीरबल कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। वे है कहां?’’

मुल्ला ने कहा, ‘‘देखा हुजूर, आज बीरबल आये ही नहीं! फिर आएगें तो कहेंगें कि ‘मुल्लाजी’ ने तो प्रश्न हल कर दिया है, तो मैं अब क्या करूं?’’ आगे बादशाह सलामत ने ही कहा, ‘‘ठीक है, बीरबल को दरबार में बुला लाओ!’’

शीघ्रता से एक हरकारे को बीरबल के यहां भेजा गया और वह उन्हें ले भी आया। बीरबल ने बादशाह हुजूर का कुर्निसात कर के अदब से खड़े हो कर पूछा, ‘‘परवर दिगार, हुजूर ने इस नाचीज को क्यों याद किया है?’’ ऐसा कहते ही उसने अपनी नजर मुल्ला पर भी फेर दी और हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई। बादशाह ने देखा और मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘बीरबल, तुम्हें एक काम करना है। अगर तुम नहीं कर सके, तो ये मुल्लाजी कर के दिखाएंगे। और ऐसा होने पर तुम्हारी हार मान कर ‘माबदौलत’ कल फज़र से दोपहर बाद तक मुंह काला कर, फटे कपड़े पहन के चांदनी चौक में खड़ा होने का फर्मान देंगे।’’स्वयं अकबर भी यही चाहता थे कि बीरबल की एखाद बार तो फजीहत हो, हार हो। चतुर बीरबल यह सब जानते थे। उसने उस दिन हरकारे से दरबार में बादशाह नें क्यों बुलाया है यह जान गये थे; साथ ही, उस की तोड़ की तैयारी से ही आये थे। फिर भी उन्होंने अनजान बनकर पूछा, ‘‘हुजूर, इस खादिम क्या खिदमत कराना चाहते हैं?’’

बादशाह ने कहा, ‘‘बीरबल, तुम देख रहे हो सामने की बाल्टी में कुछ पानी भरा है। उसी में हमने लोटे का पानी मिला दिया है। अब हमें लोटे का ही पानी अलग निकाल कर दो! नहीं तो हार मानकर हमारी सजा भुगतो!

बीरबल ने कहा, ‘‘हुजूर, माफ करें, बीच में बोलना, मेरी बेअदबी न समझें। बादशाह सलामत, मैं नहीं चाहता कि बुजुर्गवार और निहायत कमजोर मुल्लाजी को ‘वही’ लोटाभर पानी निकालने का भारी मेहनत वाला काम करना पड़े। फिर भले मेरी ही कोशिश नाकाम ही क्यों न रहे। मैं इसके लिए कोई भी सजा भोग लूंगा।’’ इतना कह के वो अदब से खड़े हो गये। ये सारी बातें देख-सुन के सारे दरबारी और अकबर भी खिलखिला कर हंसने लगें। बीरबल ने आगे कहा, ‘‘हुजूर इस काम के लिये मुझे एक सोटे की जरूरत है!’’ इतना सुनकर तो जैसी हंसी का फव्वारा फूट पड़ा! तभी मुल्ला दो प्याजा ने जोर से कहा, ‘‘ओ, सुनो मेहेरबानों! ये बीरबल अब बाल्टी के पानी को सोटे से पीट-पीट के हुजूर के लिए ‘वह’ लोटाभर पानी ले आएंगे! इसी व्यंग्य, विनोद और हास्य के बीच ही अकबर ने बीरबल को सोटा लाने की अनुमति दी। तब बीरबल ने हरकारे से सोटा मंगवा लिया। दरबार में धीरे-धीरे हंसी थमती गई और उसका स्थान उत्सुकता ने ले लिया कि अब ये बीरबल कैसे सोटे सेे मार-मार कर बाल्टी के पानी से ‘वह’ लोटाभर पानी अलग निकालते हैं? वहां, सोटा आने पर बड़े उत्साह से बीरबल ने बादशाह से ‘काम’ करने की अनुमति मांगी। अकबर ने भी उस छोटे पर काले-चमकीले डंडे को हंसकर देखते हुए हाथ से इशारा किया, बीरबल ने भगवान शंकर का जोरों से स्मरण करके, नमन किया। फिर तुरंत बीरबल ने जोर-जोर से बाल्टी के पानी में वह डंडा घुमाना शुरू किया। यह देखकर अकबर ने जोर से हंसते हुए कहा, ‘‘अरे बीरबल, तुमने अपने भगवान को फिर से अपनी सहायता के लिए बुला लिया, वो दिखाई तो कहीं देते नहीं!’’ इस बात पर सभी दरबारी खूब हसेेंं। पर बीरबल थे कि बिना विचलित हुए बाल्टी के चारों ओर घूम-घूम के सोटा पानी में घुमाए जा रहे थे। यह देखकर धीरे-धीरे सभी दर्शक आवाक होकर एक टक उसे देखने लगे। समय भी भागा जा रहा था। आधी घड़ी होने के बाद भी बीरबल वैसे ही बिना थके काम में लगा रहा। वह बिलकुल पसीना-पसीना हो गया था। बाकी लोग भी ये सब देखकर थक गए थे। आखिर मुल्ला ने मजाक में कहा, ‘‘क्या हम तुम्हारी मदद के लिये आएं?’’ सभी खिलखिला के हंस पड़े। बीरबल ने बड़ी सहजता से कहा, ‘‘मुल्लाजी, बस रहने दो!.. अब काम हो गया! आप को कष्ट करने की कोई जरूरत नहीं है! ‘वह’ पानी ऊपर आ गया है। बादशाह अकबर के साथ सभी आश्चर्य से चिल्ला उठे ‘‘कहां है, कहां है!’’ फिर बादशाह ने कहा, ‘‘ले आओ बीरबल, वह लोटा भर पानी मा बदौलत के सामने!’’

‘‘जी हुजूर … लाता हूं।’’ बीरबल ने उत्साह पूर्वक कहा और सोटा जमीं पर रख के लोटा उठा लिया। सभी आंखे फाड़ के देखना चाहते थें कि बीरबल क्या करते हैं। अकबर की भी यही अवस्था थी। इन सभी बातों से पूरी तरह से अनभिज्ञ, अलिप्त बीरबल ने बड़े मनोयोग से लोटे में संभाल के, पानी इकट्ठा किया। अंतत: विजयी भाव से, उन्होंने लोटा भर के उसे बादशाह के सामने पेश किया, ‘‘हुजर, ये है लोटे का पानी!’’… तभी कुछ दरबारी उठकर एक साथ चिल्लाए, ‘‘हुजूर! ये बीरबल का सरेआम झूठ बोल रहे हैं। सरकार, क्या पानी में मिला पानी कभी अलग हो सकता है? ये बीरबल का कहना सरासर झूठ है।’’

अकबर भी बड़े ही आश्चर्य और अविश्वास की नजर से लोटे को देख रहे थे। तभी बीरबल ने बड़ी दृढ़ता से कहा, ‘‘हुजूर, आपने और इन सब ने देखा है कि मैने कितनी मेहनत से, पानी को कितना मथ के, ये लोटा भर पानी अलग किया है। जैसे छाछ मथ-मथ के नवनीत निकालते हैं! हुजूर,अब मेहेरबान होकर न्याय कीजियें। फिर मेरे मालिक, इस नाचीज को इनाम दे या सजा दें!’’

अब दरबार में बीरबल के पक्ष-विपक्षियों के विवाद का कोलाहल बढ़नेे लगा! अकबर भी पशोपेश में पड़ गये। उन्होंने सोचा इस चतुर बीरबल ने आज सच या झूठ की जगह न्याय की गुहार लगाई है। अब न्याय तो करना ही होगा।’’

बादशाह ने कुछ सोचने के बाद हाथ उठाकर कहा ‘‘खामोश।’’ सभी शांत होकर अपनी जगह पर बैठ गये। तब बादशाह ने कहा, ‘‘बीरबल ने, अपना पक्ष रखकर हम से न्याय मांगा है। अब कोई ये सिद्ध करके बताये कि यह लोटे का पानी नहीं है। अन्यथा एक पक्षीय निर्णय होगा। क्या कोई अपनी दलील देने आगे आयेगा?’’ थोड़ी देर तक सभी शांत रहें। कोई भी दरबारी आगे नहीं आया। बादशाह ने पुन: पूछा, फिर भी सभी चुप ही रहें। अंत में अकबर बादशाह ने मुस्कुराते हुए बीरबल से कहा, ‘‘बीरबल, तुम बड़े ही चतुर हो! न्याय मांगकर तुम ने जीत हासिल कर ली है। कल दरबार में हम तुम्हे इनाम देंगे।’’ सभी दरबारियों ने तालियां बजा करके सहर्ष स्वागत किया, सिर्फ एक, ‘मुल्ला दो प्याजा’ को छोडकर!!’

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