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एक ‘सफल उद्योगपति’ बनने में आपकी आज तक की यात्रा कैसी रही?
मेरा जन्म एक सुसंस्कारित परिवार में हुआ। मेरे माता-पिताजी ने मुझे पहला संस्कार यही दिया कि-

Humanity is the best charity &

Charity begins at home…..!

मानवता यही सबसे बड़ा सेवाधर्म है, जिसकी शुरूआत अपने घर से करनी पड़ती है। इसलिए मेरे परिवार के सभी लोग मानव-सेवा में जुटे हुए हैं। यही कारण है कि मेरा उद्योग समूह और उसके सभी कर्मचारी ये कोई बाहरी सदस्य नहीं हैं, बल्कि मेरे परिवार के ही सदस्य हैं, ऐसे हम समझते हैं। इसी भावना के साथ हम व्यावसायिक एवं सामाजिक कार्य का दायित्व निभाते हैं।
हमारे कार्यालय में किसी भी कर्मचारी को ‘नौकर और मालिक’ की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। हम उसे अपने परिवार के सदस्य जैसा सम्मान देते हैं? अगर हमारे किसी भी कर्मचारी को किसी कारण बाहर गांव भेजा जाता है, तो उसे कार्यालय की ओर से ‘‘थ्री टायर एसी’’ की सुविधा होती है। किसी भी कर्मचारी का बीमारी का इलाज अच्छी जगह किया जाता है, भले वह अफसर हो या ड्राइवर।
एक घटना से यह स्पष्ट हो जाएगा। हमारे कार्यालयीन परिवार सदस्य के याने कर्मचारी के पिताजी की शस्त्रक्रिया होने वाली थी। उस समय उसके पास पिताजी के पास रुकने के लिए समय नहीं था, तो मेरी पत्नी शस्त्रक्रिया के दौरान कई घंटे अस्पताल में रुकी थी, और उसने वहां का सभी काम स्वयं संभाला था। इस अपनेपन से हमारे पड़ोसी भी अचंभित हो गए। हमने अपने कर्मचारियों के बच्चों को भी स्कॉलरशीप शुरू की है। इसी वजह, हमारे यहां सब से कम तनखा लेने वाले सदस्य का लड़का भी आज इंजीनियर हो चुका है। हमें इस बात की बड़ी खुशी है।
अगर कोई कार्यालयीन सदस्य बिना-वजह छुट्टी पर है, तो उसके घर सब ठीक है ना! कोई बीमार तो नहीं! यह सब पूछताछ हमारे अन्य कार्यालयीन सदस्यों द्वारा भी की जाती है और मुझे अवगत किया जाता है। यही भातृभाव हमारे कंपनी का आधार है। इसी वजह बहुत सारे लोग ४५ साल से भी अधिक काल से कंपनी से जुड़े हुए हैं। कोई स्वेच्छा निवृत्ति की भाषा भी नहीं बोलता एवं निवृत्त होने की सोच से ही उसकी आंखें भर आती हैं। यही मानवता की भावना हमारी सब से बड़ी पूंजी है।

कार्यालयीन सेवा के अलावा आपके सामाजिक कार्य का दायरा बहुत विस्तारीत है। उसके बारे में कुछ बताएंगे?
उ. ः मैं कई सामाजिक, सांस्कृतिक, मेडिकल एवं शैक्षणिक संगठनों, संस्थाओं तथा ट्रस्ट आदी से जुडा हुआ है। इसमें राजस्थान मंडल, माहेश्वरी मंडल, मारवाडी सम्मेलन, माधव सेवा फाऊंडेश्शन, पी.डी.खेतान, वॉकर्स क्लब ट्रस्टी, नवचेतना ट्रस्ट इन संस्थाओें को आर्थिक सहयोग भी देता हॅूँ। इसके बावजूद संस्थाओें तथा ट्रस्ट के नियमित कार्य मे किसी भी तरह की हस्तक्षेप नही करता। लोगोें मे विश्वासार्हता अगर बढ़ानी है तो कार्य मेें पारदर्शकता हो यह मेरी धारना है। इसलिए मेें मेरा आर्थिक रुप से योगदान चेक से ही करता हॅू। और यह मेरा स्वभाव है।

स. ः आप अपने कार्यालय एवं सामाजिक कार्य का तालमेल किस तरह रखते है?
उ. ः मुझे किसी संस्था व्यक्ती का निमंत्रण आता है तो मेरी प्राथमिकता होती है की मै उस कार्यक्रम का हिस्सा बन सकूॅँ अगर किसी कारणवश जाना संभव नही होता तो मैं पत्र लिखकर असमर्थता दर्ज करता हूँ। मेरा मानना है की कोई भी व्यक्ती तथा संस्था राह चलने वालों को निमंत्रित नही करते। आप उनके लिए अतिथी होते है। आपका भी परम कर्तव्य बनता है की निमंत्रण का सम्मान करें। मैं अपने दिनभर के काम के समय को १ रुपये के तीन हिस्सों बॉंटकर करता हूँ। ५०प्रतिशत समय बिझनेस के लिए, २५ प्रतिशत समय सामजिक कार्य के लिए, २५प्रतिशत समय पारिवारीक जिम्मेदारी को पूरा करता हूँ।

आपके सामाजिक कार्य की प्रेरणा क्या है? आप प्रसिद्धि से दूर रहना क्यों पसंद करते हैं?
मेरा परिवार यही मेरी प्रेरणा है। मेरा परिवार मुझ से ज्यादा मानवता पर विश्वास करता है। यही सोच मेरे परिवार की देन है।
किसी भी काम की प्रशंसा, श्रेष्ठता, बडप्पन काम में बाधा या निजी तौर पर अहंकार को बढ़ावा देता है। इसलिए किसी को डोनेशन देते हुए भी सब से ज्यादा डोनेशन जिसने दिया है, उससे थोड़ी कम राशि मैं डोनेशन में देता हूं। सिर्फ इसलिए कि मैं सब से बड़ा डोनर हूं, यह अहंकार मेरे मन को न छू सके।
आप माहेश्वरी समाज के युवकों को क्या संदेश देना चाहते हैं?
आप अपने बच्चों के साथ खुलकर रहो, मिलकर रहो। आपका यही बर्ताव बच्चों को संस्कारक्षम बनाएगा और उन्हें सही रास्ते पर चलना सिखाएगा।
-प्रतिनिधि

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