सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस

2016 में, भारत मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम ( एम टी सी आर ) का सदस्य बन गया था। भारत और रूस अब संयुक्त रूप से 800 किलोमीटर से ज़्यादा की रेंज के साथ ब्रह्मोस मिसाइलों की एक नई पीढ़ी विकसित करने की योजना बना रहे हैं। इसमे पिनपॉइंट अचूक वार करने की सटीकता के साथ संलग्नित लक्ष्यों को हिट करने की क्षमता होगी। 2019 में, भारत ने मिसाइल को 650 किमी की नई रेंज के साथ उन्नत किया। अंततः सभी मिसाइलों को 1500 किमी की रेंज में अपग्रेड करने की योजना बनाई गयी है। 

भारत के पुराने दमदार साथी रूस के साथ भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सुपरसोनिक मिसाइल बनाने का निर्णय लिया था। इसके पीछे भारत सरकार के अस्सी के दशक के बहुउद्देशीय एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (आई जी एम डी पी) की आधारशिला थी। 12 फरवरी 1998 को भारत और रशिया ने दोनों सरकारों के बीच एक ऐतिहासिक समझौते पर दस्तख़त किए थे। भारत की ओर से डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम और रशिया के पहले उप रक्षामंत्री एन व्ही मिखालोव ने ब्रह्मोस एरोस्पेस के नये संयुक्त उद्यम का रास्ता खोल दिया। डीआरडीओ और रूसी एनपीओ मशीनोस्ट्रोएनिया के बीच इस उद्यम की नींव रखी गयी।

भारत और रशिया की लंबी मित्रता के चलते इस नये उद्यम का बेहद उपयुक्त नामकरण किया गया – ब्रह्मोस। दोनो देशों की नदियों के नामों – ब्रह्मपुत्र और मश्कोव के अक्षरों को जोड़कर ब्रह्मोस बना था। आज दुनिया भर में यह उपक्रम अपनी पहुँच और बीस वर्ष के कम समय में कई आयाम हासिल कर चुका है। इस लंबी दूरी की एवं अगली पीढ़ी की उन्नत मिसाइल से हमारी तटीय सुरक्षा में एक नया इतिहास लिखा जाएगा। ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड ने इजात किया है। देश में विकसित नयी प्रोद्योगिकी से मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलेगा एवं नौसेना को बल मिलेगा।

दुनिया की सबसे बड़ी पैदल सेना का दम भरने वाले भारत के पास एक से एक घातक हथियार हैं। हमारी तीनों सेनाओं के बेड़े में दमदार मिसाइलें हैं जो दुश्मन को संभलने का मौका तक नहीं देती है। जितने वक्त में दुश्मन का डिफेंस सिस्टंम तैयार हो पाता है, ये मिसाइलें अपना काम निपटा चुकी होती है। ब्रह्मोस ऐसी ही एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। 21वीं सदी की सबसे खतरनाक मिसाइलों में से एक, ब्रह्मोस मॅक 3.5 यानी 4,300 किलोमीटर प्रतिघंटा की अधिकतम रफ्तार से उड़ सकती है।

पर्वतीय क्षेत्र में

सरकार ने थल सेना के लिए 4300 करोड़ रुपये की कीमत से चार श्रेणी की ब्रह्मोस मिसाइल रेजीमेंट को स्थापित करने का निर्णय लिया है। पर्वतीय रेजीमेंट में 100 मिसाइल और पाँच लौंचर, एक कमांड पोस्ट और मिसाइल रेजीमेंट को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के लिए 12 गुना 12 भारी भरकम ट्रक होंगे। उन्नत किस्म की ब्रह्मोस मिसाइल पर्वतीय क्षेत्र में अपने लौंचर से निकलकर आकाश का रुख़ करेगी तथा सीधे उपर उठकर तीव्र गति से लगभग 80 – 90 डिग्री के घुमाव के साथ वापस ज़मीनी टारगेट को ख़त्म करने के लिए सुपरसोनिक गति से आगे बढ़ेगी। इससे पूर्व के ब्लॉक तीन की ब्रह्मोस मिसाइल सीधे उपर उठकर ज़मीन के समानांतर आगे बढ़ती थी। इस तरह यह मिसाइल लगभग पेड़ों की उँचाई से उपर से उड़ती हुई रडार को चकमा देने में क़ाबलियत रखती थी। दूसरी बड़ी बात है इसकी गति जो ध्वनि से तीन गुना है, इस गति में हवाई जहाज़ या ज़मीन से दागी गयी दुश्मन की मिसाइल वार करने में सक्षम नही रहती। क्योंकि जब तक हमरी ब्रह्मोस मिसाइल को ढूँढा जाए और जवाबी कार्यवाही की जाए तब तक हमारी ब्रह्मोस निशाने पर पहुँच चुकी होती है।

ब्लॉक चार की ब्रह्मोस मिसाइल का परीक्षण 9 मई 2015 को कार निकोबार व्दीप और ट्रेक व्दीप पर सफलतापूर्वक किया गया था। 80 डिग्री के कोण पर स्टीप डाईव (तीक्ष्ण गोता) लगाते हुए लक्ष पर सीधी गिरी थी। यह सफलता मिलने में थल सेना का अहम योगदान था क्योंकि ये परीक्षण सेना ने खुद किए थे। इसी का नतीजा है की अब ब्लॉक चार की ब्रह्मोस मिसाइल को सेना में शामिल करने का रास्ता साफ हो गया है। पर्वतीय क्षेत्र में इस प्रकार की मारक क्षमता बेहद ज़रूरी और अहम है। पहाड़ों के पिछले ढलान पर बने दुश्मन के मोर्चे, बंकर या गोलाबारूद के भंडार को आसानी से बर्बाद करने में यह ब्लॉक चार की सीधी नीचे स्टीप डाइव संस्करण की ब्रह्मोस मिसाइल बेहद कारगर सिद्ध होने का अंदेशा है।

रणनीतिक सेना कमान

पिछले साल अगस्त में भारत ने संविधान के अनुच्छेजद 370 के तहत जम्मू और कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को खत्म कर दिया था। पाकिस्तान ने इसका खुला विरोध किया। आशंका थी कि पाकिस्तान आतंक के सहारे पलटवार की कोशिश कर सकता हैं। पाकिस्तानी सेना की ओर से भी कुछ नापाक हरकत की आशंका को देखते हुए भारत ने ब्रह्मोस मिसाइलों को सीमा पर तैनात किया तो उसके होश उड़ गये थे। पाकिस्ताान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने संयुक्त राष्ट्र को चिठ्ठी लिख डाली थी कि भारत एलओसी पर मिसाइलें तैनात कर रहा है और वह किसी ’हरकत’ की ताक में हैं। शुक्र था की इन मिसाइलों को इस्तेमाल करने की नौबत अब तक नही आई है। पनडुब्बियों से दागी जाने वाली ब्रह्मोस को उन्नत बनाया जा रहा है जिसका उपयोग भारत में बन रही प्रॉजेक्ट 75 आई और डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बी पर लगाई जाएँगी। आने वाले दो सालों में इसका पहला टेस्ट होने की उम्मीद है।

भविष्य की योजनायें

ब्रह्मोस एयरोस्पेस के प्रमुख डॉफ सुधीर कुमार ने केरल की पत्रिका मनोरमा ऑन लाइन को इस वर्ष के डिफेंस एक्स्पो में दिए साक्षात्कार में ब्रह्मोस के आने वाले स्वरूप के बारे में बातें की थी। उनके अनुसार जब ब्रह्मोस और सुखोई का मिलाप होकर एकीकरण हो चुका है तथा वायुसेना ने तँजाउर में ब्रह्मोस से जुड़े सुखोई 30 एमकेआई के अलग स्क्वाड्रन को बनाया है, इससे वायुसेना को इसकी क़ाबलियत और उपयोगिता पर पूरा भरोसा नजर आता है।

फिलहाल ब्रह्मोस मिसाइल के इंजिन को बेहतर बनाकर 3 से 5 गुना गति बढ़ने पर कार्य चल रहा है।, साथ ही इसकी रेंज भी 400 से 500 किलोमीटर की जा सकती है। ब्रह्मोस एनजी ( नेक्स्ट जेनेरेशन ) मॉडेल को भारतीय वायुसेना के लाइट कॉम्बैट एयर क्राफ्ट – तेजस पर भी स्थापित करने के विकल्प पर इंजीनियर काम कर रहे है। ब्रह्मोस एन जी मॉडेल आने वाले चार सालों में नज़र आएगा। भारतीय वायुसेना की रणनीतिक ज़रूरत के मुताबिक हम अपने आप को ढाल रहे है।

ब्रह्मोस एन जी मिसाइल का वजन 1।5 टन होगा और लंबाई 5 मीटर तथा व्यास आधा मीटर। यह मिसाइल रडार पर कम क्षेत्रफल दिखाएगी जिससे दुश्मन को उसपर आने वाली मिसाइल को ढूँढना कठिन होगा। उम्मीद की जानी चाहिए की इस किस्म की हल्की मिसाइल की फ्लाइट टेस्टिंग 2022 के बाद ही होगी। एक सुखोई पर तीन मिसाइल एकीकृत करने की योजना है।

हम आगे की सोच के साथ हाइपरसोनिक मिसाइल बनाने की और कार्य कर रहे है। इस किस्म की हाइपरसोनिक मिसाइल को डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम के नाम को जोड़ेंगे। यह हाइपरसोनिक मिसाइल ध्वनि की गति से पाँच गुना ज़्यादा स्पीड से अपने लक्ष की ओर बढ़ेगी। डी आर डी ओ भी हाइपर सोनिक प्रोद्योगिकी पर कार्यरत है जिससे शायद हम 10 – 12 मैच गति पर ब्रह्मोस को ले जाने की सोच बनाए हुए है। आने वाले बीस साल मे ब्रह्मोस के नये मॉडेल आएँगे और इसका निर्यात भी होगा ऐसी उम्मीद बरकरार है। ब्रह्मोस मिसाइल को भारतीय सेना में जून 2007 में शामिल किया गया था और अब तक तीन मिसाइल रेजिमेंट बन चुकी है जो 40, 41 और 42 आर्टिलारी डिवीजन का हिस्सा है। भारत ने चीनी टकराव को देखते हुए ब्रह्मोस मिसाइल को आकाश और निर्भय मिसाइल के साथ पूर्वी लद्दाख की सुरक्षा के लिए तैनात किया है।

अभी हाल में…

सेना ने 24 नवंबर 2020 अंडमान ऐंड निकोबार से 290 किलोमीटर रेंज वााली ब्रह्मोस का ’लाइव मिसाइल टेस्ट’ किया था। इस बार ब्रह्मोस मिसाइल के कई ऑपरेशन टेस्ट्स किए गये थे। चीन के साथ सीमा पर तनाव के बीच इन टेस्ट्स से यह दिखाने की कोशिश की गयी थी कि मिसाइल कितनी सटीकता से टारगेट हिट कर सकती है। यह मैच 2.8 की रफ्तार से उड़ती है यानी आवाज की रफ्तार का लगभग तीन गुना। इसे सुखोई लड़ाकू विमान से लॉन्च किया जाएगा। दोनों साथ मिलकर एक घातक कॉम्बोै बनाते हैं जिससे दुश्मेन कांपते है। इस मिसाइल का एक वर्जन 450 किलोमीटर दूर तक वार कर सकता है। इसके अलावा एक और वर्जन टेस्ट हो रहा है जो 800 किलोमीटर की रेंज में टारगेट को हिट कर सकता है। ब्रह्मोस मिसाइल की खासियत ये है कि इसे कहीं से भी लॉन्चं कियाजा सकता है। जमीन से हवा में मार करनी वाले सुपरसोनिक मिसाइल 400 किलोमीटर दूर तक टारगेट हिट कर सकती है। पनडुब्बी वाली ब्रह्मोस मिसाइल का पहला टेस्ट 2013 में हुआ था। यह मिसाइल पानी में 40 से 50 मीटर की गहराई से छोड़ी जा सकती है।

जमीन, समुद्र और हवा से मार

मार्च 2015 में एसएफसी के पास पहले सुखोई पहुँचे और भारतीय वायुसेना के इतिहास में एक मजबूत अध्याय जुड़ गया जब एसएफसी के पास अपने स्वयं के अधिकार क्षेत्र के सुखोई हवाई जहाज़ मिले। ज़मीन से दागी जाने वाली परमाणु अस्त्रों से लैस अग्नि – पृथ्वी को भी एसएफसी के हवाले किया गया। चाँदीपुर, ओरिसा एवं व्हीलर टापू (अब अब्दुल कलाम टापू के नाम) से मिसाइलों का परीक्षण और प्रशिक्षण में एसएफसी जुट चुकी थी। इस किस्म की जमीन से मार करने वाली परमाणु अस्त्र ले जाने में काबिल अग्नि और पृथ्वी के अलावा समुद्र की सतह से भारतीय नौसेना के युद्धपोतों पर भी ब्रह्मोस को तैनात कर परीक्षण किया गया था।

भारतीय वायुसेना के मिराज 2000, जेगुआर और सुखोई 30एमके आई लड़ाकू हवाई जहाज़ भी मौजूद हैं। इसके अलावा पनडुब्बी से भी प्रक्षेपण की तैयारी चल रही हैं। जून 2016 में ब्रह्मोस मिसाइल को सुखोई के नीचे लगाकर भारतीय वायुसेना के पाइलटों ने उड़ान भरने का परीक्षण और प्रशिक्षण लिया था। एसएफसी के पास दिए जाने वाले सभी 42 सुखोई अपने आप में विशेष होंगे एवं यह परमाणु युद्ध की स्थिति में होने वाले विकिरण को झेलने में इलेक्ट्रॉनिक रूप में सक्षम होंगे।

22 नवंबर 2017 को भारतीय वायुसेना के एस यू 30 एम के आई लड़ाकू जहाज़ से भी दागी गयी थी। इस मिसाइल की लंबाई 8550 मिलीमीटर, गोलाई 648 एम एम और वजन 2550 किलोग्राम था। 290 किलोमीटर दूर अपने लक्ष को भेदने में यह वायुसेना के जहाज से छोड़ी गयी मिसाइल कामयाब रही। इसकी गति 2.8 मैक रही थी। अब हम ब्रह्मोस की मिसाइल की रेंज जो अब तक 290 किलोमीटर तक सीमित थी को 300 किलोमीटर से आगे ले जा सकेंगे। अर्थात हमारे जांबाज पायलट सुखोई को भारतीय वायुसीमा में रहते हुए भी ब्रह्मोस को दाग सकते हैं पाकिस्तान की सरहद के भीतर उसकी युद्ध की साजोसमान की निर्माण के कारखाने और अन्य परमाणु संयत्रों को निशाना बनाना आसान हो जाएगा। साथ ही पाकिस्तान का वायुसेना का कमांड कंट्रोल सेंटर और उसकी बेलिस्टिक मिसाइल के बेस जो गुजरावाला, ओकारा, मुल्तान, झांग और डेरा नवाब शाह में हैं हमारी पहुँच में होगी। हमारे कार निकोबार व्दीपों की सुरक्षा भी सुनिशिचित की जा सकती है।

2016 में, भारत मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एम टी सी आर) का सदस्य बन गया था। भारत और रूस अब संयुक्त रूप से 800 किलोमीटर से ज़्यादा की रेंज के साथ ब्रह्मोस मिसाइलों की एक नई पीढ़ी विकसित करने की योजना बना रहे हैं। इसमे पिनपॉइंट अचूक वार करने की सटीकता के साथ संरक्षित लक्ष्यों को हिट करने की क्षमता होगी। 2019 में, भारत ने मिसाइल को 650 किमी की नई रेंज के साथ उन्नत किया। अंततः सभी मिसाइलों को 1500 किमी की रेंज में अपग्रेड करने की योजना बनाई गयी है।

30 सितंबर 2020 को, भारत ने ओडिशा के बालासोर में एकीकृत परीक्षण रेंज से सतह से सतह पर सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस के एक नए संस्करण का सफल परीक्षण किया, जिसकी रेंज लगभग 400 किमी थी। इस मिसाइल में स्वदेशी रूप से विकसित कई उप-प्रणालियां है। एक निर्दिष्ट सीमा के लिए भूमि आधारित मोबाइल लांचर से परीक्षण किया गया था। मिसाइल के नए भूमि हमले संस्करण की सीमा को मूल 290 किमी से 400 किमी तक बढ़ाया गया है, जबकि गति को मैच 2.8 पर बनाए रखा गया है – जो ध्वनि की गति का लगभग तीन गुना है। सफल प्रक्षेपण ने स्वदेशी बूस्टर और शक्तिशाली ब्रह्मोस हथियार प्रणाली के अन्य स्वदेशी घटकों के धारावाहिक उत्पादन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। भारत पहले ही चीन के साथ सटी सीमा पर 290 किलोमीटर लंबी सीमा पर ब्रह्मोस तैनात कर चुका है। ब्रह्मोस को पनडुब्बियों, जहाजों, विमानों या भूमि प्लेटफार्मों से लॉन्च किया जाता है। मई 2019 में, भारतीय वायुसेना ने एसयू-30 लड़ाकू विमान से ब्रह्मोस मिसाइल के हवाई संस्करण का सफलतापूर्वक परीक्षण कर चुका है। पुख़्ता खबर है कि भारतीय वायुसेना 40 से अधिक सुखोई लड़ाकू जेट के साथ ब्रह्मोस को एकीकृत कर रहा है।

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