कर्मठता के प्रतीक हशू अडवाणी

हशू जी का पूरा नाम था हशू पसराम अडवाणी। उनका जन्म सिंध प्रांत के हैदराबाद में (वर्तमान में पाकिस्तान में) 22 फरवरी 1926 को हुआ। 1940 के आसपास संघ-कार्य सिंध प्रांत में तेजी से बढ़ रहा था। हशू जी 1942 में संघ शाखा में प्रविष्ट हुए और दो वर्ष में ही, 1944 में, संघ के प्रचारक बन गए। देश का विभाजन हुआ और अनेक हिंदू भारत आ गए। उनमें हशू जी का परिवार भी था, जो मुंबई आकर बस गया। उन्होंने महाविद्यालयीन शिक्षा के साथ ही पत्रकारिता में प्रवेश किया और 1948-49 में एक साप्ताहिक पत्रिका से जुड़ गए।

मुंबई में जनसंघ का काम 1952 में शुरू हुआ। हशू जी का जनसंघ के काम की ओर आकृष्ट होना स्वाभाविक था। इसी दौरान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर सत्याग्रह का आवाहन किया। मुंबई से हशू जी इस सत्याग्रह में शामिलहो गए। उन्हें गिरफ्तार किया गया। आगरा के कारागृह में उन्हें एक महीने की सजा भुगतनी प़डी। आगरा से लौटने पर उन्होंने कुछ समय तक साप्ताहिक विवेक के फोटोग्राफर के रूप में काम किया। 1953 में हशू जी ने ‘चेंबूर कॉलोनी युवक मंडल’ की स्थापना की। उनके सार्वजनिक जीवन का यह शुभारंभ था। बाद में 1961 में वे चेंबूर से नगरसेवक चुने गए। उनका सदैव यही दृष्टिकोण रहा कि राजनीति, सामाजिक जीवन को समृद्ध करने का एक साधन है।

सादगीपूर्ण रहन-सहन

हशू जी का रहन-सहन अत्यंत सादगीपूर्ण था। सिंधी कैम्प की एक चालनुमा इमारत की तल मंजिल में एक छोटे से आवास में वे रहते थे। इसमें 12 बाय 10 का एक कमरा और 5 बाय 6 की रसोई थी। नहाने की व्यवस्था सार्वजनिक थी। इस जगह पर वे 1980 तक रहे। इस छोटे से घर में एक टेबल, एक कुर्सी, कुछ फाइलें, कागज और कप़डे रखने की मात्र अलमारी भर थी। इसके अलावा अन्य कोई चीजें वहां नहीं थीं। वे जिस चाल में रहते थे उसके सामने एक होटल थी। वहां वे दो कप चाय के साथ मस्का-पाव का नाश्ता किया करते थे। दोपहर के भोजन में प्राय: क़डक पाव तथा चाय रहती थी।

हशू जी चेंबूर के जिस भाग में रहते थे वहां उन्होंने 1962 में ‘विवेकानंद एजूकेशन सोसायटी’ की स्थापना की और विद्यालय एवं महाविद्यालय शुरू किया। शिक्षा के अलावा, हशू जी के मार्गदर्शन में विविध समाजोपयोगी अन्य संस्थाएं शुरू हो गईं। 1967 में हशू जी चेंबूर से विधान सभा का चुनाव जीते। जनता ने चौतरफा जनसम्पर्क और निस्वार्थ जनसेवा के लिए उन्हें इस तरह सम्मानित किया था।

विधायक बन जाने पर भी हशू जी आम आदमी के लिए सदा उपलब्ध रहे। सुबह सा़ढे छह से ग्यारह बजे तक वे अपने घर में सब से मिलने के लिए रुकते थे। उसके बाद 1 बजे तक वे विवेकानंद हाईस्कूल में विद्यालय और कॉलेज का कामकाज देखते थे। उसके पश्चात महानगरपालिका, विधान सभा, भाजपा कार्यालय का काम देखते थे। इस तरह रात 11 बजे तक वे लगातार कार्यरत रहते थे। रात 11.30 के आसपास घर लौटते थे। राजाणी नामक एक मित्र के घर से उनके लिए भोजन आता था। भोजन के बाद रात 12 के आसपास वे सो जाते थे।

नेता नहीं, कार्यकर्ता

एक बार का किस्सा मनोरंजक है। किसी चुनाव की दौड़-धूप चल रही थी। प्रचार के पोस्टर्स चिपकाने वाले एक गुट में मैं था। यही काम करने वाला दूसरा गुट सामने से आ रहा था। इस गुट में हशू जी थे। उन्हें देखकर मैंने कहा, “अजी, आप तो उम्मीदवार हैं। आप भी पोस्टर्स चिपका रहे हैं?” उस पर हंसते हुए हशू जी बोले, “मैं पार्टी के उम्मीदवार का ही काम कर रहा हूं। मेरी पार्टी जीत कर आनी चाहिए।”

हशू जी रोज 70 से 80 लोगों के काम निपटाते थे। प्रत्येक के साथ कम से कम दो-तीन मिनट की चर्चा होती थी। वे स्वयं बहुत कम बोलते थे। उनका मानना था कि दिनभर शक्ति रहने के लिए कम एवं मंद स्वर में बोलना जरूरी है। इसी कारण वे मितभाषी एवं मृदुभाषी थे। उन्होंने कभी किसी के मन को ठेस नहीं पहुंचाई। कभी किसी पर गुस्सा भी नहीं होते थे।
हशू जी का स्वभाव शांत था। कार्यकर्ताओं से अपनापन तथा ममतापूर्ण व्यवहार था। हशू जी कर्तव्यनिष्ठ थे। नियमों के उल्लंघन के लिए वे किसी को भी माफ नहीं करते। हशू जी जब मुंबई भाजपा के अध्यक्ष थे, तब किसी नगरसेवक ने पार्टी विरोधी काम किया। इसका पता चलते ही उन्होंने 24 घंटों के अंदर ही उसे बर्खास्त कर दिया। उस नगरसेवक ने पार्टी के सिद्धांत पर आघात किया इसलिए हशू जी गुस्सा हो गए अन्यथा हशू जी को क्रोधित होते देखना दुर्लभ था।

हशू जी चेंबूर विधान सभा क्षेत्र से छह बार चुने गए। 1978 के पुलोद मंत्रिमंडल में नगर विकास मंत्री के रूप में उन्होंने ठोस कार्य किया। वडाला ट्रकटर्मिनल उन्हीं की देन है। मंत्री रहते हुए उन्होंने विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण के महत्व का भी विस्मरण नहीं होने दिया। यही कारण था कि समुद्री तटों पर भराई के काम पर उन्होंने प्रतिबंध लगवा दिया।

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