छत्रपति शिवाजी: हिन्दू सम्राट को किस ने दिया था विष?

‘छत्रपति शिवाजी महाराज’ के नाम मात्र से शरीर में एक ऊर्जा का संचार होने लगता है उनके जैसा राजा और पुत्र बहुत ही कम देखने को मिले है। शिवाजी एक अच्छे पुत्र थे जो अपनी मां का खयाल रखते और उनके बताए मार्ग पर ही चलते थे। वह राजा भी दिल के धनी थे उनके राज में प्रजा भी खुश थी। दुश्मन भी उनकी बहादुरी और ईमानदारी की तारीफ करता था। शिवाजी जब तक जीवित रहे उन्होने कभी भी अपने उसूलों और हिंदुत्व से समझौता नहीं किया। अपने पूरे जीवनकाल में उन्होने 360 से अधिक किले जीते जो आज भी महाराष्ट्र में देखने को मिलते है।

शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 को महाराष्ट्र के पुणे में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। इनके पिता शाहजी भोंसले बीजापुर के सुल्तान आदिल शाह के सेनापति थे इनकी माता जीजाबाई थी। पिता सेनापति थे इसलिए उनके पास समय की कमी थी। शिवाजी का पालन-पोषण माता जीजाबाई की देखरेख में हुआ था। शिवाजी करीब हर कला में निपुण थे उन्हे राजनीति व युद्ध की अलग अलग कलाएं आती थी। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि शिवाजी अपनी उम्र से भी तेजी से सब सीख रहे थे। माता-पिता के संस्कार और आदर्शों ने उन्हे एक कट्टर देश भक्त बना दिया और उन्होने बचपन से ही स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के सपने देखने शुरु दिये जो आगे चलकर सफल भी हुआ।

पहले राजाओं की एक से अधिक शादियाँ होती थी क्योंकि यह परंपरा भी थी और जरुरत भी। राजा एक से अधिक शादियाँ कर तमाम राजाओं को अपना रिश्तेदार बनाते थे जिससे जरुरत पड़ने पर वह एक दूसरे की मदद कर सकें। शिवाजी महाराज की भी 8 शादियाँ हुई थी। उनका पहला विवाह 14 मई 1640 को सईबाई निम्बाळकर के साथ हुआ था उसके बाद सोयराबाई मोहिते, पुतळाबाई पालकर, गुणवंताबाई इंगले, सगुणाबाई शिर्के, काशीबाई जाधव, लक्ष्मीबाई विचारे, सकवारबाई गायकवाड इन्हे लोग कमलाबाई के नाम से भी जानते थे।

यह वह दौर था जब बीजापुर आपसी संघर्ष और विदेशी आक्रमण से गुजर रहा था। यहां का सुल्तान आदिलशाह भी अब बिमार रहने लगा था जिससे उसने तमाम दुर्ग से अपनी सेना हटा ली थी और दुर्ग को अपने करीबी राजाओं और सामन्तों को सौंप दिया था। शिवाजी के लिए यह अवसर ठीक था जिसका उन्होने फायदा भी उठाया और दुर्ग पर कब्ज़ा करने की रणनीति तैयार की। शिवाजी ने सबसे पहले रोहिदेश्वर दुर्ग पर कब्ज़ा किया और फिर तोरणा के दुर्ग पर भी अपना अधिकार जमा लिया। इसके बाद एक के बाद एक किले पर शिवाजी ने अधिकार बढ़ाना शुरु कर दिया। शिवाजी के चर्चे अब तक आदिलशाह के कानों तक पहुंच चुके थे आदिलशाह ने अपने सेनापति व शिवाजी के पिता शाहजी राजे को बुलाकर शिवाजी को नियंतत्र में लाने के लिए कहा लेकिन उससे कोई फायदा नहीं हुआ और शिवाजी जिस गति से आगे बढ़ रहे थे वह लगातार जारी रहा।

शिवाजी ने सन 1674 तक करीब सभी किलों को अपने अधिकार में कर लिया था और साथ ही उन किलों पर भी फिर से कब्ज़ा कर लिया था जिसे पुरंदर संधि के दौरान मुग़लों को सौंपा था। पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राजा होने के बाद शिवाजी महाराज अपना राज्याभिषेक करना चाहते थे लेकिन इस दौरान पंडितों को मुगल शासकों की तरफ से धमकी दी गयी कि जो भी शिवाजी का राज्यभिषेक करेगा उसे मौत की सजा दी जायेगी। शिवाजी ने मुग़लों के इस फरमान को चुनौती के तौर पर स्वीकार किया और कहा कि अब उनका राज्याभिषेक मुगल शासित राज्य के पंडितों से ही होगा। उस समय काशी (बनारस) भी मुग़लों के अधीन था शिवाजी के दूत ने काशी के ब्राह्मणों से मुलाकात कर राज्याभिषेक कराने का निमंत्रण दिया। मुगल सैनिकों को जैसे ही इस बात का पता चला उन्होने सभी पंडितों को पकड़ लिया, तब पंडितों ने यह कह कर बात टाल दी कि वह किसी भी शिवाजी को नहीं जानते और ना ही वह राज्याभिषेक करवाने जा रहे है। काशी के पंडितों ने मुगल सैनिकों से जान बचाने के लिए कहा कि वह तीर्थ यात्रा पर जा रहे है और वह सीधे रायगढ़ पहुंच गये जहां शिवाजी का राज्याभिषेक किया गया। राज्यभिषेक के 12 दिन बाद उनकी माता जीजाबाई का देहांत हो गया।

शिवाजी के राज्याभिषेक के बाद मुग़लों की चिंता और बढ़ गयी। वह शिवाजी के बढ़ते प्रभाव से परेशान हो रहे थे। मुग़लों ने एक चाल फिर से चली और पंडितों से आग्रह किया कि वह शिवाजी को राजा मानने से इंकार कर दें और जनता में भी यही संदेश दें जिससे शिवाजी की शक्ति कम हो जायेगी लेकिन उनकी यह चाल नाकाम हो गयी। दक्षिण भारत में यह पहला स्वतंत्र हिन्दू साम्राज्य था जहां शिवाजी ने अपने नाम का सिक्का भी चलवाया। शिवाजी की राज मुद्रा संस्कृत में लिखी हुई थी। यह मुद्रा आठ कोणों में थी जिसका उपयोग पत्रों एवं सैन्य सामग्री के लिए किया जाता था। ऐसा माना जाता है कि यह मुद्रा शिवाजी के पिता शाहजी राजे भोसले ने तब दिया था जब वह जीजाबाई और शिवाजी को पुणे की जागीर संभालने के लिए भेजा था।

मुद्रा पर लिखा है –
“प्रतिपच्चदंलेखेव वर्धिष्णुविर्श्ववंदिता शाहसुनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते”
(जिस प्रकार बाल चंद्रमा प्रतिपद बढ़ता जाता है और सारे विश्व वन्दनीय होता है उसी प्रकार शाहजी के पुत्र शिव की यह मुद्रा भी बढ़ती जायेगी)

लंबी बिमारी के बाद 3 अप्रैल 1680 को शिवाजी का निधन हो गया। इतिहासकारों में शिवाजी की मौत को लेकर अलग अलग विचार है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि शिवाजी की मौत बिमारी के बाद हुई है जबकि कुछ इतिहासकारों का कहना है कि शिवाजी को उनकी दूसरी पत्नी सायराबाई मोहिते ने विष दिया था लेकिन इस बात को तब और बल मिला जब शिवाजी की मौत के बाद सायराबाई के पुत्र संभाजी को राजकाज मिला हालांकि इसका कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है कि शिवाजी की मौत कैसे हुई थी।

आपकी प्रतिक्रिया...