आखिर कब तक हिन्दू मंदिरों पर रहेगा सरकारी शिकंजा?

भारतीय संविधान पर अगर नजर डालें तो वहां यह साफ साफ लिखा है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। धर्मनिरपेक्ष यानी जहां सभी धर्मों को समान भाव से देखा जाता हो लेकिन क्या भारत में ऐसा हो रहा है? तो मेरा जवाब होगा ‘नहीं’ क्योंकि भारत में हिन्दुओं की आस्था का केंद्र मंदिर आज भी सरकार के हाथों में है जबकि बाकी सभी धर्मों के स्थल उनके लोगों के पास है। मुसलमान अपनी मस्जिद का मालिक है उसे सरकार को इसका कोई भी हिसाब नहीं देना होता है और यही हाल गुरुद्वारे और चर्च का भी है।  
मुगलों के शासनकाल से लेकर अंग्रेजों के समय तक पूरे देश को लूटा गया लेकिन इसमें राजमहलों से भी ज्यादा सोना, चांदी और पैसे मंदिरों से लूटे गये। दक्षिण भारत के तमाम मंदिर आज भी अपनी संपत्ति की वजह से चर्चा में है जबकि उन्हें मुगल काल से ही लूटा गया है और अभी भी इसे सरकार द्वारा लूटा जा रहा है। भारत के संविधान में ऐसी नीति तैयार की गयी है कि जिससे राज्य से सभी बड़े मंदिरों पर राज्य सरकार का कब्जा है और यह नियम सिर्फ हिन्दू मंदिरों के लिए है जबकि बाकी धर्मों को इससे बाहर रखा गया है। यह एक बड़ी विडंबना है कि जिस देश में हिन्दू बहुसंख्यक है वहां उसके ही धार्मिक अधिकारों का हनन हो रहा है। अंग्रेजों ने यह नीति उस समय इसलिए तैयार की थी क्योंकि उन्हे पता था कि भारत के मंदिरों में बहुत सारा धन छिपा हुआ है और लोग दान के नाम पर यहां सोना, चांदी और पैसा चढ़ाते है इसलिए उन्होंने यह नियम बनाया कि राज्य से सभी मंदिर सरकार के अंतर्गत होंगे लेकिन जब देश आजाद हुआ तब इसमें बदलाव होना चाहिए था लेकिन उस समय अंग्रेजी मानसिकता वाली सरकार ने इस पर कोई विचार नहीं किया और नतीजा आज भी देश के लाखों मंदिर राज्य सरकार के इशारों पर चल रहे है। 
 
 
हिन्दू धर्म में मंदिर का स्थान उच्च माना गया है यह हजारों साल से पूजनीय रहा है। मंदिरों को आगे बढ़ाने के लिए ही लोग सोना, चांदी, जमीन और रुपयों का दान करते है इसलिए ही देश के मंदिरों में बेशुमार धन मिलता रहा है लेकिन वहीं दूसरी तरफ देश के करीब हर कालखंड में शासकों की नजर मंदिरों पर हमेशा रही है और आज भी यह शासन की नजर से नहीं बच पा रहा है। इतिहास में जब जब देश पर आक्रमण हुआ तब तब मंदिरों को खूब लूटा गया है। मुगल शासक मुहम्मद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर से बहुत ही बड़ी लूट की थी जो इतिहास में दर्ज है। कुल मिलाकर जितने भी शासक भारत आये उन्होंने मंदिरों को जमकर लूटा और फिर उसे तोड़ कर चले गये। आप इस बात की कल्पना कर सकते है कि अगर यह सभी मंदिर अपनी पुनर्वस्था में होते तो यह कितने धनी और अधिक संख्या में होते। 
 
देश की आजादी के बाद से जिस तरह से हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई के बीच में भेदभाव किया जा रहा है उससे यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दुओं के धर्म और संस्कृति पर काले बादल मंडरा रहे है। कुछ राज्यों में हिन्दू विरोधी सरकारें भी चुन कर आती है और वह मंदिर व हिन्दू भावना के खिलाफ जाकर फैसले करती है जिससे समाज में द्वेष पैदा होता है। एक बार आंध्र प्रदेश की जगन रेड्डी सरकार ने भगवान वेंकटेश्वर मंदिर की संपत्ति बेचने का आदेश दे दिया था जिसके बाद विरोध शुरु हो गया। जगन रेड्डी ने बढ़ते विरोध के बाद अपना फैसला वापस ले लिया। इससे पहले भी जगन रेड्डी सरकार ने तिरुमला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड में गैर हिन्दू की नियुक्ति की थी जिसका विरोध हुआ और सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा। इस तरह की तमाम घटनाएं है जहां प्रसिद्ध मंदिरों को सरकार की कुदृष्टि का सामना करना पड़ा है। 
 
अगर पूरे भारत के मंदिरों की बात करें तो करीब 9 लाख मंदिर है जिसमें से चर्चित 4 लाख मंदिर सरकार की निगरानी में है जिसमें बहुचर्चित तिरुपति बालाजी, पुरी जगन्नाथ मंदिर, केदारनाथ, बद्रीनाथ, श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर, गुरुवयूर मंदिर और वैष्णों देवी जैसे मशहूर मंदिर शामिल है हालांकि यह सभी मंदिरों की सूची नहीं है अभी लाखों मंदिर ऐसे हैं जो राज्य सरकार की निगरानी में है और उनका पूरा धन सरकार के खजाने में जाता है। मंदिर के द्वारा मिले धन से ही सरकार तमाम योजनाएं चलाती है और बाकी धर्मों का भी भरण-पोषण इससे ही होता है यानी यह कहना गलत नहीं होगा कि मंदिरों की सहायता से सरकार तमाम योजनाएं चलाती है और हिन्दू धर्म के अलावा बाकी लोगों का भी भरण पोषण करती है।  
 
सरकार के बढ़ते नियंत्रण के बाद उसमें गैर हिन्दुओं को नियुक्त किया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि मंदिरों में मूर्ति चोरी की घटना में इजाफा होने लगा। मंदिरों की जमीन पर सरकारी कब्जा तेजी से बढ़ने लगा और मंदिर की संपत्ति को ही दूसरे धार्मिक संगठनों को दिया जाने लगा। कर्नाटक की एक घटना सामने आयी जिसमें पता चला कि कर्नाटक सरकार को मंदिरों से कुल 72 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ जिसके बाद सरकार ने उसमें से 50 करोड़ मदरसों को और 10 करोड़ चर्च को विकास के नाम पर दे दिया। वहीं दूसरी तरफ से मंदिर से मिलने वाले राजस्व को मंदिर के विकास कार्यों के लिए कम कर दिया गया, मंदिर में होने वाले उत्सव का बजट लगातार कम किया जा रहा है। मंदिर के पुजारी और कर्मचारियों का वेतन कम किया जा रहा है।  
अगर वर्तमान हालात पर नजर डालें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि अब भारत में धर्म के आधार पर ही सब कुछ हो रहा है। देश में विकास, योजनाएं, नौकरी और प्रलोभन धर्म के आधार दे दिया जा रहा है और देश की जनता भी उसी में उलझी नजर आ रही  है। राजनेता भी इसका खूब फायदा उठा रहे है और धर्म के आधार पर विकास की बात कर सत्ता का सुख भोग रहे है क्योंकि उन्हे भी यह पता है कि अगर विकास की बात करेंगे तो लोगों को यह समझ में कम आयेगा। 

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