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***शशिकांत चौथाईवाले*****

 उत्तर पूर्व में ईसाई मुसलमान तथा माओवादी संगठनों ने प्रत्येक राज्य में आतंकवादी गुट खड़े किए हैं। संघ देश की अखण्डता पर विश्वास करता है। अत: संघ भी उग्रवादियों का लक्ष्य रहा।

            भारत के उत्तर पूर्व का क्षेत्र आज सर्वत्र चर्चा        का विषय है। काश्मीर के समान यह क्षेत्र भी समस्याग्रस्त है। विदेशी राष्ट्रों द्धारा सीमाओं का उल्लंघन, ईसाई मतान्तरण, विदेशी घुसपैठ, आतंकवाद, जाति-जनजातियों मे आपसी संघर्ष आदि समस्याएं कम अधिक मात्रा में सर्वत्र हैं। किंतु उत्तर पूर्व में ये सारी समस्याएं भयानक रूप  धारण कर रही हैं। समाधान के लिए विभिन्न स्तर पर अनेक प्रयास भी हो रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन समस्याओं का टुकडों में विचार न करके एकात्म दृष्टिसे समाधान के लिए अपना प्रयास कर रहा है। असम के संघ कार्य का एक विहंगम अवलोकन इस लेख के माध्यम से करने का प्रयास किया गया है।

      संघ स्थापना के २१ साल बाद संघ गंगा ने असम में प्रवेश किया। राजस्थान से आकर गुवाहाटी में बसे स्व. शंकरलाल शर्मा तथा केशवदेव बावरी के प्रयास से नागपुर से दादाराव परमार्थ, श्रीकृष्ण परांजपे और दिल्ली से तत्कालीन अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख वसंतराव ओक के साथ विजयजी  दि. २७ सितंबर १९४६ को गुवाहाटी में आए। उसी दिन शाम को एक बैठक हुई। दि. २८ को ही असम की प्रथम शाखा प्रारंभ हुई। वसंतराव ओक तथा विजयजी दल्ली लौट गए। दादाराव के नेतृत्व में कुछ ही दिनों में, डिब्रुगड, तेजपुर, जोरहाट, श्रीहट्ट (सिलहट-वर्तमान बांग्लादेश में) भी कार्य प्रारंभ हुआ। इसी बीच महाराष्ट्र से श्रीपाद गजानन सहस्त्रभोजनी, भाऊराव मूलकर, दत्तात्रेय बंदष्टे, माधवराव मेहेंदले आए थे। किंतु अंकुर प्रस्फुटित होने के पूर्व ही महात्मा गांधी की निघृण हत्या के मिथ्या आरोप में सरकार ने संघ को प्रतिबंधित किया। असम में काम नया होने  के कारण प्रचारकों को प्रखर विरोध सहना पड़ा था। बातचीत के सारे रास्ते बंद होने पर प. पू. गुरूजी के आह्वान पर हुए देशव्यापी अहिंसक सत्याग्रह में असम से भी ५२ सत्याग्रही बंदी बनाए गए। दादाराव परमार्थ शिलांग कारागृह में थे। अंत में १२ जुलाई १९४९ को सरकार ने बिना शर्त प्रतिबंध हटाया। संघ कार्य फिर से प्रारंभ हुआ। दादाराव परमार्थ को नागपुर जाना पड़ा। सन १९४९ में ही पंजाब से ठाकुर रामसिंगजी की प्रथम प्रांत प्रचारक के रूप में नियुक्ति हुई। एक साल के अंदर श्री मधुकर लिमये, सुधाकर देशपांडे, वसंतराव फडणवीस, ओमप्रकाशजी आदि कुछ प्रचारक  असम पहुंचे।

      १५ अगस्त १९५० को उत्तर पूर्व में आए भयंकर भूकंप के कारण अरूणाचल असम के अनेक गांव समाप्त हुए। ब्रह्मपुत्र नदी में बाढ़ के कारण नदी का प्रवाह ही बदल गया। सीमित साधन तथा कार्यकर्ता थे। किंतु स्वयंसेवकों ने भूकम्प सहायता समिति बनाकर राहत कार्य चलाए। नदी के उत्तर तीर तक राहत सामग्री ले जाते समय नौका उलटने से डिब्रुगढ के युवक कार्यकर्ता हनुमान सिंघानिया की मृत्यु हो गई। बाद में विभीषिका को देखने तथा पीड़ित परिवारों को मिलने प.पू. गुरूजी सितंबर मास में डिब्रुगढ, तिनसुकिया, सदया आदि स्थानों पर गए थे। उन्होंने कार्यकर्ताओं का साहस तथा उत्साह बढाकर योग्य मार्गदर्शन किया।

      महात्मा गांधी की हत्या में संघ का हाथ नहीं है, यही बात समझाने में काफी समय लगा। मधुकर लिमयेजी का एक बड़ा रोचक अनुभव है। एक परिवार में जाने पर परिवार प्रमुख को जब पता चला कि मधुकरजी संघ के प्रचारक हैं, तब वे इतने डर गए कि अंदर जाकर कमरे का दरवाजा बंद करके बोले- मख वेपफीं ुरपीं ींे ींरश्रज्ञ ुळींह र्ूेी, श्रिशरीश से र्ेीींफ.

      असम के एक प्रसिद्ध लेखक ने इतिहास की किताब में लिखा था कि गांधीजी की हत्या के लिए संघ जिम्मेदार है। संघ की ओर से उनको आदालत की नोटिस भेजी गई थी। अंत में संबंधित सभी व्यक्तियों ने लिखित माफी मांगी और किताब में उचित संशोधन भी किया। सारा पत्र व्यवहार र्ढीीींह ींीर्ळीाहिी नाम से पत्रक छपाकर जनता में वितरित किया था। असमिया तथा बंगलाभाषी हिन्दुओें में चल रहे भाषाईतनाव का लाभ लेकर पूर्व पाकिस्तान से आए हुए मुसलमान लोग हिंदुओं में भाषाईदंगे कराने में चूकते नहीं थे। अपना परिचय असमिया बताकर जनगणना के एक वर्ष पूर्व दंगे करवाना यह उनकी नीति थी। बांगला भाषी हिंदू, दंगों के कारण बाहर चले जाते थे तथा जनगणना में उनकी गणना नहीं होती थी। मुसलमान संख्या अनुप्रवेश द्वारा बढ़ती ही थी। सन १९५०, १९६०, १९७१ के दंगे इसका प्रमाण है। जहां पर संघ की अच्छी शाखा रही वहां आपसी संघर्ष टालने का स्वयंसेवक पूरा प्रयास करते थे।

      ऐसी परिस्थिति में मन्थर गति से कार्य बढ़ रहा था। एकनाथजी रानडे पूर्व के प्रचारक थे। उनके नित्य मार्गदर्शन के साथ ही सन १९५० से प.पू. गुरुजी का प्रवास होने लगा। सन १९५७ में प्रांत का प्रथम शीत शिविर हुआ जिसमें पू. गुरुजी भी उपस्थित थे। सन १९६१ से प्रांत का अलग संघ शिक्षा वर्ग लगना शुरू हुआ। धीरे धीरे  स्थानीय कार्यकर्ता भी जुड़ने लगे। गिरीश कलिता, योगेन्द्र लाल सरकार, प्रफुल्ल बरा, नवकांत बरुआ, माणिक दास, संतोष नंदी, ललित बरदलै, नारायण भौमिक आदि नाम उल्लेखनीय हैं।

 

 विदेशी आक्रमण तथा संघ

      असम प्रवास के समय प.पू.गुरुजी ने चीन की गतिविधियों तथा भारत पर आक्रमण की सम्भावना से सरकार को अनेक बार अवगत किया था। किंतु हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे लगाकर कांग्रेस ने गुरुजी का उपहास किया  था। जिसका फल १९६२ में चीन आक्रमण से भारत को भुगतना पड़ा। आक्रमण के समय पंडित नेहरू जी के वाक्य मचू हशरीीं सेशी ुळींह ींहश शिेश्रिश ेष ईीराफ आज भी लोग भूले नहीं। चीनी सेना बोमदला, पुरटहलस में आते ही तेजपुर के जिलाधकारी, एन.सी.सी. कमांडर समेत सभी सरकारी अधिकारी भाग निकले। स्टेट बैंक की राशि ब्रह्मपुत्र में फेंकी गई। जेल के दरवाजे खोल दिए। कुछ ही घंटों में तेजपुर शहर सुनसान हो गया। प्रो. देवेश्वर गोस्वामी जैसे संघ प्रेमी प्रहरी के रूप में डटे रहे। कानुढेका नाम के स्वयंसेवक ने एक स्वेच्छासेवक दल तैयार करके यथासाध्य कर्तव्य का पालन किया। प्रांत प्रचारक रामसिंहजी का मार्गर्दान था ही। किंतु तेजपुर के मुसलमान बहुल क्षेत्र में हरे झंडे लगे लोगों ने देखा था।

      १९७१ में बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के समय पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में स्वयंसेवकों ने अपनी भूमका निभायी थी। युद्ध में आहत सैनिकों के आवागमन के समय लायडिंग रेलवे स्टेशन पर चाय नाश्ते की व्यवस्था का भार संघ ने उठाया था। फौजी अधिकारियों ने भी संघ पर विश्वास करके अनुमति दी थी।

      १९७५ में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल क ी घोषणा का विरोध करने में सारे देश के साथ उत्तर पूर्व भी पीछे नहीं था। गुप्त वार्ता पत्र, व्यक्तिगत सम्पर्क और विविध कार्यक्रमों से जनजागरण करने में स्वयंसेवक सक्रिय रहे। मीसा कानून तथा बाद में जनआंदोलन के समय सत्याग्रह करके जेल में गए स्वयंसेवकों की संख्या ५०० से अधिक रही।

      विविध संगठनों का योगदान- संघ के आदर्श को समाजव्यापी बनाने के लिए स्वयंसेवकों द्वारा प्रारंभ विविध संगठन भी उत्तर पूर्व में प्रगति कर रहे हैं। विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की बाद असम में दो महासम्मेलन हुए थे। उस समय असम के वैष्णव संत श्री शंकर देव द्वारा स्थापित सत्र के प्रमुख सत्राधिकारी इतिहास में प्रथम बार एक मंच पर विराजमान रहे। अंग्रेज भी कभी उनको एक स्थान पर नहीं ला सके थे। ब्रह्मपुत्र नदी में ही सत्राधिकारी अपनी अपनी नौका में आए और उन्होंने अंग्रेजों से बातचीत की। महासम्मेलन में उस क्षेत्र की विभिन्न जनजातियों का योगदान रहा। प.पू. गुरुजी भी पूर्ण समय उपस्थित थे। जनजाति तथा पर्वतीय क्षेत्र में कल्याण आश्रम का कार्य सराहनीय है। मेघालय, अरुणाचल की अनेक जनजातियां स्वयं कों हिंदू कहने लगी हैं। अथवा मथश रीश पेीं हळपर्वीी र्लीीं ुश रीश पशरीशी ींे हळपर्वीीफ ऐसा बोलती है। नगालैंड, मिजोरम की जनजातियां भी मखपवशसशपर्शेीी षरळींह रपव र्लीर्श्रींीीरश्र र्षेीीाफ के माध्यम से स्वसंस्कृति की रक्षा का प्रयास कर रही हैं। अन्य संगठन जैसे विद्या भारती, संस्कृत भारती, संस्कार भारती का कार्य भी अपनी छाप निर्माण कर रहा है।

      इस कालखंड में अनेक अच्छे-अच्छे साहित्यिक तथा विद्वान लोग संघ से जुड़ गए। कुछ उल्लेखनीय नाम- तीर्थनाथ शर्मा गिरिधर शर्मा, रजनीकांत देववर्मा, दीनेश सरकार राधिकामोहन गोस्वामी, भूमिदेव गोस्वामी, अनाथबंधु बसु, विष्णुमोहन गुप्त आदि।

 

     विदेशी नागरिक बहिष्कार आंदोलन तथा संघ-

      सन १९०१ से ही असम में पूर्व बंगाल से मुसलमान घुसपैठ कर रहे हैं। सन १९३१ में हुई जनगणना के प्रतिवेदन में जनगणना अधकारी सी. एस. मुल्लान ने टिप्पणी लिखी है   म खीं ळी ीरव र्लीीं लू पे ाशरपी ळािीेलरश्रू ींहरीं ळप रपेींहशी ३० ूशरीी डहर्ळींीरसरी वळीींीळलीं ुळश्रश्र लश ींहश ेपश्रू रिीीं ळप ईीरा ळप ुहळलह रीीराशीश ुळश्रश्र षळपव हळाीशश्रष ळप हेाशफ सन १९३७ के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री सर सादुल्ला ने सीेु ोीश षेेव योजना के अंतर्गत पूर्व बंगाल के लोगों को असम में आकर खेती करने का प्रलोभन दिया। किंतु देखा गया कि यह योजना सीेु ोीश र्ाीीश्रळा बन गई। मुस्लिम घुसपैठ के संबंध में प.पू. गुरुजी ने सचेत किया था। किंतु कांग्रेस ने गुरुजी पर साम्प्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाकर मुस्लिम तुष्टिकरण चालू रखा। आज असम के २८ जिलों में से १० जिले मुस्लिम बहुल बन गए हैं तथा कुछ और जिले इसी रास्ते पर जा रहे हैं। ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार आज असम में मुलमान जनसंख्या ३४ प्रतिशत है।

      १९७९ में असम छात्र संगठन ने विदेशी बहिष्कार आंदोलन आरम्भ किया। किंतु नासेर अहमद जैसे छात्र नेताओं ने विदेशी याने ‘अन्य राज्यों से आए हिंदू भी’ ऐसा प्रचार कर हिंदुओं में वैमनस्य पैदा करने का प्रयास किया। तत्कालीन क्षेत्र प्रचारक सुदर्शनजी ने विदेशी याने अवैध अनुप्रवेशकारी बांग्लादेशी मुसलमान और बांग्लादेश से आए हिंदू शारणार्थी है इस पर जोर दिया। संघ की इस भूमिका का काफी विरोध हुआ। लगातार बैठकें, प्रचार पत्र वितरण, सुदर्शनजी के अखिल भारतीय प्रवास में वास्तविक समस्या का प्रतिपादन, असम छात्र संगठन के नेताओं को अन्य राज्य में प्रचार की सुविधा प्रदान करना, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा दिल्ली में राष्ट्रीय सेमीनार, देशभर से परिषद के एक हजार छात्रों का गुवाहाटी में सत्याग्रह, आदि प्रयासों से संघ के मत को स्वीकृति मिलने लगी। तत्कालीन सर संघचालक बालासाहब देवरस ने हिंदुओं में विश्वास जगाने के लिए जिलाश: हिंदू सम्मेलन आयोजित करने का आहवान किया। विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में आयोजित सम्मेलनों का शुरू में मुसलमानों ने प्रखर विरोध करके बाधाएं खड़ी करने का प्रयत्न भी किया। किंतु हजारों की संख्या में हिंदू लोग सम्मिलत हुए। १९८३ में गुवाहाटी के पूर्व हिंदू सम्मेलन में सातों राज्यों से वनवासी, गिरिवासी, जनजाति के लोगों ‘‘न हिंदु: विदेशी भवेत्’’ घोषणा की। आज संघ की इस भूमिका का दिखावटी विरोध होता है। किंतु सामान्य जनता इससे सहमत है। केन्द्र की भारतीय जनता पार्टी  सरकार ने एक आदेश निकाल कर बांग्लादेश में धार्मिक अत्याचारों से ग्रसित हिन्दू, ईसाई, बौद्ध आदि शारणार्थियों के निष्कासन पर रोक लगाई है। संविधान के अनुसार उनको नागरिकता देने की प्रक्रिया भी शुरू करने का आश्वासन दिया है।

      अंग्रेजों की कुटिल नीति के कारण उत्तर पूर्व के पर्वतीय क्षेत्र ईसाई बहुल बने हैं। ईसाईत के साथ ही वच्छिन्नतावाद तथा उग्रवाद भी बढ़ रहा है। यह नगालैंड, मणिपुर के उदाहरणों से स्पष्ट है। उत्तर पूर्व में ईसाई मुसलमान तथा माओवादी संगठनों ने प्रत्येक राज्य में आतंकवादी गुट खड़े किए हैं। संघ देश की अखण्डता पर विश्वास करता है। अत: संघ भी उग्रवादियों का लक्ष्य रहा। असम में उल्फा ने संघ के तीन प्रचारक मुरली मनोहर, प्रमोद दीक्षित, ओम प्रकाश चतुर्वेदी, तहसील कार्यवाह प्रफुल्ल की हत्या कर दी थी। त्रिपुरा में ईसाई उग्रपंथी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा ने क्षेत्र कार्यवाह मामिल सेनगुप्ता और तीन प्रचारक दीनेन देव, सुधाम दत्त, शुुभंकर चक्रवर्ती का अपहरण किया और बांग्लादेश में ले जाकर उनकी हत्या की। मणिपुर में संघ के भूतपूर्व विभाग कार्यवाह तथा उस समय भारतीय जनता पार्टी के नेता मधुमंगल शर्मा की भी उग्रवादियों ने हत्या की। हत्याओं के बाद कुछ दिन तो कार्य की गति मंद रही किंतु कुछ ही मास में कार्यकर्ता फिर सक्रिय हुए। आज सर्वत्र संघ के लिए अनुकूल वातावरण है। त्रिपुरा राज्य में इसके पूर्व कम्युनिस्ट शासन तथा ईसाई आतंकियों के कारण कार्य करना कठिन था। किंतु गत जुलाई मास में दक्षिण असम प्रांत से २६१ विस्तारक जब त्रिपुरा भेजे गए, एक दो स्थानों पर सामान्य विरोध छोड़कर सभी जगह विस्तारकों का सहर्ष स्वागत हुआ। सामान्य जनता में संघ के प्रति श्रद्धा बढी है।

      केंद्र में नई सरकार आने से समस्यायों का समाधान हो सकता है ऐसा लोगों को लगने लगा हैं। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ दिन पूर्व उग्रवादी नागा संगठन एन.एस.स.एन (एम) के नेता आय. मुईवाह के साथ शांति वार्ता की है। ६० साल में प्रथम बार साकारात्मक प्रतिसाद मिला है। इस वार्ता के संबंध में अभी भी पूरी जानकारी बाहर आई नहीं, किंतु लोग आशा करते हैं कि देशहित को प्राधान्य देकर ही समझौता हुआ होगा।

      इस समय उत्तर पूर्व में १००० से अधिक शाखाएं हैं। सेवा कार्यों का भी विस्तार हुआ है। कार्य को अधिक गति देने के लिए क्षेत्र के सात शासकीय राज्यों को संघ ने चार प्रांतों में विभाजित किया है। उत्तर असम, दक्षिण असम, मणिपुर तथा अरुणाचल प्रदेश।

      प्रारंभ से ही संघ की भूमिका रही है, संगठित हिंदू शक्ति का जागरण ही समस्यायों का एकमात्र उत्तर है। उत्तर पूर्व में भी इसी दिशा में संघ काम कर रहा है।

 

 

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