हिंदी विवेक : we work for better world...

 

****दिलीप करंबेलकर****

 बालासाहब ने सरसंघचालक पद के सूत्र सम्हाले तब और जब वे निवृत्त हुए, संघ की स्थिति में अंतर था। बालासाहब के लाए परिवर्तन ही इसका कारण थे, पर उन्होंने यह परिवर्तन इतनी सहजता से किए कि यह परिवर्तन अपने कारण ही हुए ऐसी सामान्य स्वयंसेवक की भावना बनी। यहीं उनका बडप्पन है, महत्ता है।

      राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गढ़ने में प्रारंभिक तीन सरसंघचालकों का कार्य मूलभूत स्वरूप का है। उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के प्रारंभिक ५० वर्ष भारतीय समाज जीवन में मंथन के वर्ष रहे हैं। १८५७ के युद्ध में पराजय के कारण भारत की सामंतवादी राज समाप्त होने की शुरूआत हुई। अंग्रेजी शिक्षा से विश्व की अनुभूति आने से नवशिक्षित मध्यमवर्गीय युवा वर्ग ने समाजनीति और राजनीति की बागड़ौर संभाली। लोकतंत्र, राष्ट्रवाद, समता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, साम्यवाद आदि संकल्पनाओं में हिंदू समाज अपना भविष्य खोजने लगा था, जबकि अपना मध्ययुगीन भावविश्व बचाने के लिए मुस्लिम समाज आक्रामक और हिंसक बन रहा था। इस आक्रामकता और हिंसक पृष्ठभूमि में हिंदू समाज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया था। यदि हिंदू समाज का अस्तित्व खतरे में आ गया तो परिवर्तन का सपना देखने वाली विचारधारा का ढॉंचा ढह जाएगा, इस वास्तविकता को समझने की सोच बहुत कम लोगों में बची थी। इसके लिए भविष्यदर्शी, परिवर्तनशील दृष्टिकोण समक्ष रख कर हिंदुओं के अस्तित्व रक्षण के लिए संगठित शक्ति खड़ी करने की नितांत जरूरत थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर उस आवश्यकता को पूरा करने का संकल्प डॉ. हेडगेवार ने किया।

      डॉ. हेडगेवार जिस हिंदू समाज को देख रहे थे, वह अनंत  विसंगतियों से भरा था, तत्वज्ञान जितना श्रेष्ठ, उतना ही आचरण संकुचित था। मुंह में मोक्ष की भाषा, परंतु व्यवहार में स्वार्थी व्यवहार थे। व्यक्तिगत मोक्ष की अतिरेकी श्रद्धा ने हिंदू समाज की ऐहिक एकता और कर्तृत्व खो गया था। हिंदू संस्कृति ने अनेक जातियों, भाषाओं, रूढ़ियों, रीतिरिवाजों से परे लोगों में विलक्षण आंतरिक एकात्मता के सूत्र स्थापित किए थे। परंतु व्यवहारमें अनेक अमानवीय विषमताओं की परंपराएं ईश्वराधिष्ठित समाज रचना के नाम पर निर्माण की गईं। अत: बीसवीं सदी की चुनौतियों का मुकाबला करने के डॉ. हेडगेवार ने कर्तव्यदक्ष, एकरस, एकात्म, समतायुक्त हिंदू समाज की स्थापना के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। लेकिन ऐसा करते समय केवल तात्कालिक संकट ही डॉ. हेडगेवार के समक्ष नहीं थे। वे कहते थे-

 ‘‘हिंदुस्थान की रक्षा के लिए जो स्वयंसेवक संघ निर्माण करना है उसमें मुस्लिम, ईसाई, अंग्रेज आदि विदेशी और अन्य धर्मों के लोग हों या न हों परंतु अपने हिंदू समाज को इस प्रकार का संघ निर्माण करना आवश्यक ही था।’’ (सन्दर्भ : संघ गंगोत्री, साप्ताहिक विवेक प्रकाशन)

      बालासाहब देवरस का व्यक्तित्व का सम्पूर्ण गढ़ना डॉ.हेडगेवार के व्यक्तिगत सहवास से एवं संघ की कार्यद्धति एवं विचारधारा से विकसित होने से सरसंघचालक के रूप में उन्होंने जो भूमिकाएं लीं और निर्णय किए, उसकी पृष्ठभूमि समझने की दृष्टि से ही संघ स्थापना यहां विहंगावलोकन किया गया है।

 ***

      श्री गुरुजी जैसे उत्तुंग व्यक्तित्व के नेतृत्व की पृष्ठभूमि में बालासाहब के पास सरसंघचालक पद के सूत्र आए। डॉ.हेडगेवार ने ‘मैंने संघ की स्थापन क्यों की’ इस लेख में लिखा है कि ‘आज तक हिंदू समाज के इतिहास में, कभी नहीं हुआ ऐसा, हिंदू समाज को संगठित करने का प्रयोग संघ के रूप में हमने हाथ में लिया है। (संदर्भ: संघ गंगोत्री, साप्ताहिक विवेक प्रकाशन)। ऐसी इतिहास निर्माण करने वाली संस्था को आकार देने के लिए उन्हें केवल पन्द्रह साल की अवधि मिली। उनकी मृत्यु के बाद श्री गुरूजी के कंधों पर नेतृत्व का दायित्व आया। ३३ वर्षों के अपने नेतृत्व के तूफानी काल में संघ पर आए अनेक संकटों को उन्होंने अपने कंधों पर स्वयं झेला और संघ का एक अखिल भारतीय वटवृक्ष में रूपांतर किया। श्री गुरूजी के कालखंड के स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता के बाद इस तरह दो भाग हैं। भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद वामपंथी विचारकों के प्रभाव के कारण हिंदू संस्कृति और उसकी परम्पराओंके प्रति अविवेकी तुच्छता, हीनता, केवल आलोचना की भूमिका से ही देखा जाता था। इन आलोचनाओं का वैचारिक दृष्टि से और व्यावहारिक दृष्टि से जवाब देना जरूरी था। श्री गुरूजी ने अपने भाषणों, साक्षात्कारों, बौद्धिक वर्गों के माध्यम से हिंदू संस्कृति के परिवर्तनशील स्वरूप को प्रस्तुत किया। मुद्दों के जवाब देने के बजाय किसी की आलोचना कर, उसकी प्रतिगामी छवि निर्माण करना वामपंथी कार्य पद्धति है। अत: प्रतिगामी, मध्ययुगीन काल में रहने वाले कह कर उनकी और संघ की छवि निर्माण की गई। व्यावहारिक स्तर पर, जीवन के अनेक क्षेत्रों में हिंदू सांस्कृतिक विचारों पर आधारित संस्थाजीवन खड़ा करना संभव है, यह भी उनके नेतृत्व में संघ ने साबित कर दिया। 

      इन दो महान व्यक्तित्वों की पृष्ठभूमि में बालासाहब देवरस ने सरसंघचालक पद के सूत्र सम्हाले। उस समय उन्होंने अपनी प्रारंभिक यात्राओं में किए गए विविध भाषणों में अपनी मर्यादाएं स्पष्ट करते हुए कहा-

      ‘‘पहले दो सरसंघचालकों की पृष्ठभूमि में मैंकैसे काम करूंगा, इसकी चिंता होना स्वाभाविक है। डॉ.हेडगेवार को संघ की संकल्पना सूझी और उन्होंने उसे अपने जीवनकाल में उसे अखिल भारतीय संगठन का स्वरूप दिया। श्री गुरूजी का व्यक्तित्व विद्वत्तापूर्ण और तपस्वी था। उनके कार्यकाल में संघ ने प्रभावी संगठन का रूप धारण किया। उन्होंने अपने कार्यकाल में संघ का वैचारिक मार्गदर्शन किया। मुझे इन दोनों के सहवास का सौभाग्य मिला और बाल स्वयंसेवक, गट नायक, गण शिक्षक, मुख्य शिक्षक, शाखा कार्यवाह से सरकार्यवाह जैसे दायित्व निभाये। वे व्यवस्थापन के काम थे। परंतु अब काम का स्वरूप भिन्न है। इस पद से मुझे मार्गदर्शक की भूमिका अदा करनी है। उसे अब पूरा करना है। वह हम निभा सकेंगे, यह मुझे विश्वास है।’’ 

       इस विवेचन में ‘हम’ शब्द का प्रयोग महत्वपूर्ण है। संघ की कार्य प्रणाली और विचार प्रणाली इस प्रकार है कि जिसमें ‘मैं’ का ‘हम’ हो जाता है।

      बालासाहब के नेतृत्व की सब से बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने दो महान व्यक्तित्वों की पृष्ठभूमि में नेतृत्व की कमान संभाली, फिर भी उसे बोझ न समझते हुए उन्होंने अपनी स्वतंत्र शैली में विचार व्यक्त किए। विज्ञान की तरह ही विचार प्रणाली के भी तात्विक और व्यावहारिक ये दो श्रेणियां होती हैं। तात्विक भाग कुछ चुनिंदा संशोधकों के आकलन की कक्षा में आता है। सामान्य लोग तात्विक विचार प्रस्तुत करने वाले की विद्वत्ता से अभिभूत हो जाते हैं। जिसे उसे व्यवहार में उतारना होता है, उसकी प्रस्तुति और भाषा अलग होती है। संस्था को सफल बनाने के लिए, दोनों की आवश्यकता होती है। श्री गुरूजी का व्यक्तित्व पहली श्रेणी में आता है, और बालासाहब का दूसरी श्रेणी में। इसकी झलक उन्होंन प्रारंभिक दो वर्षों में ही दी।

       मुंबई के समाचार पत्र ‘नवाकाल’ को श्री गुरूजी ने एक साक्षात्कार दिया था और इस मुलाकात में चातुर्वर्ण्य सम्बंधी विवेचन ने देश भर में तहलका मचा दिया था। वास्तव में जिन्हें संघ की कार्य प्रणाली और विचार प्रणाली की जानकारी है, उनमें से किसी को भी श्री गुरुजी जीतीय विषमता का समर्थन करेंगे यह सपने में भी शंका नहीं थी। परंतु संघ के विरोधियों का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं था। उन्हें कवल संघ को बदनाम करने में रुचि थी। इस पृष्ठभूमि में १९७४ में पुणे में ‘वसंत व्याख्यानमाला’ में बालासाहब देवरस ने जो भाषण दिया, उसका ‘क्रांतिकारी’ शब्दों में वर्णन किया गया। ‘सामाजिक समता एवं हिंदू संगठन’ के नाम से वह प्रसिद्ध है।

       हिंदू समाज ही राष्ट्रीय समाज है, इस मुद्दे को सिद्ध करने के लिए उन्होंने किसी भी पुराण ग्रंथ या ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला नहीं दिया। अत्यंत सरल और वर्तमान संदर्भों का आधार देते हुए उन्होंने कहा-

       ‘‘कुछ वर्षों पूर्व अपने देश में एक को (संहिता) बनाया गया,  हिंदू कोड। संसद ने उसे पारित किया। उसे पारित करने के लिए जिन्होंने अगुवाई की, उनमें पंडित नेहरू थे, डॉ. आंबेडकर थे। कोड बनाने के बाद उसे यहां जिन बहुसंख्य जातियों को लागू करना था, उसे क्या नाम दे? यह प्रश्न जब उपस्थित हुआ, तब उन्हें अन्य कोई नाम नहीं सूझा। उन्हें उसे हिंदू कोड ही कहना पड़ा। मुसलमान, ईसाई, यहूदी और पारसी ये चार लोग छोड़ दिए जाए, तो हिंदुस्थान में बाकी जो दूसरे लोग हैं उन सनातनी, लिंगायत, जैन, बौद्ध, सिख, आर्य समाज आदि सब लोगों को यह कोड लागू होगा। उन्होंने  कोड को नाम भी दिया-‘हिंदू कोड’। हिंदू नाम के अंतर्गत कौन कौन आएंगे यह बताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि इन सब लोगों को यह कोड लागू होगा और इससे भी आगे जाकर उन्होंने यह भी कहा है कि उपयुक्त सूची में और कोई रह गए होंगे तो उन सभी को यह कोड लागू होगा तथा जिन्हें यह लगता हो कि यह कोड उन्हें लागू नहीं होता, उनकी उन्हें यह लागू नहीं होता यह सिद्ध करने की जिम्मेदारी होगी। अतः हिंदू शब्द की परिभाषा नहीं कर सकते इसलिए हिंदू समाज ही नहीं है ऐसा विवाद कभी-कभी छेड़ा जाता है, जो ठीक नहीं है। यहां हिंदू समाज है, हिंदू कोड के अंतर्गत सभी लोग आते हैं, ऐसा पंडित नेहरु ने कहा, डॉ. आंबेडकर ने कहा। इसका अर्थ यह है कि इसके पीछे कुछ ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कारण होंगे।’’ (सामाजिक समता व हिंदू संगठन)

       इसी के साथ उन्होंने अपने भाषण में हिंदू संगठन के लिए समतायुक्त हिंदू समाज की आवश्यकता निःसंदिग्ध शब्दों में प्रकट करते हुए उन्होंने कहा-

      ’’अस्पृश्यता अपने समाज में अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और पीड़ादायक प्रकार है। कुछ विद्वान कहते हैं कि, पूर्व काल में यह पद्धति अस्तित्व में नहीं थी। आगे चलकर अचानक यह प्रथा रूढ़ हुई। लेकिन यह सच है कि अनेक सदियों से अस्पृश्यता का अस्तित्व हम देख रहे हैं। परंतु आज हम सब को मान्य है कि अस्पृश्यता एक गलती है। ‘खीं र्ाीीीं से श्रेलज्ञ, ीींेलज्ञ रपव लरीीशश्र!!‘। वह पूरी तरह नष्ट होनी चाहिए। अमेरिका में गुलामी की प्रथा नष्ट करने वाले अब्राहम लिंकन ने कहा है, ‘खष ीश्रर्रींशीू ळी पेीं ुीेपस, पेींहळपस ळी ुीेपस!‘। अस्पृश्यता बुरी न हो तो दुनिया में फिर कुछ भी बुरा नहीं है। अतः, अस्पृश्यता बुरी है और वह पूरी तरह नष्ट होनी चाहिए इस बारे में दो राय होने का कोई कारण ही नहीं है। सभी लोगों को इस दिशा में प्रयास करने चाहिए। वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के कारण हमें सामाजिक विषमता का जो अनुभव आता है, वह दुखद है। यह विषमता समाप्त होनी चाहिए यह भाव सब के मन में होना चाहिए। इस विषमता से समाज विघटन आ गया है, दुर्बलता आई है, इसे हमें समझना चाहिए, लोगों के सामने स्पष्ट करना चाहिए। उसे दूर करने के उपाय बताने चाहिए। सभी को इस प्रयास में योगदान करना चाहिए। इससे विषमता दूर होगी और हिंदू संगठन के मार्ग में अडचनें दूर होंगी।’’ (सामाजिक समता व हिंदू संगठन)

       हिंदुत्व का विचार करना साम्प्रदायिकता है और वह विचार सामाजिक विषमता का पोषण करने वाला है, इस तरह के गलत प्रचार को दिया गया यह केवल शाब्दिक उत्तर नहीं था, अपितु वह विचारों की बुनियादी धारणा थी। इसका परिणाम यह हुआ कि सामाजिक क्रांति के प्रवर्तकों के कार्य को जानने की आवश्यकता संघ के कार्यकर्ता महसूस करने लगे। इसी से ‘सामाजिक समरसता मंच’ जैसे संगठन का निर्माण हुआ।

       बालासाहब द्वारा सरसंघचालक पद का दायित्व स्वीकार करने के बाद कुछ ही समय में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व ने सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन आरंभ हुआ। इस आंदोलन के बारे में संघ क्या भूमिका लेगा यह जिज्ञासा का विषय बन गया। बालासाहब ने अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा-

      ‘‘संघ का स्वयंसेवक समाज का भी घटक है। भ्रष्टाचार की समस्या से जिस तरह जनता बेचैन है वैसा वह भी बेचैन है। संघ शाखा में हुए संस्कारों को शाखा से घर आने पर जैसे लाठी एक तरफ रखते हैं, वैसे नहीं रख सकते। उसका परिणाम कार्यकर्ता के २४ घंटों के बर्ताव पर होगा ही, यही नहीं होना भी चाहिए। अतः संघ के स्वयंसेवक भ्रष्टाचार मुक्ति के आंदोलन हिस्सा लेते हो तो यह स्वाभाविक बात है।’’

       जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए आंदोलन की परिणिती आपात्काल में हुई। फलस्वरूप, संघ पर पाबंदी लगी। लेकिन संघ ने इसके विरोध में जो आंदोलन किया वह संघ पर पाबंदी के विरोध में नहीं, बल्कि लोकतंत्र स्थापित होने के लिए किया। यह निर्णय आसान नहीं था। बालासाहब ने इस निर्णय प्रक्रिया की भूमिका विशद करते हुए कहा –

      

 ‘‘दूसरी सूचना यह आई है कि, सत्याग्रह करें। परंतु संघ पर पाबंदी हटायी जाए इसी मांग को लेकर सत्याग्रह किया जाए। अन्य कोई विचार न किया जाए। अन्य कोई कारण न बताया जाए। जब यह विचार आया तब कैसी स्थिति निर्माण हुई होगी? केवल अपना ही विचार करने तक यह सुझाव अधिकांश रूप से सीमित हो सकता है। कारागृह से बाहर आए बंधुओं और अन्य लोगों से विचार आया होगा कि, सत्याग्रह करना हो तो, संघ का सत्याग्रह यही विषय हो! ऐसा होने पर भी निर्णय लेते समय यह सोचना पड़ा होगा कि, देश में आपात्काल की परिस्थिति है, और इससे संघ पर पाबंदी लगी है। बाद में एक के बाद एक काले कानून किए गए हैं। अनेक दलों के हजारों बंधुओं को पकड़ा गया है। लोकतंत्र का अस्त हो चुका है। क्या अतः केवल संघ पर पाबंदी हटाने को लेकर यदि सत्याग्रह किया गया तो कितना उचित होगा? क्या यह चलेगा? क्या जनमत अपने साथ होगा? क्या हम अलग-थलग तो नहीं पड़ जाएंगे? जैसे अनेक सवाल उठना स्वाभाविक था। निर्णय लेना आसान नहीं था। परंतु उन्होंने  निर्णय किया। केवल संघ पर पाबंदी यह विषय नजरों के समक्ष न रखते हुए, जो कुछ विषय हैं उन सभी विषयों के लिए और अपने नाम पर न करते हुए लोक संघर्ष समिति के माध्यम से सत्याग्रह करने का निर्णय हुआ जिसमें ८० से ९० प्रतिशत अपने ही बंधु थे। मैं जिस प्रांत जाकर आया वहां के नेता मुझ से मिले हैं। सर्वोदय के लोग भी मिले हैं और सर्वदूर अपनी ही प्रशंसा ही प्रशंसा सुनाई दी। इस छोटे से प्रांत में भी, वहां संघ दुर्बल होने पर भी वहां जो कोई सत्याग्रह हुआ वह आपके कारण ही हुआ ऐसा कहा जाता था।’’

       संघ समाज के लिए है। संघ संघर्ष करेगा तो अपने अस्तित्व के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक संकटों का सामना करने के लिए लड़ेगा, यह संदेश इसमें था। फलस्वरूप स्वयंसेवकों के मन की प्रेरणा और संघ की समाजमन में छवि एकदम बदल गई। लोकतंत्र को बचाने के लिए जो संघर्ष हुआ उसमें संघ की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी इसे विशद करते हुए उन्होंने कहा-

       ‘‘मैं जब परिस्थिति का अवलोकन करता हूं, विगत दो वर्षों की अवधि का अवलोकन करता हूं, तब जिस तरह दूसरे महायुद्ध के समय जिस तरह कहा गया है कि, जपश ारप लर्हीीलहळश्र रपव २० ाळश्रशी ेष एपसश्रळीह उहरपपशश्र ीींेेव लशींुशशप कळींश्ररी रपव हळर र्ींळलींेीू. (हिटलर और उसकी विजय के बीच एक मनुष्य चर्चिल और बीस मील की इंग्लिश खाड़ी थी।) की याद आती है। मैं अगर इस समय कहूं कि जपश ारप गरूिीरज्ञरीह रपव ठडड ीींेेव लशींुशशप वळलींरींेीीहळि रपव वशोलीरलू, तो यह अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा। इतने बड़े पैमाने पर उस समय और इस सारी परिस्थिति को परिवर्तित कराने में अपना सहयोग रहा है।’’।(१९ मई १९७७ पुणे का बौद्धिक वर्ग)

       आपात्काल के संघर्ष से संघ को अनेक लाभ हुए और उसका परिणाम आगे के मार्गक्रमण पर हुआ। संघ के कार्यकर्ताओं की संगठन केंद्रित भूमिका बदल कर वह समाज केंद्रित हो गईे। हम किसी आंदोलन का नेतृत्व सफलतापूर्वक कर सकते हैं, यह विश्वास जगा। जिन नेताओं को प्रसार माध्यमों ने बड़ा किया था, उनके वजूद का अंदाजा आया। हम जुझारू संगठन है और संघ ‘कागजी शेर’ है, ऐसा कहने वालों का जुझारूपन कितना होता है यह प्रत्यक्ष संघर्ष के समय पता चला। अन्य किसी भी संस्था अथवा आंदोलन की अपेक्षा संघ के पास अधिक समाज घटक हैं, इसकी सबको अनुभूति  हुई। आगामी समय में राष्ट्रीय नीतियां तय करने में संघ की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, इस पर मुहर लगी। इस सब का परिणाम हिंदुत्व के संगठन की ओर से हिंदुत्व का आंदोलन खड़ा करने में हुआ। जन जागरण अभियान, एकात्मता यज्ञ, श्री राम जन्मभूमि से हिंदुत्व की कार्यसूची देश का मुख्य प्रवाह बनी।

       इसका प्रतिबिंब १९८४ के सरसंघचालक के विजयादशमी के भाषण में दिखाई दिया। हिंदुओं की संगठित शक्ति राजनीतिक प्रभाव डाल सकती है, यह आत्मविश्वास निर्माण हुआ था। उसके आत्मविश्वास के बल पर ही राष्ट्रहित की दृष्टि से ‘हिंदू’ के रूप में राजनैतिक दृष्टि से क्यों सक्रिय होना चाहिए इसका ऊहापोह कर उन्होंने कहा‘

      ‘‘अभी सार्वदेशिक चुनाव आ रहे हैं, हिन्दुओं को चाहिए कि इन चुनावों में वे अपने पंथ, अपने दल, अपनी भाषा, अपनी जाति के अभिमान से प्रेरित होकर नहीं बल्कि राष्ट्रीय हित के आधार पर मतदान करें्।  प्रत्येक हिन्दू को चाहिए कि मतदान के समय वह अत्यंत विवेक से काम करे।  उसका मत ऐसे किसी भी व्यक्ति  को कदापि न मिले जो हिन्दू हित विरोधी है।  हिन्दुओं के व्होट ऐसे ही उम्मीदवारों को मिलने चाहिए जो हिंदुत्व की संकल्पना को राष्ट्रजीवन की आधारशिला मानते हैं, जो हिंदुत्व की व्यापक परिभाषा को समझते हैं और अल्पसंख्यकों को राष्ट्रीय जीवन प्रवाह में लाने के लिए प्रमाणिकता से सचेष्ट है, जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि, सत्ताप्राप्ति को राष्ट्रसेवा का माध्यम मानते हैं और सत्ता की लालच में अपने सिद्धांतों की बलि नहीं देते।’’

      बालासाहब के भाषण का लोगों पर असर हुआ। तद्पश्चात हुए चुनाव प्रधान मंत्री इंदिराजी के हत्या की दुखद छाया में हुए। लेकिन इस चुनाव के पश्चात् राजनीति का जो प्रवाह बदला, उसके बीज बालासाहब के इस भाषण में हैं।

       सामाजिक समता तथा राष्ट्रीय हित और हिदूहित के आग्रह के साथ बालासाहब ने सेवा कार्य का आग्रह किया, उसका भी संघ समाजव्यापी बनने की दृष्टि से कितना व्यापक प्रभाव पड़ा यह हम अनुभव कर ही रहे हैं। समाज के सभी क्षेत्रों में सेवा कार्य के रूप में हमें जाना चाहिए  इसकी आवश्यकता का प्रतिपादन करते हुए ेउन्होंने कहा- 

      ‘‘संघ के संस्कार रचनात्मक हैं और समाज के लिए उपयुक्त होते हैं, इस बात का अनुभव लोगों को होना चाहिए। संघ शाखा से आने के बाद हम हाफपैंट उतार कर रखते हैं, उसी तरह संस्कार भी उतार कर रख दें तो? और फिर जो भी व्यवहांर करेंगे- वह कोई भी हो- उसे करते समय, संस्कारों को याद न रखेंगे, तो नहीं चलेगा। जो कोई अपना व्यवसाय हो, उसमें संघ के संस्कार प्रकट होने चाहिए। इसी तरह अपने आसपास जो भी काम होंगे, उन कामों में, उस काम की आवश्यकता के अनुरूप, अपनी रूचि के अनुसार और अपने गुणों के अनुसार योगदान होना चाहिए। ऐसा होने पर ही संघ के संस्कारों की क्षमता लोगों को मान्य होगी। इस दृष्टि से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। अब पूर्व की अपेक्षा कई क्षेत्रों में प्रवेश कर चुके हैं और अच्छी तरह से प्रवेश कर चुके हैं। अपने सम्पर्क में जो लोग आए उन्हें यह मान्य हो चुका है। हमने उसका प्रचार नहीं किया बस इतना ही है! केवल शिक्षा क्षेत्र की ही बात करें तो हम कम से कम हजार संस्थाएं तो चलाते ही हैं। इनमें से सैकड़ों संस्थाओं को आपात्काल के दौरान सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया। इस सम्बंध में खबरें आपने समाचार-पत्रों में पढ़ी ही होंगी। इसी तरह शिक्षा क्षेत्र हो, अन्य क्षेत्र हो, आदि अनेक क्षेत्र होंगे। उनमें व्यक्तिगत रूप से किसी स्वयंसेवक अथवा चार स्वयंसेवक मिलकर और संभव हो तो अपने से सहमत अन्य अनेक बंधुओं का सहयोग लेकर अनेक तरह के काम हमें करने होंगे। यह दायित्व हम टाल नहीं सकते। केवल संघ स्थान पर उपस्थित रहना और संघ का विचार करने से नहीं चलेगा।’’ (१९ मई १९७७ पुणे का बौद्धिक वर्ग)

       सामाजिक समता, राष्ट्रहित, हिंदूहित के लिए संघर्ष और सामाजिक सेवा यह नीतिगत त्रिसूत्री बालासाहब की योजनो का आधार बनी। इस से संघ की संगठित कार्यशक्ति का प्रभाव सामाजिक परिवर्तन में, सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व अधिक प्रभावी बनने में, व्यापक सामाजिक सम्पर्क में हुआ। इससे जो विशाल सामाजिक ऊर्जा उत्पन्न हुई उसका परिणाम हिंदूहित, राष्ट्रीय विचारों का केन्द्रबिंदु बनने में हुआ। एक अखिल भारतीय स्वरूप में इस हिंदूशक्ति का विराट दर्शन दुनिया को हुआ। बालासाहब द्वारा प्रस्तुत त्रिसूत्री इस जागृत विराट शक्ति का कारण थी।

 ***

       एक बाल स्वयंसेवक से सरसंघचालक तक का सफर करने वाले बालासाहब का व्यक्तित्व राजा शिवाजी जैसा प्रेरक और बहुत कुछ सिखाने वाला था। उनका ‘मैं’ सच्चे अर्थों में संघ सृष्टि में विलीन हो गया था। जिस विषय को वे प्रस्तुत करते थे, वह ‘मेरा’ न होकर ‘हम सबका है’ इस तरह उनकी प्रस्तुति हुआ करती थी। आपात्काल के बाद उनके जो सर्वत्र सत्कार हुए, उनमें वे चर्चिल का उदाहरण दिया करते थे। दूसरे महायुद्ध की विजय के पश्चात चर्चिल के भी सत्कार हुए, उसमें चर्चिल को ‘सिंह’ की उपमा दी गई। चर्चिल ने लोगों से कहा, ‘‘सिंह तो तुम लोग हों, आपकी ओर से मैंने केवल गर्जना की है।’’ वैसा ही मेरे साथ है। ‘सामाजिक समता एवं हिंदू संगठन’ यह भाषण करने से पूर्व उन्होंने अपने सहयोगियों को दिखाया, उनकी मान्यता लेकर भाषण किया। उनके स्वभाव में विनम्रता और दृढ़ निश्चय दोनों का सुंदर मिलाप था। उन्हें अपने और अपने संगठन के सामर्थ्य और मर्यादाओं की पूर्ण समझ थी। उन्होंने यह दावा कभी नहीं किया कि हमारे पास हिंदू समाज के सारे प्रश्नों का हल है। वे कहा करते थे, ‘‘संघ ने मनुष्य का संगठन शास्त्र विकसित किया है। उसके हम तज्ञ हैं। अतः ऐसे प्रश्नों का हल ईमानदारी से खोजने वालों को हम संगठनात्मक मदद दे सकते है।’’

       उनके अद्भुत स्नेहमयी व्यवेहार के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। प्रश्नोत्तर का कार्यक्रम उनका प्रिय कार्यक्रम होता था। इस कार्यक्रम का माहौल वे इस तरह निर्माण करते थे कि किसी को यह बोझ महसूस नहीं होता था कि हम देश का भविष्य बनाने वाले किसी नेता से बातचीत कर रहे हैं। प्रश्न पूछते समय अगर कोई योग्य शब्दों में नहीं रख सका तो, उस प्रश्न को योग्य शब्दों में रख कर पूछते थे कि ‘क्या आप यही पूछना चाहते थे न्?’, फिर उस प्रश्न का उत्तर देते थे। प्रश्न पूछने वालों को उन्होंने कभी अपमानित नहीं किया। अपने सहयोगियों के प्रति उनके मन में अटूट विश्वास था। वे कहते थे, आपात्काल में एक सरसंघचालक जेल में बंद हो, तो भी वे पांच-छह सरसंघचालक बाहर हैं। आपात्काल की परिस्थितियां खत्म होने के बाद, राजनीतिक दलों की तरह, अपने अन्य संगठनों को भी जनता परिवार में विलीन करने के आग्रह को उन्होंने स्वीकार नहीं किेया। प्रत्येक संगठन खड़े करने वाले ही उन संगठनों के स्वरूप के बारे में निर्णय करेंगे, यह उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया। संघ शाखा की कार्य पद्धति से संघ का सामर्थ्य बना है, यह स्पष्ट करते हुए वे कार्य पद्धति की व्यवस्थात्मक विशेषताएं भी विशद करते थे। मनुष्य का व्यवस्थापन संघ की विशेषता है, समाज चलाने के लिए अनेक गुणी जनों की आवश्यकता होती है। वे कहा करते थे, ‘‘मनुष्य की गुण विशेषताएं पहचान कर उनकी रुचि के अनुसार काम दिया जाना, यह संघ की व्यक्ति व्यवस्थापन की विशेषता है।’’

 कई बार संगठनात्मक मतभेदों के कारण अनेक कार्यकर्ताओं ने संघ रचना के बाहर जाकर काम शुरू किया। उस कार्य की प्रेरणा भी राष्ट्र परिवर्तन की ही थी। पर स्थानीय कार्यकर्ताओं के संगठनात्मक भावावेश के कारण उन्हें संघ कार्यकर्ताओं की ओर से बहिष्कृत होने का अनुभव होता था। सरसंघचालक होने के बाद बालासाहब ने ऐसे कार्यों को भेंट दी और बहिष्कार का वातावरण समाप्त कर स्वस्थ वातावरण निर्माण करने के संकेत दिए। उन्हें प्राप्त लोकमान्य तिलक पुरस्कार की रकम मधुकर देवल के दलित सहकारिता आंदोलन को दे दी। अप्पा पेंडसे द्वारा स्थापित पुणे के ज्ञान प्रबोधिनी को भेंट देकर स्थानीय कार्यकर्ताओं और ज्ञान प्रबोधिनी के बीच की अनबन मिटा दी। उनका मानना था कि समाज परिवर्तन यह केवल अकेले संघ की संस्थात्मक जिम्मेदारी न होकर सारे समाज का उसमें सहयोग होना चाहिए, यह उनके मूल विचारों का प्रतीक था।

      संघ की व्यक्ति-निरपेक्ष कार्य पद्धति को ध्यान में रख कर उन्होंने जो महत्वपूर्ण निर्णय किए, उसके संघ पर दूरगामी परिणाम हुए। पहले दो सरसंघचालकों के अतिरिक्त अपनी प्रतिमा उत्सवों में नहीं लगाई जाए यह भी उन्होंने स्पष्ट किया। अपना अंत्य संस्कार रेशीमबाग में न करें, यह भी स्पष्ट किया। ‘‘हमें रेशीमबाग का स्मशान घाट नहीं बनाना है’’, इन शब्दों में उन्होंने अपनी भूमिका स्पष्ट की।

      उनकी भाषा सीधी-सादी, आसान, तर्क को बन्दूक की गोली की तरह सीधे चीरने वाली होती थी। संतों के अभंगों में जो स्थान तुकाराम है, वैसा ही हिंदुत्व की प्रस्तुति में बालासाहब का कहा जा सकता है। दूसरा महायुद्ध और उसके बाद निर्माण हुए विविध राजनीतिक प्रवाहों का उनका न केवल अध्ययन था, बल्कि इन सारी संकल्पनाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था और हिंदू समाज के हित के संदर्भ में उन्हें किस प्रकार प्रस्तुत करें, इस बारे में उनका दृष्टिकोण स्वतंत्र और प्रगल्भ था। इसी कारण उनकी प्रस्तुति कभी हंगामेभरी नहीं की। लोकतंत्र, सेक्युलरिज़्म, समाजवाद जैसी विचार प्रणालियों का सामर्थ्य और मर्यादाएं उन्हें ज्ञात थीं। राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पण की जो प्रेरणाएं आवश्यक थीं, वे केवल प्रखर राष्ट्रभक्ति से ही आ सकती है, इसे वे जानते थे। १९७८ के विजयादशमी के भाषण में उन्होंने कहा- 

      ‘‘हम पर किये जानेवाले आरोपों में से एक आरोप यह भी किया जाता है कि हम यहां हिन्दू राज्य की, सम्प्रदाय सापेक्ष राज्य (थिओक्रटिक स्टेट) की स्थापना करना चाहते हैं्।  वास्तव में इस  अर्थ में इस देश में कभी भी संप्रदाय सापेक्ष राज्य नहीं रहा। ‘एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’ अथवा ‘उपासनानां अनेकता’ ही यहां की जीवनप्रणाली है।  हमें सेक्युलर विरोधी कहा जाता है।  ’सेक्युलर’ शब्द वर्तमान परिस्थिती के सन्दर्भ में एक मायावी राक्षस जैसा है जो भिन्न भिन्न रूप धारण करता है। दिन रात सेक्युलर शब्द का जप करनेवाले लोग भी उसका सही अर्थ समझते होंगे इसमें संदेह है।  आरोपकर्ता तो सेक्युलर शब्द का एक ही अर्थ समझते हैं्।  उनके मतानुसार हिन्दू विषयक जो जो बातें हैं वे सेक्युलर विरोधी हैं मुस्लिम लोग व् ईसाई मिशनरियों की संस्थाएं तो मानों सोलह आने सेक्युलर हैं सभी प्रकार के भेद-भावों को भूलकर सम्पूर्ण हिन्दू समाज का विचार करना सेक्युलर विरोधी है ऐसा कहना बचकानी बातें हैं्।  …. संघ को समाजवाद-विरोधी तथा पूँजीवाद का समर्थक कहकर भी आलोचना की जाती है।  हमारे देश में निरर्थक बातों का बड़ा शोर है।  समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, प्रजातंत्र आदि नारों का घोष दिन रात चलता रहता है।  उसका सही अर्थ क्या है यह कोई जानता भी है ? आज समाजवाद, बहुरुपियों का मुखौटा बन गया है।  हर एक अपने को समाजवादी मानता है और अन्य समाजवादियों को रिविजनिस्ट, रिवायवलिस्ट, ’रिऍक्शनरी आदि गालियॉं देता है।  अगर समाजवाद का यह अर्थ है कि किसी का शोषण न हो, सब के लिए उन्नति करने का सामान अवसर उपलब्ध हो, तो उसका कौन विरोध करेगा? लोकतंत्र विरोधी होने का संघ पर जो दोषारोप किया जाता है वह भी ऐसा ही निरर्थक है।  उचित तो यही होगा कि जो लोग वर्षानुवर्ष चुनाव न कराकर अपना पक्ष चलते हैं वे लोकतंत्र की गप्पें न हांके।  …. डेमोक्रसी, सेक्युलरिझम या सोशॅलिझम सिद्धांतत: ठीक होने के बाद भी इन संकल्पनाओं में लोगों को कार्यप्रवण करने या समाज में एकात्मता लाने का सामर्थ्य नहीं है।  ऐसे राष्ट्र बहुत कम है जहॉं ये तीनों बातें विद्यमान हैं, यदि एक दो तो भी वे उनकी शासन-व्यवस्था या राज्य-व्यवस्था का स्वरुप ही प्रकट करते हैं्। उन-उन राष्ट्रों की जनता के प्रेरणा स्रोत तो भिन्न हैं्।  अधिकांश लोगों को प्रेरणा उनकी मातृभूमि या पितृभूमि पर निष्ठां से प्राप्त होती है।  इसलिए संघ कार्य का आधार है मातृभूमि के प्रति अविचल निष्ठां तथा अपने महापुरुष या संस्कृति के प्रति सामान श्रद्धा।  इसी से हमें कार्य में सफलता प्राप्त हुई है।’’

      आपात्काल से प्राप्त जो मौलिक लाभ हुआ, उसे आपात्काल हटने के बाद अपने भाषणों में उन्होंने अचूक उजागर किया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि आपात्काल का संघर्ष कितना भी बिकट रहा हो, लेकिन उससे आम आदमी में जो जागृति आई उसके परिणाम भारतीय राजनीति पर निरंतर कायम रहेंगे। आपात्काल के बाद देशभर में मतदाताओं ने जो लगातार सत्ता पलट की, इससे यह बात सिद्ध हुई। आपात्काल के अत्याचारों का ढिंडोरा न पीट कर ‘भूले और क्षमा करें इस भूमिका से राष्ट्र निर्माण का कार्य जुटें’, जैसी सलाह दी। यह सलाह अनेक लोगों को जंची नहीं; लेकिन इसके बाद का घटनाक्रम देखा जाए तो बालासाहब की सलाह कितनी सही थी यह ध्यान में आता है। बाबरी ढांचा ध्वस्त होने पर उन्होंने जो प्रतिक्रिया दी, वह बुद्धिवादी मुस्लिमों को आत्मचिंतन कराने वाली थी। बालासाहब नेअपनी प्रतिक्रिया में कहा था- 

      ‘‘बाबरी ढांचा ध्वस्त होने के कारण मुस्लिम समाज में जो दुख और आक्रोश भरा है, इससे हिंदुओं के हजारों मंदिर ध्वस्त होने के कारण हिंदुओं के मन में कितना दुख और क्रोध निर्माण हुआ होगा, इसके बारे में मुस्लिम समाज सोचें। इस प्रतिक्रिया को अगर मुस्लिम और सेक्युलरिज्म वाले समझते तो बाबरी पतन के बाद देश में जो साम्प्रदायिके तनाव का वातावरण का निर्माण हुआ, वह न होता।’’ यदि इस प्रतिक्रिया का मुस्लिम तथा कथित सेक्युलरवादी ठीक से अध्ययन करते तो बाबारी पतन के बाद देश में जो साम्प्रदायिक तनाव का वातावरण निर्माण हुआ वैसा न होता।

 ***

      भारत जब स्वतंत्र हुआ तब चार प्रमुख विचारधाराओं वाले संगठन कार्यरत थे। कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवादी और संघ। कांग्रेस को स्वतंत्रता आंदोलन विरासत में मिला था। महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल जैसा उत्तुंग व लोकप्रिय नेतृत्व मिला था। कम्युनिस्टों को लगता था कि उनके पास क्रांति का वैज्ञानिक तत्वज्ञान है और चीन, रूस की तरह दुनिया भर में क्रांति होने वाली है और उनके समर्थन में दो महासत्ताएं खड़ी थीं। समाजवादियों के पीछे स्वतंत्रता की लड़ाई की पार्श्वभूमि थी और प्रसार माध्यमों से मिलने वाली प्रसिद्धि थी। इसके विपरीत संघ यानी शाखा में खेलने वाले चार बच्चे और सिर पर गांधी हत्या का दाग। इस पार्श्वभूमि पर संघ अविरत बढ़ता गया और अन्य आंदोलन पिछड़ गए। डार्विन का सिद्धांत कहता है कि जो वर्तमान से नहीं मेल खाता और काल के साथ परिवर्तन नहीं करता वह नष्ट हो जाता है। जो वर्तमान के अनुसार चलता है और समय के चलते बदलने की क्षमता रखता है वही जीवन संघर्ष में टिकता है। संघ सिर्फ हिंदू समाज का संगठन न बन कर वैश्विक मानवी मूल्यों की रक्षा के लिए हिंदू समाज का प्रभावी संगठन बने, इसी ध्येय से संघ की स्थापना हुई। इस तरफ जाने वाला रास्ता बालासाहब ने खोल दिया। जिसे अपनी असामान्यता ज्ञात है, नियति की ओर से सौंपी गई जिम्मेदारी की समझ है वही व्यक्ति राष्ट्रीय विचारधारा में मूलगामी बदलाव ला सकता है। बालासाहब की विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी अलौकिकता और असामान्यत्व सामान्य स्वयंसेवक के रूप में निभाया। डॉ.हेडगेवार पर बालासाहब ने लेख लिखा है। उसमें वे कहते हैं- 

      ‘‘उनकी संन्यासी वृत्ति देख कर मैंने मजाक से पूछा, ‘डॉक्टर आपका जीवन तो संन्यासी की तरह है, तो आप संन्यास लेकर केसरी वस्त्र क्यों नहीं धारण करते?’’

      डॉक्टर ने कहा, ‘‘संन्यासी वेश धारण करने वाले की ओर लोग असामान्य पुरुष की दृष्टि से देखते हैं। मेरी तरफ भी लोग अगर इस दृष्टि से देखने लगे तो मैं जो कार्य करता हूं, वह सामान्य आदमी को करना असंभव है, यह उनकी गलत धारणा होगी। अविवाहित रहकर जितना काम मैं कर सका, उतना गृहस्थाश्रमी जीवन जी कर मैं कर सकता तो मुझे और अच्छा लगता। जनता की दृष्टि से उसका ज्यादा असर होता। समाज की धारणा यह हो कि कार्यकर्ता भी उनके जैसा मनुष्य है। मैं संन्यासी जैसा रहने लगा तो लोग मेरे पांव पर सिर रखेंगे। मुझे जो काम प्रिय है, उसे कभी न करेंगे। मेरा महत्व बढ़ जाए, तो इसमें देश का क्या लाभ?’’ (संदर्भ: संघ गंगोत्री, साप्ताहिक विवेक प्रकाशन)

      भाजपा के विकास में श्री राम जन्मभूमि आंदोलन की विशेषता को स्पष्ट करते हुए लालकृष्ण आडवाणी जी ने कहा था कि राम जन्मभूमि आंदोलन से पहले भाजपा चलचित्र के चरित्र नायक की भूमिका में थी। वह इस आंदोलन के बाद नायक की भूमिका में गई। बालासाहब ने सरसंघचालक पद के सूत्र सम्हाले तब और जब वे निवृत्त हुए, संघ की स्थिति में अंतर था। बालासाहब के लाए परिवर्तन ही इसका कारण थे, पर उन्होंने यह परिवर्तन इतनी सहजता से किए कि यह परिवर्तन अपने कारण ही हुए ऐसी सामान्य स्वयंसेवक की भावना बनी। यहीं उनका बडप्पन है, महत्ता है।

 

 मो. ः ९५९४९६९६३१

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu