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*** एड. मुरलीधर कचरे***

          शारीरिक विकलांगता कोई नहीं चाहता। किसे कौन सी             विकलांगता मिलेगी, यह जन्म से पहले कोई नहीं बता सकता। विकलांगता आने पर उस बच्चे को, उसके माता पिता को, परिवार को, रिश्तेदारों को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है। अंधत्व, बहरापन, मतिमंदता, बहु विकलांगता, अस्थिदोष जैसी विविध प्रकार की विकलांगता के कारण विविध कठिनाइयां होती हैं।

          विकलांग होने कई कारण होते हैं। कुछ लोग इसे किस्मत का अभिशाप मानते हैं। जो लोग विकलांग बनते हैं, उन्हें कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। उनका परिवार, रिश्तेदार, समाज, दोस्त इत्यादि लोगों को चाहिए कि वे उस व्यक्ति को उसकी विकलांगता के साथ स्वीकार करें। समाज में उसका मेलजोल बढ़ाना, उसका जीवन सुखमय बनाने के लिए उसे सहारा देना जरूरी है।

       सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि वह व्यक्ति विकलांग किस कारण से हुआ? कारण जान कर उसका इलाज करना, उसका पुनर्वसन करने की कोशिश करनी चाहिए। सही इलाज और सुयोग्य शिक्षा से उसकी विकलांगता कम की जा सकती है।

       विकलांग व्यक्ति को अपना मानने वाले, मानवता की दृष्टि से मदद करने वाले बहुत से लोग हैं। उसी प्रकार नफरत की नज़र से देखने वाले या इसे पाप समझने वाले लोग भी बहुत हैं। इस प्रकार नजरिया न रखकर सब उनके पुनर्वसन के लिए प्रयास करेंगे तो समाज-मन के निरोगी रहने में मदद मिलेगी।

       आधुनिक युग में यह साबित हुआ है कि विकलांग भी अपने बलबूते पर प्रगति कर सकते हैं। उनको सिर्फ मौके की जरूरत है। वह प्राप्त होते ही उनके गुण दिखाई देने लगते हैं। वे अपनी कार्यक्षमता साबित करते हैं। उन्हें आजकल ‘विशेष सामर्थ्यवान व्यक्ति’ कहा जाता है। ईश्वर की या प्रकृति की ओर से उनमें अगर उनमें कुछ कमी होगी तो उनमें कुछ अतिरिक्त शक्ति भी है। उन्हें विकलांग न कहते हुए ‘विशेष सामर्थ्यवान व्यक्ति’ कहना उचित है।

       ऐसे सामर्थ्यवान व्यक्तिओं के पुनर्वसन की जिम्मेदारी समाज लें तो बहुत बड़ा काम बन सकता है। समाज, परिवार, मित्र परिवार यह जिम्मेदारी शासन की है; ऐसा समझकर छुटकारा प्राप्त कर लेते हैं। यह बात गलत और खेदजनक है।

       शासन भी विकलांगों का पुनर्वसन करने की कोशिश करता है। परंतु इस कोशिश में उदासीनता, भ्रष्टाचार, विकलांगता का नकली प्रमाण पत्र देकर नौकरी प्राप्त करना, अलग अलग सुविधाएं प्राप्त करना जैसी अड़चनें होती हैं। इन समस्याओं के कारण शासन को भी सफलता नहीं मिलती।

       विकलांगों के पुनर्वसन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राज्य के कर्मचारी, जो कि ‘माननीय आयुक्त-विकलांग कल्याण’ पद पर काम करते हैं, वे भी इस काम को सजा मानते हैं। क्योंकि उन्हें काम करते समय विकलांगों के लिए योजनाओं पर अमल करने के बजाय, कोर्ट कचहरी, कोर्ट केसेस, निदेशक और कर्मचारियों की सुनवाई, आदि में समय गंवाना पड़ता है। शासन को इस काम के लिए स्वतंत्र पद की बनाना चाहिए। जब विकलांगों के पुनर्वसन का काम आयुक्त की ओर से होगा तभी सच्चे अर्थों में वह आगे बढ़ेगा।

          विकलांगों के लिए समाज में सुयोग्य वातावरण का निर्माण करना अत्यंत जरूरी है, यानी सिर्फ रैम्प बनाना, बैठने के लिए अलग व्यवस्था करना इतना काफी नहीं। समाज में उनके चलने फिरने योग्य व्यवस्था निर्माण करना चाहिए।  सड़कों, फुटपाथ पर गैरक़ानूनी कब्ज़ा करना, सड़कों पर नाम फलक, यातायात इत्यादि, ऐसी कई बातें हैं, जो विकलांगों के घूमने- फिरने में बाधाएं बनती हैं। विकलांग व्यक्ति अधिनियम १९९५ में नगर पालिका, महानगर पालिका, स्थानीय स्वराज्य संस्था आदि में ३% रोजगार आरक्षण, शासन के बजट में से ३% रकम विकलांग पुनर्वसन के लिए ही इस्तेमाल करना इत्यादि शामिल है।  इस पर प्रभावी अमल हुआ तो अपंगों के पुनर्वसन कार्य को गति मिलेगी।

        समाज के अंधे, बहरे, अस्थि रोग से पीड़ित, मतिमंद और कुष्ठरोग मुक्त विकलांग व्यक्ति की ओर, उनकी विकलांगता की ओर न देखते हुए, उनके सामर्थ्य की ओर देखना, उनके सुप्त गुणों को विकसित करना, उन्हें समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में अवसर मिले, उनके हक की रक्षा हो, इस उद्देश्य से विकलांग व्यक्ति समान अवसर, हक का रक्षण और सहभाग अधिनियम १९९५ की निर्मिति हुई है। इस पर सही और पूरी तरह से अमल करें तो भारी मात्रा में पुनर्वसन हो सकता है। लेकिन इस अधिनियम की जानकारी कई लोगों को नहीं है।

          गोवा, कर्नाटक, गुजरात ने विकलांगों के पुनर्वसन में बड़े पैमाने पर कार्य किया है। गोवा जैसा अत्यंत छोटा राज्य विकलांगों को प्रति माह २००० रु. से ३००० रु. तक अनुदान देता है। रोजगार, कारोबार और कई व्यवसायों के लिए कानून के अनुसार मदद देता है। इन राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र शासन का काम नगण्य है। इन राज्यों ने विकलांगों के पुनर्वसन सम्बंधी नीति  निश्चित की है।

          अपंगों के बच्चों के पुनर्वसन का कार्य करने वाली बहुत सी संस्थाएं कार्यरत हैं। महतवपूर्ण यह है कि ऐसे बच्चों में आत्मविश्वास जगाना और उसे बढ़ाना। शालेय शिक्षा के साथ उन्हें व्यवसाय आधारित शिक्षा देना, स्वावलंबी बनाना। जिससे स्वावलंबन और आत्मविश्वास जैसे दो पंखों पर ये इस स्पर्धात्मक युग की दुनिया में अपना स्थान निर्भयता से बना सके। व्यवसाय आधारित प्रशिक्षण या विकास पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत ध्यान दिया है। देश के युवाकों को अलग-अलग क्षेत्रों में कुशलता प्राप्त हो तो रोजगार और स्वयं रोजगार निर्मिति में बढोत्तरी होगी इसलिए सारे स्तर पर विकलांगों को व्यवसाय आधारित कला कौशल पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

          विकलांगों का जीवन समस्याओं से भरा है। शिक्षा, नौकरी, कामकाज करते समय कई मुश्किलें आती हैं। विकलांग व्यक्ति १९९५ के कानून के अनुसार विकलांगता की समस्याओं को दूर करने हेतु, हर राज्य में एक विकलांग कल्याण आयुक्त की नियुक्ति की गई है। शासन का काम समय पर नहीं होता, यह आमतौर पर अनुभव है। इसलिए विकलांगों को न्याय मिलने में अडचनें आती हैं। पुणे में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद ने विकलांग व्यक्तियों के लिए न्याय केन्द्र ५ नवम्बर २००६ से शुरू किया है। इस न्याय केन्द्र की ओर से अधिवक्ता (वकील) बंधुओं ने और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बहुत से विकलांगों को न्याय दिलाने का कार्य किया है। उदा. नौकरी में, कचहरी में योग्य काम देना, व्यवसाय के लिए महापालिका से स्टाल दिलाना, नौकरी में प्रमोशन दिलाना, जिनके साथ कुछ धोखाधड़ी हुई है ऐसे व्यक्तियों को न्याय दिलाना आदि।

          विकलांगों के पुनर्वसन में महत्वपूर्ण बात है एकल शिक्षा। शासन के मतानुसार सिर्फ सामान्य पाठशाला में ही विकलांगों को शिक्षा देकर यह समस्या सुलझाई जा सकती है। जिनमें विकलांगता ज्यादा हैं ऐसे छात्रों को विशेष पाठशाला की जरूरत होती है। वे आसानी से घूम फिर नहीं सकते। उन्हें इस एकल शिक्षा पद्धति का फायदा नहीं होता। अति विकलांगता वाले बच्चों के लिए एक नई योजना दिल्ली के स्कूल में शुरू हुई। विकलांग छात्रों के स्कूल में सामान्य छात्रों को भी प्रवेश दिया गया। इससे एकल शिक्षा का फायदा विकलांग बच्चों को दिलाने की कोशिश की गई। उसे ‘रिवर्स इंटेग्रेशन’ कहा गया। सरकार ऐसी पाठशालाएं खोलने की अनुमति दें तो पुनर्वसन की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

          विकलांगता न हो इसलिए टीका लगवाना, नियमित रूप से सेहत की जांच करना, जन जागृति करना, बीमारी का सही इलाज करना, सफाई रखना, व्यसनाधीन न होना, संतुलित आहार लेना, जल्द से जल्द रोग निदान करना इससे विकलांगता टाली जा सकती है। इसके लिए बड़ी मात्रा में जन जागरण होना जरूरी है।

          ३ दिसंबर को वैश्विक विकलांग दिन होता हैै। इस दिन अलग अलग कार्यक्रम संपन्न होते हैं। केवल इस एक दिन कार्यक्रम करके पुनर्वसन की समस्या नहीं सुलझायी जा सकती। इसमें बाधाएं हैं। अधिकारियों और सरकार की उदासीनता, भ्रष्टाचार, अयोग्य व्यक्तिओं को मिलने वाली सुविधा तथा योग्य व्यक्तियों को इससे वंचित रखना। इनमें जब तक सुधार नहीं होता तब तक विकलांगों को सामाजिक प्रवाह में लाने में मुश्किलें आएंगी ही।

          उपरोक्त काम में विद्यालय, सामाजिक संस्थाएं, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनितिक पार्टियां और संगठन, समाज के सारे घटकों का सहयोग और प्रयत्न महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।

 

 

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