सफल विदेश और कूटनीति पाक-तुर्की दोनों ‘ग्रे लिस्ट’ में

 

जिन देशों एवं शासन से राजनयिक संबंधों को लेकर कभी भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान में संशय और संकोच था, मोदी सरकार के अनेक तथ्यों पर सकारात्मक पहल के कारण वह बदल चुका है। अब पारस्परिक हित और भारत का भला होना ही भारतीय मैत्री का एकमेव आधार है। भारत अब इजरायल की कीमत पर इस्लामिक मुल्कों से संबंध नहीं रखता। अब हम इजराइल से अलग और अरब देशों से अलग संबंध रखते हैं।

हाल ही में पाकिस्तान को दोहरा झटका लगा। आतंकवादी समूहों के वित्त पोषण पर निगरानी रखने वाली वैश्विक संस्था ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ (एफएटीएफ) ने पाकिस्तान के साथ ही उसके खास दोस्त तुर्की को भी इस बार ‘ग्रे लिस्ट’में डाल दिया है। तुर्की को ‘आतंकवाद वित्त पोषण’ से सख्ती से नहीं निपटने के लिए पहली बार इस लिस्ट में डाला गया है। जबकि, पाकिस्तान को आतंकी गतिविधियों से कारगर तरीके से नहीं निपटने  के कारण एक बार फिर से ‘ग्रे-लिस्ट’ में ही रखने का फैसला किया गया है। मालूम हो कि पाकिस्तान एफएटीएफ की ‘ब्लैक लिस्ट’ से बचने के लिए तुर्की, चीन और मलेशिया जैसे मित्र देशों का सहारा लेता रहा है। कोई माने या न माने, भारत की सफल विदेश नीति और कूटनीति का ही यह परिणाम है। यह नया भारत है। भले ही, एफएटीएफ कहता फिरे कि किसी देश के दबाव में नहीं बल्कि फैसला सबकी सहमति से किया गया।

दरअसल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र के 76वें सत्र में तुर्की ने एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया था। भारत ने भी इसका जोरदार जवाब दिया। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने तुर्की की कमजोर कड़ी साइप्रस पर कब्जे का मुद्दा उठा दिया। तुर्की कई दशक से साइप्रस के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमाए हुए है। दुनियाभर के मुसलमानों के स्वयंभू नेता के रूप में स्वयं को स्थापित करने की चेष्टा में लगे तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने साल 2019 में भी संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करने का मुद्दा उठाते हुए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से कश्मीर की तरफ ध्यान देने का अनुरोध किया था।

 पाकिस्तान हुआ ग्रे लिस्ट में शामिल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अर्दोआन के भाषण के जवाब में शिखर सम्मेलन के दौरान तुर्की के विरोधी देशों ग्रीस, आर्मेनिया और साइप्रस के नेताओं से मुलाकात की। मोदी ने नवंबर साल 2019 में तुर्की के प्रस्तावित दौरे को भी रद्द कर दिया और तुर्की की एक कंपनी के साथ 2.3 अरब डॉलर के नौसैनिक समझौते को रोक दिया। इस समझौते का मकसद भारत और तुर्की के बीच व्यापार असंतुलन को दूर करना था। इसके बदले मोदी ने तुर्की के दुश्मन देश आर्मेनिया के साथ 40 मिलियन डॉलर का समझौता किया। अर्दोआन ने तनाव बढ़ाते हुए फरवरी 2020 में इस्लामाबाद के दौरे में बयान दिया कि कश्मीर ‘जितना पाकिस्तान के दिल के क़रीब है, उतना ही तुर्की के करीब भी है।’

भारत एफएटीएफ का एक सदस्य है। पाकिस्तान के आतंकी गतिविधियों को पालने पोसने के सबूत भारत विश्व मंच पर रखता भी रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पिछली जुलाई में ही बताया था कि नरेन्द्र मोदी सरकार के प्रयासों के कारण ही पाकिस्तान को एफएटीएफ की ‘ग्रे लिस्ट’ में शामिल किया गया। मीडिया सूत्रों के अनुसार तब विदेश मंत्री ने भाजपा नेताओं के प्रशिक्षण कार्यक्रम में कहा कि ’प्रधानमंत्री जी7 या जी2 के माध्यम से वैश्विक प्लेटफार्म पर आतंकवाद का मुद्दा हमेशा उठाते रहे हैं’। उन्होंने कहा कि भारत सरकार के प्रयासों के कारण ही आतंकवादी संयुक्त राष्ट्र की लिस्ट में शामिल किए गए हैं।

एफएटीएफ लिस्ट में होने का अर्थ है कि मनी लाँड्रिंग और आतंकी गुटों को मिलने वाली आर्थिक सहायता पर अंकुश लगाने के लिए यदि संबंधित देश प्रभावी कार्रवाई नहीं करता है, तो उसे ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा। ऐसी स्थिति में अनेक आर्थिक प्रतिबंधों का खतरा होता है। ‘ग्रे लिस्ट’ में होने के कारण अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और एशिया विकास बैंक से मदद लेने में भी मुश्किलें आती हैं।

नरेन्द्र मोदी ने बढ़ाई सत्ता की डोर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब से केन्द्र में सत्ता की बागडोर संभाली है, तब से भारत की विदेश नीति नई दिशा के साथ नए दौर में है क्योंकि पाकिस्तान-चीन जैसे दोमुंहे पड़ोसी पहले से ही सिरदर्द हैं। तुर्की भी कुछ समय से बौराया हुआ था। हाल ही में बांग्लादेश में मंदिरो में हुई तोड़फोड़ और कट्टरपंथी हिंसा से भी तनातनी का माहौल बना है। दूसरी ओर, अमेरिका-ईरान, इजरायल-फिलिस्तीन, चीन-अमेरिका, अमेरिका-रूस आदि के बीच संबंध कटुता के उच्च स्तर पर हैं। इसके चलते, न सिर्फ राजनीतिक बल्कि आर्थिक गतिरोध भी बढ़ गए हैं। ऐसे में भारत सोच समझकर कदम उठा रहा है, क्योंकि इन सभी देशों के साथ उसके आर्थिक हित जुड़े हुए हैं इसलिए भारत किसी एक देश की कीमत पर दूसरे देश से संबंध स्थापित करने की विदेश नीति को पीछे छोड़ कर अलग-अलग देश, अलग-अलग संबंध पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

चीन के सरकारी थिंक टैंक ‘चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज’ के वाइस प्रेसीडेंट रोंग यिंग ने भी पिछले साल भारत की विदेश नीति में जबरदस्त बदलाव की बात मानते हुए कहा था कि मोदी सरकार में भारत की विदेश नीति ज्यादा सक्रिय, मुखर हो गई है। रोंग यिंग का मानना है कि भारत को दुनिया की महाशक्ति बनाने के उद्देश्य से विदेश नीति में यह बदलाव देखने को मिल रहा है।

चीन ने की थी आलोचना

चीन ने ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, भारत और जापान के संगठन ‘क्वाड’ को एशियाई देशों के नेटो संगठन की संज्ञा देते हुए इसकी आलोचना की थी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि हम सभी जानते हैं कि ‘क्वाड’ किस तरह का तंत्र है। एक अलग गुट बनाने, चीन को एक चुनौती के रूप में पेश करने, क्षेत्र के देशों और चीन के बीच कलह पैदा करने के कुछ देशों के प्रयासों का चीन विरोध करता है। चीन तो बांग्लादेश के भी ‘क्वाड’ का हिस्सा बनने की आशंका से इतना बौखला गया था कि उसने बांग्लादेश को चेताया था कि यदि ढाका बीजिंग विरोधी इस ’क्लब’ का हिस्सा बनता है, तो द्विपक्षीय संबंधों को भारी नुकसान होगा।

दरअसल, साल 2009 से ही शेख हसीना वाजेद की सरकार बनने के बाद भारत बांग्लादेश संबंध बेहतर होने लगे थे। दोनों देशों के बीच सुरक्षा मामलों को लेकर सहयोग घनिष्ठ और महत्वपूर्ण रहा है। बांग्लादेश ने अपने यहां भारत विरोधी गुटों पर लगाम लगाई, जिससे भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में शांति बनाए रखने में मदद मिली लेकिन भारत के साथ एलएसी पर तनाव बढ़ने के बाद चीन ने बांग्लादेश को आर्थिक मदद और हथियारों की सप्लाई के बहाने भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की।

भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ‘क्वाड’ की पहली बैठक को चीन से जोड़े जाने की बात को खारिज किया था। उन्होंने तब कहा था कि ‘क्वाड’ समूह किसी भी देश के खिलाफ नहीं है और ‘क्वाड’ समूह का दृष्टिकोण निगेटिव नहीं बल्कि पॉजिटिव है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी कहना है कि ‘क्वाड’ समूह के सभी देश लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। मोदी के अनुसार हमलोग एक आज़ाद, खुले हुए और समावेशी भारत-प्रशांत क्षेत्र के लिए प्रतिबद्ध हैं।

संबंध बनाए रखना है चुनौतीपूर्ण

देखा जाए तो चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के कारण उसके साथ संबंध बनाए रखना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण है। चीन ने अपनी वित्तीय एवं सैन्य ताकत के जरिये तथा दरियादिली से खैरात बांटकर भारत के पड़ोसी देशों में अपना मजबूत प्रभाव जमा लिया है, जो हमारी विदेश नीति के उद्देश्यों की राह में बाधक बन सकता है। चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल’ रणनीति, उसकी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना और बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं के लिए सटीक बैठती है। वास्तव में इससे चीन का प्रभाव और भी आगे तक चला जाता है, जो रणनीतिक रूप से हमारे लिए असहज हो सकता है। चीन ने नेपाल और श्रीलंका के साथ अपने रक्षा संबंध और भी मजबूत किए हैं। ऐसी स्थिति में जमीनी हकीकत बदलती है, तो नीतियों में भी बदलाव करना पड़ता है। भारत की विदेश नीति में बदलाव भी इसी बात का द्योतक है।

दूसरी ओर भारत के टनल वाले प्लान ने पाकिस्तान और चीन की नींद उड़ा दी है। केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर और लद्दाख में भारत सरकार कुल 31 टनल पर काम कर रही है। पाकिस्तान पिछले दो दशकों में इतनी टनल अपने देश में नहीं बना पाया है। जम्मू कश्मीर और लद्दाख की सीमा चीन और पाकिस्तान से लगती है और इस दृष्टि से ये टनल और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। कश्मीर और लद्दाख की सीमा पर जोजिला दर्रे पर लगभग साढ़े 14 किलोमीटर लम्बी टनल के बन जाने से भारतीय सेना साल के 365 दिन सड़क के रास्ते श्रीनगर से लद्दाख पहुंच सकेगी। यानी, मुश्किल घड़ी में हथियार भेजने हो या सैनिकों को वहां पहुंचाना हो, ये टनल एक सेतु का काम करेगी। इसके अलावा ये टनल कश्मीर और लद्दाख के बीच कारोबार और पर्यटन को भी गति प्रदान करेगी।

मोदी ने लाया है बदलाव

भारत ने इजराइल से लेकर ताइवान तक कई नए दोस्त बनाए हैं। जिन देशों एवं शासन से राजनयिक संबंधों को लेकर कभी भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान में संशय और संकोच था, मोदी सरकार के अनेक तथ्यों पर सकारात्मक पहल के कारण वह बदल चुका है। अब पारस्परिक हित और भारत का भला होना ही भारतीय मैत्री का एकमेव आधार है। हम अफगानिस्तान-म्यांमार की कीमत पर अमेरिका से और पूर्व सोवियत संघ के देशों से रूस की कीमत पर संबंध नहीं रखते हैं। भारत अब इजरायल की कीमत पर इस्लामिक मुल्कों से संबंध नहीं रखता। अब हम इजराइल से अलग और अरब देशों से अलग संबंध रखते हैं।

चार देशों का एक और गठजोड़ बनाने की दिशा में काम करते हुए भारत, इजरायल, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात ने परिवहन, प्रौद्योगिकी, नौवहन सुरक्षा और व्यापार के क्षेत्र में आधारभूत ढांचा तैयार करने की संभावना तलाशनी शुरू की है। इन देशों के विदेश मंत्रियों ने एक साथ वर्चुअल बैठक कर इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर, इजरायल के विदेश मंत्री येर लेपिड, यूएई के अब्दुल्ला बिन जायेद अल नाहयान और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन इस बैठक में शामिल हुए। इजराइल के दौरे पर गए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकन के उस सुझाव से सहमति जताई कि तीन अलग-अलग द्विपक्षीय संबंध के बजाय एक फोरम बनाना ज्यादा बेहतर होगा। इजरायल के विदेश मंत्री लेपिड ने कहा कि चारों देशों ने आर्थिक सहयोग के लिए एक अंतरराष्ट्रीय फोरम बनाने का फैसला लिया है।

वर्तमान में भारत अपने सामरिक हितों की पूर्ति के लिए अमेरिका और रूस को संतुलित रूप से साथ लेकर चल रहा है। सामरिक के साथ-साथ वाणिज्यिक हितों की पूर्ति के लिए भारत अपने पड़ोसी देशों पर फोकस कर रहा है। उल्लेखनीय है कि पहले विदेशी दौरे के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रणनीतिक रूप से हिंद महासागर के द्वीपीय देश मालदीव को चुना था। अलबत्ता, बांग्लादेश से अच्छे रिश्तों के बावजूद आईएसआई और कट्टरपंथी संगठनों ने हिन्दू मंदिरों और हिन्दुओं को निशाना बनाना जारी रखा है, जो चिंता का विषय है।

 

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