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***घनश्याम कुकरेजा*** 
     

     सौदर्य से परिपूर्ण, बरबस ही आकर्षित कर लेने वाले ऊंचे-ऊंचे हिमाच्छादित पर्वत शिखर, नीले आकाश में रुई के ढेर जैसे उड़ते बादल…कुछ ऐसा ही मनमोहक नजारा है, बर्फीली घाटियों की वादी-ए-लद्दाख का। इन्हीं वादियों में बहती है पावन सिंधु नदी..! देवों के देव महादेव के प्रिय कैलाश पर्वत के उत्तर में स्थित मानसरोवर जल स्रोत से उद्गमित विश्व की महानतम नदी है सिंधु! विश्व में शायद ही किसी देश की सभ्यता, संस्कृति व इतिहास का एक नदी के साथ इतना गहराई से जुड़ाव रहा हो, जितना कि पवित्र सिंधु नदी का अपने हिंदुस्तान की सभ्यता, संस्कृति व इतिहास के साथ रहा है। यह वही पुरातन एवं पौराणिक सिंधु नदी है, जिसके तट पर वैदिक संस्कृति अंकुरित-पुष्पित-पल्लवित हुई। सिंधु नदी ने ही हमारे देश को नाम दिया, हमें सांस्कृतिक पहचान दी। इसी नदी के किनारे विश्व की अति प्राचीन व समृद्ध सिंधु सभ्यता विकसित हुई तथा इसी नदी के पावन तट पर विश्व वंदनीय वेदों व पुराणों की रचना की गई। कालांतर में ‘सिंधु’ से ‘हिंदु’ शब्द का उद्भव हुआ तथा अपने देश का नाम हिंदुस्तान पड़ा। ऋग्वेद में अन्य नदियों से तुलना करते हुए सिंधु नदी की महिमा का अद्भुत वर्णन कर उल्लेख किया गया है कि यह सब से शक्तिशाली नदी है। इसकी गर्जना स्वर्ग तक सुनाई देती है। पलक झपकते ही इसमें प्रचंड तूफान आ जाता है। यह तीव्र गति से प्रवाहित होने वाली, स्वर्ण भंडार व धन-संपदा से परिपूर्ण है। इन शब्दों में वैदिक ऋषियों ने ऐसे गरिमामय अलंकारों से सिंधु नदी को श्रृंगारित किया है। श्योक नदी के संगम पर इसका पाट १५ कि. मी. चौड़ा हो जाता है। दुनिया की किसी भी नदी का पाट इसके आधे के बराबर भी नहीं है। यहां समुद्र-सा दृश्य दिखता है, अत: इसका नाम सिंधु (सागर) पड़ा।
        ऐसी महानतम व पौराणिक नदी के पावन तट पर जम्मू-कश्मीर के लेह शहर में सिंधु दर्शन यात्रा समिति द्वारा भारतीय सिंधु सभा के सहयोग से प्रति वर्ष सिंधु दर्शन यात्रा का आयोजन किया जाता है। देश के विभाजन के बाद समिति द्वारा सिंध से बिछड़े सिंधु-पुत्रों का जुड़ाव पुन: मातृभूमि सिंध से कराने का यह अत्यंत सराहनीय प्रयास है। बड़ी संख्या मेंे सिंधु पुत्रों के साथ अन्य भारतीय इसका लाभ उठा रहे हैं।

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