हिंदी विवेक : we work for better world...

***माधवी भुत्ता***
       

                                      

 भारत की युवा पीढ़ी की शिक्षा किस तरह होनी चाहिए? क्या उसकी शिक्षा में भारत की पूर्व महत्ता का प्रतिपादन आवश्यक नहीं? क्या स्वराष्ट्राभिमान, संस्कृति का गर्व, महापुरुषों का सम्मान, उनके कार्यों के द्वारा प्रेरणा लेना आवश्यक नहीं? क्या गणित और भूगोल के साथ ही संस्कृति का ज्ञान देना स्कूल-कॉलेज के जिम्मेदारी नहीं है?
     दीनानाथ बत्रा नामक अध्यापन क्षेत्र में आदरणीय व्यक्ति ने इस भारतीय इतिहास के सुवर्ण पन्नों को हमारी आनेवाली पीढी तक पहुंचाने का दायित्व उठाया है।
      सन १९३९ में राधनपुर, डेरा गाजी खान (पाकिस्तान) में जन्में दीनानाथ बत्रा ने दिल्ली से एम.ए. किया। १९९० तक डी. ए. वी. विद्यालय, कुरुक्षेत्र में आचार्य पद पर रहे। हरियाणा शिक्षा बोर्ड की पाठ्ययोजना, दिल्ली शिक्षा बोर्ड, दिल्ली कोड समिति, दिल्ली नैतिक शिक्षा समिति में भी वे कार्यरत रहे। अखिल भारतीय स्काउट्स गाइड्स के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष और भारतीय शिक्षण मंडल के पूर्व अखिल भारतीय संयुक्त मंत्री का कार्यभार संभाल चुके दीनानाथ बत्रा वर्तमान में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के अध्यक्ष तथा शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति के राष्ट्रीय संयोजक हैं।
      अध्यापन क्षेत्र में इतना व्यापक कार्य कर चुके दीनानाथ बत्राजी ने १९९१ में लिखी ‘प्रेरणादीप’ नामक पुस्तक हमारे महापुरुषों के जीवन की प्रेरणादायी गाथाओं का वर्णन है। भारतीय संस्कृति एवम् भारतीयता के संस्कार और वीर रस के परम सामर्थ्य की अनुभूति इस पाठ्य पुस्तक के माध्यम से अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने की कल्पना इसमें की गयी है।
      भारत के सुवर्ण इतिहास का वर्तमान से साक्षात्कार कराना ६० साल से भी अधिक समय तक शासन करनेवाली कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को मान्य नहीं था। यह प्रयोग बत्राजी द्वारा किया गया है। इस बात को लेकर पाश्चात्य विश्व तो छोड़िए, हमारे ही देश के कांग्रेसी और कम्युनिस्ट विचारकों ने ऐसा हाहाकार मचाया है जैसे आसमान टूट पड़ा हो। आज ‘नीगर’ शब्द का प्रयोग अनुचित माना जाता है यह मान्य है, पर दीनानाथ बत्राजी ने यह लेखन १९९१ में किया था, तब इस शब्द प्रयोग पर कोई पाबंदी नहीं थी। ऐसे अर्थहीन विषय को समाचार बनाकर, उस पर नुक्ताचीनी करते रहना, यही इन स्यूडो सेक्युलरिस्टों की तासीर बन गई है।
     डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन के एक प्रसंग का उल्लेख भी दीनानाथ बत्रा ने इन पुस्तकों में किया है। क्या भारतीयता की प्रशंसा करना कोई निंदनीय बात है? पर जो वर्ग भारतीयता एवं उसके मूल्यों के प्रति गर्व महसूस न करता हो, उनकी मानसिकता से हम और क्या अपेक्षा रख सकते हैं?
     सदियों से भारत भूमि, साधु-संतों की तपोभूमि रही है। सनातन धर्म की सहिष्णुता के कारण, अन्य धर्म और परदेशी सोच दूध में शक्कर की भांति हमारी संस्कृति में मिल गई। चौथी सदी में भारत-प्रवास पर आए चीनी प्रवासी ह्यू-एन-संग, जिस संस्कृति से अति प्रभावित हुए थे, वही विचारशीलता समय के बीतते खोखली होती गई। अंग्रेजों ने भारतीय भूमि पर सिर्फ आधिपत्य नहीं जमाया, इसके आचार-विचार पर भी गहरा घाव पहुंचाया। १९ वीं सदी के उत्तरार्ध में भारतीय प्रजा भले ही अंग्रेज सत्ता के विरुद्ध आजादी का युद्ध लड़ रही थी, हर भारतीय सरदार पटेल को ही चाहता था, पर महात्मा गांधी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्राधान्य दिया। फलस्वरुप साम्यवादी विचारों से प्रभावित पंडित नेहरू और नेहरूवाद भारत में जड़ कर गया। स्वतंत्र भारत में महात्मा गांधी और सरदार पटेल की मृत्यु के पश्चात, कांग्रेस में नेहरू परिवार का वर्चस्व बढ़ा। अपनी पुत्री, इंदिरा गांधी को कारावास के दौरान लिखे पत्रों के माध्यम से पंडित नेहरू ने भारतीय इतिहास का उल्लेख किया है और भारतीय इतिहास के अभिन्न अंग हिन्दुत्व के प्रति प्रखर विरोध जताया है। कांग्रेस के ६० साल से अधिक काल के शासन के दौरान नेहरू वंश की कदमबोशी ने कांग्रेस इतिहास की सत्य गाथाओं का अवमूल्यन किया है।
      कांग्रेस के द्वारा राम सेतु तोड़ने की योजना, इतिहास के साथ खिलवाड़ करने का सबसे बड़ा उदाहरण है। राम सेतु के अस्तित्व से कांग्रेस का इनकार, राम और रामायण की गाथा से इनकार करने जैसा है। नेहरूवाद की साम्यवादी विचारधारा समुद्र में डूबी द्वारिका नगरी, अयोध्या में राम जन्मभूमि, मथुरा में कृष्ण जन्म स्थल, सरस्वती नदी का अस्तित्व जैसे हमारे सुवर्ण लिखित पन्नों को काल्पनिक कथाओं का दर्जा देती है। हमारे इस सुवर्णकाल के इतिहास कोपन्नों मेंे उतारने की प्रक्रिया को ‘सॅफोरिंग द हिस्ट्री’ अर्थात इतिहास का भगवाकरण का नाम देकर नकारा गया है।
‘सॅफोरिंग द एज्युकेशन सिस्टिम’ का आरोप लगाकर भारतीय मूल्यों के अवमूल्यन की प्रक्रिया जोर-शोर से चल रही है। सॅफरॉन अर्थात भगवा रंग तो त्याग, वैराग्य और सेवा का प्रतीक है। इस भगवे-केसरी रंग को भारत के ध्वज में भी स्थान मिला है। क्या हम भारतीय ध्वज को ‘सॅफोरिंग द नेशन’ के आरोप में बदल सकते हैं? तो फिर शिक्षण में सॅफोरिंग का आरोप अर्थहीन नहीं है?
      दीनानाथ बत्रा ने १९९१ में लिखी पुस्तकों को जैसे ही प्रकाशित किया कांग्रेसी विचारधारी भौंहें तन गयीं। जिस पुस्तक के विचारों का १९९१ में विरोध नहीं किया गया, उसका २०-२२ साल के बाद इतना प्रखर विरोध यही प्रस्थापित करता है कि यह विरोध राजनैतिक हेतु से किया जा रहा है।
जैसा कि मैंने कहा कि वास्तविक प्रश्न भिन्न है, १०० साल से भारतीय समाज को भारतीय संस्कृति से तोड़ने का और पाश्चात्य समाज से जोड़ने का यत्न, दीनानाथ बत्रा की पुस्तक के विरोध के माध्यम से भारतीयता और भारतीय संस्कृति के विनाश का जो घृणास्पद कार्य किया जा रहा है, उससे विचलित होना निरर्थक है। वास्तव में हमारी पीढियों को निरंतन संस्कृति पूजन के पथ पर चलाना प्रत्येक देशवासी का कर्तव्य है।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu