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***सुबोध मिश्र ***

     पाइप और लाइफ का क्या किस्सा है? भला पाइप का लाइफ से क्या संबंध, उससे क्या लेना देना। अभी तक तो लाइफ का संबंध वाइफ से सुना था और वाकई में देखा जाये तो वाइफ के आने के बाद लाइफ पर असर पड़ता भी है, बहुत सारे बदलाव आ जाते हैं। पर ये पाइप और लाइफ का माजरा कुछ समझ में नहीं आ रहा है, जोशी साहब। देखो पाटिल साहब, आजकल पाइप का जितना असर लाइफ पर पड़ रहा है उतना वाइफ का कभी नहीं पड़ा।
     वो कैसे? जरा हमें भी तो समझाओ।
     लगता है आपकी एरिया में अभी खुदाई का काम शुरू नहीं हुआ और आप शहर में घूमते भी नहीं हैं।
     हां, ये तो है- घर से आफिस एकदम नजदीक है और आफिस में काम इतना रहता है कि इधर-उधर जाने का टाइम ही नहीं मिलता। लेकिन शहर में ऐसा क्या हो गया है?
    अरे! क्या बताये पाटिल साहब, आजकल प्रशासन बहुत आगे की सोचने लगा है।
     अच्छा! प्रशासन सोचने भी लगा है! और वो भी आगे की! हां, बरोबर है- अगले चुनाव के बारे में अभी से सोचने लगा होगा।
     अरे वो तो है ही,चुनाव के बारे में तो सोचना ही है। अच्छा ये बताओे पिछले साल की मुंबई की बाढ़ याद है ना!
      क्या बोलते हो जोशी साहब, पिछले साल तो बारिश ही नहीं हुई, पीने के पानी के वांधे हो रहे हैं- और आप बाढ़ की बात करत रहे हो।
ओफ हो! तुम तो बाल की खाल निकालने लगते हो। मेरा मतलब है दो साल पहले वाली बाढ।
      अरे! याद मत दिलाओ उस बाढ की मेरा बेटा तब मुंबई में ही था। बिल्डिंग के पहले माले पर रहता था। पूरा घर पानी से भर गया था। तीन दिन तो बेचारे को छत पर रहना पड़ा था। सोफा बेड, टीवी सब बेकार हो गया था।
हां, मैं उसी बाढ़ की बात कर रहा हूं। तब प्रशासन ने ‘कारण खोजो कमेटी’ बनाई थी और उस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि ड्रेनेज पाइप पुराने और पतले होने के कारण पानी जल्दी पास नहीं हो पाता है इसलिए बाढ़ आती है। अगर भविष्य में बाढ़े से बचना है तो इन पाइपों से चार गुना चौड़े पाइप डालने पड़ेंगे तभी बरसात का पानी निकल पायेगा।
      लेकिन यह तो मुंबई की बात है। उस रिपोर्ट का हमारे शहर से क्या लेना देना?
       तभी तो कह रहा था कि प्रशासन आगे की सोचने लगा है। आगे चलकर हमारा शहर भी मुंबई जैसा बड़ा हो सकता है। यहां भी वैसी बारिश हो सकती है। बाढ़ आ सकती है। सरकारी अफसर तो बड़े-बड़े पुराने पाइप के बंगलों में ही रहते हैं तो बाढ़ का पानी सबसे पहले उन्हीं के घर में घुसेगा और उन्हें तुम्हारी तरह सोफा और टी वी की चिंता नहीं है। उन्हें चिंता इस बात की है कि अगर रात में अचानक बाढ़ आ गई और पानी पहले माले तक भर गया तो वो मुवायना करने के लिए बाहर कैसे निकलेंगे। इसलिए उन्होंने मुंबई वाली रिपोर्ट अपने शहर में लागू करवा दी है। देखते नहीं हो कितने बड़े-बड़े पाइप सडकों के किनारे पड़े हैं। कई लोग तो उसके अन्दर रहने भी लगे हैं। एक छोटी फैमिली आराम से उसमें रह लेती है। अभी परसों के पेपर में ही तो आया था कि पाइप डालते समय हंगामा खड़ा हो गया। जो फैमिली उसमें रहती थी उसने खाली करने से मना कर दिया कि हमारे पांच छोटे-छोटे बच्चे हैं, बीबी गर्भवती है, ऐसे में हम कहां जायेंगे? प्राब्लम तो तब खड़ी हो गई जब पुलिस वाले ने दो डंडे मार दिए। तब से मियां-बीबी भूख हड़ताल पर बैठ गये। जिला कलक्टर को आना पड़ा और डिलीवरी के छ: महीने बाद तक उस पाइप में रहने के लिए इजाजत दी। तब जाकर मामला शांत हुआ।
       अब इतनी बड़ी पाइप सड़क के किनारे डालना है तो उससे दुगुनी खुदाई करनी पड़गी। इस समय हमारे शहर में जगह-जगह पर यही तो हो रहा है और उससे इतनी परेशानी बढ़ गई कि पूछो मत।
     ठीक है भाई नहीं पूछते, मुझे क्या पडी है पूछने की। कमाल के आदमी हो! इस शहर की परेशानी से तुम्हारा कोई सरोकार नहीं, कुछ लेना-देना नहीं, कुछ भी नहीं जानना चाहते?
      अच्छा भाई बताओ। अरे क्या बताएं करीब बीस दिन पहले की बात है आफिस जा रहा था तो रास्ते में एक बोर्ड लगा देखा- ‘काम चालू- रास्ता बंद’ कहां-कहां से घूम कर जाना पड़ा और तब से यूं ही आ जा रहा हूं। करीब १५ दिनों से घर के सामने वाली सड़क पर भी पाइपों का ढेर लग गया है। खुदाई शुरू हुई, दो पाइप डाले और काम बंद करके चले गए। रास्ता बंद का बोर्ड लगा हुआ है ‘काम बंद’ का बोर्ड अभी तक नहीं लगाया। और तो और घर में तीन दिनों से पीने का पानी भी नहीं आ रहा है। आफिस में कम्प्लेन करने गए तो उन्होंने खुद ही बताया कि सड़क की खुदाई करते समय पानी का पाइप कट गया है। अब चूंकि पानी वहीं बह रहा है, तुम्हारे यहां कैसे आयेगा? मैंने कहा कि भाई तीन दिन हो गये है, एक पाइप जोड़ने के लिए कितना समय चाहिए? तो साहब क्या बोलते हैं कि पाइप जोड़ने वाला कांट्रैक्टर कहता है कि सड़क खुदाई का कांट्रैक्ट हमें नहीं दिया तो अब जिसने तोड़ा है उसी से जुड़वाओ। सड़क खोदने वाला कहता है कि मेरा काम सड़क खोदना और नया पाइप डालना है, पुराना पाइप जोड़ना हमारे कांट्रैक्ट में नहीं है। अगर हमसे ही जुड़वाना है तो हमारे कांट्रैक्ट में अमेंडमेंड करो और अलग से उसके चार्जेस दो तो ही हम जोड़ेंगे। अब कांट्रैक्ट अमेंड करना हमारे हाथ में तो है नहीं सो बड़े साहब कल से मंत्रालय में हैं। आज पता चला है कि मंत्री महोदय नागपुर अधिवेशन में गये हैं, एक हप्ते के बाद जब वापस आयेंगे तब इसके ऊपर बिचार किया जायेगा।
       अरे हां! याद आया हमारे आफिस के ही पवार साहब बता रहे थे कि कल सुबह-सुबह उनकी लड़की साइकिल से ट्युशन जा रही थी तो एक गड्ढे में गिर गई। सायकल तो टूटी ही पैर में फ्रैक्चर हो गया सो अलग। बेचारे बहुत परेशान थे। बता रहे थे कि कंप्लेन करने गये थे कि अगर आप लोग गड्ढे खुदवाते है तो उन्हें वापस मिट्टी डालकर भरवाते क्यों नहीं? पहले तो बोले देखो भाई सड़क खुदवाना मेरे अंडर में आता है, रहा मिट्टी भराई का काम तो वो कमलेश साहब देखते हैं और वो आजकल छुट्टी पर हैं। १५ दिनों के बाद जब ज्वाइन करेंगे तब हम तुम्हारी कम्प्लेंट उन तक पहुंचा देंगे। हमने कहा तब तक ये गड्ढे ऐसे ही पड़े रहेंगे। आप लोगों की कोई जवाबदारी है कि नहीं। देखो भाई! यह इतना आसान काम नहीं है। जब तक हम खुदाई का बिल पास नहीं करते, भराई का काम शुरू नहीं हो सकता। आखिर कांट्रैक्ट का मामला है। तुम तो जानते ही हो आजकल के कांट्रैक्टर कैसे होते हैं। खुदाई का कांट्रैक्ट वर्ग फुट के हिसाब से होता है। अब एक वर्ग फुट की जितनी मिट्टी होती है उतनी बाहर है कि नहीं, उसकी नाप जोख करके ही तो बिल पास होगा ना। एक बार पहले लफड़ा हो चुका है। मिट्टी कम पाई गई तो कांट्रैक्टर बोला कि मिट्टी चोरी हो जाती है तो उसमें हम क्या करें। अब बड़े साहब के पास नोट पुटअप किया है कि मिट्टी की चोरी बचाने के लिए उनकी दलीलें सुनकर हमारा सर चकरा गया था। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर कब हमारा सिस्टम सुधरेगा। अभी छ: महीने पहले ही सड़क बनी थी और आज उसकी यह दुर्दशा। अगर ये पाइप वाला काम पहले हो जाता तो… पर यह सब सोचना उनका काम तो है नहीं।
       अब अगर आपको अपनी कालोनी की सड़क खुदी दिखे, सड़क पर गड्ढा दिखाई दे, काम अधूरा पड़ा हो, पाइप और मिट्टी पड़ी हो, तो परेशान मत होना, टेंशन मत लेना। हो सकता है- बडे साहब छुट्टी पर हों, इंजीनियर सस्पेंड हो गया हो, कांट्रैक्टर भाग गया हो, बजट सैंक्शन न हुआ हो, चौकीदार न मिला हो, मंत्रालय का अप्रूवल न मिला हो, या फिर सरकार ही गिर गई हो। ये सरकारी पाइप हैं। सिस्टम से पडेंगे। आखिर सिस्टम भी कोई चीज है ना! उन्हें न पाइप की चिंता है, न आपकी लाइफ पर उससे पडने वाले प्रभाव की। उन्हें तो चिंता है बस अपनी और अपनी। तो पाइप को छोड़िये और लाइफ से जुड़िये; क्योंकि लाइफ आपकी अपनी है, सरकारी नहीं। हं…हां… जरा संभल के आगे ‘काम चालू है’ रास्ता बंद है…

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