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***लैला महाजन ***
     

आपका आकर्षक व्यक्तित्व हम कब से देख रहे थे। कॉन्फरन्स हॉल के द्वार पर आप खड़ी थीं इसलिए हम आपसे मिलने आए। हम पाकिस्तानी हैं। आपकी साड़ी, माथे पर लाल बिंदी, आप हिंदू है ना?
    जी हां, लेकिन ऐसे भेद मिटाने, दोस्ती करने के लिए तो यह सम्मेलन बुलाया है। सही बताया, लेकिन आपा, आपका नाम क्या है?
मैं कॉन्फरन्स हॉल के बाहर ही खड़ी थी। कड़ाके की ठंड थी, इसलिए धूप बहुत अच्छी लग रही थी।
    मेरे आस-पास खड़ी लड़कियों को मैंने ध्यान से देखा। सारी लड़कियां स्वस्थ थीं, उत्साह से भरी थी। मुझे प्रश्न पूछनेवाली लड़की शायद उनकी मुखिया थी। एकदम तंदुरुस्त, हंसमुख और दबंग लड़की थी। उसने फिर से अपना सवाल दोहराया। ‘आपका नाम क्या है, आपा?
उर्दू में आपा यानी बड़ी बहन-दीदी।
मैनें कहा- लैला।
   ‘हाय अल्ला, आपका नाम लैला, मेरा भी नाम लैला ही है। कितनी अजीब बात। लैला को लैला ही मिली। मिलना चाहिए मजनू।
‘मैं शादी-शुदा हूं, मेरा मजनू है।
    ‘आप मेरी लैला है’ कहते हुए उसने मुझे गले लगाया। उसका आवेग, वह कसकर पकड़ना मुझसे बर्दाश्त न हुआ। मैंने कहा-‘इतनी जोर से पकड़ रखा है? मेरी रोटी बना रही हो क्या?’
‘मैं हूं पहलवान, सिर्फ मैं अकेली नहीं, हम सभी।
मैने गौर से उन लड़कियों के झुण्ड को देखा।
‘दूसरी लड़कियों की तरह हम आवारा नहीं, लड़कों पर हम जाल नहीं बिछाते, हम खिलाड़ी हैं खिलाड़ी। हमारे हाथों को देखो। अरे यार! ऐसी क्यों देख रही हो, हम सड़कों पर पत्थर नहीं तोड़ते फिरते। हम खिलाड़ी हैं खिलाड़ी। बास्केट बॉल खिलाड़ी। गेंद से खेलते खेलते वह गाना गुनगुनाने लगी ‘हम गोरी की कलाइयां, बन गई लोहे की बेडियां।’
पाकिस्तानी इलाके में लड़कियों का ऐसा उत्साह- लड़कियां और खिलाड़ी। अपार जिज्ञासा ने मुझे झिंझोड कर रख दिया। ये सारी लड़कियां खिलाड़ी बनी कैसे? मैंने पूछा और जवाब में जो कुछ सुना उस पर आश्चर्य हुआ। मानो फिल्मी ढंग की कोई कथा-कहानी हो। उसने अपनी टीम के साथ आए सज्जन से मेरा परिचय कराया और बड़ी विनम्रता से कहा-
हम किसी वृक्ष की तरह फल-फूल रही है, पर हमारी जड़ ये हैं। बड़े सख्त-हमारे गुरु- ट्रेनर- महंमद अफजल शिखानी। ये बजुर्ग ही हमारे सबकुछ हैं। हम सबको बनानेवाले।
     मैं कॉन्फरन्स हॉल के बाहर ही खड़ी थी। वहां से रंगमंच साफ दिखाई पड़ता था। लड़कियां उसी की ओर देख रही थीं। मैंने कहा, तुम सब जाओ अन्दर, जहां चाहो वहां बैठो, चाहे जिससे बातें करो। मैं हमेशा पीछे की ओर बैठती हूं। जो बुजुर्ग तुम्हारे साथ आए हैं उन्हें मेरे पास भेज दो। मुझे उनसे बातें करनी हैं।
    ‘बहुत बढ़िया, बहुत अच्छा’ महंमदजी ने खुश होकर कहा। लड़कियों का झुण्ड आगे की तरफ चला गया। मैं और महंमदजी मंडप में पीछे जाकर बैठ गए। वैसे ही मैंने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। शायद महंमदजी भी यही चाहते थे। आज तक उन्हें किसी ने बास्केट बॉल पर प्रश्न नहीं पूछे थे। उन्होंने खुशी से बताना शुरू किया। उनके कहने से मैं आश्चर्य के समुद्र में डुबकियां खाने लगी।
   महंमदजी आला दर्जेके बास्केट बॉल खिलाड़ी थे। १९४९ की महात्मा गांधी बास्केट बॉल प्रतियोगिता में जीतनेवाले अव्वल खिलाड़ी थे। बंटवारे के बाद वे सियालपुर रहने लगे। हमारे यहां जैसा आयुर्वेद वैसे ही मुस्लिमों की यूनानी दवा। महंमदजी उसमें कुशल होने के कारण उन्होंने यूनानी दवाखाना शुरू किया, इससे वे लोकप्रिय हुए। उन्होंने हिंदुस्तान की लड़कियों का, महिलाओं का रहन-सहन, उनकी जिंदगी देखी थी। हिंदुस्तान के स्त्री-पुरुषों का निर्मल मेल-मिलाप देखा था। पर पाकिस्तान में ऐसा न था। आस-पास के वातावरण की लड़कियों का जीना देखकर उन्हें अतीव दु:ख हुआ। उनके लिए कुछ करने की वे सोचने लगे। उनके मुफ्त और योग्य इलाज के कारण सारे उनको चाहते थे, मानते थे। उन्हें तीव्रता से लगा कि इन सबको अपना खेल सिखाना चाहिए। उन्होंने यह खेल सिर्फ महिलाओं और लड़कियों को सिखाने का निश्चय किया। महंमदजी का इरादा अटल था। उनके दोस्त भी बहुत से थे। एक हमाल दोस्त को उन्होंने बार-बार कहना शुरू किया- तुम्हारी गरीबी के कारण तुम अपनी बेटी को स्कूल नहीं भेज सकते, कल को अगर उसकी शादी की बात सोचो, तो किसी बूढ़े मियां के साथ उसकी शादी करा दोगे। मैं तुम्हारी बेटी को अपना खेल सिखाता हूं। इससे उसे समाज में सम्मान मिलेगा। तुम्हारी आठ-दस साल की बेटी को यह खेल सीखने की इज़ाजत दे दो। उठते-बैठते उन्होंने यह कहना जारी रखा। लड़की की मां को यह बात जंच गई। खेल से बेटी को समाज में मान-सम्मान मिलेगा यह सोचकर माता-पिता खुश हुए। चार-पांच लड़कियां और मिल गईं। सारी लड़कियां अत्यंत गरीब वर्ग के माता-पिता की।
    तैयारी तो कर ली। खेल की ट्रेनिंग शुरु कैसे करें? बॉल कहां से खरीदें। लड़कों के पुराने बॉल से शुरू किया, पर यह बॉल (गेंद) लड़कियों के लिए इस्तेमाल करेंगे इस बात को छिपाकर रखा। लड़कियां भी वह पुरानी गेंद नहीं चाहती थीं। वे निराश हुई। महंमदभाई निम्न-मध्यवर्गीय थे। इलाज करके जो पैसा मिलता था, उसमें खुद की गुजर-बसर करते थे। दवाइयां बनाते थे, जैसे-तैसे खर्चा निकलता था। पाकिस्तान में लड़कियों के खेल के लिए ना सरकार, ना सामाजिक संस्था से, ना ही पारिवारिक मदद मिलती थी। अगर किसी को मालूम पडे तो दंगे हो सकते थे। मुसीबतें आ सकती थी। लड़कियां और उनके माता-पिता को मुसीबतों का सामना करना पड़ता। महंमदभाई हिम्मतवाले आदमी थे। उन्होंने यूनानी दवाएं बना-बनाकर बेचना शुरू किया। दवा अच्छी होने के कारण उत्पाद और बिक्री बढ़ गई। उस कमाई से उन्होंने बास्केट बॉल खरीदे, लड़कियों में नया जोश और उत्साह का संचार हुआ। पर ड्रेस-पोशाक का क्या करें? टेनिस, बैडमिंटन जैसा बास्केट बॉल खिलाड़ियों का खास ड्रेस, हॉफ पैंट यानी बहुत छोटी पैंट। वहां के माहौल में तो पहनना असंभव। खिलाड़ी और उनके अभिभावक कतई स्वीकार न करेंगे। इस पर उन्होंने एक उपाय सोचा-टी शर्ट- घुटनों तक लंबा, स्कर्ट-फ्रॉक बनाया। लड़कियों को पहनने के लिए कहा गया।, फ्रॉक के अंदर पैंट तो थी ही।
    महंमदजी बुजुर्ग होने के कारण अभिभावकों ने लड़कियों को खेल सीखने उनके पास भेजा। वे उनके दादा-नाना की उम्र के थे। व्यवहार भी सबके साथ भला ही रखते थे।
   

 फैसलाबाद का शिया गर्ल्स स्कूल। रइसों की पाठशाला। वहां की लड़कियां बास्केट बॉल खेलती थीं। इसके अलावा वे नेटबॉल, हैण्डबॉल की शिक्षा भी लेती थीं। उनके साथ महंमदजी ने लैला के टीम का मैेच रखा। अचरज की बात तो यह थी कि लैला की टीम जीत गई। उसने अपना वर्चस्व प्रस्थापित किया। सारे अभिभावकों के हाथ आसमान छूने लगे।
    टीम की कार्यकुशलता देखकर गरीब लड़कियों का समाज में मान-सम्मान बढ़ गया। उनके खेल की प्रशंसा हुई। यह देखकर कई गरीब माता-पिता महंमद जी के पास आए। कहने लगे कि हमारी बेटियों को भी बास्केट बॉल सिखाइये। अब महमंदजी बिल्कुल तानाशाह बन गए। उन्होंने कहा, ‘लड़कियों को स्कूल भेजो, शिक्षा दिलाओ। पहले पढ़ाई बाद में खेल।’
     इससे पाकिस्तान के गरीब, अभिभावकों ने लड़कियों को स्कूल भेजा। अब महंमदभाई के बास्केट बॉल में आठवीं कक्षा की लड़कियां भी हैं तथा कॉलेज की भी।
    महंमदभाई गहरी सोचवाले और मेहनती इंसान हैं। वे ‘हिंग की गोली’ अर्थात ‘हाजमोला’ टाइप स्वादिष्ट गोली बनाते हैं- बेचते हैं। उस पैसे का उपयोग वे बास्केट बॉल के खर्चेके लिए ही करते हैं। उन्होंने छोटी-छोटी प्लास्टिक बोतलें मुझे दीं। मुझसे पैसा लेने से इनकार कर दिया। कुछ शीशीयां मैंने लोगों को दीं, महंमदभाई के बारे में जानकारी दी। हर कोई उनसे बोतल लेने पहुंचा।
‘आपने तो मेरा पीआरओ का बढिया काम किया।’
    लैला के साथ उसकी सारी सहेलियां पूरा सभा-मंडप घूमकर आईं। सारी पीछे जाकर बैठे गईं। लैला से बहुत कुछ बातें पता चलींे।
     देखिए आपा, कहते हुए लैला बात को शुरू करती थी। उसकी बास्केट बॉल की बातों में सभी शामिल होकर मजे लूटती थीं। उसके साथ दूसरी खिलाड़ी भी थीं। रिज़वाना, ताहिरा, फरहा, अज़रा, नाज़िया और उनकी कोच आबिदा। यह उमर में बडी थीं। खेलने में अत्यंत कुशल। उसे महंमदजी ने अपनी लड़कियों के साथ बास्केट बॉल टीम की ओर खींच लिया। उनका कहना था कि ‘मैं कितने दिन रहूंगा, मेरे पीछे लड़कियों को मार्गदर्शन करनेवाला, प्रेरणा देनेवाला कोई तो होना चाहिए और लेडिज ही हो तो बहुत अच्छा।’ इसलिए उन्होंने आबिदा को प्रशिक्षण दिया। उसने भी दिलो जान से सीखा। वह बास्केट बॉल में इतनी अग्रसर रही कि वह बास्केट बॉल गोल्ड-मेडलिस्ट बनीं। ऐसी कुशल आबिदा लड़कियों की बास्केट बॉल प्रशिक्षक बनीं।
     सभी लड़कियां मुझे चाहने लगीं, मुझे भी वे अच्छी ही लगीं। इससे हममें संवाद का आदान-प्रदान होने लगा। विषय था, बास्केट बॉल खेलने का अनुभव, प्रतियोगिता और अन्य। लैला ने कहा- आज तक हमने बहुत मैचेस खेले, बार बार जीते भी, प्रतियोगी भी लड़कियां ही थीं। मैच देखनेवाली भी लेडिज। इसका कारण कड़ा कानून, पुरुष ऐसी महिला खिलाड़ियों को देखने न पाए। वीडियो फिल्म बना दी, पर दिखाई कहीं नहीं। पाकिस्तान टी. वी. पर भी नहीं। खेलने के लिए ईरान गए। उधर भी मैच देखनेवाली सब लेडिज। खेलते समय बुर्का पहनना, स्कार्फ भी इस तरह बांधना पड़ता था कि बाल भी न दिखने पाए। पाकिस्तान की तरह दूसरे इस्लामी देशों में भी वैसे ही सख्त नियम। प्रतियोगिता में आपसी मेल-मिलाप होता था।
‘हमारे यहां इंडिया आए टीम लेकर। क्या यहां खेलोगे?’
     ‘हां-हां कल सुबह ही मैच है, यहां की लेडिज टीम से। पर बहुत डर लग रहा है, यहां की टीम तो एक्सपर्ट हो होंगी, हम तो कुछ नहीं उनके सामने, वह तो खेल में ज्यादा सक्रिय होंगी।’
     मुझे खेद हुआ। उत्साह से भरपूर लैला अब निराश हो गई। मैंने कहा, ’तुम देखो, तुम ही जीतोगी, मेरी लाख-लाख दुआएं तुम्हारे साथ हैं। ईमानदारी से कोशिश करो, निराशा, डर मन से निकाल दो।’ तुम्हारी कोच आबिदा कहती हैं कि खेल तो समझदारी, आज्ञापालन, कमांड, अनुशासन सिखाता है। जो भी उसने सिखाया है उसका पालन करो। विजय प्राप्त करोगे ही। मार्गदर्शन के लिए गुरु हैं ही।
    दुसरे दिन ग्यारह बजे मैं मंडप में बैठ कर भाषण सुन रही थी कि तभी लैला वहां आई। मुझे वह बाहर ले आई। वहां पर उसकी पूरी टीम खड़ी थी। कल सब के चेहरे से निराशा टपक रही थी, पर इस वक्त सारी खुशी से खिलखिला रही थींे। सब बास्केट बॉल की पोशाक पहने हुए थीं।
‘इस ड्रेस में तो सारी जन्नत की हूर लग रही हैं।’
     पहली बार हम लोगों के सामने खिलाड़ी बन गई हैं। हम अपना मैच खेलने जा रहे हैं, आप हमारे लिए अल्लाताला के जैसी हैं, आप हमारे लिए दुआ करो। हमें आशीर्वाद दो ताकि जीतने के लिए ताकद मिलें। इतना कहकर उसने मेरे पैर छुए। बड़ों के पैर छूते हुए उसने देख लिया था। सबने वैसा ही किया। यहां के दर्शक स्त्री और पुरुष दोनों हैं। सिर्फ लेडिज ही नहीं। जीतोगे-तुम जरूर जीतोगे।
     चार बजे के करीब वे आईं। मैं पीछे बैठी, ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी, ‘ये लडकियां जीतनी चाहिए।’ वे सारी मंडप के पास आईें। जैसे ही मैं उनके सामने पड़ गई, उन्होंने मुझे उठा लिया और खुशी से चिल्लाने लगी। ‘आपा, हम जीत गए।’ वे लगातार यहीं कहे जा रही थीं, ‘आपने दिल से दुआ दी इसीलिए हम जीत गईं।’ मैंने अपने आपको उनसे छुड़ाते हुए कहा, ‘मेहमूदभाई की आज्ञा थी कि कसकर मेहनत करो- सो तुमने उस आज्ञा का पालन किया, इसलिए जीती हो।’
     मुझे अचानक ठिठोली करने की सूझी। मैंने कहा, ‘तुम्हारा मैच देखने के लिए पुरुष-दर्शक थे, इसीसे तुम्हारा खेल अच्छा रहा। तुमने पहली बार कोशिश की थी। सारा माहौल खुशनुमा लगा। वहां के जवान लड़कों ने तुम्हें बक-अप किया ना, इससे तुम्हें प्रोत्साहन मिला। मैच में थ्रिल महसूस हुआ। इसलिए खेल बढ़िया हुआ और तुम जीत गईं।’
     ‘हमें कबूल है, हमारी जीत का यह भी एक कारण है’, लैला ने कहा। सारी लड़कियां जोश से भरपूर थीं, खुश थीं। वे सब एक जगह पर खड़ी थीं, पर ऐसा लगता था कि मानो वे नाच रही हो। आंखों और चेहरे से खुशी टपक रही थी।
     पर क्या सिर्फ यही एक एहसास रहेगा? इस्लामी देशों में दर्शक सिर्फ लेडिज…ड्रेस भी…?
‘ये भी दिन लद जायेंगे, समय बदलेगा’ मैंने उन्हें ढांढ़स बांधा।‘अब सिर्फ एक ही रास्ता है- यहीं खेलेंगे, आपा तुम सत्पालजी से बोलो ना, सारे कहते हैं, वे तुम्हारी सुनते हैं।’ उनसे कहो… यहां…यहां उसका गला भर आया।
मैंने कहा- ‘मुझे पता है, तुम्हारे दिल की चाहत क्या है?’
सबने हीनता से कहा- ‘पुरुष (मर्द) देखेंगे, इसलिए हमारी फिल्म टी.वी. पर नहीं दिखाई।’ सत्पालजी लेडिज के लिए बहुत काम करते हैं, उनसे कहती हूं, यहां के अलग-अलग शहरों में सारे दर्शकों के सामने बास्केट बॉल प्रतियोगिता रखे।
सारी लड़कियों ने बिनती की, ‘श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे दक्षिणी एशियाई देशों में हमें भेजिए, आप उनसे कहिए ना।’
     जगन्नाथपुरी का यह हमारा १९९८ का संमेलन। दिल्ली के लाला लाजपत संस्था की ओर से सत्पालजी ने दक्षिणी एशियाई मित्रता-संमेलन शुरू किया। ये संमेलन अपने जैसा ही दक्षिणी-एशिया के युवा स्त्री-पुरुषों का आठ दिन का संमेलन एक दूसरे की भाषा, संस्कृति तथा समस्याओं का परिचय हो, आपस में मित्रता, सद्भाव बढ़े ऐसा उद्देश्य और उसी के अनुसार कार्यक्रम। इसमें दो सौ लोग शामिल हुए थे। आपसी स्नेह-भाव बढ़ा था- एक- दूसरे के बन गए थे।

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