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 *** डॉ.कुलदीप चन्द अग्निहोत्री ***

    

  जम्मू कश्मीर की वर्तमान विधान सभा के चुनाव २००८ में हुए थे। इसलिए क़ायदे से उसके चुनाव २०१३ में हो जाने चाहिए थे। लेकिन जम्मू-कश्मीर विधान सभा की उम्र छह साल है। देश में बाक़ी सब राज्यों में विधान सभाओं की उम्र पांच साल की है। इसलिए अपनी सामान्य उम्र से एक साल की ज़्यादा उम्र भोग कर राज्य की विधान सभा अब २०१४ में अपना कार्यकाल समाप्त करेगी और नई विधान सभा के लिए चुनाव नबम्वर-दिसम्बर २०१४ में होंगे।
      ऐसा क्यों है? इसका उत्तर संघीय संविधान के अनुच्छेद ३७० में छिपा हुआ है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे संघीय संविधान के किसी प्रावधान को मूल रूप में या उसके संशोधित रूप में राज्य सरकार की सहमति से ही लागू कर सकते हैं। विधान सभा की पांच साल की आयु वाले प्रावधान को जम्मू कश्मीर में लागू करने की सहमति राज्य सरकार ने नहीं दी। इसलिए १९७५ में आपात स्थिति के दौर में संविधान संशोधन के माध्यम से बढ़ाई गई विधान सभा की छह साल की उम्र अभी तक लागू है।
     राज्य में प्रमुख तौर पर चार राजनैतिक दल हैं। भारतीय जनता पार्टी, सोनिया कांग्रेस, नैशनल कान्फ्रेंस और पीपल्स डैमोक्रेटिक पार्टी। भारतीय जनता पार्टी को छोड़ कर बची बाक़ी तीनों पार्टियां आपस में तालमेल से या तो चुनाव लड़ती हैं या फिर चुनाव हो जाने के बाद सरकार बनाती हैं। इन तीनों पार्टियों के अघोषित गठबंधन से राज्य की सत्ता कश्मीर घाटी के कुछ परिवारों के बीच ही सिमट कर रह गई है। लेकिन पिछले पचास सालों की लूटखसोट, राजनैतिक अव्यवस्था और कुशासन के चलते इन के प्रति आम जनता के मन में भयंकर निराशा उत्पन्न कर दी है।
      ऐसे माहौल में नरेन्द्र मोदी के प्रयोग ने जिस प्रकार देश के शेष भागों में आशा का संचार किया है, उसी प्रकार जम्मू कश्मीर को भी उद्वेलित किया है। मोदी ने जिस प्रकार विकास और सुशासन की बात की है, उससे जम्मू कश्मीर के युवाओं में भी आशा जगी है कि उनके लिए भी भविष्य में योग्यता के आधार पर उन्नति के नए रास्ते खुलेंगे और जम्मू कश्मीर कुछ परिवारों के एकाधिपत्य से मुक्त हो जाएगा। लेकिन इससे मुल्ला मौलवियों की फ़ौज में, आतंकवादियों के अपर ग्राउंड हिस्से में चिंता होना भी स्वाभाविक है। यदि राज्य का युवा विकास के नए पथ पर चल पड़ा तो ‘एके ४७’ कौन पकड़ेगा?
इसलिए घाटी आश्रित इन दलों ने चुनाव को ध्यान में रखते हुये नई रणनीति बनानी शुरू कर दी। भारत से विदेश सचिव स्तर की बातचीत के पहले दिल्ली स्थित पाकिस्तानी राजदूत ने कश्मीर घाटी के हुर्रियत नेताओं को तुरन्त दिल्ली बुला लिया। रणनीति स्पष्ट थी। कम से कम घाटी के युवाओं को लगना तो चाहिये की हुर्रियत की प्रासांगिकता बरक़रार है। सरकार चाहे मोदी की ही क्यों न हो, हुर्रियत को पूछे बिना कश्मीर घाटी में पत्ता नहीं हिल सकता। स्वाभाविक है, भारत ने वार्ता रोक दी।
      इसके तुरन्त बाद सोनिया कांग्रेस, पी.डी.पी और नैशनल कान्फ्रेंस ने आसन्न विधान सभा चुनावों में अपना चुनाव घोषणा पत्र तैयार करने का काम चालू कर दिया। ताज्जुब है तीनों दल, चुनाव चाहे अलग-अलग लड़ेंगे लेकिन उनके चुनावों का मुद्दा साझा होगा। वह मुद्दा है कि चाहे जो मर्ज़ी हो जाए, पाकिस्तान के साथ वार्ता हर हालत में चालू रहनी चाहिए। वे इससे भी एक क़दम आगे बढ़ गए। तीनों ने मिल कर प्रदेश की विधान सभा में प्रस्ताव पारित किया कि भारत को हर हालत में पाकिस्तान के साथ बातचीत करनी ही चाहिए। जाहिर है कि इससे जम्मू कश्मीर में सुशासन और विकास की आशा लगाए बैठे लोग चौंकते।
     इस वातावरण में भारतीय जनता पार्टी ने पहल की। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने आशा व्यक्त की कि राज्य को निराशा के इस भंवर से निकालने के लिये प्रदेश में राष्ट्रवादी सरकार बनाने के प्रयास करने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा इस दिशा में पहल भी करेगी और प्रदेश की सभी राष्ट्रवादी शक्तियों को एक मंच पर एकत्रित करने का प्रयास भी करेगी।
      प्रदेश की विधान सभा में कुल मिला कर ११३ सीटें हैं। लेकिन फ़िलहाल इनमें से ८७ सीटों के लिये ही चुनाव होगा। शेष बची २६ सीटें गिलगित, बल्तीस्तान, मुज्जफराबाद और मीरपुर के उन इलाक़ों में हैं, जिन पर अभी तक पाकिस्तान का क़ब्ज़ा है। राज्य में अस्थिरता बनाए रखने की सोनिया कांग्रेस, पी.डी.पी और नैशनल कान्फ्रेंस की रणनीति परास्त करना हो तो, आवश्यक है कोई दल ४४ या उससे ज़्यादा सीटें जीत लें। इसलिए अमित शाह ने इन चुनावों में भाजपा के लिये +४४ का लक्ष्य घोषित किया।
       परन्तु लाख टके का एक ही प्रश्न है कि क्या भाजपा यह कर पायेगी? यदि हां, तो कैसे? आख़िर अमित शाह की इस आशावादिता का आधार क्या है? इस प्रश्न पर विचार करने से पहले जम्मू कश्मीर राज्य की राजनैतिक स्थिति का जायज़ा ले लिया जाए। राज्य की ८७ सीटों में से ३७ सीटें जम्मू संभाग में आती हैं और ४६ सीटें कश्मीर घाटी के हिस्से। यह अलग बात है कि आबादी दोनों संभागों की लगभग बराबर ही है। शेष बची चार सीटें लद्दाख में पड़ती हैं। दो लेह ज़िला में और दो शिया बहुल कारगिल ज़िला में। यदि शुद्ध मज़हब के आधार पर ही विचार किया जाए तो जम्मू संभाग की २५, लेह की दो और कारगिल की शिया समाज वाली दो सीटों को छोड़ कर शेष बची ४८ सीटें मुस्लिम बहुल हैं। जहां तक लोक सभा का प्रश्न है, लोक सभा की छह सीटों में से दो जम्मू संभाग, तीन कश्मीर घाटी और एक लद्दाख संभाग के हिस्से आती है। हाल ही में हुए लोक सभा चुनावों में जम्मू व लद्दाख संभाग की तीनों सीटें भाजपा ने और कश्मीर घाटी की तीनों सीटें पी.डी.पी ने जीत ली हैं। जहां तक प्राप्त मतों का प्रश्न है, भाजपा को ३२.२, सोनिया कांग्रेस को २२.९, पी.डी.पी. को २०.५ और नैशनल कान्फ्रेंस को ११.१ प्रतिशत मत मिले। ़
       लेकिन नबम्वर-दिसम्बर में होने वाले विधान सभा चुनावों में क्या कुछ नए समीकरण बन सकते हैं? सबसे पहले सोनिया कांग्रेस की बात ही की जाए। सोनिया कांग्रेस को कुल मिले वोटों में से जम्मू संभाग से ७.८ लाख वोट मिले। इसका अर्थ यह हुआ कि भाजपा और सोनिया कांग्रेस, दोनों का ही मुख्य आधार जम्मू संभाग और लद्दाख में ही है।
      नरेन्द्र मोदी के दिल्ली में सत्तारूढ़ हो जाने के बाद जम्मू क्षेत्र की फ़िज़ा बदली है। वहां यह भावना घर कर गई है कि सोनिया कांग्रेस अब राज्य में किसी भी हालत में सरकार नहीं बना सकती। इसलिए यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि विधान सभा के चुनावों में जम्मू संभाग में लोगों का झुकाव भाजपा की ओर हो सकता है। यही कारण है कि सोनिया कांग्रेस के प्रमुख नेता भाजपा की ओर भाग रहे हैं। यहां तक कि उसके एक नेता ने यह कहने तक की हिम्मत जुटा ली है कि जम्मू कश्मीर में हिंदू मुख्यमंत्री क्यों नहीं हो सकता?
       अनुमान लगाया जा रहा है कि इस क्षेत्र की ३७ सीटों में से ज़्यादातर सीटों पर भाजपा का क़ब्ज़ा हो सकता है। जम्मू संभाग में ही चनाब घाटी के साथ साथ राजौरी व पुंछ की बारह सीटों पर यदि सोनिया कांग्रेस, पी.डी.पी और एन.सी. अलग अलग भिड़ते हों, तो मुस्लिम वोट इन तीनों में विभाजित हो जाएगा। इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है। नरेन्द्र मोदी पिछले दिनों स्वयं लद्दाख का दौरा करके आए हैं, इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भाजपा इसे कितना महत्व देती है। लेकिन इन सब समीकरणों के बावजूद इतना तो स्पष्ट है कि भाजपा जम्मू व लद्दाख की ४१ सीटों को ही ध्यान में रख कर मिशन + ४४ पूरा नहीं कर सकती है।
      फ़िलहाल स्थिति यह है कि पिछले कुछ वर्षों से कश्मीर घाटी की राजनीति पी.डी.पी. और नैशनल कान्फ्रेंस में बंट कर रह गई है। सोनिया कांग्रेस धीरे-धीरे वहंा से निष्कासन की स्थिति को भोग रही है। इस बार के लोक सभा के चुनावों में तो घाटी की तीनों सीटों श्रीनगर, अनन्तनाग और बारामुला पर पी.डी.पी. का ही क़ब्ज़ा हो गया। उसने शेख़ अब्दुल्ला परिवार की पार्टी नैशनल कान्फ्रेंस का घाटी में से सफ़ाया कर दिया।
        पिछले कुछ अरसे से भाजपा ने कश्मीर घाटी में अपनी गतिविधियों को तेज़ किया है। पार्टी के युवा मोर्चा के राज्य अध्यक्ष रवीन्द्र रैना ने घाटी के अनेक हिस्सों में यात्राओं का आयोजन किया था। इन्द्रेश कुमार के मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने भी श्रीनगर में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। सबसे बढ़ कर, कुछ महत्वपूर्ण मुस्लिम नेता भाजपा में शामिल हुए हैं। पूर्व सांसद मोहम्मद शफ़ी भट्ट की बेटी डॉ. हिना भट्ट कुछ समय पहले भाजपा में शामिल हो गई हैं। शफ़ी भट्ट एन.सी. के विधायक हैं। घाटी की जनसंख्या में से गुज्जर बकरवाल और शिया समाज के लोग भाजपा की ओर जा सकते हैं। या कम से कम इसकी शुरुआत इन चुनावों में हो सकती है। कश्मीरी मुसलमान उसको दोयम दर्जेका ही मानता है। यही कारण है कि गुज्जर आतंकवादियों के निशाने पर भी रहा। लेकिन अब तक भाजपा ने घाटी में प्रवेश ही नहीं किया है, बल्कि बदली परिस्थिति में वह यहां गंभीरता से सीटें जीतने के लिये प्रयत्नशील भी है। भाजपा अपने साथ कश्मीरी हिन्दुओं -सिक्खों, प्रवासी कश्मीरी पंडितों को तो जोड़ेगी ही, इस बार वह गुज्जरों बकरवालों, शिया समाज के वोट बैंक में भी सेंध लगा सकता है। सज्जाद गनी लोन की पीपल्स कान्फ्रेंस और अवामी इत्तिहाद पार्टी के मैदान में कूदने का लाभ अप्रत्यक्ष रुप से भाजपा को ही मिलेगा।
          भाजपा के मिशन +४४ के मूल में जम्मू-लद्दाख पर ज़ोर और घाटी में सेंध का फ़ार्मूला है जिसमें उसे वर्तमान हालात में सफलता भी मिल सकती है। इतना तो निश्चित है कि इस बार राज्य के राजनैतिक नक़्शे में बदलाव लाज़िमी आएगा। घाटी की ४६ सीटों पर मुक़ाबला तो परम्परानुसार पी.डी. और नैशनल कान्फ्रेंस में ही होगा लेकिन ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि इस बार पी.डी.पी. को कुछ लाभ हो सकता है, जिसके संकेत लोक सभा चुनावों से मिलते हैं।
       राज्य में पिछले कुछ समय से एक और मांग भी ज़ोर पकड़ती जा रही है। विधान सभा की २६ सीटें उन क्षेत्रों की हैं जो फ़िलहाल पाकिस्तान के क़ब्ज़े में हैं। इसलिए चुनाव आयोग के लिये वहां चुनाव करवाना संभव नहीं है। परन्तु उन क्षेत्रों के लाखों माईग्रेंट मतदाता राज्य के उन हिस्सों में रह रहे हैं, जहां चुनाव आयोग चुनाव करवा रहा है। यह मांग उठ रही है कि जिस प्रकार कश्मीरी माईग्रेंट मतदाता को राज्य के बाहर से भी मतदान का अधिकार दिया गया है, उसी प्रकार इन २६ सीटों में से कुछ के चुनाव करवा लिये जाए और उन क्षेत्रों के माईग्रेंट मतदाताओं के लिए जम्मू इत्यादि स्थानों पर मतदान केन्द्र स्थापित किये जाए। चुनाव आयोग इसे स्वीकार करता है या नहीं, यह बाद की बात है लेकिन इसने राज्य में एक नई बहस को तो जन्म दे ही दिया है, जिसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।
       दिल्ली में बैठे कुछ राजनैतिक पंडितों की चिन्ता इस बात को लेकर बढ़ती जा रही है कि भाजपा के मिशन +४४ से राज्य में मज़हब के आधार पर ध्रुवीकरण हो सकता है। उन्हें लगता है कि इस तथाकथित ध्रुवीकरण के घाटी में बहुत ही भयंकर दुष्परिणाम हो सकते हैं। जबकि ज़मीनी स्तर पर स्थिति इस के बिल्कुल उलट है। फ़िलहाल घाटी में स्थिति यह थी कि पी.डी.पी. और नैशनल कान्फ्रेंस, दोनों ने ही राजनीति का अपने बीच ध्रुवीकरण किया हुआ था और प्रदेश की सभी नौकरियों पर इन दोनों दलों के तथाकथित कार्यकर्ताओं ने ही क़ब्ज़ा किया हुआ है। इस ध्रुवीकरण के बीच आम कश्मीरी, जो योग्यता के आधार पर नौकरी लेना चाहता था, वह पिस रहा था।
        अनुच्छेद ३७० के नाम पर भावनात्मक शोषण करके, उसकी आड़ में इन दोनों दलों ने अपनी निरंकुश राजशाही स्थापित कर रखी है। भाजपा ने पहली बार अनुच्छेद ३७० को हटाने की मांग न करके आम जनता के लिये उसके नफ़े नुक़सान पर बहस करने की मांग की है। ताज्जुब है जब कश्मीर घाटी के लोग सोनिया कांग्रेस समेत इन दोनों दलों के नेताओं से इस अनुच्छेद के लाभों पर कुछ सुनना चाहते हैं तो ये सभी नेता उस बहस से भाग ही नहीं रहे बल्कि उसका विरोध भी कर रहे हैं। यही स्थिति हुर्रियत की भी है। उनके इस आचरण से कश्मीर घाटी के लोग, ख़ासकर बुद्धिजीवी वर्ग अनुच्छेद ३७० के मायावी जाल से बाहर आ रहा है। यही इन दोनों दलों की चिन्ता का कारण है। भाजपा की इस पहल ने ध्रुवीकरण को तोड़ा है।

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