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***रमेश पतंगे ***

   

पाकिस्तान और अफगानिस्तान भारत के दो पड़ोसी देश हैं। पाकिस्तान की सीमा भारत से लगी हुई है, अफगानिस्तान की सीमा थोड़ी दूर है। भारत पर ईसा पूर्व से ही लगातार आक्रमण होता रहा है। शक, हूण, कुशाण, ग्रीक, अरब, तुर्क, मुगल, ईरानी और अफगानी इत्यादि सब ने भारत पर पश्चिमोत्तर दिशा से खैबर दर्रे के मार्ग से आक्रमण किया। इन सब में इस्लामी आक्रमण अत्यंत उग्र और हिंसक थे। इस्लामी आक्रमण सातवीं शताब्दी से शुरू हुआ। आज भी यह आक्रमण पूरी तरह से बंद हो गए हैं, ऐसा नहीं है। हमारे कर्तृत्वहीन राजनीतिक नेतृत्व ने अपनी ही भूमि में हम से ही दुश्मनी रखने वाला देश पाकिस्तान पैदा कर रखा है। उसका पड़ोसी अफगानिस्तान हमारा परम मित्र है, ऐसा कह नहीं सकते। इन दोनों देशों में जो राजनैतिक उथल-पुथल हो रही है, उस पर बारीकी से गौर करने की जरूरत है; क्योंकि उसका सम्बंध हमारी सुरक्षा से गहराई से जुड़ा है। भारत के अनाड़ी और मूर्ख सेकुलर बुद्धिवादी सुरक्षा के इस मुद्देे को धार्मिक रंग दे देते हैं, और इसे भारत के मुसलमानों से जोड़ते हैं। हमें ऐसा कुछ न करते हुए अपनी देश की सुरक्षा का विचार करना है।
अस्थिरता के द्वार पर
    पाकिस्तान फिलहाल अस्थिरता के द्वार पर है। इमरान खान और ताहिरुल कादिरी ने स्वतंत्र रूप से मोर्चे निकालकर इस्लामाबाद में ऊधम मचा रखा है। इमरान खान की मांग है कि प्रधान मंत्री नवाज शरीफ अपने पद से त्यागपत्र दें। कादरी की भी मांग यही है। लेकिन, दोनों के कारण अलग-अलग हैं। ताहिरुल कादरी पाकिस्तान के अण्णा हजारे हैं। उनका लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली पर विश्वास नहीं है। उनका कहना है कि निर्वाचित होकर संसद में पहुंचे सभी नेता भ्रष्ट, लफंगे और लुटारू हैं। इसलिए वे कहते हैं कि पूरी व्यवस्था में बदलाव होना चाहिए। इमरान खान कहना है कि पिछले वर्ष हुए आम चुनाव में नवाज शरीफ ने खूब गड़ब़डियां की हैं, फर्जी मतदान करवाया है, इसलिए उन्हें त्यागपत्र देना चाहिए। नवाज शरीफ प्रचंड बहुमत से चुने गए हैं। कादरी और इमरान राजनीतिक दृष्टि से अल्पमत में हैं। इन अल्पमत वालों ने लोकतंत्र और प्रशासन को बंधक बना रखा है।
    नवाज शरीफ असहाय दिखाई दे रहे हैं। राजधानी में प्रवेश कर चुके आंदोलनकारियों को बाहर निकाल पाने में वे विफल हो चुके हैं। उन्होंने यह कार्य सेना को सौंप दिया है। सेना को भी यही चाहिए था। पाकिस्तान में प्रशासन चलाने का काम सेना ही करती है। सेना को पाकिस्तान के लोकतंत्र पर विश्वास नहीं है, नागरी सरकार पर विश्वास नहीं है। सेना मानती है कि नागरी सरकार कानून-व्यवस्था कायम नहीं रख सकती, देश का आर्थिक विकास नहीं कर सकती। इसलिए सेना की नीति है कि परिस्थिति जितनी बिगड़ती है, उतनी अधिक बिगड़ने दे। १५-२० हजार आंदोलनकारियों को राजधानी से बाहर खदेड़ना सरकार के लिए सामान्य बात है। सरकार की ताकत का इस्तेमाल कर मामूली जनसमर्थन वाले इमरान और कादरी को ठीक करना कठिन नहीं है। नवाज शरीफ ऐसा कर नहीं सकते और पाकिस्तानी सेना कर नहीं रही है। सेना की भूमिका तमाशाबीन की है। सेना को सत्ता हाथ में लेने के लिए बहाना चाहिए और वह उसी अवसर की ताक में है।
शांति नहीं चाहिए
     भारत और पाकिस्तान के बीच सचिव स्तर की बातचीत शुरू होने वाली थी। पाकिस्तान की नागरी सरकार सीमा पर शांति चाहती है। सेना शांति नहीं चाहती। भारत-पाकिस्तान के बीच शांति कायम हो गई, तो पाकिस्तानी सेना के अस्तित्व का कोई कारण ही नहीं बचता। पाकिस्तान पर अफगानिस्तान, ईरान या अरब देश आक्रमण नहीं करेंगे। पाकिस्तान ने भारत से युद्ध करने के लिए ही अपनी सेना खड़ी की है। पाकिस्तानी सेना के मन में भारत के प्रति अत्यंत विद्वेष की भावना पहले से ही भर दी गई है। पाकिस्तानी सेना को भारत के साथ किसी भी प्रकार की शांति नहीं चाहिए। इसी कारण सेना के दबाव में पाकिस्तान की सरकार ने कश्मीर के विषय में हुर्रियत कान्फ्रेन्स से बातचीत शुरू कर दी। भारत ने इस पर आपत्ति प्रकट की और विरोध में सचिव स्तर की वार्ता अपनी ओर से बंद कर दी। उसी समय पाकिस्तान सेना ने सीमा पर भारी गोलीबारी शुरू कर दी। इसकी खबरें पाठकों ने पढ़ी ही होंगी।
    इसी समय अफगानिस्तान में भी राजनीतिक उथल-पुथल की घटनाएं हो रही हैं। वह आतंकवादियों का देश बन गया है। अल कायदा और ओसाबा-बिन-लादेन के अड्डे मूलत: अफगानिस्तान में ही थे। अमेरिका ने आतंकवादियों के खिलाफ युद्ध का आह्वान किया। नाटो की सेना अफगानिस्तान में घुस गई। इस घटना को भी दस वर्ष हो गए। इस वर्ष के अंत तक अमेरिकी सेना वहां से वापस लौट जाएगी। अमेरिका ने वहां राजनीतिक व्यवस्था कायम करने का प्रयत्न किया है। अफगानिस्तान में चुनाव हुए और अब्दुल्ला-अब्दुल्ला तथा अशरफ गनी में जबरदस्त स्पर्धा उत्पन्न हो गई। उसमें मतदान के दूसरे चरण में अशरफ गनी को निर्वाचित घोषित कर दिया गया। अब्दुल्ला-अब्दुल्ला को यह मान्य नहीं है। उन्होंने स्वयं को विजयी घोषित कर दिया है। अब्दुल्ला अब्दुल्ला और अशरफ गनी दोनों ने एक साथ मिलकर संयुक्त सरकार बनाने का निर्णय किया है। यह सरकार किस तरह चलेगी, कितने दिन टिकेगी यह देखना होगा। अफगानिस्तान का राजनीतिक इतिहास हमेशा से रक्तरंजित रहा है। अपने विरोधियों को मौत के घाट उतार देना वहां सामान्य व्यवहार है।
स्ट्रैटिजिक डेप्थ
    

 अब्दुल्ला अब्दुल्ला और अशरफ गनी में से कोई एक राष्ट्राध्यक्ष होगा। इस संदर्भ में यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान का रवैया कैसा रहेगा? पाकिस्तान तालिबान के रूप में आज भी वहां सक्रिय है। पाकिस्तान से तात्पर्य पाकिस्तानी सेना या आईएसआई से है। पाकिस्तानी सेना की नीति अफगानिस्तान का पाकिस्तानी पगहे से बांधना है। पाकिस्तान यानि पाकिस्तानी सेना चाहती है अफगानिस्तान उनकी सलाह के बिना कुछ न करे। पाकिस्तान की सेना अफगानिस्तान का उपयोग ‘स्ट्रेटिजिक डेप्थ’(सामरिक आधार) के रूप में करना चाहती है। सामारिक आधार का मतलब यह है कि यदि भविष्य में भारत के साथ युद्ध हुआ और पाकिस्तान की सेना को पीछे हटना पड़ता है, तो यह अफगानिस्तान की भूमि का भारत से युद्ध के लिए इस्तेमाल कर सके। इसलिए पाकिस्तान चाहेगा कि अफगानिस्तान में पाकिस्तानी सेना की मांगों को मानने वाली सरकार ही अस्तित्व में आए। भारत अधिक हस्तक्षेप न करे। भारत ने अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण कार्यक्रमों के लिए २.३ बिलियन डॉलर की सहायता दी है। भारत की दृष्टि में अफगानिस्तान में अनुकूल सरकार आना आवश्यक है। ऐसे प्रयास भारत की पूर्ववर्ती सरकार ने भी किए हैं। यह गौरव की बात है।
    आयमन जौहरी ने हाल में भारत में जिहाद शुरू करने की धमकी दी है। उसने भारत में अल कायदा की शाखा शुरू करने का संकेत दिया है। यह आयमन जौहरी और ओसामा-बिन-लादेन अफगानिस्तान में छिपे बैठे थे। उन्होंने ही अमेरिका पर आतंकवादी हमला बोला था। अफगानिस्तान से जब अमेरिका के नेतृत्ववाली नाटो सेना वापस चली जाएगी, उसके पश्चात क्या अफगानिस्तान में राजनीतिक स्थिरता आ पाएगी? इसकी सम्भावना बहुत कम है। सन् १९७९ से ही अफगानिस्तान में युद्ध चल रहा है। इस युद्ध में अब तक २० लाख अफगानी मारे जा चुके हैं। सात लाख विधवाएं हैं, ३५ लाख लोग विस्थापित हो गए हैं। ये विस्थापित पाकिस्तान और ईरान की सीमा पर रहते हैं। इन शिविरों में १० लाख अफगानी बच्चे पल-बढ़ रहे हैं। इनमें से बहुतों को तालिबानी बनाने की कोशिश चल रही है। पिछले आठ सप्ताहों में अफगानिस्तान में ३९ आत्मघाती बम बिस्फोट हो चुके हैं। आत्मघाती बम विस्फोट का मतलब है कि आक्रमण करने वाला स्वयं मारा जाता है। लोकतंत्र के रास्ते आने वाली सरकार को तालिबानी टिकने नहीं देंगे।
खतरनाक संगठन
     अफगानिस्तान के काबुल में केन्द्र सरकार है, किन्तु इस सरकार का शासन पूरे अफगानिस्तान में नहीं चलता। अफगानिस्तान में राज्यविहीन अनेक गुट अपने-अपने क्षेत्र में सत्तासीन हैं। इनमें अधिकांश संगठन कट्टरपंथी मुस्लिमों के हैं। उनके नाम हैं- हिज्ब-ए-इस्लामी, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, इस्लामिक जिहाद यूनियन, लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क। इनमें से लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क सर्वाधिक खतरनाक संगठन हैं। तालिबान का नेता है मुल्ला मोहम्मद उमर। आज तक वह अमेरिकी हमले में मारा नहीं जा सका है। वर्ष १९९६ से २००१ की अवधि में उसका अफगानिस्तान में शासन था। वह पाकिस्तान में रहता है और बहुत कम लोगों से मिलता-जुलता है।
      अफगानिस्तान में तालिबानियों के हमले लगातार होते रहते हैं। चुनाव के दौरान उन्होंने १०८८ हमले किए। उन हमलों में बड़ी संख्या में लोग मारे गए। सभी आतंकी हमलों में जनवरी से जून, २०१४ के छह महीनों में १,५६४ लोग मारे गए और ३,२८९ गंभीर रूप से घायल हुए। हक्कानी नेटवकर्र् के हमले में उच्च सरकारी अधिकारी, विदेशी दूतावास, विदेशी पत्रकार, सेना और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी, मंत्री निशाने पर होते हैं। इससे उन्हें दुनिया भर में प्रसिद्धि मिलती है और इस्लामी जिहाद के लिए इस्लामी देशों से भरपूर पैसा मिलता है। स्वीडिश रेडियो की पत्रकार नील्स हार्नर की राजधानी काबुल में हत्या कर दी गई। तालिबानियों के हमलें किस तरह होते हैं इसे समझने के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत है। अफगानिस्तान के गृह मंत्रालय में एक आत्मघाती तालिबानी ने बम विस्फोट कर दिया। उसमें छह पुलिस अधिकारी मारे गए। वह आत्मघाती तालिबानी उस समय फौजी वर्दी में आया था। इन सब का सार यह है कि वर्ष २०१४ के अंत में अफगानिस्तान पुन: गृहयुद्ध की स्थिति में पहुंच जाएगा। सन् १९९५ में भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हुई थी। उस समय मुल्ला उमर के तालिबानी गुट ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा किया था। २०१४ के अंत मेंे आपस में मारकाट करते हुए कौन सा गुट सत्ता पर अधिकार करेगा, इसकी भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगी। किन्तु पाकिस्तानी सेना की पूरी कोशिश होगी कि अफगानिस्तान में उसकी ताल पर नाचने वाली सरकार ही आए।
चिंताजनक बात
      अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच इस प्रकार गठजोड़ होना भारत के लिए अत्यंत चिंता की बात है। चिंता करने के कारण ये हैं- पाकिस्तानी सेना भारत विद्वेष के आधार पर खड़ी है। पाकिस्तान की विदेश नीति वहां के प्रधान मंत्री निर्धारित नहीं कर सकते। सेना को जो पसंद होता है, प्रधान मंत्री को वही करना होता है। पाकिस्तान में दिखावटी संसदीय लोकतंत्र है। इसलिए पाकिस्तान की विदेश नीति निरंतर भारत विरोध की रही है, और कल भी वैसी ही रहेगी। पाकिस्तानी सेना ने कट्टरपंथी तालिबानी और जिहादी निर्माण किए हैं। वह स्वयं एक आतंकवादी देश है। अमेरिका जिस ओसामा-बिन-लादेन को पकड़ना चाहता था, वह पाकिस्तान में छिपा हुआ था। मुल्ला मोहम्मद उमर को पाकिस्तान ने खुलेआम शरण दे रखी है। नाटो सेना की वापसी के उपरांत अफगानिस्तान में यदि तालिबानी सरकार आई, तो पाकिस्तान इस सारी जिहादी फौज का रुख भारत की ओर करेगा। आयमन जौहरी ने हाल में जो धमकी दी है, उसे इस संदर्भ में गंभीरता से लेना चाहिए। अफगानिस्तान और पाकिस्तान का गठजोड़ भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर इस्लामी हमलावरों को अभयदान देने जैसा होगा। खैबर का दर्रा ऐसे आक्रमण के लिए हमेशा खुला रहेगा।
     गंभीर चिंता का एक और विषय यह है कि ईराक, लीबिया, सीरिया इत्यादि इस्लामी देशों के आतंकवादी संगठन बहुत शक्तिशाली हो गए हैं। उसका नाम है-आईएसआईएस (ईसीस) अर्थात, ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ ईराक एण्ड सीरिया’। इस संगठन ने घोषणा की है कि उसे ‘खिलाफत’ (खलीफा का शासन) निर्माण करना है। अर्थात इस्लाम के आधार पर चलने वाला एक वृहद राज्य। इस राज्य में इराक, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान हैं। ऐसा पर्चा तैयार करके ईसीस ने पाकिस्तान के सीमावर्ती प्रदेशों के मुसलमानों के बीच में वितरित किया है। सीमांत प्रदेश में पठानों की संख्या अधिक है। उनकी भाषा में ही में पर्चे छापे गए हैं। इस्लामी खिलाफत का आकर्षण पश्चिमी एशिया के मुसलमानों में बहुत अधिक है। इस्लाम की स्थापना होने के बाद १०० वर्षों में इस्लाम के प्रभाव में मध्य एशिया, तुर्किस्तान, स्पेन, मिस्र इत्यादि देश आ गए। इसके साथ ही भारत पर भयंकर आक्रमण शुरू हो गए। यदि हम इस्लाम के मूल तत्वों पर चलें और कुरान की आज्ञाओं का पालन करें, तो अल्लाह हमें सफल बनाएगा, यह उनकी आस्था है। इस्लामी देश में गैर इस्लामी व्यक्ति और फौज का रहना इस्लाम का घोर अपमान है। इसलिए अमेरिका और पश्चिमी देशों के विरुद्ध इस्लामिक संगठनों ने आतंकवादी जिहाद शुरू किया है। भारत के संदर्भ में उनका मानना है कि अंग्रेजों के आने से पूर्व भारत एक इस्लामी देश था, किन्तु अब यह गैर इस्लामी लोगों का है। इसलिए गैर इस्लामी के विरुद्ध जिहाद करना सच्चे मुसलमान का पहला धार्मिक कर्तव्य है। भारतीय मुसलमानों का हाथ पकड़कर जिहाद करने की उनकी योजना है।
पाकिस्तान का अस्तित्व
      इस दृष्टि से पाकिस्तान का अस्तित्व अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। जिस तरह से अफगानिस्तान अनेक आतकंवादी संगठनों का अन्तरराष्ट्रीय अड्डा बन गया है, उसी तरह पाकिस्तान स्पष्ट रूप से आज अनेक आतंकवादी संगठनों का अड्डा हो गया है। यह मामला हमारी अपेक्षा अमेरिका को अधिक अच्छी तरह से मालूम है, किन्तु वह पाकिस्तान को हाथ नहीं लगाएगा। पाकिस्तान का अस्तित्व बनाए रखने के लिए अमेरिका हर सम्भव यत्न करेगा। कारण कि पाकिस्तान की भूमि भू-राजनीतिक संदर्भ में अनन्य साधारण महत्व की भूमि है। चीन, रूस और सभी अरब देशों पर नियंत्रण रखने के लिए अमेरिका को यह भूमि चाहिए। इस भूमि का उपयोग करने की अनुमति देने वाली सरकार चाहिए। पाकिस्तान का कोई भी शासन अमेरिका के विरुद्ध नहीं जा सकता है। जनता का शासन सेना के अधीन है। इसलिए भारत की पश्चिमी सीमा सदैव अशांत रहती है। एक सीमा से आगे हम भी सेना के बल पर पाकिस्तान को समाप्त नहीं कर सकते।
      सातवीं शताब्दी से शुरू हुआ इस्लामी आक्रमण आज भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। भारत की विदेश नीति पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अकेला देखने की है। इसमें हमें बहुत हद तक सफलता मिली भी है। पाकिस्तान को अमेरिका से दूर करना या अमेरिका द्वारा पाकिस्तान की ओर से पल्ला झाड़ लेना, ऐसा हम नहीं कर सके। अमेरिका का गला फंसने के सिवाय ऐसा होगा नहीं। ऐसी शक्ति आज तक भारत के प्रधान मंत्री ने दिखाई भी नहीं। इंदिरा गांधी ने ऐसा प्रयत्न किया था। अब नरेन्द्र मोदी इस संदर्भ में क्या करते हैं, यह बारीकी से देखना होगा। उनकी वर्तमान विदेश नीति भारत के पड़ोसी ‘सार्क’ देशों के साथ सम्बंध अच्छे बनाने की है। इन देशों को मिलाकर भविष्य में एक बड़ी शक्ति खड़ी हो सकती है। भारत के दक्षिण में अनेक देश बौद्ध धर्म मानने वाले हैं। बौद्ध धर्म का उदय भारत में होने के कारण ये सभी देश भारत की सांस्कृतिक छतरी के नीचे आते हैं। यदि नरेन्द्र मोदी इन देशों को एकजुट करके एक शक्तिशाली संगठन बनाते हैं, तो अमेरिका के सामने एक शक्ति की उत्पत्ति होगी।
फाइनल सॅलूशन
     सातवीं शताब्दी से हो रहे इस्लामी हमले पर स्थायी लगाम लगाने की आवश्यकता है। विश्व की परिस्थिति कैसी बनती है और पश्चिम एशिया की उथल-पुथल का परिणाम क्या निकलता है, इस पर आक्रमण का स्वरूप निर्भर करेगा। आज रूस प्रत्यक्ष रूप में दुनिया के सामने पुन: एक महाशक्ति बनना चाहता है। वह अमेरिका को चुनौती देने की भूमिका में स्थित दिखाई देता है। पश्चिम एशिया का तेल भण्डार आज नहीं तो कल समाप्त होगा ही। तब उन देशों की पैसों की मस्ती उतर जाएगी। किन्तु यह देखकर भी जिहाद की मस्ती नहीं उतरेगी। क्योंकि धार्मिक उन्माद का मद ऐसा है कि यदि वह एक बार मन पर छा जाए, तो जीवन भर उतरता नहीं।
      इन सभी दृष्टिकोणों से यदि कल भारत पर जिहादी आघात होता है, तो उसका सामना हमें प्राणपण से करना होगा। और कभी न कभी तो एक बार इस समस्या को जड़मूल से उखाड़ फेंकने के लिए विचार करना होगा। अंग्रेजी में जिसे ‘फाइनल सॅल्यूशन’ (निर्णायक समाधान) कहा जाता है, उस पर विचार करना होगा। पाकिस्तान द्वारा शुरू किया गया युद्ध केवल शस्त्रों का युद्ध नहीं है, अस्त्रों का भी है। और अपने अस्त्र-शस्त्र केवल शोभा बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि कल वे प्रयोग करने के लिए हैं, यह भावना अपने मन में होनी चाहिए। हमें युद्ध की विभीषिका को निमंत्रण नहीं देना है, यदि कोई हमारे अस्तित्व और संस्कृति को नष्ट करने का प्रयत्न करेगा तो उसके लिए घबराने की भी जरूरत नहीं है। हिंदू धर्म की एक मान्यता है कि ‘आत्मा के रूप में हम अमर होते हैं।’ इस भू लोक मेंे आना-जाना लगा रहता है। केवल नश्वर शरीर बदलता है, परन्तु अस्तित्व नहीं बदलता। कूटनीति के सभी मार्ग हमेशा खुले रखने चाहिए। उस मार्ग से सभी प्रश्नों को हल करना चाहिए, और साथ में ‘फाइनल सॅल्यूशन’ अर्थात अंतिम समाधान की तैयारी भी रखनी चाहिए। यहां नेहरू जी की नीति उपयोगी नहीं है, यहां कृष्णनीति की जरूरत है।

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