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 ***राधाकृष्ण भागिया***

   

महमूद का तो सिर चकरा गया। जब उसने दुर्गा से जोरदार एवं दृढ निश्चय वाले शब्दों मेे सुना कि वह उससे निकाह नहीं परंतु शादी कर सकती हैं और वह भी तभी जब वह हिंदू धर्म स्वीकार कर के रजिस्ट्रेशन करवाएगा।
आज जब से वह घंटा दो घंटा दुर्गा से मिलकर छात्रावास के अपने कक्ष में आया था तब से दुर्गा की कही हुई बातों को याद कर उसका सिर घूम रहा था। उसके कहे हुए वाक्य उसके दिमाग से टकराकर, हृदय से टकराकर उसके दिल और दिमाग के टुकड़े-टुकड़े कर रहे थे। महमूद की बेचैनी बढ़ा रहे थे। उसने तो दुर्गा को अन्य साधारण लड़कियों की तरह ही समझा, जो शीघ्र ही प्रेम के जाल में फंस जाती हैं। लेकिन दुर्गा तो अपने नाम के अनरूप ही दुर्गा निकली।
गुज़रे डेढ बरस की सारी घटनाएं उसकी आंखों के सामने एक सिनेमा के चित्रों की तरह धीरे-धीरे घूमने लगीं। उसे याद था कि ‘जिहादी प्रेम’ की योजना के अंतर्गत ही उसके शहर के मौलवी एवं कुछ बुजुर्गों ने उसका इस कॉलेज में दाखिला करवाया था। उन्होंने न केवल उसका कॉलेज का खर्चा वहन किया था; बल्कि जिहादी प्रेम को सफल करने के लिए होने वाले सारे खर्चों से भी बहुत अधिक पैसा उसको दे रहे थे। उसने और उसके दोस्त युसूफ ने डेढ़ वर्ष पूर्व उसकी शुरुआत भी की थी। उसके दोस्त युसूफ ने एक सीधी-सादी हिंदू लड़की से प्रेम का सम्बंध बनाया था। यूं तो अन्य लडकियां भी थीं लेकिन महमूद का ध्यान दुर्गा की ओर ही गया। दुर्गा अन्य लड़कियों की तरह चुलबुल स्वभाव, कम समझ वाली, फूहड़ एवं जल्दी से चक्कर में आनेवाली लड़कियों में से नहीं थी। वह पक्के इरादे वाली एवं रौबदार लड़की थी। महमूद उसके इन गुणों के कारण ही एक चैलेंज के रूप में उससे सम्बंध बनाने लगा। उसे लगा शिकार करना तो कोई अच्छा सा।
       धीरे-धीरे दुर्गा उसके साथ इधर-उधर जाने लगी थी, उसके साथ उठने-बैठने लगी थी; फिर भी हमेशा अकेली एकांत जगह पर बैठने से इनकार करती थी। दोनों साथ तो बैठते थे, लेकिन दुर्गा हमेशा सुरक्षित अंतर पर बैठती थी और ऐसे स्थान पर बैठती थी जहां आते-जाते लोग उनको देख पाएं और बुलाने पर कोई भी सुन सके और आ सके। दुर्गा की इन अदाओं ने महमूद को और अधिक अपनी ओर आकर्षित किया था। वह उससे सचमुच प्यार करने लगा था। वह उसके नहीं मिलने पर बेचैनी अनुभव करता था, व्याकुल हो जाता था। धीरे-धीरे वह उसके प्रेम में उलझता गया। कुछ समय से वह यह भी अनुभव करने लगा था कि दुर्गा भी पहले की तुलना में कुछ ज्यादा अपनत्व से उससे मिलती थी, नहीं मिल पाने पर बेचैन सी लगती थी। मिलने पर प्रसन्न लगती थी। एक बार बात-बात में महमूद ने उसे कह भी दिया था कि वह उससे प्यार करता है। उसने देखा कि दुर्गा यह सुनने के बाद कुछ रोमांचित अवश्य हुई थी, लेकिन मानों कठिनाई से खुद को सम्भालते हुए कहा था, ‘देख महमूद यह प्यार आदि कुछ नहीं है। हम दोनों बहुत अच्छे मित्र हैं इसलिए अपनत्व है। मित्र होने के नाते एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं, एक दूसरे बातचीत करते हैं, बस!’ लेकिन महमूद ने अनुभव किया कि वह कुछ छिपा रही है, अपनी भावनाओं को कुछ दबा रही है। शायद वह प्यार ही था। वह सब कहते हुए भी दुर्गा ने अपना हाथ उसके हाथ से नहीं छुडाया था, बल्कि अपने दूसरे हाथ से उसके हाथ पर हल्की सी थपकी भी लगाई थी। इसी से महमूद को लगा था कि वह कह कुछ और रही है और उस के मन में कुछ और है। और वह उसे प्यार मान रहा था। कुछ समय यूं ही बीत गया। दोनों एक दूसरे के साथ पहले की तरह मिलते रहते थे। नहीं मिलने पर बेचैनी अनुभव करते थे।
     आज फिर एक बार महमूद अपने आप को रोक नहीं पाया और बहुत ही प्यार से दुर्गा का हाथ अपने हाथ में लेकर सीने से लगाते हुए कहने लगा, ‘दुर्गा मैं तुम्हें बहुत बहुत प्यार करता हूं। अब मैं तेरे सिवाय रह नहीं सकता। हर परिस्थिति में मैं तुझे अपना बनाना चाहता हूं। अब तुम्हारे बिगर जी नहीं सकूंगा। तू जल्दी हां कर तो बाकी तैयारियां करें।’ दुर्गा भी भावुक हो गयी, लेकिन खुद को सम्भालते हुए बोली, ‘सुन महमूद अब बेचैनी तो मुझे भी अनुभव होने लगी है। मिले बिगर मुझे भी व्याकुलता होने लगती है। दुनिया कहती है ‘प्यार अंधा होता है’ लेकिन मैं मानती हूं प्यार तो परमात्मा का, खुदा का बहुत बड़ा गुण है, वह अंधा नहीं हो सकता, यह तो वासना है जो अंधी होती है’ अत: प्रेम में भी मैं सोच समझकर कदम उठाना चाहती हूं। तू मेरे सिवाय रह नहीं सकता अर्थात क्या करना चाहता है? तुम्हारा विचार क्या है?’
     महमूद खुद को रोक नहीं सका। उसका हाथ सहलाते हुए कहने लगा, ‘बस तू हां कर तो मैं तुमसे निकाह करना चाहता हूं।’
     दुर्गा ने कुछ रुक कर खुद को सम्भालते हुए कहा, ‘बस इसी बात का ही मुझे तुझ से डर था। तुम एक दिन निकाह करने को कहोगे। इस कारण तुझे चाहते हुए भी मैं तुझसे कुछ दूरी रखती रही हूं। प्यार के अंधे वेग में बह जाने के बदले खुद को सम्भालती आई। सुन महमूद, मैं भी तुम्हें बहुत चाहती हूं। मैं भी तुझ से एक होना चाहती हूं लेकिन मैं तुझसे निकाह नहीं; शादी करना चाहती हूं, वह भी तेरे हिन्दू बनने पर।’ महमूद को तो मानो सांप सूंघ गया। वह हतप्रभ दुर्गा के मुंह की ओर देखता ही रह गया। कुछ समय के बाद खुद को सम्भालते हुए कहने लगा, ‘ऐसे कैसे कह रही हो। खुद तो अपना धर्म बदलना नहीं चाहती; लेकिन मुझे धर्म बदलने के लिए कह रही हो, यह तेरा दोगलापन नहीं है क्या?’ दुर्गा ने जवाब दिया, ‘महमूद तू सच कह रहा है। हम हिंदू कभी भी किसी का धर्म परिवर्तन करने में विश्वास नहीं करते। हमारे कृष्ण भगवान ने तो साफ कहा है कि हरेक अपने-अपने धर्म में बना रहकर परमात्मा, खुदा को पा सकता है। मैं तुम्हारे धर्म बदलने में इन्टरेस्टेड नहीं हूं। लेकिन मैं अपनी जिंदगी की सुरक्षा में बहुत ही इन्टरेस्टेड हूं। मैं तेरे साथ जिंदगी भर का रिश्ता रखना चाहती हूं। तेरे साथ निकाह करने पर तू कभी भी मुझे ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कह दे तो मैं तो बरबाद हो जाऊंगी। आगे चलकर तेरे घर वालों या तुझे लगे कि तुझे किसी अन्य लड़की या सगेवाली से एक और निकाह करना है और तू जिद करके यह कहते हुए कि आपके धर्म में यह जायज है, दूसरा निकाह कर लें तो मैं तो जीते-जी मर जाऊंगी। मुझ पर बुर्का पहनने की जिद की जाय तो मैं तो सहन नहीं कर पाऊंगी। मैं तो कृष्ण और देवी की पूजारन हूं, आपके घर वाले अगर कहने लगे कि मैं खुदा के सिवाय अन्य किसी की इबादत नहीं कर सकती तो यह मुझ से तो सहन नहीं हो सकता। मैं दो बच्चे होना ठीक मानती हूं। कल आप लोग अगर कहो कि आपके तो संख्या बढ़ानी है तो मैं एक बच्चे पैदा करने वाली मशीन नहीं बनना चाहती। ऐसे कई बंधन हैं जिनमें मैं बांधना नहीं चाहती। इसके विरुद्ध तेरे हिंदू बनने से मैं इस प्रकार के सारे खतरों से बच जाऊंगी। इससे भी बड़ी बात यह होगी कि तेरे हिंदू बनने पर तुझ पर ऐसा कोई भी बंधन नहीं आएगा जो तुझे कष्ट दे। तू चाहे तो मस्जिद में भी जा सकेगा, कुरान भी पढ़ सकेगा। तुम्हारे माता-पिता से भी बहुत ही अच्छे सम्बंध रखेंगे ही। इसलिए मेरी न्रम विनती है कि अगर तुम मुझ से सचमुछ प्रेम करते हो तो मेरी ही सुरक्षा के लिए ही सही तू मेरा कहा मान, जिससे हम शीघ्र आगे की तैयारियां करें। अन्यथा मुझे यह रिश्ता स्वीकार नहीं है। हम अच्छे दोस्त ही भले हैं।’
     महमूद के कुछ दिन तो बड़ी बेचैनी से बीते। दुर्गा के शब्द उसके दिल और दिमाग में घूम रहे थे। कुछ समय के बाद ज्यों उसका दिमाग कुछ शांत हुआ तो उसे दुर्गा की बातों की सच्चाई सवर्था समझ में आने लगी। दुर्गा के तर्को में उसे हकीकत दिखाई देने लगी। दूसरी ओर वह दुर्गा को इतना तो प्रेम करने लगा था कि उसको दुर्गा के सिवाय रहना नामुमकिन लग रहा था। वैसे भी वह समझदार और बुद्धिमान था। इस कारण उसे दुर्गा की कही हुई बातों का अहसास भी हो रहा था। उसने दुर्गा से बात करने का प्रयत्न भी किया था। दुर्गा से एकदम धीरज के साथ शांत जवाब मिलता था, ‘महमूद मेरी तुझ से कोई शिकायत नहीं है। मुझे मालूम है, मैने एक अत्यंत ही कठिन बात कही है। मुझे कुछ जल्दी नहीं है। तू अच्छी तरह मेरी होने वाली परिस्थिति पर भी सोच और फिर निर्णय कर। मैं अभी और छह महीने इंतजार करने के लिए तैयार हूं।’
      महमूद ने दो तीन मास बहुत गहराई से चिंतन किया। अपने दोस्तों, यारों, मौला-मौलवियों, सगे सम्बधियों से अप्रकट रूप से दुर्गा के उठाए प्रश्नों को पूछता रहता था, लेकिन सब जगह से उसे यही उत्तर मिला कि निकाह और ये सारी बातें तो लागू होने वाली ही हैं। यह तो हमारे मुस्लिम धर्म का अंग ही है। महमूद का मन बदलता गया। उसे लगा कि हिंदू धर्म तो इतना उदार है कि वह हिंदू बनकर भी मुस्लिम रह सकेगा। हिंदुओं में जैसे कोई कृष्ण की, कोई शिव की, कोई राम और कोई काली की पूजा कर सकता है वैसे ही वह हिंदू बनकर खुदा की बंदगी कर सकता है और कुरान पढ़ सकता है।
      अंत में उसने हिम्मत के साथ निर्णय लिया। आर्य समाज में जाकर हिंदू धर्म स्वीकार किया। कोर्ट में जाकर एफीडेविट देकर अपना हिंदू होना रजिस्टर्ड करवा आया। एक मास के बाद उसने दुर्गा के साथ शादी की। मंदिर में गया, मस्जिद में भी गया। कुरान की कई आयातें भी श्रद्धा से पढ़ीं। धीरे-धीरे दुर्गा और मोहन (महमूद) ने मिलकर महमूद के माता-पिता को मना कर गुस्सा दूर किया। दुर्गा और मोहन ने मां-बाप की बहुत बहुत सेवा की। उसके मां बाप उसे महमूद के नाम से ही बुलाते थे, लेकिन दुर्गा को कभी बुरा नहीं लगता था। हर शुक्रवार को महमूद (मोहन) मस्जिद भी जाता था, लेकिन दुर्गा ने कभी नाराजगी नहीं दिखाई। आज शादी के बाद दोनों की जिंदगी खूब सुखपूर्वक चल रही है।

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