नए जिहादियों की पुरानी विचारधारा

 

हाल के उपचुनावों में खासकर उत्तर प्रदेश में भाजपा को जब समाजवादी पार्टी के हाथों अपनी विधान सभा सीटें गंवानी पड़ीं तो भाजपा विरोधी दलों और सेक्यूलर तबके ने स्वाभाविक तौर पर खूब हमले बोले। कहा गया कि भाजपा और उसके मित्र संगठनों ने ‘लव जिहाद’ के मुद्दे को हवा देकर राज्य में कथित सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की जो कोशिशें कीं, वे पूरी तरह नाकाम हो गईं। लेकिन इन आरोपों का कोई वास्तविक आधार नहीं है। बेशक पहले ऐसी खबरें आई थीं कि उत्तर प्रदेश भाजपा की कार्यकारिणी ‘लव जिहाद’ के मसले पर विचार करने का मन बना रही है। लेकिन बाद में ये निराधार निकलीं। कहा गया कि राज्य इकाई ने केंद्रीय नेतृत्व के दखल के बाद यह मुद्दा चुनावी अभियान में उठाने का विचार त्याग दिया। असलियत यह है कि उत्तर प्रदेश भाजपा ने न तो ‘लव जिहाद’ को उपचुनावों में कोई मुद्दा बनाया और न ही उसके आधार पर कथित ध्रुवीकरण की कोई कोशिश हुई। उपचुनावों में पार्टी की हार के दूसरे कारण अब सामने आ रहे हैं और उनका विश्लेषण भी हो रहा है। दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह देखने की है कि जिस ‘लव जिहाद’ को तथाकथित सेक्यूलर वर्ग और अन्य कुछ दल सिरे से नकार रहे हैं, क्या वह वास्तव में कोरी कल्पना ही है?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम युवाओं या विवाहित पुरूषों द्वारा हिंदू लड़कियों या महिलाओं से अपनी पहचान छुपाकर विवाह करने और फिर उनके जबरन धर्मांतरण की कोशिश करने के कम-से-कम सात मामले पुलिस ने दर्ज किए। इन सभी प्रकरणों में झांसा देकर निकाह पढवाई गईं और जबरन धर्म बदलने के लिए विवश की गईं लड़कियों और महिलाओं को पुलिस ने छुड़ाया तथा आरोपियों को गिरफ्तार किया। इनमें से छह लड़कियों को देश के एक प्रमुख समाचार चैनल ने समाज के सभी वर्गों से आमंत्रित लोगों के सामने अपने स्टुडियों में पेश किया, जहां इन पीड़ित महिलाओं ने अपनी दुखभरी दास्तान सुनाई। एक अन्य प्रमुख चैनल ने भी ‘लव जिहाद’ पर एक विस्तृत खोजी कार्यक्रम प्रसारित किया। यह सब उपचुनावों के लिए मतदान से पहले हुआ।
इतना ही नहीं, देश और दुनिया के मुस्लिमों के सबसे बड़े धार्मिक-आध्यात्मिक केंद्र दारूल-उलूम देवबंद के मुख्य प्रॉक्टर ने एक स्पष्ट बयान जारी कर कहा कि कुछ मुस्लिमों द्वारा खुद को हिंदू बताकर हिंदू लड़कियों से निकाह करने और उन्हें जबरन इस्लाम में धर्मांतरित करने को इस्लाम मान्यता नहीं देता और ऐसे सभी निकाह धर्मविरूद्ध तथा अवैध हैं। इतना ही नहीं, देवबंद के प्रवक्ता ने तो कहा कि सिर्फ शादी करने के लिए किसी लडक़ी या लडक़े को जबरन धर्मांतरित करना कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता, आखिर हम ‘लव जिहाद’ को स्वीकार कैसे कर सकते हैं? इस्लाम औरतों को अत्यंत आदर देता है। हमारा मज़हब लडक़ों को किसी भी लडक़ी के साथ प्रेम की पींगें बढ़ाने (फ्लर्ट करने) की इज़ाजत नहीं देता, तो इस्लाम अपने मर्दों को दूसरे धर्मों की औरतों को जोर-जबरदस्ती से इस्लाम में धर्मांतरित करने की इज़ाजत कैसे दे सकता है?’’ इसी के साथ देवबंद ने इस मुद्दे पर सामाजिक-सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिशों की भी निंदा की।
जमियत-ए-उलेमा-ए-हिंद और शिया धार्मिक नेताओं ने भी ‘लव जिहाद’ को इस्लाम-विरूद्ध घोषित किया।
सवाल यह है कि अगर ‘लव जिहाद’ कल्पना की ही उपज है, तो मुस्लिम धर्मगुरूओं और महत्वपूर्ण इस्लामिक संस्थाओं को उसकी चिंता करने की जरूरत क्यों पड़ी? वजह यह है कि ऐसी घटनाएं हो रही हैं और उनसे सामाजिक तनाव भी उत्पन्न हो रहा है। इसीलिए २०० से अधिक दंगों के दाग झेल रही उत्तर प्रदेश पुलिस ऐसी शिकायतों पर कार्रवाई करने को मजबूर हो रही है और मुस्लिम समुदाय के धर्म-कर्म को नियंत्रित करने वाले नेतृ-वर्ग तथा संस्थाओं को इस ओर ध्यान देने और ‘लव जिहाद’ को इस्लाम विरोधी घोषित करने की पहल करनी पड़ी है। यह अच्छी बात है। लेकिन इसका जमीनी असर होता दिखाई नहीं देता। इसका बड़ा कारण यह कि पिछले कुछ वर्षों से एक ऐसी इस्मामिक विचारधारा और संगठन समुदाय को निर्देशित करने लगे हैं जो इस्लाम के शुद्धतावादी स्वरूप, जो दरअसल कट्टर रूप है, के आधार पर जीवन जीने की वकालत करते हैं। हालांकि तबलगी जमात जैसे संगठन, जिनके वार्षिक सम्मेलनों में २० लाख तक लोग जुटते हैं, घोषित रूप से शुद्ध इस्लाम की धार्मिक शिक्षेा और आचार-व्यवहार तक सीमित है, लेकिन समुदाय में बढ़ती स्वीकार्यता तथा इस्लाम के स्थापित केंद्रों और देश भर की मस्जिदों में बढ़ते नियंत्रण से कालबाह्य हो गए मज़हबी विचार और धारणाएं तथा उसके अनुरूप जीवन-शैली पर जोर बढ़ता जा रहा है। देश के स्वतंत्रता संग्राम में बराबरी से शिरकत करने वाले जमीयत जैसे संगठन तथा सर्वधर्म समभाव वाले लोकतांत्रिक भारत में युगानुरूप परिवर्तन के साथ चलने की कोशिश करने वाले देवबंद जैसे केंद्र इस बढ़ते तूफान के सामने एक तरह से असहाय साबित हो रहे हैं।
इस्लाम के शुरूआती धार्मिक आदेशों में से कई को कालानुरूप न मानते हुए उन पर जोर न देने वाला या फिर उनकी नई समन्वयवादी व्याख्याएं करने वाला यह तबका जो पहले समुदाय का जीवन निर्देशित करता था, कट्टर वहाबी विचारधारा के सामने अब अप्रासंगिक होने की कगार पर है। कट्टर विचारों के मुकाबले समन्वयवादी विचार कैसे टिकें और समुदाय कैसे उनका पहले की तरह पालन करता रहे इसकी चिंता इस मुस्लिम नेतृ-वर्ग को आज नहीं तो कल निश्चित ही करनी होगी। इराक में आइएसआइएस जैसे खूंरेज़ सुन्नी इस्लामी संगठनों के उभार और उसके प्रति भारत के मुस्लिम युवाओं के एक वर्ग में बढ़ते आकर्षण से यह सवाल और भी चिंतनीय हो गया है। कट्टर विचारधारा उदार विचारधारा को धीरे-धीरे हाशिये पर धकेल रही है। और केवल इस्लाम का ही नहीं, भारत का भी संकट है। ‘लव जिहाद’ जैसे प्रकरण उसका महज एक पहलू हैं।
इन आरोपों में कोई दम नहीं कि ‘लव जिहाद’ शब्द राष्ट्रीय विचारों के पह्नधर संगठनों की ईज़ाद है। दरअसल ‘लव जिहाद’ या ‘रोमियो जिहाद’ का प्रयोग केरल की उन दो लड़कियों के पालकों ने पुलिस में दर्ज अपनी शिकायतों में किया जिनकी बेटियों को एक मुस्लिम युवक झंसा देकर भगा ले गया। एमबीए की छात्रा इन लड़कियों में से एक हिंदू और एक ईसाई थी। इनका धर्मपरिवर्तन किया गया और एक ही मुस्लिम युवक द्वारा प्रेमजाल में फंसाई गई इन युवतियों में से एक से उस युवक ने निकाह कर लिया जबकि दूसरी का निकाह जबरन एक टैक्सी ड्राइवर के साथ करा दिया गया। इसमें केरल में सक्रिय एक उग्रवादी मुस्लिम संगठन के नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई।
गिरफ्तारी वारंट जारी होते ही दोनों युवकों की ओर से हाइकोर्ट में अग्रिम जमानत की याचिका दायर कर दी गई। इसी याचिका पर २००९ में केरल हाइकोर्ट ने केरल सरकार और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर ‘लव जिहाद’ के मामलों की जांच करने और लड़कियों को कोर्ट में पेश करने के आदेश दिए। केरल के तत्कालीन डीजीपी ने कोर्ट में दाखिल हलफनामे में यह तो कहा कि इन दो मामलों के अलावा राज्य में ‘लव जिहाद’ या ‘रोमियो जिहाद’ नाम का कोई अभियान चलने के प्रमाण नहीं हैं, न ही ऐसा कोई संगठन पुलिस की नज़रों में आया है, लेकिन माना कि ऐसी अपुष्ट खबरें हैं कि कुछ संगठन ‘लव जिहाद’ जैसे तरीके अपनाकर हिंदू-ईसाई लड़कियों को बरगलाकर उनसे शादी कर रहे हैं और उनका जबरन धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। और कहा जाता है कि इन संगठनों-युवकों को इस काम के लिए विदेशों से धन मिल रहा है। डीजीपी ने कहा कि केरल में बड़ी संख्या में हो रहे अंतर-धार्मिेक विवाहों में यह संदेह करने के पक्के कारण हैं कि मुस्लिम युवकों के प्रेमजाल में फंसी लड़कियों को जबरन धर्मांतरित करने की कोशिशें हो रही हैं। हालांकि बाद में हाइकोर्ट की एक और पीठ ने कोर्ट के इस आदेश पर रोक लगा दी। लेकिन अंतत: वे दोनों लड़कियां बरामद रक ली गईं और उनकी कहानी वैसी ही थी जैसी हाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में छुड़ाई गई ऐसी ही सात लड़कियों की थी।
२०१० में कर्नाटक हाइकोर्ट ने भी ‘लव जिहाद’ के ऐसे ही प्रकरणों की जांच करने और भगाई गईं हिंदू-ईसाई लड़कियों को बरामद करने के आदेश पुलिस को दिए। हाल में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने भी उत्तर प्रदेश सरकार को जांच के ऐसे ही आदेश जारी किए। झरखंड की राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज तारा सहदेव और उसे हिंदू होने का झांसा देकर उससे पहले निकाह रचाने और बाद में उसे इस्लाम स्वीकार करने के लिए यातनाएं देने वाले रकीबुल हसन ऊर्फ रंजीत कुमार कोहली का मामला तो राष्ट्रीय सुर्खियां बना हुआ है। अब इस प्रकरण में तो हिंदू लड़कियों से देहव्यापार कराने, खुफिया जानकारी जुटाने तथा मंत्रियों-जजों के शामिल होने तक की बातें सामने आ रही हैं।
असम, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और ेअब कई राज्यों से ऐसे मामलें अखबारों और चैनलों के प्रमुख समाचार बन रहे हैं। यह जागृति अनायास और अचानक नहीं आई है। जब समाज में ऐसी घटनाओं के विरूद्ध आवाज उठने लगी, समाजिक तनाव पैदा होने लगे और अपनी बेटियों में जाल में फंसने से बचाने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों में रक्षक दस्ते बनने लगे, जैसा कि एक दस्ता पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सक्रिय है, तब जाकर सरकारों और मुस्लिम संगठनों की नींद खुली है।
इन संगठनों और समुदाय के नेताओं को इसकी रोकथाम के लिए कदम उठाने की जरूरत है। मुस्लिम समुदाय का सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, शिक्षा की भारी कमी और खासकर निचले तबके के मुस्लिम घरों का वातावरण उन तत्वों को खाद-पानी देने का काम करता है जो शुद्धतावादी मज़हब के नाम पर मानवताविरोधी धर्मांधता को जायज ठहराते हैं। समुदाय के नेताओं को यह विचार करने की भी जरूरत है कि तुष्टीकरण की नीति पर चलकर उनके महज़ वोट बटोने वाले राजनैतिक दलों ने उनका कितना भला किया है। आधुनिक शिक्षा-दीक्षा और समन्वयवादी विचारों का प्रसार तथा उनकी पुनर्स्थापना समुदाय में कैसे हो इसका विचार भी उन्हें करने की जरूरत है। जब विश्व भर के समाज अपनी तरक्की की राह पर बढ़ रहे हैं तो भारत का मुस्लिम समुदाय कैसे पीछे रह सकता है? १८वीं सदी के तौर-तरीकों पर बल देने वालों को बाहर करने की राह उसे जरूर ढूंढनी चाहिए।

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