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वास्तुशास्त्र से व्यक्तित्व विकास

 ***डॉ. रविराज अहिरराव ***

    

यह निर्विवाद सत्य है कि मानव जीवन की प्रत्येक बात पर वास्तु शास्त्र का प्रभाव होता है। मानव के व्यक्तित्व का विकास होते ही उसका यश बढ़ता है और प्रगति होती है। व्यक्तित्व विकास के लिये कई स्थानों पर सेमिनार आयोजित किये जाते हैं। इन सेमिनारों में भी़ड़ भी बहुत होती है। इन महंगे सेमिनारों के जरिये व्यक्तित्व का विकास करने के पहले कुछ महत्वपूर्ण बातें जो हमारे हाथ में हैं और जिन्हें मुफ्त में किया जा सकता है, उनकी ओर ध्यान देना चाहिये। ये भी व्यक्तित्व विकास में सहायक हो सकती हैं।
प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र के माध्यम से व्यक्तित्व विकास को गति प्रदान की जा सकती है। व्यक्तित्व विकास में विचार शैली, कार्य प्रणाली, देहबोली, पहनावा, आत्’विश्वास, निर्णय क्षमता, नेतृत्व, समन्वय, संवाद इत्यादि अनेक बातों का ध्यान रखा जाता है। इन बातों को वास्तुशास्त्र के माध्यम से किस तरह प्रभावशाली बनाया जा सकता है; इसका वर्णन आगे किया जा सकता है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार ईशान्य भाग में जल तत्व होता है, इसका अर्थ है प्रवाह। इसे शुद्धता और ईश्वर से सात्विकता प्राप्त करने का मार्ग भी कहा जा सकता है। इस भाग की वास्तु रचना में तीन ‘प’ का महत्व अधिक है – वे इस प्रकार हैं – १. प्रवेश द्वार २. पानी ३. पूजा घर; इस पद्धति से रचना करने पर आर्थिक प्रगति अच्छी होती है, साथ ही स्वास्थ्य, शिक्षण और आध्यात्मिक क्षेत्रों में प्रगति होती है। आर्थिक प्रगति समाधान व संपन्नता प्राप्त होती है और कार्य का वेग अपने आप बढ़जाता है। अच्छा स्वास्थ्य आपके उत्साह और मेहनत में इजाफा करता है। शिक्षण क्षेत्र में प्रगति करने से वैचारिक स्तर बढ़ता है और कार्य पद्धति संतुलित होती है। आध्यात्मिक प्रगति से मन-मस्तिष्क शांत होता है और कार्य में प्रगति होती है।
       आग्नेय दिशा अर्थात अग्नितत्व। अग्नि से ऊर्जा प्राप्त होती है जिससे गति और प्रगति होती है। आग्नेय दिशा में अग्नि की स्थापना अर्थात रसोई घर की रचना ही जीवन में प्रगति को अधिक गति प्रदान करती है, परंतु घर में अग्नि आग्नेय दिशा में प्रज्वलित न हो तो कार्यों में बाधाएं आ सकती हैं। थोड़े शब्दों में कहा जाये तो ईशान्य दिशा की वास्तु रचना के कारण सर्वांगीण विकास और प्रगति होती है और आग्नेय दिशा इसकी गति बढ़ाने का कार्य करती है।
       सर्वांगीण विकास के कारण मानव को सुख प्राप्त होता है। इसका परिणाम उसकी देहबोली, विचार शैली और कार्य पद्धति पर बिंबित होता है। प्रसन्न वातावरण में प्रसन्न मानसिकता का विकास होता है और इसी से उत्कृष्ट कार्य क्षमता का स्वरूप बनता है। इसी उत्कृष्ट कार्य क्षमता को अगर स्थिरता, आत्’विश्वास, कठिन प्रसंगों पर कठोर निर्णय लेने की क्षमता, उस निर्णय पर अमल और नेतृत्व करने का साथ मिल जाये, तो व्यक्ति निश्चित रूप से यश प्राप्त करता है। यह परिणाम नैऋत्य दिशा के पृथ्वी तत्व से प्राप्त होता है। पृथ्वी अर्थात जड़ता और जड़ता से स्थिरता का निर्माण होता है। नैऋत्य दिशा शारीरिक व मानसिक स्थिरता प्रदान करती है। इससे आत्’विश्वास, निर्णय क्षमता, नेतृत्व प्राप्त करने में मदद मिलती है।
     

 वायव्य अर्थात वास्तु तत्व का स्थान। वायु सदैव बहती रहती है। वह चंचल है। यही प्रकृति मानवीय स्वभाव में चंचलता प्रदान करती है। चंचलता के कारण मानव स्वभाव में पकड़ने – छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती है। इसका परिणाम समाज के विविध अंगों के होने वाले संबंधों पर पड़ सकता है। वायव्य दिशा की वास्तुशास्त्रीय रचना के अनुसार वायु तत्व को संतुलित करके संवाद कुशलता और व्यक्तिगत संबंधों को विकसित किया जा सकता है। जिस वास्तु की वायव्य दिशा में दोष उत्पन्न होते हैं, वहां वाद – विवाद और संबंध बिगड़ने की संख्या अधिक होती है।
       वास्तु का मध्य भाग ब्रह्म तत्व कहलाता है। यह स्थान आकाश तत्व का माना जाता है। आकाश में कई ग्रह, तारे हैं। इन्हे स्वयं में समाहित करने और एकत्रित रखने का कार्य आकाश करता है। यह स्थान पूर्ण रूप से खुला और वजन रहित होना चाहिये। इससे वास्तु के सभी घटक एक – दूसरे से अच्छी तरह से बंधे रह सकते हैं। आकाश तत्व भव्यता, प्रगल्भता का द्योतक है। सभी को एक सूत्र में बांधना अर्थात नेतृत्व करना ब्रह्म तत्व से प्राप्त होती है।
      इस संपूर्ण विवेचना का सारांश यह है कि प्रगति, समाधान, संपन्नता, सात्विकता, बौद्धिक – मानसिक – शारीरिक संतुलन, गतिमानता, स्थिरता, आत्’विश्वास, निर्णय क्षमता, नेतृत्व, प्रभुत्व, संवाद कुशलता, संबंधों को मधुर बनाने की विशेषता, प्रगल्भता, परिपक्वता इत्यादि सभी गुण एकत्रित प्राप्त होने पर निश्चित ही व्यक्तित्व का विकास होता है और व्यक्ति जीवन में यश और कीर्ति प्राप्त करता है।

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