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  *** राजेंद्र परदेसी ***

      उसका नाम क्या था, मुझे मालूम नहीं, क्योंकि उसका नाम लेकर पुकारते नहीं कभी किसी को सुना था। वैसे किसको फुरसत है जो दूसरे के बारे में जानने का प्रयास करे, उसके प्रति सहानुभूति दर्शाये। पीठ पीछे आलोचना करने का भी एक अलग मजा है।
      कुछ लोग उसे पागल कहते और उसके पागलपन की कहानी भी अपने-अपने ढंग से गढ़कर, नमक-मिर्च मिलाकर सुनाते। पर मुझे ऐसे लोगों की बातों में कहीं कोई वजन, नजर न आता। कभी शंका होती कि आखिर लोग बाग उसके बारे में इतने विस्तार से कहां से जान गये। जबकि मैंने उसे कभी किसी से न तो बोलते देखा और न ही कुछ मांगते। वह कहां रहता था, कोई नहीं जानता था। यहां तक कि उसके पागलपन की कहानी बताने वालों को भी शायद उसके निवास का पता नहीं ज्ञात था।
     अचानक बिन बुलाये मेहमान की तरह किसी दिन मोहल्ले में दिखायी पड़ जाता, तो छोटे-छोटे बच्चे उसके पीछे, ‘मुरगी चोर!, मुरगी चोर!’ कहते लगे रहते। कभी-कभार कोई नटखट लड़का उसका कोई सामान पीछे से खींचने का प्रयास करता। जानते हुए कि यह सब उसे अच्छा नहीं लगता, फिर भी बच्चों के लिये वह एक मनोरंजन का साधन था।
     एक दिन बरामदे में बैठा समाचार पढ़ रहा था कि वह मेरे पास आकर बोला-‘प्यास लगी है!’
     इस बार के शब्द मुझे और मर्माहत करते हुए प्रतीत हुए। लगा, कोई अपनी वेदना उड़ेल रहा है। उसकी आवाज से मेरा बदन सिहर उठा। उत्तर देने में विलम्ब होने पर कहीं वह तीसरी बार उसी वेदना की तीव्रता से अपना शब्द न दुहराये, इसी आशंका से मैं बोल पड़ा- ‘बैठो! अभी मंगाता हूं पानी।’
      उसने मेरी बात या तो सुनी नहीं थी, या मेरी तरह वह भी कुछ सोचने लगा था। इसीलिए मैंने ही पहलकर उसकी चेतना को वापस लाने के लिए कहा- ‘बैठ जाओ! पानी अभी मंगाता हूं’, इसी के साथ मैंने अपने बेटे आलोक को आवाज दी कि वह थोड़ी शक्कर और पानी लेता आये।
      फिर भी वह नहीं बैठा, मुझे हार कर तीसरी बार कहना पड़ा- ‘अरे बैठ जाओ!’ जैसे बैठने का अनुरोध करने के प्रत्युत्तर में उसने अपना मुख खोला हो, ‘सभी तो बैठे हैं, मैं भी बैठ जाऊं। कितना गूढ़ रहस्य समेटे थे उसके शब्द। आलोचना करके हम अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ बैठते। कठिनाइयों के मार्ग पर चलने के लिए सहभागी बनना नहीं चाहते, क्योंकि अपना हित ही सर्वोपरि है।
     आलोक आया, तो उसे देखकर चौंका और बोला- ‘पापा! यह तो मुरगी चोर है!’
      मैं कुछ कहता, उसके पहले ही वह सहज भाव से बोला, ‘बेटा! यहां तो सभी चोर हैं।’
      उसकी बातों को झेलने का सामर्थ्य मुझमें और नहीं था, लगता था वह जितनी बार बोलता है, उतनी बार कुछ-न-कुछ मेरे चेहरे का झूठा आवरण हटाने में सफल होता जाता है। हां आवरण, जिसे ओढ़कर ही हम अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करने का प्रयास कर रहे होते हैं।
      कितनी बार मैं स्वयं अपने कानों से आलोक के मुख से ‘मुरगी चोर’ शब्द सुन चुका था। लेकिन आज मुझे यह सम्बोधन अच्छा नहीं लगा। अत: उसे झिड़कते हुए बोला- ‘इस तरह की बातें नहीं कहते जी!’
      आलोक को आश्चर्य हो रहा था कि पापा को जाने आज क्या हो गया है जो मुझ पर ‘मुरगी चोर’ कहने से नाराज हो रहे हैं। सभी तो इसी सम्बोधन से इसे सम्बोधित करते हैं। मेरी झिड़की को वह सह नहीं पाया और जवाब में बोला- ‘पापा, सभी तो इसे ‘मुरगी चोर’ कहते हैं।’
      ‘अच्छा पानी पिलाओ और जाओ।’ आलोक का जवाब देना मुझे अच्छा न लगा, वह भी किसी गैर के सामने। इसीलिए कुछ कड़े शब्दों का प्रयोग करना पड़ा।
       पिता-पुत्र के वार्तालाप को वह सहज ढंग से सुन रहा था। जब मैंने आलोक को कड़े शब्द कहे तो वह बीच में पड़कर बोला, ‘साहब! चोर का भाई चोर ही होगा। ऐसे में बच्चे ने मुझे ‘मुरगी चोर’ कह दिया, तो क्या हुआ।’
      उसकी बातें सुनकर मुझे कहीं से यह न लगा कि वह पागल है। मुझे तो लगा कि निश्चय ही समय की मार से कहीं-न-कहीं पीड़ित वह अवश्य है। तभी तो ऐसी दार्शनिक सी बातें कर रहा हैं।
      अचानक उसका आना, बीच-बीच में संक्षिप्त टिप्पणी करना, फिर चुपचाप चला जाना मेरे लिए रहस्य ही बना रहा। क्योंकि बात करने के ढंग से वह मुझे असामान्य नहीं प्रतीत हो रहा था। फिर भी वह फटे-पुराने चीथड़ों को लपेटे घूमता रहता। बच्चों के मनोरंजन का साधन तो वह बना ही था।
      महीनों बीत गये। मेरा ध्यान अब उसकी ओर से हट गया था। दो-चार दिन तो उसके बारे में अनेक विचार आये, लेकिन इधर उसे भूल ही सा गया था। एक दिन लगभग बारह बजे दिन में पास की गली में बच्चों की आवाज सुनायी पड़ी। उसी से अनुमान लगाया कि वह आज फिर मुहल्ले में आया है। आवाज की तीव्रता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। इससे आभास हुआ कि वह इधर ही आ रहा है।
      देखा, लड़कों की टोली उसके पीछे-पीछे ‘मुरगी चोर! मुरगी चोर!’ की रट लगाये चल रही थी। यह सम्बोधन उसे क्यों मिला। उनमें से किसी को नहीं मालूम था। फिर भी उन्हें यह कहकर उसे सम्बोधित करने में आनंद आता था। वह आगे-आगे मंद गति से अपने में खोया चल रहा था। साथ ही अपने चीथड़े को इस तरह कसकर पकड़े था जैसे सच ही उसमें कोई मुरगी चुरा कर रखी हो। कभी-कभार पीछे मुड़कर देखता तो लड़के किसी अज्ञात भय से उससे दूर हो जाते।
      लड़कों के साथ वह मेरे मकान के पास आकर, मेरे गेट का फाटक खोलकर बरामदे में आ गया। लड़के वहीं बाहर गेट के पास खड़े रहे। अब उनकी आवाज शांत हो गयी थी, क्योंकि शायद उनके लिए यह एक नया अनुभव था। वे बड़ी उत्सुकता से दृश्य का अवलोकन कर रहे थे कि अब क्या होता है।
      मैं उसकी अगली हरकत की प्रतीक्षा कर रहा था कि वह मेरे पास ही जमीन पर बैठ गया और बोला, ‘कुछ खाने को मिलेगा।’
       मनुष्य को शायद यही स्थिति सामान्य से असामान्य बना देती है जिसमें वह अपनी पहचान खो देता है। पहली मुलाकात के बाद मैं कुछ सहज हो गया था। इसीलिए उसकी उपस्थिति से मुझे कोई असुविधा नहीं हुई। आवाज देकर आलोक को बुलाया।
       मेरे बुलाने पर आलोक बाहर आया और जैसे ही उसकी दृष्टि उस पर पड़ी ‘मुरगी’ शब्द ही कह पाया कि मेरी उपस्थिति का उसे आभास हुआ और शेष शब्द ‘चोर’ मुख में ही रह गया।
      उसे भी, शायद अब कुछ अस्वाभाविक नहीं लग रहा था। गेट के पास खड़े लड़के भी थोड़ी देर इंतजार करने के बाद वापस अपने घरों को चले गये। शायद अब उनकी उत्सुकता समाप्त हो गयी थी। भ्रम की दीवार के ढह जाने से दूरियां समाप्त हो गयी थीं।
      अब वह बच्चों के लिए मनोरंजन का साधन नहीं, मात्र भूखा भिखारी लग रहा था, जो मौजूदा व्यवस्था की देन था। …और मैं, मैं उनके लिये सहानुभूति का पात्र बन गया था।

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