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   ***नरेंद्र कोहली*** 

   

‘भारत के इतिहास में इतना सशक्त प्रधानमंत्री आज तक नहीं हुआ, जितने कि हमारे मनमोहन सिंह हैं।’ भोलाराम ने कहा।
‘क्या प्रमाण है?’
    ‘प्रमाण? क्या प्रमाण चाहिए तुम्हें? आज ही तो उनका अपना वक्तव्य आया है।’
    ‘यदि व्यक्ति का अपना ही वक्तव्य प्रमाण माना जा सकता, तो हमारे सारे राजनीतिक नेता सत्य और निर्मल आचरण के पुतले हैं। किसी के आचरण में कहीं कोई धब्बा है ही नहीं।’ रामलुभाया ने कहा, ‘कारागार में बन्द सारे अपराधी निरापराध हैं; पागलखाने में बन्द पागलों में से कोई पागल है ही नहीं। …और तो और पाकिस्तान के मन में भारत के विरुद्ध तनिक भी मैल नहीं है।’
     ‘तुम्हारे लिए उन लोगों के वक्तव्य और भारत के प्रधानमंत्री के वक्तव्य में कोई अन्तर ही नहीं है?’ भोलाराम बौखला गया, ‘तुमने उनका वक्तव्य पढ़ा भी है?’
     ‘पूरी तरह से पढ़ा है।’ रामलुभाया ने कहा, ‘मैं बहुत मजबूत प्रधानमंत्री हूं। बस मेरे वश में कुछ नहीं है। कोई मुझे पूछता नहीं है। कोई मुझे कुछ बताता नहीं है। कोई मेरी बात नहीं मानता।’
‘यह सब कब कहा उन्होंने?’
    ‘और क्या कहा है।’ रामलुभाया बोला, ‘गुवाहाटी से आ रही गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। प्रधानमंत्री ने रेल राज्यमंत्री को ओदश दिया कि वे दुर्घटना स्थल पर पहुंचे। राज्यमंत्री ने कहा, ‘मैं कोलकाता में हूं और यहीं प्रसन्न हूं। जनता की सेवा कर रहा हूं।’ जो शब्दों में नहीं कहा, वह यह है कि ‘तुम में साहस है, तो तुम असम चले जाओ। इस समय तो रेल मंत्रालय भी तुम्हारे ही पास है; और आसाम से चुनाव भी तुमने ही जीता है।’ मजबूत प्रधानमंत्री ही अपने मंत्री से ऐसा उत्तर सुनकर विचलित नहीं होता। दृढ़ता से मौन रह जाता है।’
     ‘तो और क्या करे प्रधानमंत्री? स्कूल मास्टर के समान बच्चों को दंडित करता फिरे?’ भोलाराम ने कहा।
    ‘नहीं स्कूल मास्टर के समान दंडित क्यों करे, मानीटर के समान शिकायत लेकर १० जनपथ चला जाए।’ रामलुभाया ने कहा।
‘देखो, मुझे ये सब बातें अच्छी नहीं लगतीं।’
‘क्या?’ रामलुभाया ने पूछा।
‘तुम लोग एक भले आदमी को बदनाम करते रहते हो।’ भोलाराम बोला, ‘वे मजबूत हैं। मजबूत प्रधानमंत्री हैं। तुम मुझे बताओ कि आज तक कौन सा प्रधानमंत्री इतने आरोप झेल पाया है। किस प्रधानमंत्री के काल में इतने घपले हुए हैं? चोर बाजारी, काला बाजारी, काला धन, महंगाई… इतने धड़ल्ले से यह सब कब हुआ है? इतनी हत्याएं, डकैतियां और बलात्कार कोई और प्रधानमंत्री करवा पाया कभी? किस प्रधानमंत्री में साहस हुआ कि वह कह सके कि बाबा रामदेव के साथ जो कुछ हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण था; किन्तु हम क्या करते? हमारे पास सौभाग्यपूर्ण तो कुछ है ही नहीं। हम पड़ोसियों से पिटते रहते हैं और अपनी निहत्थी जनता को पीटते रहते हैं। है किसी और प्रधानमंत्री में इतना साहस कि यह सब करे और फिर भी निर्लज्जता से अपनी कुर्सी पर बैठा रहे।’
‘बात तो तुम्हारी पक्की है भोलाराम।’ रामलुभाया सहमत होता गया, ‘मैंने तो कभी ऐसे सोचा ही नहीं।’
‘तो सोचो न।’ भोलाराम बोला, ‘है किसी प्रधानमंत्री में साहस कि जिस आतंकवादी को उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदंड दे दिया हो, उसे वर्षों तक बचाये रखे और अन्तत: ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दे कि वह आतंकवादी छोड़ दिया जाये।’
‘नहीं। ऐसा कानून विरोधी काम कोई प्रधानमंत्री नहीं कर सकता।’ रामलुभाया ने कहा।
‘है कोई इतना मजबूत प्रधानमंत्री जो लालू के डाकू-राज को वर्षों तक टिकाये रखे? है कोई और जो एक सदस्यीय पार्टी वाले मधु कोडा को झारखंड का मुख्यमंत्री बनाये रखे?’
‘नहीं। इतना मजबूत तो कोई नहीं है।’ रामलुभाया को स्वीकार करना पड़ा।
भोलाराम मुस्कराया, ‘अब मत कहना कि मनमोहन सिंह कमजोर प्रधानमंत्री हैं।’
‘नहीं। कभी नहीं।’

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