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 ***आबा साहब पटवारी ***

  

समय था सन् १९६२ में ईशान्य भारत पर हुए चीनी आक्रमण का। अनपेक्षित रूप से हुए आक्रमण के कारण हिंदी-चीनी भाई-भाई का जाप करने वाली सरकार त्रस्त हो गई थी। गर्म वस्त्रों के अभाव में भारतीय सैनिक पुराने शस्त्रों के कड़ाके की ठंड में चीनी हमले का प्रतिकार करने के लिए प्राणों की बाजी लगाकर तैयार खड़े थे, परंतु दुर्भाग्य यह था कि उनके वरिष्ठ अधिकारी इस परिस्थति में उनके साथ मजबूती से खड़े रहने कइ जगह सलाह मशविरे का बहाना बनाकर दिल्ली भाग गये। उनके साथ नहीं थे। ऐसे में कौन था जो उनका मनोबल बढ़ाता। ऐसे में कुछ राष्ट्र चिंतक लोग सैनिकों से मिलकर उन्हें प्रोत्साहित करने व हरसंभव मदद करने आगे आये जिसमें प्रमुख थे श्रीकांत जोशी। तेजपुर में संघ प्रचारक के रूप में कार्य करने वाले श्रीकांत जोशी ने वहां प्रत्यक्ष रूप से बहुत कार्य किया। इसी दौरान जब कोकण से पारिवारिक समारोह में शामिल होने का आग्रह और आवश्यकतारूपी पत्र उन्हें प्राप्त हुआ तो उन्होंने उपरोक्त वर्णन पत्र के जवाब में लिखा और समारोह में शामिल न होने की अपनी असमर्थतता जताई।
     २३ वर्ष की कोमल आयु श्रीकांतजी ने अपने परिजनों के क्रोध को सहन करके भारतीय जीवन बीमा निगम की नौकरी छोड़कर संघप्रचारक का आजीवन व्रत लिया। छोटी बहन सुधा के जन्म के दो माह बाद ही मां के देहावसान के कारण सभी भाई-बहनों की अलग-अलग रिश्तेदारों के घर रवानगी हो गयी। घर में सबसे बड़े होने के बावजूद अपने छोटे भाई-बहन की ओर ध्यान न देकर प्रचारक के रूप में कार्य करने की वजह से रिश्तेदार उनसे नाराज रहते थे। म्युनिसिपल बैंक में नौकरी करने के साथ-साथ शाम को के. सी. कॉलेज से पढ़ाई कर उन्होंने बी. ए. की उपाधि प्राप्त की। एल. आई. सी. में कार्यरत श्रीकांत जोशी से उनके परिजनों की काफी अपेक्षा थी, लेकिन मातृभूमि का आर्तनाद श्रीकांत जोशी के अंतकरण में स्थायी तौर पर स्थापित हो चुका था। उन्होंने नांदेड में संघ प्रचारक के रूप में कार्य शुरू किया।
     नांदेड जिले में श्रीकांत जोशी के आगमन से कार्यों को तेज गति मिली। एक दो वर्षों में ही नांदेड मे संघ शाखाओं का जाल सा बिछ गया। अपने संघ कार्यों के साथ-साथ उन्होंने पारिवारिक दायित्व का भी निर्वाह किया। एक प्रकार का खेद मन में होने के कारण वे सदैब दक्ष रहते थे। इसी दौरान उनकी बहन का विवाह तय हुआ। श्रीकांत जोशी पारिवारिक कर्तव्य को ध्यान में रखकर नांदेड से मुंबई आए। विवाह की सारी जिम्मेदारियों को स्वीकार करते हुए अत्यंत उत्साह से कार्यक्रम पूर्ण किया। उनके कार्यों की लगन देखकर उनके परिजनों के मन का रोष कम हो गया। विवाह समारोह खत्म हुआ। बहिन ससुराल रवाना हो गई और परिवार के कुछ वरिष्ठ सदस्य श्रीकान्त जोशी की पीठ थपथपाने के लिए उन्हें खोजने लगे। बहुत देर के बाद एक बंद कमरे के दरवाजे को ढकेल कर खोला गया तो वहां पर श्रीकांत जोशी अपने चेहरे को हथेलियों मे छिपाकर रो रहे थे। पूरे विवाह समारोह को कुशलता से पूरा करने वाला यह भाई अपनी बहिन की विदाई से विह्वल हो गया था।
     श्रीकांत जोशी की बहन सुधाताई ने अपने आंसू पोंछते हुए बताया कि ‘‘उनका मुझ पर विलक्षण स्नेह था। मुझे एक प्रसंग याद आता है। हम लोग उस समय रत्नागिरी में थे। भाईदूज पर उसका मुझसे मिलने आना निश्चित होता था। पर उस दिन कोकण में भारी तूफान आया था। बिजली के खंभे और बड़े-बड़े वृक्ष रास्तों पर गिर गए थे। ६ मील दूर एक खंबे तक ही वाहन आ सकते थे। इस तूफान से लोग परेशान हो गए थे, हर तरफ अफरा-तफरी मच गई थी। भगवान के कक्ष में दीपक तो जल रहा था, पर आसमान में गहरा अंधेरा छा गया था। ऐसे समय घर का दरवाजा किसी ने खटखटाया। दरवाजा खोला तो सामने श्रीकांत खड़ा था। मेरे मुंह से आश्चर्यजनक उद्बोधन निकला अरे! तुम यहां तक कैसे आये? इस पर श्रीकांत का जबाब था- ‘पैदल’। यह था बहिन के प्रति भाई का उत्कट प्रेम।
     श्रीकांत जोशी के साले प्राचार्य आठल्ये ने भी इसी तरह का एक प्रसंग सुनाया- ‘‘वह आपातकाल का समय था। भूमिगत रहकर काम करने की रणनीति बनाई गई थी। श्रीकांत जोशी को गिरफ्तार करने के लिए वारंट जारी हो चुका था और पहचान बतानेवाले को ५०००/- का ईनाम भी घोषित हुआ था। सब जगह उनकी तलाश हो रही थी। गुहागर में प्राचार्य पद पर कार्यरत रहते समय बड़ी मुश्किल से उनके बारे में कुछ खबर मिलती थी। एक रात को अचानक दाढ़ी बढ़ी हुई सूट-बूट पहने हुए एक व्यक्ति दरवाजे पर खड़ा दिखाई दिया। मन भयभीत हुआ। उस व्यक्ति ने दरवाजा बंद किया और जानी पहचानी आवाज में पुकारा। उसका रूप देखकर हम लोग चकित रह गए थे।
      ईशान्य भारत में देशद्रोही लोग कूटनीति र्क सहारे इस भूमि को भारत से अलग करने का मंसूबा बना रहे थे, लेकिन दिल्ली सरकार नींद से जाग नहीं रही थी। इस भूमि की पुकार सुनकर कुछ संघ प्रचारकों को भेजना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जरुरी प्रतीत हुआ और इस कार्य के लिए चार स्वयंसेवकों को नियुक्त किया गया। इसमें पूर्व सरसंघचालक सुदर्शनजी के साथ-साथ श्रीकांत जोशी का समावेश था। सुदर्शनजी तथा श्रीकांत जोशी को आसाम भेजा गया। निरंतर यात्रा तथा संपर्क की शृंखला बनाकर श्रीकांत जोशी ने संघ शाखाओं का जाल बनाया। इसके लिए उन्होंने असमिया और बंगाली भाषा को आत्मसात किया। गोहाटी में संघ कार्यालय स्थापित करने के लिए श्रीकांत जोशीने अथक परिश्रम किए। सम्पूर्ण ईशान्य भारत से संपर्क बना रहे और देशद्रोही कार्रवाहियों का पता चलता रहे इस दृष्टि से यंत्रणा निर्माण की।
     बाद में श्रीकांत जोशी को कई दायित्व दिये गये। पूर्व सरसंघचालक बाला साहब देवरस के निजी सहायक रहते हुए उन्होेंने व्यक्तिगत सेवा का आदर्श निर्माण किया। वे देवरस जी के आहार और औषधी का कुछ इस तरह खयाल रखते थे कि लोग उन्हें उनका डाक्टर समझने लगे।
      हिंदुस्थान समाचार और पत्रकारिता कल्याण न्यास से जुड़ा कार्य करते समय श्रीकांत जोशी के बहुआयामी तथा आत्मीयतापूर्ण कार्य करने की प्रवृत्ति का विशेष अनुभव हुआ। हिंदुस्थान समाचार को इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते समय बंद करना पड़ा था। उसे शुरू करने की जिम्मेदारी श्रीकांत जोशी को सौंपी गई थी। १९७५ में बंद हुई संस्था का पुर्नज्जीवित करते समय श्रीकांत जोशी उस समय के कार्यकर्ताओं को नहीं भूले। कर्मचारियों को भले ही भूल गये हों परंतु श्रीकांत जोशी ने सभी की बकाया राशि दिलाने की व्यवस्था की। जोशी ने पूरे भारत में भ्रमणकर हिंदुस्तान समाचार के नये कार्यालय खोले। आज यह देश की पहली ऐसी संस्था है जोे १५ स्थानीय भाषाओं में समाचार पहुँचा रहा हैं। इस संस्था में उन्होंने कभी भी पदाधिकारी न रहते हुए सदैव समन्वयक रहे।
     ग्राहक पंचायत के संदर्भ में देश में होने वाले कार्यों में सुसूत्रता लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य श्रीकांत जोशी ने किया है। पूंजीवादी व्यवस्था में ग्राहक राजा कहा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि उसको गुमराह किया जा रहा है। इसके लिए प्रभावी ग्राहक आन्दोलन तैयार करने में और ग्राहक पंचायत के माध्यम से संचालित किए जाने वाले कार्यों को श्रीकांत जोशी के कारण बल मिला।
     पत्रकारिता कल्याण न्यास श्रीकांत जोशी के चिंतन और देशभर की यात्रा के माध्यम से कार्यान्वित हुई संकल्पना है। इसके माध्यम से माननीय अटल बिहारी वाजपेयी की उपस्थिति में पहला पुरस्कार बापूराव लेले को राजधानी दिल्ली में प्रभावी पत्रकारिता के लिए और नवोदित कलाकारों का मार्गदर्शन करने के लिए दिया गया। इसके बाद प्रतिवर्ष रमाशंकर अग्निहोत्री, नीला उपाध्ये जैसे देश भर के वरिष्ठ पत्रकारों तथा पत्रकारिता क्षेत्र में कदम रखने वाले निर्भिक युवकों को देने की योजना श्रीकांत जोशी ने ही देश के अलग- अलग राज्यो में कार्यान्वित की ।
      यह प्रश्न उठता है कि इतना सब श्रीकांत जोशी कुशलतापूर्वक कैसे कर सके? श्रीकांत जोशी का सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व ही उसका सटिक उत्तर है। बचपन में किसी से मुकाबला करते समय जब उन्हें अपनी ताकत कम दिखाई दी तो उन्होंने नियमित बालोपासना करके सुदृढ़शरीर बनाया और मनोसामर्थ्य की भी उपासना की। कार्यक्रमों की अधिकता के बावजूद श्रीकांत जोशी को कभी थका हुआ या उनके चेहरे का स्मित हास्य खोया हुआ किसी कार्यकर्ता ने नहीं देखा। नागपुर के अंतिम कार्यक्रम के बाद मुंबई पहुंचने पर विश्रााम करने का आश्वासन उन्होंने सरसंघचालक मा. मोहनजी भागवत को दिया था, परंतु जो मंत्र ‘कार्यमग्नता ही जीवन होे….मृत्यु ही विश्रांति’ उन्होंने जीवन भर जपा उसे सत्य कर गये।

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