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एससी/एसटी एक्ट को कथित तौर पर शिथिल किए जाने के विरोध में 2 अप्रैल को दलित संगठनों के राष्ट्रव्यापी बंद के चलते कई राज्यों में जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ, जबकि कई जगह प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। इसमें कम-से-कम 11 लोगों की मौत हो गई और अनेक घायल हो गए। हिंसा में परिवर्तित इस विरोध प्रदर्शन में करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ। उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड समेत कई राज्यों में आगजनी, गोलीबारी, तोड़फोड़ और रेलगाड़ियां रोकने की खबरों के बीच कई राज्यों ने शैक्षणिक संस्थानों को बंद रखने का आदेश दिया, साथ ही संचार और रेल समेत परिवहन सेवाएं अस्थायी तौर पर रोक दी गईं। इस बंद का एक खौफनाक सच यह भी सामने आया है कि इसे प्रभावी और उग्र बनाने के लिए बाकायदा कुछ व्यक्तियों, संगठनों ने फंडिंग भी की थी, जैसा कि मध्य प्रदेश खुफिया विभाग का दावा है।

इस बवाल की जड़ में मामला इस प्रकार था। महाराष्ट्र में शिक्षा विभाग के स्टोर कीपर ने राज्य के तकनीकी शिक्षा निदेशक सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। स्टोर कीपर ने शिकायत में आरोप लगाया था कि महाजन ने अपने अधीनस्थ उन दो अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी है, जिन्होंने उसकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में जातिसूचक टिप्पणी की थी। पुलिस ने जब दोनों आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उनके वरिष्ठ अधिकारी महाजन से इजाजत मांगी, तो वह नहीं दी गई। इस पर पुलिस ने महाजन पर भी केस दर्ज कर लिया। महाजन का तर्क था कि अगर किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के खिलाफ ईमानदार टिप्पणी करना अपराध हो जाएगा तो इससे काम करना मुश्किल हो जाएगा। 5 मई 2017 को सुभाष काशीनाथ महाजन एफआईआर खारिज कराने हाईकोर्ट पहुंचे। पर हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया। महाजन ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इस पर शीर्ष अदालत ने 20 मार्च को उन पर एफआईआर हटाने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले के साथ आदेश दिया कि एससी/एसटी एक्ट में तत्काल गिरफ्तारी न की जाए। इस एक्ट के तहत दर्ज होनेवाले मामलों में अग्रिम जमानत मिले। पुलिस को 7 दिन में जांच करनी चाहिए। सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी/ नियुक्ति प्राधिकारी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती। इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। दलित संगठनों और विपक्ष ने केंद्र से रुख स्पष्ट करने को कहा। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की। दलित संगठनों का तर्क है कि 1989 का एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम कमजोर पड़ जाएगा। इस एक्ट के सेक्शन 18 के तहत ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है।

पिछले सालों में दलितों पर अत्याचारों के मामलों पर काबू के लिए सख्त कानून बने हैं। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989, 11 सितंबर 1989 को पारित हुआ, जिसे 30 जनवरी 1990 से जम्मू-कश्मीर छोड़ सारे भारत में लागू किया गया। यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है तथा वह व्यक्ति इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है। इस अधिनियम में 5 अध्याय एवं 23 धाराएं हैं। इस एक्ट का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और जनजातियों के व्यक्तियों के खिलाफ हो रहे अपराधों के लिए अपराध करने वाले को दंडित करना है। यह इन जातियों के पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार प्रदान करता है। इस कानून के तहत विशेष अदालतें बनाई जाती हैं जो ऐसे मामलों में तुरंत फैसलें लेती हैं। यह कानून इस वर्ग के सम्मान, स्वाभिमान, उत्थान एवं उनके हितों की रक्षा के लिए, उनके खिलाफ हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए है।

इस एक्ट के तहत आनेवाले अपराध अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के खिलाफ होनेवाले क्रूर और अपमानजनक अपराध, जैसे उनका सामाजिक बहिष्कार करना, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्य से व्यापार करने से इनकार करना, इस वर्ग के सदस्यों को काम ना देना या नौकरी पर ना रखना, शारीरिक चोट पहुंचाना, गैर कानूनी-ढंग से खेती काट लेना, खेती जोत लेना या उस भूमि पर कब्जा कर लेना, भीख मांगने के लिए मजबूर करना या बंधुआ मजदूर के रूप में रहने को विवश करना, मतदान नहीं देने देना या किसी खास उम्मीदवार को मतदान के लिए मजबूर करना, महिला का उसके इच्छा के विरूद्ध या बलपूर्वक यौन शोषण करना, उपयोग में लाए जाने वाले जलाशय या जल स्रोतों को गंदा कर देना अथवा अनुपयोगी बना देना, सार्वजनिक स्थानों पर जाने से रोकना, अपना मकान अथवा निवास स्थान छोड़ने पर मजबूर करना, इस अधिनियम में ऐसे 20 से अधिक कृत्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए हैं। इन अपराधों के लिए दोषी पाए जाने पर 6 महीने से लेकर 5 साल तक की सजा और जुर्माने तक का प्रावधान है। इसके साथ ही क्रूरतापूर्ण हत्या के अपराध के लिए मृत्युदण्ड की सजा का भी प्रावधान है। अगर कोई सरकारी कर्मचारी/अधिकारी जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं, अगर वह जानबूझकर इस अधिनियम के पालन करने में लापरवाही बरतता है तो उसे 6 माह से एक साल तक की सजा दी जा सकती है।

संविधान का अनुच्छेद 341, भारत के राष्ट्रपति को जातियों को अनुसूचित जातियों के रूप में अधिसूचित करने के लिए अधिकृत करता है। भारत का राष्ट्रपति संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से एक विशेष जाति को अनुसूचित जाति के रूप में सूचित करता है और संसद जाति को अनुसूची में शामिल करने के लिए प्रख्यापित करती है। 1950 से 1978 तक राष्ट्रपति के विभिन्न आदेशों से देश के विभिन्न भागों में अनुसूचित जातियों की वैधानिक सूचियों को अधिसूचित, संशोधित किया गया (वर्तमान में 1231 जातियों को अनुसूचित जातियों के रूप में अनुसूची में संलग्न किया गया है)। भारत में समाज सुधारकों ने जातीय आधार पर भेदभाव के लिए किसी तर्कसंगत आधार की कमी के बारे में जागरूकता फैलाने की दिशा में लगातार काम किया है। इस तरह की जागरूकता ने शासन में ’दलित वर्गों’ के अधिकार के दावे को स्वीकार किया तथा यह गांधी और आंबेडकर के बीच 16 अगस्त, 1932 को पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करने के लिए जिम्मेदार था। इस पैक्ट ने शासन में ’दलित वर्गों’ के समान प्रतिनिधित्व और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के सुधार का रास्ता खोला। यह पैक्ट महत्वपूर्ण था क्योंकि बाद में यह संवैधानिक/विधायी सुरक्षा उपायों तथा अनुसूचित जाति के सामाजिक एकीकरण के लिए अन्य उपायों का आधार बन गया।

सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री सुखदेव थोरात (पुस्तक ’भारत में दलित’) के अनुसार, भारत के संविधान के अस्तित्व में आने से पहले भी अनुसूचित जातियों के एक समावेशी विकास के लिए कई कानून बनाए गए थे और विभिन्न उपायों की शुरूआत की गई थी। सरकार का अनुसूचित जाति के उत्थान की दिशा में दृष्टिकोण और हस्तक्षेप मुख्य रूप से दो प्रमुख विचारों पर आधारित हैं: पहला, अतीत में उपेक्षा के कारण अनुसूचित जातियों को विरासत में मिले अनेक बहिष्कारों पर काबू पाना, और जहां तक संभव, उन्हें समाज में दूसरों के साथ बराबरी पर लाना; दूसरा, वर्तमान में बहिष्कार और भेदभाव के खिलाफ संरक्षण के साथ देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं में उनकी प्रभावी भागीदारी को प्रोत्साहन प्रदान करना। इन लक्ष्यों तक, सरकार के दृष्टिकोण का मतलब द्विस्तरीय रणनीति, जिसमें भेदभाव-विरोधी या सुरक्षा उपायों, और विकास तथा सशक्तिकरण के उपायों को अपनाना था।

अस्पृश्यता अपराध अधिनियम, 1955 (1976 में नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम के रूप में नाम परिवर्तन हुआ) तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति प्रिवेंशन ऑफ एट्रासिटीज अधिनियम, 1989  भेदभावविरोधी उपायों को लागू करने में शामिल हैं। पूर्व के तहत सार्वजनिक स्थानों और सेवाओं में अस्पृश्यता और भेदभाव एक अपराध के रूप में माना जाता है; बाद वाला उच्च जातियों द्वारा हिंसा और अत्याचार के खिलाफ अनुसूचित जातियों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।

सरकारी सेवाओं, सरकारी और समर्थित शिक्षण संस्थानों और विभिन्न लोकतांत्रिक राजनीतिक निकायों में आरक्षण नीति भेदभाव-विरोधी या सुरक्षा उपायों का हिस्सा है। इन उपायों ने विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्रों में अनुसूचित जाति के लिए आनुपातिक भागीदारी सुनिश्चित की, अन्यथा जो बहिष्कार और भेदभाव के प्रसार की वजह से संभव नहीं होता। हालांकि, आरक्षण नीति का विस्तार और सीमा दोनों सरकारी और समर्थित क्षेत्रों तक ही सीमित है। संविधान के भाग तीन, चार, छह, चौदह, सोलह और उन्नीस में अनुसूचित जातियों से संबंधित विभिन्न प्रावधानों को समाहित किया गया है। ये प्रावधान भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों और अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए मंत्रियों की नियुक्तियों को रेखांकित करते हैं।

महाराष्ट्र में चल रहे मराठा समुदाय के आंदोलन की आड़ में दलित उत्पीड़न रोकथाम कानून की समीक्षा की बात कही जा रही है। मराठा समुदाय की मांग है कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री रामदास आठवले ने इसकी उपयोगिता और आवश्यकता जताते हुए कहा है कि वह दलित उत्पीड़न कानून को रद्द नहीं होने देंगे। वे कहते हैं, यदि आवश्यक संशोधन सुझाया गया, तो मंत्रालय निश्चित ही उस पर विचार करेगा। वहीं मराठा आंदोलन को अपना समर्थन देने वाले राकांपा मुखिया शरद पवार ने भी साफ किया है कि वह दलित उत्पीड़न कानून के खिलाफ नहीं बल्कि कानून के दुरुपयोग को रोके जाने के पक्ष में हैं। उन्होंने कहा, दलित इस कानून का दुरुपयोग नहीं करते बल्कि आपसी रंजिश के चलते सवर्ण ही एक दूसरे के खिलाफ किसी दलित का इस्तेमाल कर एट्रोसिटी एक्ट का दुरुपयोग करते हैं। जबकि दलित युवा अनिल जाधव कहते हैं कि दलित समुदाय के जो भी अपराधी हैं उनको कड़ी सजा दी जानी चाहिए लेकिन कुछ दलितों के अपराध के आधार पर कानून में बदलाव की बात करना उचित नहीं है। दलित समुदाय को लगता है कि इस कानून की जरूरत अभी भी है। इस कानून के सहारे उन्हें अपनी शिकायत दर्ज कराने में थोड़ी आसानी होती है। दलित उत्पीड़न के मामले को उजागर करने में यह कानून सहायक साबित हुआ है। एक ताजा प्रकरण संजय जाटव की बारात का है। संजय की शादी कासगंज जनपद के गांव निजामपुर में 20 अप्रैल को होनी तय हुई। संजय ने ऐलान किया कि वे अपनी बारात गांव के अंदर से घोड़ी पर बैठकर निकालेंगे। गांव में ठाकुर जाति के लोगों द्वारा आपत्ति की गई और गांव में ऐसी कोई परंपरा न होने का हवाला दिया गया। बारात में दलित युवक का घोड़ी चढ़कर बारात निकालने पर परंपरा का हवाला देकर रोक लगा दी गई। घोड़ी पर चढ़ना एक प्रतीक मात्र है। गुजरात में एक दलित की हत्या सिर्फ इस वजह से कर दी गई क्योंकि वह घोड़ी पर चढ़ा था। कासगंज में संजय लड़ गया। अब दलितों को अधिकारों का बोध है, इसीलिए संघर्ष हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट मामले में दायर केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की। बेंच ने कहा- हमने एससी/एसटी एक्ट के किसी भी प्रावधान को कमजोर नहीं किया है। लेकिन, इस एक्ट का इस्तेमाल बेगुनाहों को डराने के लिए नहीं किया जा सकता। जस्टिस ए के गोयल और जस्टिस यू यू ललित ने कहा, जो लोग विरोध कर रहे हैं, उन्होंने शायद फैसले को पूरी तरह नहीं पढ़ा है। कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए दूसरों को गुमराह किया है। हम एससी/एसटी एक्ट के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन किसी बेगुनाह को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या गलत कहा? लोगों को सचेत होना होगा कि क्षुद्र राजनीतिक हितों को भुनानेवाले कहीं वर्ग संघर्ष की आग में पूरे समाज को झोंक कर अपना उल्लू तो सीधा नहीं करना चाहते?

 

 

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