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**महेश अटले**
      

                                                           मनसुख भाई प्रजापति  

      प्रकृति सबसे बड़ी निर्माता भी है और नवनिर्माता भी। निर्माण का यह खेल प्रत्येक क्षण खेला जाता है। इस दुनिया में अभी तक लाखों लोगों ने जन्म लिया है और हर सेकेंड में लोग जन्म ले रहे हैं। परन्तु कोई भी एक-दूसरे जैसा नहीं है। यहां तक कि जुड़वां लोग भी किसी न किसी रूप में, चाहे वह आवाज हो, स्वभाव हो या अंगुलियों के निशान हों, भिन्न होते ही हैं। यह प्रतिक्षण होने वाला नवनिर्माण ही तो है।
      एक पेशीय जन्तुओं में उनकी आयु में कमी होने के कारण पीढ़ियों में परिवर्तन दिखायी देता है। ये जन्तु परिस्थिति के अनुसार स्वयं: में परिवर्तन करते रहते हैं और नवनिर्माण भी करते हैं।
        मानव भी प्रकृति का ही एक हिस्सा है। अत: प्रकृति के द्वारा मानव का और मानव के द्वारा प्रकृति का उपयोग किया जाना स्वाभाविक है। परन्तु इस उपयोग में समन्वय न हो, अगर मानव प्रकृति से आगे बढ़ना चाहे, तो इसे प्रकृति कभी स्वीकार नहीं करेगी। केवल एक ही झटके में प्रकृति तबाही मचा सकती है। इसकी एक झलक पिछले दशकों में आये भूकम्प और सुनामी ने दिखा दी है।
       आज मानव नये-नये शोध कार्य कर रहा है। परन्तु कई बार इन शोध कार्यों में पर्यावरण का विचार नहीं किया जाता। हालांकि प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल भी कुछ आविष्कार मानव ने किये हैं, जैसे संकरित बीज और कम पानी में खेती करना आदि। बीज रहित अंगूर का निर्माण करने में भी पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं है। हाइड़्रोपानिक्स से ड़्रिप इरिगेशन तक मानव ने जो भी आविष्कार किये उनसे प्रकृति को कोई नुकसान नहीं हुआ। बांबू (बांस) के घर से बने हुए घरों से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं है, परन्तु ऐसे उदाहरण अत्यल्प हैं। कई बार प्रकृति का ध्यान न रखते हुए ही आविष्कार किये जाते हैं। इसलिए इन सब खोजों के कारण पर्यावरण की प्रचण्ड हानि ही हुई है। सीमेंट और क्रंक्रीट के कारण प्रकृति में सीमेंट के जंगल खड़े हो रहे हैं। प्लास्टिक से लेकर मनुष्य के क्षणिक मनोरंजन के लिये छोड़े जाने वाले पटाखों तक, सभी ने पर्यावरण का विनाश ही किया है। तेज गति से आकाश में उड़कर सुंदर दृश्य प्रस्तुत करने वाले पटाखों में तेजी से नवनिर्माण हो रहा है। इसके कारण ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण होता ही है, साथ ही उस क्षेत्र की रात का नैसर्गिक चक्र भी बिगड़ जाता है। इस बात की न कोई कल्पना करता है न ही फिक्र। निशाचर पशु-पक्षियों का भी इस चक्र में महत्वपूर्ण योगदान होता है। बरगद, पीपल आदि अनेक वृक्षों के पुनरुत्पादन में निशाचर पक्षी जैसे-चमगादड़ बहुत मदद करते हैं। इन पटाखों के धमाके के कारण वृक्षों के साथ पक्षियों के प्रजनन पर भी विपरीत परिणाम होता है।
       हमारे देश में ऋषि-मुनियों की परम्परा रही है। महलों में रहने वाले और सभी सुख-सुविधाएं भोगने वाले राजा भी इन ऋषियों के सामने अपना शीश झुकाते थे, परन्तु ये ऋषि-मुनि जंगलों में, प्रकृति के समीप रहते थे। उन्होंने अपनी आवश्यकताओं को मर्यादित रखा था। उनके आसपास असंख्य प्राणी और पक्षी रहते थे। ये ऋषि भी बहुत बड़े संशोधक थे। उनके पास अस्त्र-शस्त्र विद्या का भंडार था, जिसमें उनके संशोधन सतत चलते रहते थे। उन्होेेंने कई शस्त्रों की खोज की थी। उन्हें डर था स्वार्थी मानवों से, दानवों से। मानव ही मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। अत: इन्हें ही दानव कहा जाता था। इन दानवों से प्रकृति का रक्षण करने का बीड़ा उन्होंने स्वत: ही उठाया था। जंगल की शेरनी का दूध वे सहज प्राप्त करते थे और उन्हें कई पक्षियों की भाषा भी ज्ञात थी। अकाल के निदान के रूप में उन्होंने पर्जन्य यज्ञ और पर्जन्यशास्त्र के शोध किये। आणिमा-गरिमा जैसी सिद्धियां भी उन्हें प्राप्त थीं। परन्तु उन्होंने प्रकृति के विरुद्ध कभी भी इसका उपयोग नहीं किया। उन्होंने प्रकृति के महत्व को समझ लिया था। अत: अन्य कोई भी भौतिक सुख देने वाली वस्तुओं की जगह प्रकृति का अंग माने जाने वाले मानव देह और मन पर ऋषियों ने ध्यान दिया। मन का शोध ही सबसे बड़ा शोध है।
      

                            आनंद भावे 

सूर्य सम्पूर्ण संसार को शक्ति प्रदान करता है। सूर्य से प्राप्त होने वाले फोटोन्स पर पूरा संसार जीवित रहता है। परन्तु हम सूर्य का आभार तक नहीं मानते। सूर्य नमस्कार तो दूर की बात है। अगर मानव के हाथ में होता, तो उसने सूर्य का एक टुकड़ा तोड़कर ही अपने पास रख लिया होता, जिससे प्रकृति को जय किया जा सके। हमारे देश की परम्परा में इसे प्रमुख ऊर्जा स्त्रोत के रूप में मानकर उसकी भक्ति और उपासना की जाती थी और आज भी की जाती है। विदेशों में विभिन्न प्रकार के त्वचा रोगों से पीड़ित लोग ‘सन बाथ’ (सूर्य स्नान) करते हैं। परन्तु अपनी ही अर्घ्य देने की परम्परा को निरुद्देशीय क्रिया समझकर उसका मजाक उड़ाया जाता है। शरीर का मुख्य आधार माना जाने वाला अस्थितंत्र कैल्शियम पर निर्भर करता है। आज का आधुनिक विज्ञान कहता है कि इस कैल्शियम के लिये विटामिन डी आवश्यक है। यह विटामिन डी मानव शरीर मुख्य रूप से सूर्य के प्रकाश से ही निर्माण करता है। सूर्य को अर्घ्य देने की प्रक्रिया में विटामिन डी का निर्माण होता है। इस विटामिन डी की खोज करने वाले संशोधक को शायद नोबेल पुरस्कार भी मिला हो, परन्तु उस सूर्य देवता को जिसने इसका निर्माण किया हम भूल गये। अत: किसी भी आधुनिक वैज्ञानिक और संशोधक की तुलना में ये ऋषि ही श्रेष्ठ हैं।
      आज के सभी वैज्ञानिकों, संशोधकों और नवनिर्माताओं को एक बात स्मरण रखनी चाहिये कि कोई भी खोज या निर्माण करते समय प्रकृति का ध्यान रखना चाहिये। ‘इको फ्रेंडली’ केवल चिन्ह के रूप में न रखकर उसे अनुसंधानों की आत्मा बनाना होगा। नवनिर्माण करना तब बहुत आसान हो जाता है, जब वह प्रकृति के विरुद्ध किया जाये। मनुष्य को मारने की सैकड़ों पद्धतियां हैं और ईजाद भी की जा सकती हैं। परन्तु आज भी अप्राकृतिक रूप से जन्म देने की पद्धति का अस्तित्व नहीं है। ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ जैसी कुछ बातें हैं। परन्तु गांव में और अत्यंत गरीब व्यक्ति भी कर सके ऐसी कोई तकनीक नहीं है। जो तकनीक है उसके भी सफल होने के प्रमाण कम ही हैं। निसर्गोपचार की पद्धतियों को अब लोग अपनाने लगे हैं, लेकिन इसमें कुछ लोगों का स्वार्थ निहित है।
       प्रकृति को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुंचा कर पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए कार्य करने वाले कई लोग हमारे देश में है। इन्हें न लोकप्रियता मिली न पैसा। आइये ऐसे कुछ शोधकर्ताओं के विषय में जानते हैं-
       मुंबई जैसे पर्यावरण शत्रु शहर में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो पर्यावरण का ध्यान रखकर नवनिर्माण कर रहे हैं। अंधेरी में रहने वाले और सरकारी नौकरी में कार्यरत आनंद भावे भी ऐसे ही ऋषि तुल्य व्यक्ति हैं। आनंद भावे सदैव पर्यावरण का ही विचार करते हैं। हम घर में लकड़ी से बने अलग-अलग फर्नीचर का उपयोग करते हैं। इनके कारण भले ही हमारा घर सुशोभित हो रहा हो, परन्तु पर्यावरण की हानि ही होती है। फिर इसका क्या उपयोग? इस प्रश्न पर चिन्तन करते-करते आनंद भावे को रद्दी पेपर और उसका पुनर्निर्माण की कल्पना आयी। नैसर्गिक गोंद का उपयोग करते हुए उन्होंने इस रद्दी से बच्चों के खिलौने, विद्यालय के बेंच से लेकर डायनिंग टेबल, आराम कुर्सी आदि कई वस्तुएं बनायीं। इस कार्य में उनकी पत्नी का भी भरपूर साथ मिला। इन फर्नीचर्स को उन्होंने प्राकृतिक रंग भी दिया। इनमें भी उन्होंने नयी-नयी संकल्पनाएं खोजीं। ऊंचाई में कम ज्यादा की जा सकने वाली कुर्सी, बच्चे भी उठा सकें और उन्हें चोट भी न लगे ऐसे सी-सा आदि आनंद भावे ने बनाये हैं। रद्दी कागजों से मजबूत रस्सियां भी बना सकते हैं। आज ऐसे व्यक्ति को सरकारी मान्यता मिलने की आवश्यकता है। क्योंकि उन्हें लोकप्रियता और पैसे की आवश्यकता भले ही न हो, परन्तु अपने समाज को उनकी और उनके कार्यों की आवश्यकता है।

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