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***राम नाईक (मा.राज्यपाल-उत्तर प्रदेश)****

              पिछले कई सालों से डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के महानिर्वाण दिन  अर्थात ६ दिसम्बर को चैत्यभूमि पर जाकर मैं उन्हें वंदन करता आया हूं। लेकिन, इस साल यह सिलसिला खंडित होनेवाला है। मैं उत्तर प्रदेश में हूं यह कारण तो है ही, परन्तु सच कारण यह है कि मुझे अकेले वहां जाना बड़ा कठिन लग रहा है। पहले से कुछ तय न होने के कारण ६ दिसम्बर की सुबह सुबह ही रमेश मेढेकर से दूरभाष पर बात होती थी। वे कहते थे कि ‘रामभाऊ! मुझे लगता है कि आप चैत्यभूमि पर फलां समय तक पहुंचे। आपके  लिए समय ठीक होगा या बदला जाए? रमेश की समय की पाबंदी और नियोजन पर पूरा भरोसा होने के कारण वह जिस वक्त बताए उसी वक्त मैं निकल पड़ता था। इस ६ दिसम्बर को भी चैत्यभूमि पर जाना था, रमेश मेढेकर के साथ, आंबेडकर जी को श्रद्धांजलि देने। परंतु अब उसके पहले ही दुर्भाग्य से रमेश मेढेकर को ही श्रद्धांजलि देनी पड़ रही है। मेरे पैरों को, रमेश को साथ न ले जाते हुए, चैत्यभूमि दिशा की ओर जाना बड़ा मुश्किल लग रहा है।  

            राजनैतिक, सामाजिक, जीवन में उम्र का अंतर होने के बाद भी सहकारियों को ‘तुम’ कहकर बुलाना मेरी आदत नहीं है। अनेक लोगों को मैंने न ही शुरूआत में ‘तुम’ कह कर पुकारा और न ही तब जब उनकी गणना भी प्रौढ़ों में होने लगी। यह मेरा स्वभाव नहीं है। रमेश मेढेकर इसका अपवाद है। रमेश का जन्म ७ अक्टूबर १९५२ को हुआ। उसे मैं उसकी उम्र के १९-२० साल से मैं देख रहा हूं। उसने स्वकर्तृत्व से समाज तथा राजनीति में बहुत बड़ा नाम कमाया। किन्तु कुछ बातों के लिए वह थोड़ा हठी था और हठी भी ऐसा कि उसके हठ को नकारना बड़ा मुश्किल हो जाता था। इसलिए ‘तुम’ कहकर पुकारने के उसके हठ को मैंने हमेशा पूरा किया। मुंबई जनसंघ का मुख्य कार्यालय दादर में था। १९७० के दशक में संगठन मंत्री होने के कारण हर रोज मेरा एक चक्कर दादर में लगता ही था। उसी समय दादर की एक चाल में रहने वाले उत्साही रमेश से मेरी मुलाकत हुई। पिताजी रेल्वे में और मां कपड़ा मिल में काम करती थी। पिछड़े वर्ग में जन्म लेने वाला किंतु समाज के हर व्यक्ति की नजरों में भरने वाला उनका बड़ा बेटा रमेश उस समय १९-२० साल का था। उसका राजनैतिक, सामाजिक, कामों की ओर स्वाभाविक झुकाव था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कट्टर स्वयंसेवक होने के कारण रमेश उत्साह से जनसंघ के कार्यालय में आता था। फिर सभी का इम्तहान लेनेवाला आपातकाल आया। उस समय भी निष्ठा से जनसंघ का काम करने की हिंमत दिखाने वाले मुंबई के कुछ नवयुवकों में से एक रमेश देखते-देखते ही पार्टी का प्रमुख कार्यकर्ता बन गया। केवल अकेले की ही नहीं, पूरे परिवार की प्रगति का निश्चय और उसके लिए लगातार कोशिश करने के साथ रमेश ने पार्टी का काम भी निरंतर किया और पार्टी में अपनी वह जगह बना ली कि किसी बड़ी सभा के आयोजन का पत्ता भी उसके बिना नहीं हिलता था।      

            गृहस्थी के लिए नौकरी यह सामान्य मराठी आदमी की प्रवृत्ति होती है। कम शिक्षा और अस्थिर अर्थिक स्थिति की परिस्थिति में रमेश ने उपजीविका के लिए कारोबार की शुरूआत की। हर काम व्यवस्थित ढ़ंग से करने और कल्पनशीलता आदि गुणों से रमेश ने कारोबार में बहुत जल्दी ही अपना नाम कमाया। उसका कारोबार अलग था। कापियों और किताबों को लगाए जाने वाले कवर का। रमेश का कारोबार ही दादर और मध्य मुंबई में उनकी पहचान थी। उसकी पहचान रमेश मेढेकर के बजाय रमेश कवरवाला के नाम से होने लगी। आगे चलकर कारोबार बदला फिर भी लोगों को जोड़े रखने के, उनके निरंतर संपर्क में रहने के गुणों के कारण उसका नवनीत प्रकाशन के श्री गाला जैसे उसके क्षेत्र के दिग्गज लोगों से सदैव स्नेह रहा। इस कारोबार की वजह से रमेश परिवार की प्रगति करने में सफल रहा। वह सिर्फ उसके भाइयों का ही नहीं, अनेक लोगों का ‘रमेश दादा’ बन गया।      

            रमेश पिछड़े हुए समाज से होने के कारण मुंबई में पार्टी को विशेष लाभ हुआ। इसलिए एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी के नाम से पहचानी जाने वाली धारावी, जहां जनसंघ शुरू भी नहीं हो सका था वहां पार्टी का स्थान मजबूत करने के मुश्किल काम को रमेश ने सफलतापूर्वक पूर्ण किया। उसके ऐसे ही गुणों के कारण १९९४ में जब महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार बनी तब रमेश को चर्मोद्योग महामंडल का अध्यक्ष पद दिया गया। वर्षों तक हानि सहने वाले महामंडल को लाभ की स्थिति में लाने का चमत्कार रमेश ने किया। इसके लिए उसने पूरे राज्य का दौरा किया। चर्मोद्योग महामंडल की ओर से बनाई जाने वाली वस्तुओं की वह ऐसी ‘मार्केटिंग’करता था जैसे कि वह उसका स्वयं का उद्योेग हो। उसके इसी उत्साहपूर्ण नेतृत्व की वजह से ही उस महामंडल को फिर से ऊर्जा प्रप्त हो सकी।  

            जगह की कमी की वजह से मुंबई के अनेक मध्यमवर्गीय  लोग शहर के मुख्य भाग से उपनगरों में रहने आते हैं। शुरू में दादर से खार में, फिर बाद में रमेश ने चारकोप-कांदिवली में रहने का निश्चय किया। उनके स्वभाव के अनुसार रमेश ने मुझसे मिलकर यह सारी सूचना दी।उसके शब्दों में ‘‘आपके निर्वाचन क्षेत्र में चारकोप आने का विचार है, इसलिए बता दिया।’’ रमेश चारकोप में आया और कुछ ही समय में उसने वहां अपनी गृहस्थी बसा ली। उत्तर मुंबई में भाजपा के कार्यक्रम रमेश की गैरमौजूदगी में नहीं हो पातेेे थे। धारावी में रमेश ने पार्टी को खड़ा किया, पर उसे वहां चुनावों में सफलता नहीं मिल सकी। परंतु चारकोपवासियों ने रमेश को अत्यधिक मतों से विजयी किया। राजनैतिक जीवन में व्यक्ति घर बदलते समय पहले यह विचार करता है कि इसकी वजह से उसका कार्यक्षेत्र बदल जाएगा। वह पिछड़ जाएगा। परंतु अल्पावधि में ही रमेश भाजपा उत्तर मुंबई का रमेश महत्वपूर्ण नेता बन गया। उत्तर मुंबई में पार्टी के कार्यकर्ताओं को अपना बनाते हुए रमेश ने संगठन की जिम्म्ेदारियां सहजतापूर्वक निभाईं। अनुसूचित जाति मोर्चा का वह राष्ट्रीय नेता बन गया। इस मोर्चे के केंद्रीय सचिव के रूप में उसने उत्तम कार्यभार निभाया।   

            ऐसा ही उत्तम कार्यभार उसने उपमहापौर के रूप में भी निभाया। अब तो वह जनप्रतिनिधि नहीं था। किन्तु फिर भी रमेश के घर में लोगों का आना जाना रहता था। उनके स्पष्ट बोलने के कारण लोगों को बुरा लगता, गुस्सा आताा, फिर भी वह सहकारियों को अपनासा लगता था। जिनके लिए वह मेहनत करता था ऐसे कार्यकर्ताओं का, मतदाताओं का उसके घर पर तांता लगना स्वाभाविक था। उसकी पत्नी सरोजभाभी और लड़की मुक्ता-श्वेता भी हर काम में आगे रहते थे। इसी कारण वह घर सबको अपनासा लगता था। उस प्रेम की वजह से ही सैंकडोंे कार्यकर्ता हर साल गणेश उत्सव में रमेश के घर जाते थे। लोगों को कई जगहों पर जाना होता है, इतनी जगहों का प्रसाद खाना मुमकिन नहीं होता। अत: प्रसाद के बंद पैकेट और साथ में पानी का बंद ग्लास। बडप्पन का लवलेश मात्र नहीं, किसी को भी बोझ न लगे ऐसा कम परन्तु सुंदर प्रसाद, ढ़ेर सारी बातें और गणेश दर्शन। स्वागत का यह तरीका सुंदर और सभी के लिए याद रखने वाला होता था।    

            हर काम को व्यवस्थित रूप से करना रमेश के रोम-रोम में बसा था। पार्टी की साप्ताहिक बैठक हो, शिवाजी पार्क पर अटलजी की भव्य सभा हो या बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स के मैदान पर मोदी जी का भाषण सुनने के लिए राज्यभर से आई हुई जनता हो। रमेश भाषण के बिंदुओं पर पहले विचार करता था फिर उसके अनुरूप बोलता था। मुझे तो ऐसा लगता है कि ऐसे कार्यक्रमों के  तैयार किए गए बिंदु उसने संभाल कररखे होंगे। उसका संग्रह किताब के रूप में प्रकाशित करना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए वह बहुत उपयोगी साबित होगी। जब कोई बड़ा कार्यक्रम पूर्ण हो जाता है तो जिनपर उस काम की जिम्मेदारी होती है वे चैन की सांस लेते हैं, श्रम परिहार करते हैं; परंतु अगर जिम्मेदारी रमेश पर होती तो वह सभी को आभार प्रदर्शन का एक छोटा से पत्र भेजता था। कार्यक्रम की सफलता का श्रेय सभी को देकर कमियों को खुद के नाम पर करने का बडप्पन दिखाता था। केवल इतना ही नहीं; कार्यक्रम में अगर कुछ कमी रह गई तो वह भी लिखकर रखता था। औपचारिक महाविद्यालयीन शिक्षा न होने के बावजूद उसके तैयारी के बिंदु ऐसे होते थे कि किसी व्यवस्थापन विशेषज्ञ को भी शर्म आ जाय।   

            इस व्यवस्थापन की वजह से ही एक ही वक्त में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी, अनुसूचित मोर्चा इनके साथ ही पर इससे भी बहुत अलग है सहकारी बैंक  क्षेत्र में, रूग्ण सेवा क्षेत्र में ही वह बहुत मेहनत करता था। डेक्कन मर्चंट सहकारी बैंक के संचालक मंडल पर वह काम करता था। मुंबई के मराठी व्यापार मंडल का भी वह महत्वपूर्ण कार्यकर्ता था। दादर के प्रसिध्द ‘शूश्रुषा‘ नामक सहकार पर आधारित अस्पताल का वह संचालक था। मेरा विश्वास है कि डॉक्टर न होकर भी अहम योगदान देने वाला संचालक शुश्रुषा को नहीं मिलेगा। केवल संस्था या पार्टी को ही नहीं वरन मेरे जैसे अनेक सहकारियों को रमेश की कमी महसूस होगी। निरंतर पढते रहने के कारण रमेश को अनेक विषयों की जानकारी थी, अगर ना भी हो तो वह उन्हें जानने के लिए उत्सुक  रहता था। जब हम अलग-अलग विषयों पर आंदोलन करते थे, तब निवेदन करने काम रमेश को ही सौंपा जाता था। वह काम भी रमेश उत्तम तरीके से करता था। स्वाभाविक तौर पर आगे भी उसे ही यह करना होता था और वह हर बार उत्साह से करता भी था।  बहुत से राजनैतिक कार्यकर्ता-नेता एक काम में पीछे रह जाते हैं। वह काम है लिखने का। उच्च शिक्षित होने के बावजूद एक सामान्य सी कार्यक्रम पत्रिका वे नहीं तैयार नहीं कर पाते। हजारों की सभा का व्यवस्थापन उत्साह से करने वाला इसमें पीछे क्यों रहता है यह समझना मुश्किल है। परंतु रमेश इसमें अव्वल था। उसे भाषा से भी बहुत प्रेम था। उसकी लिखावट भी बहुत सुंदर थी। किसी महत्वपूर्ण कार्यक्रम का समाचार तैयार करने का काम भी रमेश बड़े चाव से करता था। शुरूआत में मेरे चुनाव के समय और आगे चलकर भाजपा का जनसम्पर्क विभाग रमेश ने अच्छी तरह से सम्हाला। अध्ययन करने की वृत्ति के कारण उसे पत्रकारिता क्षेत्र में भी अनेक दोस्त मिल गए। किस तरह से नियोजन करने पर समाचार सबसे अच्छी तरह प्रकाशित हो सकता है इसका तंत्र उसने आत्मसात किया था। संगठन में सभी को उसका लाभ होता था। रमेश बड़ा नेता बन चुका था, फिर भी मैं कई बार उसे अपना समझकर अगर कोई काम सौंपता, तो वह बड़े प्यार से आनाकानी न करते उसे पूरा करता था।   

          

  उसके काम करने की पध्दति के कारण ‘व्यवस्थित मतलब रमेश और रमेश का मतलब व्यवस्थित’ इस पर सभी का एकमत था। रमेश के रहने का ढंग भी व्यवस्थित था। किन्तु यही रमेश चलते-चलते भी अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो जाता था। उसकी यह आदत पर हम सभी उसे खूब चिढ़ाते थे। चैत्यभूमि पर पुलिस की बंधी रस्सी में पैर फंसने से रमेश गिर गया और उसे काफी गहरी चोट पहुंची। हालांकि चोट काफी गहरी थी और उसे ठीक होने में भी काफी वक्त लगा परंतु अपने गिरने की घटना को रमेश खुद ही कुछ इस तरह सुनाता था कि सभी हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते थे। सामान्य रूप से बातूनी रमेश अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में कम ही बात करता था। कई बार तो समाधान हो जाने के बाद समस्या का पता चलता था। इस बारे में कई बार बताने के बावजूद भी रमेश शर्मीला और स्वाभिमानी ही रहा। इसी स्वभाव के कारण कोई यह कल्पना भी नहीं कर सका कि दो साल पहले ही साठ वर्ष पूर्ण करने वाला रमेश अचानक इतना बीमार हो जाएगा। 

      अक्टूबर में मुझे एक पुराणा विवरण चाहिए था। मैं उत्तर प्रदेश में था। रमेश को मैंने फोन किया, क्योंकि मुझे विश्वास था कि वही मुझे सही जानकारी दे सकता है। रमेश की आवाज सुनकर मैं चौंक गया। दो महीने पहले ही हम मिले थे। तब वह स्वस्थ था। उसके धीमे स्वर के बारे में पूछने पर उसने मुझे अपनी बीमारी के बारे में बताया और कहा कि अधिक जानकारी ‘सुश्रुषा’ के डॉ. नंदू लाड दे सकेंगे। उसे शायद यह समझ में आ गया था कि मुझे मुंबई के किसी भी सहकारी ने यह बात नहीं बताई, इसलिए मैं दु:खी हूं। रमेश ने तुरंत कहा कि, रामभाऊ किसी पर भी नाराज न हों। मैंने अभी तक किसी को नहीं बताया। आपका फोन आया। आपने मेरी अपनत्व से पूछताछ की इसलिए कह दिया। डॉ. लाड से बात करने पर पता चला कि रमेश का लीवर बहुत खराब हो चुका था, और लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उपाय था। उसके बाद  डॉक्टरों ने, घरवालों ने, सहकारियों ने, बहुत मेहनत की थी।     

            ट्रान्सप्लान्ट के लिए दाता भी मिल गए किन्तु रमेश की शारीरिक क्षमता ट्रान्सप्लान्ट सहन करने जैसी नहीं थी। आखिरकार रमेश की मुत्यु हो गई। किसी के यहां कोई बीमार पड़ जाए तो कौन सा डॉक्टर अच्छा होगा, कौन से अस्पताल के पास होंगे, कौन से सहकारी मदद के लिए आएंगे; इन सब की जानकारी रमेश को होती थी। जिसे भी मदद की जरूरत होती थी, वह स्वयं उसे मदद करता था। ऐसे रमेश की मदद के लिए सैकडों हाथ आगे आए। जैसे घर के अपने लोग थे, वैसे ही सहकारी, नेता इत्यादि भी थे। परन्तु सभी की मदद को अमान्य कर नियति ने रमेश को हमसे छीन लिया। उम्र में इतना छोटा सहकारी, जो मेरी आंखों के सामने तैयार हुआ, उसका २० नवम्बर २०१५ जाना मन को अंदर तक झकझोर गया। परन्तु अपने मन के घाव कभी-कभी ही दिखाने चाहिए। उन्हें अपने मन में ही समेट कर काम करते रहना चाहिए। रमेश की ही इस शिक्षा को लेकर अब आगे बढ़ना है।

 रमेश को आदरपूर्वक श्रध्दांजलि!

 

 

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