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****रमेश पतंगे****

   रामचंद्र गुहा का १० दिसम्बर के ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में                 ‘भागवत्स आंबेडकर’ याने ‘भागवत का आंबेडकर’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ है। इस लेख में लेखक ने बड़े दूर की का़ैडी नापी है। वह कैसे नापी इसका विवरण आगे लिखेंगे ही, लेकिन इसके पूर्व ये रामचंद्र गुहा महाशय कौन हैं, इसकी जानकारी पाठकों को देना जरूरी लगता है।

 अंग्रेजी अखबार एवं अंग्रेजी ग्रंथ आम तौर पर न पढ़ने वाले देशी भाषियों को रामचंद्र गुहा का नाम पता होने का कोई कारण नहीं है। भारत में दीर्घ काल तक काले अंग्रेजों का राज रहा है। काले अंग्रेजों का राज इसका अर्थ समझ लेना चाहिए। सत्ता पर काबिज लोग काले अंग्रेज थे, यहीं तक इसका अर्थ सीमित नहीं है। समाज सत्ता के अनेक अंग होते हैं, उनमें से बौद्धिक अंग राज्य की दण्डशक्ति जैसा ही महत्वपूर्ण होता है। बौद्धिक शक्ति, राजनीतिक शक्ति, सांस्कृतिक शक्ति मिल कर सत्ता का त्रिकोण तैयार होता है। इस सत्ता के त्रिकोण में जो लोग स्वाधीनता के बाद आए वे जन्म से भारतीय, परंतु विचारों से अंग्रेज थे यह कहने में कोई हर्ज नहीं है। उन्होंने भारत की ओर हमेशा अंग्रेजी चश्मे से ही देखा। इससे उन्हें भारत अधिक समझ में आया ही नहीं।

 इस सत्ता के त्रिकोण में जो लोग थे वे ‘एक दूसरे की सहायता कर सत्ता का उपभोग करने’ वाले पंथ के हिस्से थे। फलस्वरूप, जिनके हाथ में राजसत्ता आई, उन्होंने बौद्धिक क्षेत्र के, सांस्कृतिक क्षेत्र के अपने लोगों को बहुत बड़ा बना दिया। रामचंद्र गुहा का वर्णन ‘इतिहासकार’ के रूप में किया जाता है।

 सामाजिक, राजनीतिक एवं क्रिकेट हिस्टी के वे विशेषज्ञ हैं, यह बात उनके अंग्रेजी परिचय में पढ़ने को मिलती है। उन्होंने पुस्तकें भी लिखी हैं। उनमें से अंग्रेजी अखबारी दुनिया में सिर पर उठाई गई उनकी एक पुस्तक है ‘इंडिया आफ्टर गांधी’। दूसरी पुस्तक है ‘इंडिया फॉर गांधी’। उनकी शिक्षा देहरादून की दून स्कूल में हुई है। सेंट स्टीफन कॉलेज से उन्होंने डिग्री हासिल की। इनमें से किसी भी शिक्षा संस्था में भारत क्या है, इसकी शिक्षा नहीं दी जाती। वहां भारत को अंग्रेजी चश्मे से किस तरह देखा जाए इसकी शिक्षा अवश्य मिलती है। उन्हें पुरस्कार भी मिले हैं। पद्म पुरस्कारों में दूसरे क्रमांक का ‘पद्म विभूषण’ अलंकरण उन्हें मिला है। अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में वे अधिव्याख्याता के रूप में जाते हैं। इतनी सारी संपदा का उल्लेख करना हो तो उन्हें अंग्रेजी भाषा में ‘एमिनंट हिस्टोरियन’ संज्ञा दी जाती है।

   अपने महाराष्ट्र में वि.का.राजवाडे, ग.ह.खरे, नरहर पाठक, दत्तो वामन पोतदार, प्रा.शेजवलकर, दुर्गा भागवत जैसे ‘हिमालय की ऊंचाई’ के इतिहासकार हमें पता है। इतिहास लेखन कठिन काम है, और उसे करने के लिए प्रामाणिक इतिहासकार को अपना सम्पूर्ण जीवन उसमें लगा देना होता है। अतः उनकी पुस्तकें भी उस क्षेत्र में ‘मील का पत्थर’ साबित होती हैं। इनमें से किसी को भी पद्मविभूषण खिताब नहीं मिला है, क्योंकि वे काले अंग्रेज नहीं थे। वे जन्म से भारतीय, मन से भारतीय और प्रवृत्ति से भी भारतीय थे। सामाजिक दोषों पर उन्होंने भी ऐतिहासिक दृष्टि से कठोर सत्य विशद किए हैं, उनमें किसी तरह की राजनीति नहीं है। सत्ताधारियों के लिए अनुकूल तो बिल्कुल नहीं है।

 रामचंद गुहा का ऐतिहासिक ज्ञान कितना है, इसकी समीक्षा करने का ज्ञान फिलहाल मुझे नहीं होने से उस बारे में मैं कुछ नहीं लिखता, लेकिन उनका संघ के बारे में ज्ञान बालक मंदिर के बच्चे जितना भी नहीं है। इसलिए ‘इतिहासकार’ के रूप में उनकी प्रतिमा का विचार मुझ जैसे को बहुत गंभीरता से करना होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राष्ट्रपुरुष हैं, यह बात देशभर में प्रसारित करने का निर्णय किया है। उन्हें किसी एक जाति में बंदिस्त करना उन पर घोर अन्याय है, यह बात संघ प्रामाणिक रूप से मानता है। संघ अपनी पद्धति से काम करता है। संघ की पद्धति क्या है, इसकी रामचंद्र गुहा को शून्य जानकारी है। पिछले वर्ष डॉ. आंबेडकर विषय पर नागपुर में दो दिवसीय अखिल भारतीय स्तर की कार्यशाला हुई। इस कार्यशाला में संघ के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। इस कार्यशाला में संघ के सहसरकार्यवाह कृष्णगोपालजी उपस्थित थे। बाबासाहब के जीवन से सम्बंधित नौ विषयों पर चर्चा हुई। इस चर्चा पर बाद में ‘पांचजन्य’ एवं ‘आर्गनाइजर’ के विशेषांक निकले। संघ प्रमुख के रूप में मा. मोहनजी भागवत को इन सभी विषयों की जानकारी है। अतः गोवा में उन्होंने जो विचार रखे, वे उनकी व्यक्तिगत राय नहीं, अपितु संघ के विचार हैं। रामचंद्र गुहा को यह बात जान लेनी चाहिए थी।

 रामचंद्र गुहा कहते हैं, ’ढहळी रलज्ञपेुश्रशवसशाशपीं ेष आलशवज्ञरी’ी सीशरींपशीी लू ींहश डरपसह झरीर्ळींरी ळी लशश्ररींशव- रपव रश्रीे हूिेलीळींळलरश्र’ इसका अर्थ होता है, आंबेडकर की महानता को मान्यता देने का देरी से सूझा सयानापान, और वह मात्र ढोंग है। कोई भी इतिहासकार इस तरह की राजनीतिक भाषा में लेखन नहीं करता। आगे वे कहते हैं कि, ‘आंबेडकर की जीवितावस्था में संघ और संघ की संस्थाओं ने उनका जबरदस्त विरोध किया।’ यह विरोध किस तरह किया इसके सबूत देने चाहिए, वह न होने से गुहा ने फेकमफेकी का वाक्य फेंक भर दिया। १९४९ से ५१ के वर्ष गुहा ने संदर्भ के रूप में दिए हैं। इस काल में संघ विचार से काम करने वाली संस्थाओं का जन्म नहीं हुआ था, और वे कुछ कहने की स्थिति में भी नहीं थीं।

 १९५२ साल के भंडारा के चुनाव में दत्तोपंत ठेंगडी, पू. बाबासाहब के साथ काम कर रहे थे। उन्हें विजयी बनाने के लिए संघ स्वयंसेवकों ने जी-जान से परिश्रम किए। और यह सारा काम श्रीगुरुजी के निर्देश पर हो रहा था। इसकी विस्तृत जानकारी दत्तोपंत ठेंगडी के ‘सामाजिक क्रांतीची वाटचाल’ (सामाजिक क्रांति का मार्गक्रमण) ग्रंथ में मौजूद है। यह ग्रंथ हिंदी में भी प्रकाशित हुआ है। काले अंग्रेजी हिंदी नहीं पढ़ते होंगे, इसमें दोष किसका?

 रामचंद्र गुहा ने हिंदू कोड बिल का जो विरोध हुआ उसके बारे में अपनी ही एक पुस्तक का एक उद्धरण दिया है और कहा है कि संघ ने दिल्ली में रामलीला मैदान पर सभा आयोजित की। यह जानकारी उन्होंने कहां से खोजी, इसकी जानकारी देना उन्होंने टाल दिया है। श्रीगुरुजी के जीवन पर १२ खंड प्रकाशित हुए हैं। वे सभी भाषाओं में हैं। उनमें इस घटना का जिक्र नहीं है। हिंदू कोड बिल को संघ का विरोध होने का कोई कारण भी नहीं था। श्रीगुरुजी ने बार-बार कहा है कि, स्मृति (अर्थात हिंदू कानून) समय के साथ बदलती रही है। उस काल के अनुरूप नई स्मृति लिखी जाती है। स्मृति लिखते समय हिंदू धर्माचार्यों, ॠषि-तपस्वियों की सलाह लेना आवश्यक है। स्मृति लिखना राजनेता का काम नहीं है। अंग्रेजों के काल में हिंदू कोड बिल का विषय आरंभ हुआ। हमारी स्मृति लिखने वाले अंग्रेज कौन हैं? यह प्रश्न यदि पूछा गया तो इसमें गलत क्या है?

 रामचंद्र गुहा का संघ-अज्ञान इतना विशाल है कि, बालासाहब देवरस अपने वक्तव्य में हिंदू कौन है, यह समझाते ेथे। उस समय वे बाबासाहब आंबेडकर के हिंदू कोड का आधार लिया करते थे। यह कोड किसे लागू होगा, यह बताते समय बाबासाहब ने लिखा है कि, आर्य समाज, सनातनी, बौद्ध, जैन, सिख इन सभी को यह कोड लागू होगा। जिन्हें लागू नहीं होता ऐसा लगता है, वे वैसा अदालत में साबित करें। हिंदू की यह परिभाषा हमें मान्य है, यह बालासाहब बताया करते थे। रामचंद्र गुहा कहते हैं कि, ‘भागवत को उनका लिखा इतिहास पता है नहीं?’ वास्तव में प्रश्न भागवतजी का नहीं, गुहा को संघ का इतिहास पता है या नहीं, यह है।

 रामचन्द्र गुहा ने एक और कोज की है, वह यह कि संघ ने हिंदू कोड बिल का विरोध किया क्योंकि संघ स्त्री विरोधी है। उपरोक्त वर्णनानुसार गुहा का संघ ज्ञान ‘अति उत्तम’ है; यह उसी का परिचायक है।

 डॉ. हडगेवार के जीवन का एक प्रसंग है। नागपुर के पास आर्वी नामक स्थान पर रहने वाले गंगाधर पंत देशपांडे की भांजी का विवाह एक बूढ़े व्यक्ति के साथ हो रहा था। डॉ. उस लड़की को विवाह के दिन ही आर्वी लेकर आए और उसका विवाह योग्य युवक के साथ कराया। यह था संघ का स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण का इतिहास।

 आगे संघ के विचारों से प्ररित होकर ही राष्ट्र सेविका समिति का जन्म हुआ और अब स्त्रीशक्ति जागरण का देशव्यापी कार्य हो रहा है। उसके आसपास पहुंचने लायक कार्य कोई भी अन्य महिला संस्थाएं नहीं कर रही हैं। यह सब समझने के लिए इतिहासकार को सच्चा होना आवश्यक है।

 गुहा की दूसरी खोज है, संघ को गांधीजी का आरंभ से ही विरोध था। गुहा का संघ के प्रति ज्ञान विशाल होने से उन्हें डॉक्टरजी की जीवनी पढ़नी चाहिए। संघ की स्थापना के पूर्व, डॉ.हेडगेवार विदर्भ में कांग्रेस के पदाधिकारी थे। १९२० में नागपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में स्वयंसेवक दल का उन्होंने काम किया था। पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव प्रस्तुत करने की उनकी इच्छा थी। १९३० में वे सरसंघचालक थे। तब उन्होंने जंगल सत्याग्रह में भाग लिया था। अकोला की जेल में वे थे। कांग्रेस ने जब रावी के तट पर पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया तब सभी शाखाओं में उसका स्वागत करने का डॉक्टरजी ने आदेश दिया था। १९४२ के संघर्ष में भूमिगत हुए लोगों की हर तरह से सहायता स्वयंसेवकों ने की। महात्मा गांधी ने वर्धा के संघ शिविर को भेंट दी थी। डॉक्टर और उनमें संवाद हुआ था। महात्मा गांधी के विचार एवं विभिन्न समस्याओं के बारे में उनकी भूमिकाएं कुछ त्रिकालबाधित सत्य अथवा बाइबिल या कुरान के वचन नहीं थे। गांधीजी आप हम जैसे ही व्यक्ति थे। उनके विचार और अनेक भूमिकाएं काल की कसौटी पर सही साबित नहीं हुईं। अच्युतराव पटवर्धन ने कहा है कि, खिलाफत आंदोलन का समर्थन करना हिमालय जितनी बड़ी भूल थी। गुहा प्रामाणिक रूप से कितने गांधीभक्त है, यह मैं नहीं जानता। गांधी शाकाहारी थे, शराब को छूते तक नहीं थे, और साधन-शुचिता के बारे में बेहद आग्रही थे। गुहा कैसे हैं, यह वे ही हमें बताएं। गांधीजी का वैचारिक विरोध संघ की अपेक्षा स्वयं डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने ही अत्यंत प्रखर ढंग से किया है, और काल की कसौटी पर आज आंबेडकर सही साबित हो रहे हैं। अतः गुहा साहब, अनावश्यक गांधी-पुराण बखान करने का कोई कारण नहीं है।

 संघ ने गांधी विरोध का माहौल बनाया, यह काले अंग्रेज बुद्धिवादियों द्वारा देश में फैलाया गया एक भ्रम है। मूलतया किसी का द्वेष करना हिंदुओं का स्वभाव नहीं है। बहुसंख्य हिंदू इसे स्वीकार नहीं करते। हिंदू समाज में उग्र विचार रखने वाले कुछ लोग हैं। लेकिन उन्हें हिंदू समाज का प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता। विभाजन के संदर्भ में गुहा ने ८ दिसम्बर १९४७ की तिथि देकर स्वयं जो भाषण सुना वह दिया है। कोई भी इतिहासकार इस तरह के घटिया स्तर का प्रमाण स्वीकार नहीं करता। उसे सच्चा प्रमाण लगता है। श्रीगुरुजी का जो भाषण उन्होंने अपने लेख में दिया है, इस तरह की भाषा में श्रीगुरुजी कभी भाषण नहीं करते थे। उनकी भाषा धीरगंभीर और प्रौढ़ हुआ करती थी, उसे समझने के लिए उनके खंड पढ़े जाने चाहिए। उनके मुंह में फेकमफेकी की भाषा देने का कोई कारण नहीं है।

 भारत के मुसलमान एवं ईसाई भारत माता की ही संतान हैं, यह संघ की भूमिका है। उसे गुरुजी ने विस्तारपूर्वक रखा है। संघ का कहना केवल इतना ही है कि, मुसलमान या ईसाई अपने को क्या भारत माता की संतान मानते हैं? इस देश की परंपराएं, इतिहास, संस्कृति, जीवनमूल्य हमारे ही हैं, क्या यह यहां के मुसलमानों या ईसाइयों को लगता है? छत्रपति शिवाजी, राणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह और आधुनिक काल के सरदार पटेल, डॉ. आंबेडकर, विवेकानंद ये हमारे राष्ट्रपुरुष हैं, क्या ऐसा उन्हें लगता है? यह असली प्रश्न है। इतिहासकार गुहा को यह पता होना चाहिए कि एक राष्ट्र होने के लिए समान आकांक्षा, समान भावविश्व, समान आदर्श, समान जीवन मूल्य, समान शत्रु-मित्र भाव आवश्यक होता है। केवल हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई- हम सब भाई भाई, यह कह कर नहीं चलता। उसकी अनुभूति लेनी होती है। इसके लिए क्या करना होगा, यह डॉ. आंबेडकर ने विस्तारपूर्वक बताया है। इसलिए संघ को बाबासाहब प्रिय है। अर्थात संघ-अज्ञानी रामचंद्र गुहा के यह समझ में न आने वाली बात है।

 गुहा का संघ को उपदेश है कि, डॉ.हेडगेवार एवं श्रीगुरुजी की विरासत को उसे नकारना चाहिए। मोहन भागवत को उन्होंने यह सलाह दी है। उपदेश करना काले अंग्रेजों का काम ही है, लेकिन गुहा को मैं नम्रतापूर्वक बताना चाहता हूं कि, डॉ.हेडगेवार एवं श्रीगुरुजी की ऊंचाई आप नाप नहीं सकते। क्योंकि उनकी ऊंचाई नापने के लिए अपनी भी कुछ ऊंचाई होनी होती है। अंगूठे जैसा पिद्दी कैलाश पर्वत की ऊंचाई कैसे नाप सकेगा? आपका इतिहास लेखन चलने दीजिए, लेकिन संघ के बारे में लिखते समय, अध्ययन करें, गंभीरता से वाचन करें, संदर्भों को समझ लें और बाद में ही कलम उठाए। कलम तो सरस्वती का रूप होती है, आपको यह मान्य है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। लेकिन उसकी पवित्रता की रक्षा करें, यह न्यूनतम अपेक्षा है।

 

 मो.ः ९८६९२०६१०१

 

 

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