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संघ कार्य का महाराष्ट्र के बाहर पहला विस्तार पूर्वांचल में ही हुआ और काशी तथा देवरिया शाखाएं आरंभ हुईं। इस दृष्टि से संघ कार्य में पूर्वांचल का महत्वपूर्ण योगदान है।

             महाराष्ट्र से बाहर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य का विस्तार करने का विचार किया गया तब आरंभिक दिनों में जिन क्षेत्रों में शाखाएं प्रारंभ हुई उनमें पूर्वांचल अग्रणी है। प्रस्तुत है पूर्वांचल में प्रारंभ में संघ कार्य, कार्यकर्ता और शाखाओं की संक्षिप्त जानकारी।

 काशी शाखा

            सच पूछा जाए तो उत्तर प्रदेश में संघ कार्य की शुरुआत मा.भाऊराव के वहां जाने के बहुत पहले यानी १९३१ में ही हो चुकी थी। स्वातंत्र्यवीर सावरकर के बड़े भाई श्री बाबाराव सावरकर से डॉ. हेगडेवार के बड़े घनिष्ठ संबंध थे। वे डॉ. साहब से सदैव इस बात का आग्रह करते थे कि देश के विभिन्न भागों में संघ की शाखाएं प्रारम्भ कर संघ के कार्य का शीघ्र विस्तार करना चाहिए। १९३१ में श्री बाबाराव अपने उपचार के लिए काशी गए थे। वे अपने साथ डॉ.हेडगेवार को भी काशी ले गए थे। उन दिनों महाराष्ट्र की अनेक छोटी-छोटी रियासतों की ओर से काशी में पुजारी -प्रतिनिधि की नियुक्तियां की जाती थीं। काशी में तब भाऊराव दामले नामक एक हिन्दुत्वनिष्ठ विद्वान रहते थे। उन्हें अनेक रियासतों की ओर से प्रतिनिधि पुजारी नियुक्त किया गया था। श्री दामले हर एक -दो वर्ष नागपुर जाते थे। वे नागपुर के संघ कार्य से परिचित थे।

            भाऊराव दामले तथा बाबाराव के आग्रह तथा प्रयत्नों के कारण डॉ.साहब ने उत्तर प्रदेश की पहली शाखा काशी नगर में प्रारम्भ की। यह शाखा ब्रह्माघाट-दुर्गाघाट के पास स्थित धनधान्येश्वर मंदिर में आरंभ की गई थी। भाऊराव दामले को इस शाखा का कार्यवाह नियुक्त किया गया। यह शाखा अत्यंत अनियमित थी। कभी चलती थी तो कभी बंद हो जाती थी।

            उन दिनों पं. मदन मोहन मालवीय जैसे महर्षि काशी हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़े होने के कारण तरुण विद्यार्थी देश के सब भागों से वहां शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी आते थे। उनमें नागपुर तथा महाराष्ट्र से आने वाले विद्यार्थी बड़ी संख्या में होते थे। ऐसे विद्यार्थियों में संघ के स्वयंसेवक भी होते थे। पू.माधव सदाशिव गोळवलकर तब काशी विश्वविद्यालय में प्राणी शास्त्र के प्राध्यापक थे, पर तब तक उनका संघ से संबंध नहीं जुड़ा था। पू. मालवीयजी ने नागपुर में संघ के कार्यक्रम देखे थे और वे उससे बहुत प्रभावित हुए थे। इस बार डॉ. साहब से पुन: मिलने पर मालवीयजी ने उन्हें एक मैदान दिया। मैदान के एक कोने में संघ के कार्यालय के लिए दो कमरों तथा एक बरामदे की व्यवस्था भी थी। उस संम्पूर्ण क्षेत्र पर संघ का स्वामित्व था। कारण वह संघ को दान रूप में दिया गया था।

            डॉ. साहब १९३१ में ११ मार्च से १ अप्रैल तक यानी केवल तीन सप्ताह काशी में रहे, परन्तु इस अल्प अवधि में भी उन्होंने काशी में संघ की दो शाखाएं प्रारम्भ कीं। काशी विश्वविद्यालय में संघ की शाखा शुरू करने के पीछे डॉ. साहब का यह उद्देश्य था कि काशी विश्वविद्यालय में शिक्षा पाने के लिए सारे देश से आने वाले तरुणों का संघ से संपर्क बनेगा और उनके माध्यम से सारे देश में संघ कार्य का विस्तार किया जा सकेगा। मा. भैयाजी दाणी उन दिनों काशी विश्वविद्यालय में ही शिक्षा ग्रहण कर रहे थे और उनका विश्वविद्यालय शाखा के प्रारम्भ करने में महत्वपूर्ण योगदान था। उन्ही के प्रयत्नों से पू. गोळवलकर गुरुजी का संघ से संबंध जुड़ा। जब डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन काशी विश्वविद्यालय के कुलपति हुए तब उनका भी संघ से संबंध जुड़ा। एक दो बार वे संघ के कार्यक्रमों में भी उपस्थित रहे। १९४० के शीत शिविर का उद्घाटन भी कदाचित उन्हीं के हाथों हुआ था। १९४० के काल में डॉ. रोडे इस शाखा के कार्यवाह तथा डॉ.वर्मा संघचालक थे।

            काशी की तीसरी शाखा भी मा. भाऊराव के उत्तर प्रदेश में पहुंचने के पहले प्रारम्भ हुई थी। नागपुर के श्री बाबा साहब घटाटे का काशी में गोदौलिया पर एक पुरातन राम मंदिर है। श्री बाबा साहब ने १९३३ में नागपुर के श्री अण्णाजी वैद्य को इस मंदिर का व्यवस्थापक नियुक्त किया था। यह नियुक्ति डॉ.साहब की योजनानुसार की गई थी। श्री अण्णाजी वैद्य के सुपुत्र श्री वसंत वैद्य भी उनके साथ काशी गए थे। श्री वसंतजी संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक थे। उन्होंने विश्वविद्यालय शाखा के स्वयंसेवक श्री तात्या लोखंडे की सहायता से काशी नगर के मध्य भाग में स्थित सनातन धर्म हाईस्कूल में काशी की तीसरी शाखा प्रारम्भ की। १९४० में श्री भाउराव दामले इस शाखा के संघचालक थे।

          

  काशी में श्री दत्तराज कालिया (काळे) नामक एक अत्यंत धनवान व्यक्ति रहते थे। वे नागपुर के मूल निवासी थे। वे नागपुर के भोसले राजघराने के साहुकार थे। श्री कालिया और उनके भाई शाखा के नियमित स्वयंसेवक थे। कालियाजी का काशी में कमच्छा इलाके में एक बड़ा बंगला तथा बाग है। यह स्थान बाद में लगभग संघ के ही अधिकार में था। काशी आने पर पू.गुरुजी के रहने की व्यवस्था यहीं पर की जाती थी। श्री अण्णा पांढरीपांडे कुछ समय तक काशी के नगर कार्यवाह थे। उसी समय काशी के एक डेंटिस्ट डॉ. पी.के.बैनर्जी का संघ से संपर्क जुड़ा। बाद में वे अनेक वर्ष नगर कार्यवाह और उनके पश्चात संघचालक थे।

            १९४३ में काशी मा. भाऊराव का केंद्र स्थान बना। वे गोदौलिया में घटाटे राम मंदिर में रहते थे और काशी में काफी समय बिताते थे। काशी विश्वविद्यालय शाखा की ओर उनका विशेष ध्यान रहता था। उन्होंने विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों का एक ऐसा समूह बनाया जो संघ कार्य के लिए कहीं भी जाने को तत्पर रहता था। १९४६-४७ में लगभग ७० विद्यार्थी प्रचारक के नाते से संघ का काम करने के लिए निकल पड़े। इसी कारण अत्यंत थोड़े समय में संघ का कार्य उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले में पहुंचा। मा. भाऊराव का लोकसंग्रह कौशल्य, कार्यकर्ता की अचूक परख, तथा कार्यकर्ता के प्रति असीम आत्मीयता आदि गुणों के कारण ही यह हो सका।

 देवरिया शाखा

           

 देवरिया उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग का एक जिला स्थान है। यहां की शाखा १९४२ के आसपास शुरू हुई। यहां संघ का काम करने के लिए आने वाले पहले प्रचारक श्री भैयाजी सहस्त्रबुद्धे थे। यहां की शाखा भी भैयाजी ने ही शुरू की।

            देवरिया में शाखा प्रारंभ करने की दृष्टि से भैयाजी ने दो प्रकार के प्रयत्न किए। एक -वहां प्रतिष्ठित, हिंदुत्व प्रेमी लोगों से मिल कर उनसे संबंध बढ़ाना तथा उन्हें संघ के कार्य की जानकारी देना। इसके साथ-साथ रोज सायंकाल किसी निश्चित स्थान पर छोटे बालकों को एकत्रित कर उन्हें तरह-तरह के खेल, व्यायाम आदि सिखाने का काम करना। इसके अतिरिक्त वे बालकों को देश के महापुरुषों के बारे में रोचक तथा प्रेरक कहानियां भी सुनाते थे। वहां देश प्रेम के गीत भी गाए जाते थे। इन बातों के साथ बालकों को संघ के बारे में तात्विक बातें भी बताई जाती थीं और अत्यंत सरल ढंग से उन्हें संघ समझाने का प्रयास किया जाता था। धीरे धीरे बालकों के इस एकत्रीकरण ने ही संघ शाखा का रूप ले लिया और देवरिया में संघ का कार्य स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगा। १९४२ में लखनऊ में हुए संघ शिक्षावर्ग में देवरिया से तीन  स्वयंसेवक गए थे। उनके शिक्षित होने के बाद देवरिया शाखा शीघ्र ही स्वयंपूर्ण हो गई।

 साप्ताहिक विवेक प्रकाशित ‘‘राष्ट्रसाधना’’ ग्रंथ से साभार

 

 

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