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पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत में हुए शिवशक्ति संगम कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवत द्वारा दिए गए भाषण का सार प्रस्तुत है। पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के म्हालुंगी, नेरे और जांथे इन तीन गांवों की संयुक्त सीमा पर डॉ. आंबेडकर की १२५वीं जयंती पर्व के अवसर पर यह शिवशक्ति संगम सम्पन्न हुआ।

अनेक वर्षों के जाज्वल्य इतिहास वाले अपने देश के बारे में वस्तुस्थिति ऐसी है कि, कोई भी बाहर से आता है और हमें गुलाम बनाता है। उनकी संख्या कम होती है। सभ्यता एवं संस्कृति की मर्यादा भी कम हाती है। वे हजारों मील दूर से आते हैं। विपरीत परिस्थितियों में लड़ते हैं। हम नीतिसम्पन्न, बलसम्पन्न होते हुए भी पराजित होते हैं। यह बार-बार होता है। हूणों, कुशाणों से लेकर अंग्रेजों की गुलामी तक यह मालिका चल रही है।
आज का दिन समाज में सामाजिक समता का ध्वज उंचा कर एक आंदोलन खडा करने वाली महात्मा फुले की सह धर्मचारिणी क्रांतिजननी, लोकमाता, और स्त्री शिक्षा प्रारंभ करने वाली वीरपत्नी सवित्रबाई फुले का जन्मदिन है। शिवशक्ति इस शब्द के उच्चारण से ही शिवाजी महाराज की याद आना स्वाभाविक है। संपूर्ण देश का विचार करने वाले शायद पहले राजा के रूप में ही उनका हमें परिचय है। भले ही उनका राज्य इस भाग के कुछ जिलों तक सीमित था, फिर भी मानसरोवर से कावेरी के दक्षिण क्षेत्र तक स्वजनों का राज्य स्थापन होना चाहिए; यह उनका संकल्प था। केवल इस क्षेत्र में उनका राज्य होने के बावजूद उन्होंने नौसेना का गठन कर पश्चिम किनारा मुक्त कराया जिससे विदेशियों को समुद्र मार्ग से आक्रमण करना असंभव हो गया। राज्य धर्म न्याय नीति से चले यह आदर्श उन्होंने स्थापित किया। संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार कहते थे कि अपना संगठन व्यक्तिनिष्ठ न होकर तत्वनिष्ठ है। फिर भी यदि किसी व्यक्ति का आदर्श सामने रखना है तो छत्रपति शिवाजी महाराज को हृदय में स्थान देना होगा। संघ के छह उत्सवों में केवल एक ही उत्सव व्यक्तिनिष्ठ है और वह है शिवाजी महाराज का राज्यभिषेक दिन।
शिवशक्ति संगम के निमित्त आज हम यहां एकत्रित हुए हैं। शिव यह शब्द जैसे शिवाजी महाराज के लिए है वैसे ही यह शिवतत्व के लिए भी है। संसार में निर्माण होने वाला विष अर्थात हलाहल अपने कंठ में धारण करने वाला शिव याने नीलकंठ हमारा आराध्य है। यह शिव अर्थात शुभ, अस्तित्व में लाना है तो इसे शक्ति का साथ देना पड़ेगा। शिवशक्ति संगम के निमित्त हमें उसका महत्व समझना होगा। हम भले ही शिव के पूजक हों परंतु संसार शक्ति को ही पहचानता है। शक्ति के बिना सत्ता नहीं चलती, यह संसार का अनुभव है। संसार में जितने भी शासन चल रहे हैं वे सभी अच्छे हैं ऐसा नहीं है। परंतु ऐसा देखने में आता है कि शक्तिमान राष्ट्रों की गलत बातें भी चुपचाप स्वीकार कर ली जाती है एवं दुर्बल राष्ट्रों की अच्छी बातों की भी कोई कीमत नहीं होती। इस संदर्भ में यदि भारत का विचार करें तो भारतीय संस्कृति की विश्वभर में चर्चा है। पहले भी थी। उसे कोई कीमत नहीं देता था। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबल पुरस्कार मिलने पर जापान के विश्वविद्यालय में उनके कार्यक्रम में वहां के छात्रों ने आना इसीलिए अस्वीकार किया कि उनका व्यक्तित्व महान होने पर भी वे एक गुलाम देश के नागरिक हैं। गुलाम देश के व्यक्ति के उत्तम विचार भी सुनने की मन:स्थिति वे नहीं थे। इसका अर्थ यह है कि दुर्बल देश के सत्य को सुनने लायक भी कीमत नहीं होती। यदि इस दृष्टि से विचार करें; तो भारत स्वतंत्र होने के बाद उसकी प्रतिष्ठा कुछ बढ़ी। पिछले कुछ वर्षों में युध्दों में विजय मिलने के बाद वह और बढ़ी। परमाणु अस्त्रों से संपन्न होने पर और बढ़ी। लोकतंत्र पर प्रहार होने के बाद यहां की जनता उसकी रक्षा कर सकती है यह देखने के बाद और बढ़ी। इसका दिखाई देने वाला परिणाम यह है कि योग का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने का हमारा प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्रसंघ में एकमत से पारित हुआ और पूरे विश्व में उसके अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से स्वीकृति प्राप्त हुई। इस विषय में यह कहा जा सकता है कि जैसे देश की शक्ति बढ़ती है वैसे वैसे शासन की प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। यह विश्व का न्याय है। इसलिए शासन एवं सामर्थ्य की आवश्यकता है। एक सुभाषित है, जिसका अर्थ है कि देवता को बलि देते समय भी हाथी, शेर, घोडे की बलि नहीं दी जाती; बल्कि दुर्बल समझे जाने वाले बकरी के बच्चे की बलि दी जाती है। भगवान भी दुर्बलों का साथ नहीं देता। जिसके पास शक्ति है, भगवान भी उसी का साथ देता है। जिसके पास शक्ति है उसकी सब सुनते हैं। शेष यदि योग्य भी हैं तो भी उनके तरफ ध्यान नहीं दिया जाता।
विश्व में सत्ताधारियों का असत्य भी सामर्थ्यवान होता है। परंतु ऐसा यदि विश्व का नियम है तो भी हमारे यहां शक्ति के लिए कुछ सूत्र हैं। हमारे यहां सर्वशक्तिमान राजा की अपेक्षा तपश्चर्या करने वाले संन्यस्त साधु की प्रतिष्ठा अधिक होती है। हमारे यहां चारित्र को महत्व है इसके कारण शीलयुक्त शक्ति ही शक्ति मानी जाती है। शील के संबंध में सत्य का आग्रह हमेशा रहता है।
सत्य के सम्बंध में अपने यहां कहा जाता है कि जगत में जीव और जीवन के अनेक प्रकार होते हुए भी उनके अस्तित्व का बोध एक ही है और इसीलिए जो विविधता है उसका स्वीकार करना होगा। सब प्रकार की स्थितियों में समदृष्टि से रहना इसे ही योग कहा गया है। सत्य में भेद एवं विषमता को स्थान नहीं है यह ध्यान में रखना है। ऐसे सत्य में ‘मैं ऊंचा, वह नीच’ ऐसा मानने को कोई स्थान नहीं है। इसी का दूसरा अर्थ यह कि दूसरे की ओर सम दृष्टि से देखें। इस भूमिका को जब चारित्र्य की साथ मिलती है, तब उसका रूपांतरण सामाजिक शक्ति में होता है। कई प्रकार के भेदों में बंटा डुआ समाज कितना भी संपन्न, उज्ज्वल परंपराओं वाला एवं बलशाली हो तब भी उसका नाश होने में देर नहीं लगती। दूसरी तरफ एक दूसरे की चिंता करने वाला समाज यदि छोटा है, एवं साधन संपन्न भी नहीं है तब भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। इस संदर्भ में इजराइल का उदाहरण हमारे सामने हैं। दो हजार वर्ष तक इस यहूदी समाज को भारत छोड़ कर शेष सम्पूर्ण विश्व ने यातनाएं दीं। उसी मुट्ठीभर समाज ने अपनी मातृमूमि में अपना राष्ट्र स्थापित कर तीस वर्ष में छह युध्द जीते और रेगिस्तान में नंदनवन खड़ा किया। यह उदाहरण संकल्परत समरस समाज का है।
अपने संदर्भ में यदि इसका विचार किया तो स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान देश को समर्पित करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा कि हममेंे राजकीय, एकता आ गई है परंतु जब तक आर्थिक एवं सामाजिक एकता नही आती तब तक राजनीतिक एकता अधूरी है। पिछले एक हजार साल का हमारा पराधीनता का इतिहास यदि देखें तो ध्यान में आएगा कि किसी भी बाहरी आक्रमण ने स्वपराक्रम के आधार पर हमें नहीं जीता। हममें जो विभेद था उसके कारण कुछ लोगों ने दुश्मन से मिल कर यह देश चंादी की थाली में रखकर उन्हें भेंट किया। इससे एक बात ध्यान में आनी चाहिए कि यदि हम हमारे भेद भूल कर एक समाज के रूप में खड़े नहीं हो सके तो संविधान हमारी सुरक्षा नहीं कर पाएगा। इस विेषय में डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि पिछली अनेक पीढ़ियों से आ रहे भेदभाव को समाप्त कर फिर से आत्मीयता एवं परिश्रम से समाज को खड़ा करने की आवश्यकता है। इसके लिए सारा समाज मेरा है यह मानने का संस्कार जब हदयंगम होता है तब शोषणमुक्त समाज तैयार होता है।

स्वतंत्रता एवं समानता इन दोनों बंधनों को पालने वाला न्यायपूर्ण समाज यदि खड़ा करना है तो शिव और शक्ति की एकसाथ आराधना करनी होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना इसी के लिए हुई है। संघ संस्थापक डॉ.हेडगेवार उस समय चलने वाले देश कल्याण के प्रत्येक कार्य में सहभागी हुआ करते थे। उनका बचपन अतिशय प्रतिकूल परिस्थितियों में बीता। विषम परिस्थितियों में शिक्षा पूरी करनी पड़ी। फिर भी उस समय सामने आने वाले राष्ट्रीय कर्तव्यों का उन्होंने निर्वाह किया। स्वतंत्रता के प्रत्येक प्रयत्न में सहभागी हुए। जब तक देश का दु:ख दूर नहीं होता तब तक स्वयं के सुख का विचार करने का अधिकार नहीं है, ऐसा उन्होंने दृढ़ निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने सभी आंदोलनों में भाग लिया। क्रांतिकारी आंदोलन में वे थे ही। कानून तोड़ने के आंदोलन में भी उन्होंने दो बार जेल यात्रा की। उन्होंने स्वदेशी वस्तु भंडार चलाया। एक सहकारी बैंक, एक अखबार भी चलाया। गणेशोत्सव में प्रबोधन हेतु प्राप्त हर अवसर का लाभ उठाया। इसके माध्यम से उनका उस समय के सभी समकालीन लोगों से सम्पर्क हुआ। डॉ आंबेडकर से उनका अच्छा परिचय था। गांधीजी से उनकी विस्तृत चर्चा हुई थी। सावरकर बंधुओं से भी उनके अच्छे सम्बंध थे। मदन मोहन मालवीय जैसे सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों से भी उनके सम्बंध थे।
डॉक्टर जी के ध्यान में आया कि हम बार-बार जो गुलाम होते हैं उसके लिए हमारे शत्रु जिम्मेदार न होकर हम स्वयं हैं। हमारे बीच के भेद, वैमनस्यता का फायदा उठाकर विदेशी हम पर शासन करते हैं। हममें से ही कुछ लोग देशद्रोही होकर उनका साथ देते हैं। हमारे समाज की इन विकृतियों को, त्रुटियों को मिला कर यह देश मेरा है इस आत्मीय भाव से देश की ओर देखने वाले समाज का निर्माण करना यही समस्या का उत्तर है। ऊपर उल्लिखित सभी को यही लगता है ऐसा उनके ध्यान में आया। अपने देश की सभी विविधताओं को स्वीकार कर उनका आदरपूर्वक सम्मान करते हुए उन सब को एक सूत्र में बांधने का नाम है ‘हिंदुत्व’, यह अनुभव उन्होंने किया। ऊपर हमने कुछ समस्याओं का विचार किया है। परंतु हमारी जो मूल धारणा है वह इस सब का विचार कर आगे जाने वाली है। इस देश के ऋषिमुनी और महापुरूषों द्वारा स्थापित सनातन मूल्य हमारे जीवन का आधार है। यम- नियम के अधार पर सम्मानित जीवन जीना, आजूबाजू के प्रत्येक के सम्बंध में कृतज्ञता रखना ये बातें पीढ़ियों से और हजारों वर्षों से हमें बताने वाली हमारी संस्कृति है। हम भले ही अलग-अलग पार्टियों में विभक्त हों या अभी भी जातियाद हम पर हावी हो; फिर भी संस्कृति हम सबकी एक ही है। वही हिंदू संस्कृति है और वही हमारी पहचान है कि हिंदू संस्कृति मानने वालों की यह मातृभूमि है। सुबह उठने को बाद हम जमीन को भी ‘पादस्पर्शं क्षमस्व’ कहते हैं। यह संयम रखने की संस्कृति जिन्होंने पढ़ाई उनके विषय में हमारे मन में गौरव रहता है। उसी सूत्र के आधार पर समाज जोड़ने का लक्ष्य संघ ने रखा है। ऐसी संस्कृति की आज विश्व को आवश्यकता है। यह हम देख रहे हैं। दूसरी ओर, हम यह भी देख रहे हैं कि अपने मूल्यों के आधार पर विश्व को एक करने के सारे प्रयत्न निष्फल हो चुके हैं। इसलिए विश्व नए मार्ग की खोज में है। वे सारे भारत की ओर आशाभरी दृष्टि से निहार रहे हैं। सनातन मूल्यों के आधार पर समाज संगठन का कार्य संघ कर रहा है। किसी ने विरोध किया तो भी उसकी परवाह न करते हुए अपने को यह कार्य करना है। गत अनेक वर्षों से संघ इसी प्रवृत्ति से कार्य कर रहा है। इस देश को परमवैभव संपन्न करना, विश्वगुरु बनाना, इसके लिए ही अपना जीवन है यह भाव मन में दृढ़ करें।
इसी भाव के आधार व्यक्ति को राष्ट्रीय चारित्र्य सम्पन्न बनाना, नित्य के छोटे-छोटे कार्यक्रमों की रचना करना, शारीरिक बल हेतु व्यायाम इ. पर जोर देना एवं इन सब के माध्यम से संगठित समाज खड़ा करने का संकल्प संघ संस्थापक ने किया। इस संगठित समाज के आधार पर देश को परम वैभव के शिखर पर ले जाने का लक्ष्य सामने रखने पर सन १९२१ में विजयादशमी के दिन अपने कुछ थोड़े से सहयोगियों के साथ उन्होंने संघ की स्थापना की घोषणा की। आज का संघ का यह विशाल रूप उन्हीं की तपस्या का फल है। पूरे देश में पूरी शक्ति के साथ खड़ा हुआ संघ, मात्र यही संघ की पहचान नहीं है तो विश्व में, देश में, समाज में कहीं भी कोई दु:ख है, आपत्ति है तो स्वप्रेरणा से मदद हेतु दौड़ कर जाने वाले स्वयंसेवकों का संघ यह इसकी पहचान है। चाहे बाढ़ उत्तराखंड में हो या चेन्नई में, भूकंप या नेपाल में संकट आते ही संघ पहले से स्वत: के हितों का विचार छोड़ पूरे समाज को जाति-पंथ-पार्टी इ. से ऊपर उठ कर समाज सेवा करने वाला संघ है, यह उसकी पहचान है। यदि आज समाज में पूछा जाए तो समाज इस प्रकार के अनुभव बताता है। हमारे लिए यह सब गर्व करने का विषय नहीं है; परंतु हमारे किए गए कार्यों का यह फल है। उससे भी आगे जाकर अपने देश के उत्थान हेतु महापुरुषों द्वारा दिए गए निर्देशों को पूर्ण करने का यह संकल्प है। देशभक्ति का यह एकमात्र उपाय है। सामाजिक जागृति से देश की उन्नति होती है। शासन, उसके अधिकारियों के भरोसे देश नहीं बढ़ता। टिकाऊ सरकार के लिए समाज को तत्पर चाहिए और सरकार एवं नेताओं का बर्ताव अच्छा होने के लिए समाज जागृत होना चाहिए। समाज परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन यशस्वी होता है। प्रत्येक बस्ती में अच्छा बर्ताव करने वाले और सारे समाज को आत्मीय मानने वाले चारित्र्यसंपन्न व सतत परिश्रम करने वाले लोग हो तो उनके सामूहिक बर्ताव से जो वातावरण उत्पन्न होता है उससे समाज परिवर्तन होता है।
इस प्रेरणा से एक लाख के आसपास स्वयंसेवक यहां एकत्रित करना यह कोई वैभव प्रदर्शन का कार्यक्रम नहीं है। हमारा ऐसा मत है कि देश को आगे ले जाने वाला यह एकमात्र मार्ग है। हमारी अन्य भूमिका कुछ भी हो, यह लक्ष्य यशस्वी करने का उपाय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही है। संघ शक्ति बढ़ी है। इसलिए देश-विदेश से लोग आकर पूछते हैं, आपकी कार्यपूंजी क्या है? प्रत्येक को ऐसा लगता है कि यदि उसके परिवार को सुरक्षित रखना है तो यह देश सुरक्षित रहना चाहिए। मेरी गत प्रतिष्ठा कितनी की ऊंची क्यों हों परंतु यदि देश की प्रतिष्ठा नहीं है, तो मेरी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की भी कोई कीमत नहीं है। वह कभी भी खतरे में आ सकती है। इस कारण अपनी- अपनी जिम्मेदारियां संभालते हुए, थोड़ा परिश्रम करते हुए, आज जो शक्ति है उसके आधार पर समाज की सेवा की जा सकती है और यह शक्ति उत्तरोत्तर बढ़ाई जा सकती है, ऐसी योग्यता प्राप्त करने वाला यह संघ कार्य है। क्या करने से क्या होता है यह प्रत्यय दिखाने वाला संघ कार्य है। शिवशक्ति संग्राम के बारे में हमारी भूमिका हमने लोगों के सामने स्पष्ट की है। इसलिए बिना समाज गंवाये जिसको जितना काम संभव है ऐसे प्रत्यक्ष काम में सहभागी बनें। उसके लिए आवश्यक योग्यता प्राप्त कर उसके आधार पर सामाजिक कोई भी काम चुन कर उस काम में सक्रिय भाग लें, ऐसा मैं आवाहन करता हूं।

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