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**चित्रा जोशी**

१९३६ में वं. मौसी जी ने समाज स्थिति का अवलोकन कर राष्ट्र सेविका समिति की नींव रखी और महिलाओं का एक राष्ट्रव्यापी संगठन धीरे-धीरे संपूर्ण देश में कार्यरत हुआ। शाखा में तैयार हुई मानसिकता -हिंदू हिंदू मेरा अपना इस एकात्म भाव से अनेकविध सेवा प्रकल्पों के माध्यम से- कृतिरूप धारण करने लगी।
स्त्री समाज का एक सशक्त अंग है, ऐसी भारत की मान्यता है। अतः उसके विकास के बिना न घर का, न परिवार का, न समाज का विकास संभव है, यह भी स्वाभाविक है। यदि वह स्वयं ही अपने विकास की दिशा निश्चित करें तो सोने पर सुहागा। स्वामी विवेकांनद को किसी ने पूछा की विधवाओं के लिए क्या करना चाहिए। स्वामी जी ने कहा, ‘मैं क्या बताऊं? मैं विधवा थोड़े ही हूं। वे ही उसके बारे में बताएं।’ तात्पर्य यह है कि जिसकी समस्या है वही उस समस्या को सुलझाने का स्वयं प्राथमिकता से प्रयास करें, उसका प्रभाव विशेष होता है। १९३६ में वं. मौसी जी ने समाज स्थिति का अवलोकन कर राष्ट्र सेविका समिति की नींव रखी और महिलाओं का एक राष्ट्रव्यापी संगठन धीरे-धीरे संपूर्ण देश में कार्यरत हुआ। शाखा में तैयार हुई मानसिकता -हिंदू हिंदू मेरा अपना इस एकात्म भाव से अनेकविध सेवा प्रकल्पों के माध्यम से- कृतिरूप धारण करने लगी।
समाज बड़ा घर
समिति की द्वितीय प्रमुख संचालिका वं. ताई जी कहती थी- समाज अपना बड़ा घर है। अपने छोटे घर की हम चिंता करते हैं वैसे ही इस बड़े घर की चिंता करेंगे। घर के किसी व्यक्ति को क्या चाहिए, यह उसके बिना बताए भी हम समझ जाते हैं, वैसे ही समाज के बारे में होना चाहिए। इसी भावना से समिति के विविध सेवाकार्य शुरू हुए। इसमें सेवा छात्रावास विशेष है। पूर्वोत्तर की स्थिति ध्यान में रखते हुए उसके लिए विशेष प्रयास किए गए। सर्वप्रथम १९८४ में नागपुर में सेवा छात्रावास प्रारंभ हुआ। समिति कार्य का यह एक मील का पत्थर ही है। नागपुर का छात्रावास अर्थात् लघु रूप में भारत दर्शन ही है। ‘‘भिन्न भाषा, भिन्न पेहराव, फिर भी अपना एक देश’’ इसकी अनुभूति इस छात्रावास में होती है। पूर्वोत्तर के सात राज्यों के अलग-अलग बीस स्थानों की जनजाति की बालिकाएं यहां हैं। जनजातिनुसार उनकी भाषा, परिधान अलग है, परंतु इस बड़े परिवार में बड़े ही आनंद से यहां रहती हैं। पहली, दूसरी कक्षा में ही पढ़ने के लिए अपने घर से सैंकड़ों मील दूर आती है और उन्हें वेष, भाषा, भूषा, भोजन में सामंजस्य बिठाना पड़ता है। वहां उन्मुक्त वातावरण, यहां अनेक बंधन। फिर भी वह हंसती, खेलती, फुदकती है।
सर्वप्रथम १९८७ में अबोला, अलीम यहां आईं। सात- आठ वर्ष की थीं। उन्हें भाषा भी नहीं आती थी। न उस समय दूरभाष की व्यवस्था थी। थोड़ासा खाना खाकर उठ जाती तो हमारी ही आंखें छलछला जातीं। किसके पास अपनी बेटी रहती है- यह उनके मां-बाप को कुछ भी पता नहीं था। कितना कठिन- परंतु बेटी के भविष्य के लिए यह निश्चय उन्हें करना ही पड़ता। ग्रीष्मकालीन अवकाश के समय पहली बार इन छात्राओं को मा.श्रीकांत जी जोशी अपने साथ घर लेकर गए। उन्होंने बताया था जब वे गांव पहुंचेगीं तो सब ग्रामस्थ आकर इन्हें देखेंगे, सारे अंगांग ठीकठाक है या नहीं। हुआ भी वैसे ही; परंतु उनमें आया हुआ परिवर्तन वहां के लोगों के मन को स्पर्श कर गया और वे वापस आईं तो और दो बालिकाओं को लेकर ही।
इन सबमें रानी मां गाईदिनिल्यू की भी अहम् भूमिका है। अखिल भारतीय वनवासी कल्याणाश्रम-रायपुर छात्रावास की एक पूर्व छात्रा ने लिखा है- रानी मां भिलाई-रायपुर आई थीं तो हमें उनकी व्यवस्था में रखा था। रायपुर में हमारा मन नहीं लगता था, हम वापस जाने की सोच रहे थे। वह हमें समझाती थी कि यहां रहना है- सीखना है और वहां जाकर वहां के लोगों को यह सीखाना है। उन्हें प्राप्त कितने सारे उपहार उन्होंने हमें दिए ताकि हमारी मानसिकता रायपुर छात्रावास रहने की बने। रानी मां के कारण हमने अपना मन वहां लगाया और छात्राओं की आने की शृंखला वहां बनी रही, जो आज भी कायम है।
मैं भारत के अरुणाचल की हूं
छोटी-छोटी बातें भी संघर्षमय बन जाती हैं। आज
नागपुर छात्रावास को इक्कतीस वर्ष हुए हैं; परंतु छात्राएं बाहर गईं कि यें चीनी लोग आए – ऐसा सामान्यतः दुकानदार आदि सहजता से बोलते हैं। परंतु सुनने वाले समझदार को कभी-कभी यह बात चुभती है। अरुणाचल से आई हुई- गोमी छोटी ही थी। कक्षा द्वितीय में होगी- किसी ने उसे चिढ़ाया- चीनी, चीनी। उसने कहा- ‘‘अरे, चीन तो दूसरा देश है। मैं भारत के अरुणाचल की हूं, चीन की नहीं।’’
मैें सातों बेटियों को उन्हें देना चाहती हूं
दो-तीन वर्ष पूर्व मा. नितीन जी के आग्रह पर पत्रकारों की एक टीम नागपुर आई थी। देवी अहल्या मंदिर में उनकी भेंट निश्चित की गई थी। मा. सुनील जी देवधर उनके साथ थे। छात्राओं के साथ परिचय प्रश्नोत्तरी हुई। उस समय सुनील जी ने उनसे कहा, ‘‘आप स्वयं देखिए, पूछिए और सही लिखिए। अनेक बार प्रसार माध्यमों के कारण गलतङ्गहमियां होती हैं।’’ आगे उन्होंने बताया कि जब मैं मेघालय में प्रचारक था तब दो छात्राओं को यहां भेजा था। वल्ली और बीरुसनी। बीरुसनी की मां को सब कहने लगे, आपकी बालिका तो बेची गई। उसने कहा, ‘‘नहीं, सुनील जी ने छात्रावास में भेजा है। अरे, वे ऐसे ही कहते हैं, यहां के अखबारों में क्या हम नहीं पढ़ते कि ये लोग छात्रावास के बहाने ले जाकर उन्हें बेचते हैं।’’ जब कुछ दिन पश्चात् मैं उनके घर गया तब उन्होंने मुझे सभी बातें कहीं। मैंने उनसे कहा, ‘‘ चलो, आप ङ्गोन से उसके साथ बात कीजिए।’’ ङ्गोन से उनकी बीरुसनी से बात करवाई। बीरुसनी ने यहां के वातावरण के बारे में बताया। वे खुश हुई। परंतु उन्हें उकसाने वाले कहने लगे, ‘‘अरे, तुझे क्या पता? जब बीरुसनी के हाथ में ङ्गोन दिया होगा, तब उसके गले पर छुरी रख कर ऐसा बताने के लिए कहा होगा और इसलिए उसने ‘‘सब अच्छा है ऐसा आपको बताया।’’ उसके पश्चात वर्ष की भारत जोड़ो यात्रा में मैं बीरुसनी की मां को नागपुर लेकर आया। उन्होंने अपनी आंखों से सबकुछ देखा। उनका समाधान हुआ। वह बहुत आनंदित हुई। वहां जाने के पश्चात् लोग उनसे पूछने लगे, ‘‘बेचा न सुनील ने आपकी बेटी को।’’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘हां, उन्होंने इतने अच्छे स्थान पर मेरे बेटी को रखा है कि मैं मेरी सातों बेटियों को उन्हें सौंपना चाहती हूं।’’ आज बीरुसनी और उसका भाई दोनों अपने काम में लगे हुए हैंे।
ऐसा ही एक अनुभव कचुगाव का है। वहां पहली बार ही हमने मेडिकल कैम्प लगाया था। ३१०० लोग आए। दवाइयां कम पड़ गईं। उस समय एक महिला आई थी। डॉक्टर ने उसे दवाई दी। ङ्गिर तीसरी बार जब वह कतार में दिखाई दी, तब डॉक्टर ने उन्हें पूछा, ‘‘अरे, आप पहले भी तो दवाई लेकर गई हैंे।’’ उसने कहा, ‘‘ हां, पर मेरे १३ बच्चे हैं। उनमें से एक-दो की दवाई कल ली और दूसरों की आज ले रही हूं।’’ डॉक्टर देखते ही रह गए। मन में प्रश्न आया, एक बालक की दवाई दूसरों को दी तो क्या होगा? डॉक्टर मृदुला ने वहां की कुछ बहनों को परिवार नियोजन ऑपरेशन के बारे में काङ्गी समझाया, निकटवर्ती गोसाईगांव में व्यवस्था है, आपके स्वास्थ्य की दृष्टि से वह अच्छा है, परंतु वे तैयार नहीं थीं। वहां की आरोग्य सेविका भी उन्हें समझाती रही। एक डेढ़ वर्ष के पश्चात् उनमें से एक ने ऑपरेशन किया। उसे ऑपरेशन के कुछ माह पश्चात् सहजता से सभी काम करते हुए देख कर अन्य बहनों का साहस बढ़ा और वे एक दूसरों को ऑपरेशन लिए प्रोत्साहित करने लगीं।
चॉकलेट नहीं, खजूर खाएंगे
कचुगाव में चिकित्सा शिविर में बड़ी मात्रा में कुपोषण दिखाई दिया। हम लोग अपने साथ काफ ी मात्रा में खजूर लेकर गए थे। खजूर दिखाकर उसका स्वाद लेने के लिए कहा, परंतु खजूर खाने की चीज है इस पर उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था। कुछ लोगों ने हाथ में तो लिया पर फेंक दिया। यह खून की कमी को पूरा करता है यह बताने पर कुछ लोगों ने खजूर खा कर देखा। आज उस गांव में जब घर के बुजुर्ग बच्चों को कुछ चीज खाने के लिए पैसे देते हैं तब बताते हैं आप चॉकलेट नहीं लेना, खजूर खरीदना और खाना। इस कारण दुकानदार भी अपनी दुकान पर अब खजूर रखने लगे हैं।
ऐसी लागी लगन

तेजपुर के ‘मामू’ने आरोग्य सेविका प्रशिक्षण लिया। उसमें अत्यधिक सेवा भाव है। प्रशिक्षण के पश्चात वह तेजपुर में १० मील की परिधि में पैदल घूमकर दवाइयां देती हैं। एक बार उसने एक रुग्ण को दवाई दी। कुछ समय के बाद उसके मन में शंका निर्माण हुई कि वे ठीक तरह से दवाई ले पाएंगे या नहीं? अत: वह आठ किमी की दूरी पार कर उनके घर पहुंची। अपने सामने उन्हें दवाई दी। बहुत देर तक वहां रुकी। जब उसके मन को संतोष हुआ तब वह पैदल ही पैदल अपने घर लौटी। इन बहनों की यह तड़प, लगन के कारण ही रोगी शीघ्र ही ठीक होता है। दवाई के साथ ही बीमार के प्रति उनके सद्भाव, सदिच्छाएं परिणामकारक होती हैं और समिति कार्य का मार्ग प्रशस्त होता है।

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