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****वर्षा खराडे***

योग का हमारे जीवन से बहुत गहरा संबंध है। ऐसा कहा जाता है कि योग करने से मन को सुकून मिलता है। सुबह उठकर योग करने से हमारा शरीर मजबूत, सदृढ होता है। साथ ही सबसे महत्तवपूर्ण बात है कि हम दिनभर प्रसन्न, तरोताजा रहते है। ये विचार हैं योग का प्रशिक्षण देने वाली श्रीमती रेखा काले के। रेखा पुलिस विभाग में कार्यरत हैं।इनकी विशेषता यह है कि कैदियों को योग का प्रशिक्षण देती हैं और योग के माध्यम से उनकी आपराधिक मानसिकता बदलने का प्रयास करती हैं। प्रस्तुत हैं उनके साक्षात्कार के प्रमुख अंश-

पने बचपन एवं शिक्षा के विषय में कुछ बताएं? आपने इस क्षेत्र में आने का निर्णय क्यों लिया? इस सफलता के पीछे किसका योगदान रहा है?
सबसे प्रथम मैंने १९८८ में मुंबई विश्वविद्यालय से एल्एल्बी की पढ़ाई पूरी की। फिर १९९२ में रेकी प्रशिक्षक प्रशिक्षण पूरा किया।
इस योग क्षेत्र में आपने जो सफलता पाई है, उस पर निगाह डालते हैं, तो आपको कैसा महसूस होता है?
हर व्यक्ति का समाज के प्रति एक दायित्व होता है। कुछ लोग इसे समझते हैं, कुछ नहीं। मैं मानती हूं कि मन की शांति पाने के लिए लोग जो भी करते हैं, उसमें उन्हें एक वैज्ञानिक दृष्टि देने में मैं अपनी तरफ से सहयोग कर रही हूं।
एक योग शिक्षक के रूप में आपकी क्या भूमिका है?
योग से विचार सकारात्मक रख कर तनाव से दूर रहने में मदद मिलती है। योगका अर्थ केवल योगासन नही होता।
योग आध्यात्मिक प्रगति की पहली सीढ़ी है। इसके आठ अंग होते हैं। वे हैं-
१. यम २. नियम ३. आसन
४. प्राणायाम ५. प्रत्याहार ६. ध्यान
७. धारणा ८. समाधी।
योग के इन सभी अंगों का अभ्यास ही हमें रोजमर्रा के जीवन के तनाव से सही रूप से मुक्त रखता है। केवल आसन या ध्यान का अभ्यास व अनुभवों से हमें समस्याओ का सामना करने में नहीं बल्कि समस्या से दूर भागने में सक्षम करने का डर रहता है। इसीलिए योग का संपूर्ण अभ्यास आवश्यक है।
आप एक योग शिक्षक के साथ-साथ लेडी आफिसर, वकील, और पत्रकार भी हैं। इन सभी क्षेत्रों को आप कैसे संभाल पाती हैं?
मैं योग के अनेक अंग, तथा रेकी सिखाने के साथ-साथ कानूनी सलाह देना, मानसिक समस्याओ का समाधान करना, कानूनी शिक्षा महाविद्यालय में प्रदान करना, महिला दक्षता समिति, मुंबई पुलिस के लिए काम करके लोगों की मदद करना, आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक सलाह देना आदि अनेक कार्य करती हूं।
इसमें मेरे घर से बच्चों का पूरा सहयोग मिलता है। बच्चों और बहुओं के सहयोग से ही आज इतना सब मुमकिन हो रहा है। मेरी बड़ी बहू भी योग की प्रशिक्षक हैं।
आध्यात्मिक स्तर पर अष्टांग योग के साथ रेकी तथा अन्य कई प्रणालियां स्थापित करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है।
बिना संमोहन पूर्वजन्म का अनुभव कराना, सामान्य आंखों से किसी भी व्यक्ति की आभा देखने का प्रशिक्षण देना, मर्म बिंदु ओपन रेकी से उपचार करके बिना दवाई से कम से कम समय में दर्द से राहत दिलाने की कला का साक्षात्कार कराना, ऐसी कुछ बातें भी मैं साथ-साथ करती हूं।
इन सभी प्रणालीयों का अभ्यास करके मैं केवल यही कहूंगी कि, हमने हमेशा विनम्र रहकर जितना हो सके नेक और भला काम करते रहना चाहिए।

योग के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है? आज पूरे विश्व में योग प्रतिष्ठित होता जा रहा है, उस बारे में आप क्या कहेंगी? और योग के प्रति लोगों के क्या विचार है?
दुनिया को भागना आता है, और कुछ लोगों को दुनिया को भगाना आता है। इस प्रक्रिया में ज्यादातर लोग खुद से भागना सीखते हैं। ऐसे लोग शांत तो रहते हैं, पर सच्चाई से दूर होते हैं। मैं ऐसे मन को शांति देन ेमेँ विश्वास नहीं रखती। मैं अपनी संपूर्ण शास्त्रशुद्ध शिक्षा से आत्मबल बढ़ा कर लोगों को सक्षम मानसिकता प्रदान करती हूं।
आधुनिक समय में आम आदमी जिस मनःशांति को चाहता है, क्या वह शांति योग से मिल सकती है?
आज अंधानुकरण, इश्तहारबाजी और व्यापार हर जगह फैल रहा है, तो आध्यात्मिकता उससे कैसे बचेगी? मनःशांति बेचने के नाम पर आज कुछ भी बिक रहा है और खरीदा भी जा रहा है। ये चीजें शराब की तरह नशा देकर शांति का आभास तो कराती हैं, लेकिन असली शांति केवल शास्त्रीय पद्धति ही दे सकती है।

योग सिखाते वक्त आपको कौनसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा? क्या ऐसा कोई एकाध उदाहरण दे सकती हैं?
लोग इश्तहारबाजी के शिकार बनना पसंद करते हैं। जो इश्तहार करते हैं उनकी काबिलियत परखे बिना लोग उनके पीछे भागते हैं, और ठगे जाने पर इश्तहारबाजी से दूर रहने वालों पर शक करते हैं। इसके साथ ही, लोग हर चीज मुफ्त या सस्ती चाहते हैं। लोगों को दूसरों के समय की तो कद्र ही नहीं होती। इसीलिए शास्त्रीय योग का प्रशिक्षण देने मेँ कई दिक्कतें आती हैं।
योग क्षिक्षा शुरू करने के बाद से आपको कैदियों में किस तरह का परिवर्तन दिखाई देता है?
जेल के कैदियों पर मैंने काम नहीं किया। मैंने खुद के विचारों के कई कैदियों पर काम किया है। शास्त्रशुद्ध रेकी तथा शास्त्रशुद्ध अष्टांग योग का अभ्यास लोगों को खुद के विचारों के और अवास्तव भावनाओं के जंजाल की कैद से आसानी से बाहर निकाल कर उन्हें बेहतर इन्सान बनाता है।
आप जिस क्षेत्र में कार्यरत हैं, उसे मुख्यत: पुरूषों का क्षेत्र समझा जाता है। महिला होने के कारण आपको किन चुनौतियों को सामना करना पड़ता है?
जब मैं कोई भी काम करती हूं तो यह स्त्री का या पुरूष का क्षेत्र ऐसे विचार मेरे मन में ही नहीं आते। वैसे भी हमारे समाज के लोग महान हैं। किसी भी क्षेत्र में जब एक औरत कामयाब होने लगती है, तो इनके पेट में दर्द तो होना ही है। उसके बारे में क्या सोचना? ऐसे अनुभव तो हर कामयाब स्त्री के जीवन का एक अनिवार्य अंग है। यही लोग तो अनजाने में हमें और कामयाब होने की प्रेरणा देते हैं।
महिला होने के नाते इस विशेष शिक्षा पर आपका ध्यान कैसे गया और क्या आपको इसमें कोई बाधा आया?
मैं रेकी और योग आदि आध्यात्मिक चीजें सिखाती हूं, जो स्त्री या पुरूष कोई भी कर सकता है। लेकिन जो महिला रसोई के दायरे में ही उलझी रहती है, उसके लिए यह मुमकिन नहीं। मेरा तो बचपन से ही संस्कृत का और वेदों का तथा षड्दर्शन का अभ्यास रहा है। न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा तथा पुराण इन षड्दर्शनों का अंग है योग, जो संपूर्ण और शास्त्रशुद्ध है। आजकल योग के नाम पर जो आधा-अधूरा ज्ञान लोग खुद को महान बताते हुए देते हैं वह देख कर बहुत खेद जरूर होता है। ऐसे लोगों को सम्हालने की मेरी चाहत तो होती है, लेकिन वह खुद ही जब खुद को अधूरे ज्ञान के व्यापारियों की कैद में जकड़ लेतें हैं, तब भारी दिल से उन्हें अपने हाल पर छोड़ना पड़ता है। एक महिला और एक मां के लिए यही सबसे बड़ी बाधा है।
महिलाओं के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगी ?
सक्षम बनो। खुद पर विश्वास करो। इश्तहारबाजी की शिकार मत बनो। सब्जी चुनने में जैसे समय लेती हैं और ध्यान देती हैं, वैसे ही योग, रेकी तथा आध्यात्मिक गुरू चुनने मे सही परख करने की चुस्ती रखो।

मो  9820044254

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