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**** पल्लवी अनवेकर****

राजनीति में महिलाओं की सहभागिता बढ़ रही है, मगर जिस मात्रा में बढ़नी चाहिए थी, वैसी नहीं बढ़ी है। आज महिला किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है… महिला को भी भगवान ने वही बुद्धि दी है, वही काम करने की शक्ति दी हुई है, वही समझ दी है, जो एक पुरुष को दी है। महिला के साथ तो थोड़ी क्वालिटिज और जुड़ जाती हैं, क्योंकि वह घर-परिवार भी संभालती है। प्रबंधन, सहनशक्ति और समायोजन की उसमें गजब की शक्ति होती है, जो उसे राजनीति से लेकर हर क्षेत्र में ताकतवर बनाती है।

महाराष्ट्र के चिपलून शहर से अपनी जीवन यात्रा प्रारंभ करके इंदौर से होते हुए दिल्ली तक पहुंचने वाली सभी की आत्मीय ‘ताई’ अर्थात सुमित्रा महाजन। राजनीति की कोई भी पारिवारिक पृष्ठभूमि न होते हुए भी सुमित्रा महाजन आज देश के सर्वोच्च पदों में से एक लोकसभा के सभापति पद पर आसीन हैं। वे एक सशक्त महिला के रूप में जानी जाती हैं। प्रस्तुत लेख के माध्यम से उनकी अभी तक की जीवन यात्रा के कुछ पड़ावों पर प्रकाश ड़ाला गया है साथ ही महिलाओं से संबंधित कुछ प्रश्नों के उत्तर जानने की भी कोशिश की गई है।

चिपलून से इंदौर
सुमित्रा महाजन अपने पिता श्री पुरुषोत्तम(उर्ङ्गअप्पा) साठे से प्राप्त संस्कारों को अपने अंदर गहराई से संजोए हुए हैं। ये संस्कार ही उनके व्यक्तित्व विकास की नींव हैं। सुमित्रा जी ने चिपलून के यूनाइटेड इंग्लिश हाइस्कूल से शिक्षा प्राप्त की उनके सभी शिक्षक उनके पिता से परिचित थे। अत: सुमित्रा जी की शिक्षा पारिवारिक वातावरण में हुई। घर पर पिता का अनुशासन, समाज के विभिन्न स्तर के लोगों के साथ उनके सम्बंध, उनके व्यवहार से प्रगट होनेवाली देशभक्ति, सर्वसामान्य लोगों के प्रति निस्वार्थ प्रेम, संघ की प्रार्थना के ‘त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम’ का श्रद्धापूर्वक पालन करने की इच्छा आदि सभी को किशोरावस्था में ही सुमित्रा जी ने आत्मसात किया। अपने पिता के साथ बडे-बडे लोगों के भाषण सुनने जाना सुमित्रा जी को पसंद था। यहीं से उनकी वक्तृत्व कला का भी विकास हुआ। विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की कई भाषण प्रतियोगिताओं में उन्होंने प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। सुमित्रा जी की माता का अल्पायु में ही देहांत हो गया था तथा अचानक पिता के देहांत से सुमित्रा जी की शिक्षा तथा पालन-पोषण का प्रश्न सामने आ गया। चुंकि सुमित्रा जी के शिक्षक श्री मधु बरवे उनके पिता के अच्छे मित्र भी थे अत: सुमित्रा जी ने उन्हीं के यहां रहकर दसवीं तक की शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद उच्चशिक्षा के लिए वे मुंबई आईं। मुंबई में पढ़ाई के दौरान ही उनका विवाह इंदौर के वकील जयंत महाजन से हुआ और चिपलून की कन्या बहू बनकर इंदौर आ गई।

इंदौर से लोकसभा
मायके में पिता के माध्यम से सुमित्रा जी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार हुए और ससुराल में सासू मां के माध्यम से राष्ट्र सेविका समिति के। सुमित्रा जी अपनी सास के साथ समिति की शाखाओं और कार्यक्रमों में जाने लगीं। वे रामायण तथा महाभारत पर प्रवचन देती थीं। वकृत्व कला में तो वे पहले से ही निपुण थीं अब मराठी के साथ-साथ हिंदी पर भी उनकी अच्छी पकड़ हो गई। इसका सुपरिणाम उनकी राजनीतिक यात्रा पर हुआ।
सुमित्रा महाजन कहती हैं कि समाजसेवा के संस्कार तो उन्हें बचपन से ही मिले थे परंतु वे राजनीति में कदम रखेंगी यह उन्होंने नहीं सोचा था। उन्होंने सर्वप्रथम पार्षद पद का
चुनाव जीता। ङ्गिर वे इंदौर की उपमहापौर रहीं। इंदौर की जनता ने उन्हें बहुत सम्मान और प्रेम दिया। सर्वप्रथम उन्होंने मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत के गृहमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी के विरुद्ध चुनाव लड़ा था। चुनावी रैली में जब वे दोनों आमने सामने आए तो उम्र और तजुर्बे में बड़े होने के कारण सुमित्रा जी ने उनके पांव छूकर आशिर्वाद मांगा और वे विजयी हुईं भी। इसके बाद उन्होंने इंदौर से लगातार आठ बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और वे हर बार विजयी रहीं। उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी तथा लाल कृष्ण आडवानी जैसी ज्येष्ठ हस्तियों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। राजनीति में निरंतर आगे बढ़ते हुए वे आज लोकसभा की सभापति बन गईं हैं।

कार्यक्षेत्र और महिलाएं
राजनीति में

महिलाओं की स्थिति के बारे में वे कहती हैं कि मैं उससे संतुष्ट नहीं हूं। राजनीति में महिलाओं की सहभागिता बढ रही है, मगर जिस तरीके से बढनी चाहिए थी, वैसी नहीं बढ़ी है। राजनीति मेरा भी क्षेत्र हो सकता है, यह मानने में अभी भी महिलाएं पीछे रह जाती हैं।
घर तथा कार्यक्षेत्र के बीच तालमेल बिठाने के संदर्भ में वे अपना उदाहरण देते हुए कहती हैं कि एक बार सुषमा जी का दौरा था। मुझे कहा गया था कि आप उनके साथ दौरे पर रहेंगी। मध्यप्रदेश का ४-५ दिन का दौरा था। मुझे उनके साथ रहना था। मेरा बेटा उस समय ७-८ साल का था। उसने एक दिन पहले बोला था कि मां जाते समय लड्डू बनाकर जाना। मैंने हां कहा था, परंतु बनाना रह गया था। उसने ङ्गिर पूछा, तो मैंने कहा कि दादी बना देंगी। वह बोला कि नहीं, मुझे तो तुम्हारे ही हाथ के खाने हैं। ङ्गिर मुझे कहना पड़ा कि सुषमा जी १५ मिनट देर से निकलेंगे। मगर मैं लड्डू बनाकर निकली। हर महिला यह प्रयास करती है कि घर का काम भी संभालना है और कार्यक्षेत्र भी। उसके लिए मेहनत तो ज्यादा करनी ही पड़ती है।
इसमें दो बाते हैं। महिलाओं को चुनौती का सामना करना पड़ता है और महिलाएं खुद भी नहीं छोड़ पाती हैं। यह हम लोगों का स्वभाव है। हम स्वयं यह सोचते हैं कि सबको संतुष्ट रखें। इसलिए स्वयं को सिद्ध भी करते रहते हैं।
महिलाओं की आंतरिक शक्ति और ऊर्जा के बारे में वे कहती हैं कि वास्तव में महिलाओं में सहनशक्ति अत्यधिक होती है, साथ ही उनमें एड़जस्टमैंट की भावना भी होती है क्योंकि उनको शुरु से बताया जाता हैं कि अगर अपने घर जाओगी तो तुम्हें सबको खुश रखना पड़ेगा। २०-२२ साल तक किसी एक परिवार में रहने के बाद, अलग संस्कार, अलग व्यवहार में रहना शुरू करना एकदम से जैसे एक पेड़ को उखाड़कर दूसरी जगह लगाया जाता है, ङ्गिर उसमें उसको पनपना है, यह बहुत कठिन काम है। लेकिन महिला वह करती है क्योंकि उसमें आंतरिक शक्ति होती है। उसके पास सारे गुण हैं। वह जब समाज में काम करने के लिए निकलती है तो इसका ङ्गायदा उसको मिलता है। एक घर को सब प्रकार से मैनेज करना घर का बजट बनाने से लेकर उस बजट के अंदर घर को चलाना और सबको खुश रखना, इत्यादि सभी का मैनेजमेंट वह करती है तो उसका ङ्गायदा उसे बाहर काम करने में मिलता है। पॉलीटिक्स में तो आपको ये सब बहुत जरुरी होता है।
महिलाओं के लक्ष्य और उनके स्वप्नों के बारे में वे कहती हैं कि जो भी सपने देखना है, वह यथार्थ से जुड़े होने चाहिए। अपनी कैपेसिटी, अपने आस पास का वातावरण, माहौल भी निर्णायक होते हैं सपने पूरे करने में। सपने तो कोई भी देख सकता है कि में यह बनूं। सपने देखें भी तो उसकी पूर्ति के लिए हमें ही प्रयत्न करना है, कोई दूसरा आकर आपके सपने पूरा नहीं करेगा। मैं यह नहीं कहूंगी कि सपने मर्यादा में ही देखो। लेकिन अगर सपना हम देखते हैं तो उसकी पूर्ति भी हमें ही करनी है। उसको साकार करने के लिए मुझे ही मेहनत करनी है। यह समझकर हमें मेहनत करनी पड़ेगी, काम करना पड़ेगा। जैसे मैं बताऊं कि जब पहली बार सांसद बनी या मैंने जब राजनीति में शुरुआत की, तो कहीं न कहीं मै अन्याय के खिलाङ्ग लड़ने के लिए राजनीति में आई। उस समय इमरजेंसी के बाद मैंने राजनीति शुरु की, बल्कि एक प्रकार से इमरजेंसी के दौरान ही मैने राजनीति शुरु की। अन्याय नहीं होना चाहिए, मैं लडूंगी, मैं यह काम करके दिखाऊंगी और यह करते समय मुझे कुछ नहीं चाहिए। राजनीति अगर खराब हो गई है तो इस राजनीति को ठीक करने के लिए मैं केवल किनारे पर बैठकर यह नहीं कह सकती हूं कि राजनीति खराब हो गई हैं। प्रवाह में उतरकर जितना बने उतना इसे सा’ करने के लिए प्रयास करुं। यह मेरा सपना था, कि मैं साबित करूं कि राजनीति में ईमानदार भी हो सकते हैं। राजनीतिज्ञ मेहनत भी करते हैं और जितना बने उनता काम तो करते ही हैं। आज मैं यह कह सकती हूं कि जितना मैंने सोचा था, एक सपना देखा कहीं न कहीं कुछ अंशों में वह पूरा हो गया है। आज २५ साल राजनीति करने के बाद, अनेक पदों पर रहने के बाद एक ईमानदार की छवि तो पाई हूं। यह भी छवि बना पाई कि हां, राजनीतिज्ञ ईमानदार होते हैं और मेहनत भी करते हैं, कुछ करके दिखाते हैं। छवि में यह थोड़ा सा परिवर्तन आया है, ऐसा लगता हैं।
लोकसभा में ताई
हम अगर लोकसभा का कोई सत्र देखें तो वह किसी ऐसी कक्षा की तरह प्रतीत होता है जहां विद्यार्थी लगातार शोर मचाते रहते हैं और उस कक्षा की अध्यापिका कभी शांति से, कभी डांटकर तो कभी दंडात्मक कार्रवाही करके उन्हें नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं। कक्षा की अध्यापिका अर्थात लोकसभा की सभापति इस बारे में सुमित्रा महाजन कहती हैं कि यह कोई एकाध क्लास संभालने वाली बात नहीं है। लोक सभा में विभिन्न प्रदेशों से लोग आते हैं, विभिन्न प्रदेशों में भी भिन्न भिन्न भाषाओं के लोग हैं। पहले जब सदन चलता था तो जो सांसद बोलते थे, उनमें बहुत अच्छे-अच्छे और बड़े-बड़े लोग रहे हैं। उनकी आपस में जो चर्चाए होती थीं, वह बड़ी ही रोचक होती थीं। अब उसमें बदलाव आता जा रहा है। मराठी में ताई का अर्थ होता है बड़ी बहन। सुमित्रा जी से जब पूछा गया कि वे संसद के सदन में ‘ताई’ होने का कर्तव्य कैसे निभाती हैं तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि ताई काम होता है, प्रेम से समझाना और समय आया तो ड़ांटना भी। मगर ड़ांटना भी प्रेम से हो और सही बात के लिए हो तो मुझे लगता है कि उसे इसी रुप में लोग भी समझेंगे। मैं पूरी कोशिश करती हूं कि सबको बोलने का मौका मिले। अध्यक्ष बनने के बाद आए अनुभवों के बारे में पूछे जाने पर वे कहती हैं कि अध्यक्ष बनकर तो अच्छा लग रहा है क्योंकि वास्तव में कभी कभी ऐसा लगता है कि यह काम मेेरे स्वभाव के अनुसार है। १९८९ से लेकर आज तक जिस तरीके से लोकसभा में मैंने काम किया है, कई चींजे देखी हैं और ऐसा लगता है कि उस अनुभव का कहीं न कहीं ’ायदा तो मिलेगा और सदन अच्छे तरीके से चल सकेगा। लोकसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने के संदर्भ में सुमित्रा ताई कहती हैं कि ’ुल मेजोरिटी भी एक प्रकार का चैलेंज है। जैसे लोगों ने इस सरकार को कह दिया है कि लो, अब कर के दिखाओं, हमें सुशासन चाहिए, हमें इन सब बातों से मुक्ति चाहिए, हमें एक अच्छा हिन्दुस्तान चाहिए। यह एक चैलेंज है इस सरकार के सामने और सरकार को यह पूर्ण करना हैै।

साक्षात्कार के प्रमुख अंश

आप ने १९८२ से २०१६ के कालखंड में महिलाओं के विकास संवर्धन हेतु कौन से कार्य किये है ?
समय के साथ-साथ जिम्मेदारियों और कार्यों का स्वरूप बदलता रहा, लेकिन इन सबके बीच एक ही भाव था महिलाओं में स्वाभिमान भरना, स्वावलम्बन की प्रेरणा देना, सामाजिक कार्यो में महिलाओं की सहभागिता बढाना, शिक्षा, संस्कार और स्वरोजगार से वे देश को सशक्त करें यही मेरा प्रयास रहा है।
पार्षद के रूप में – सन १९८३-८४ में महिलाओं के लिए टायलेट का प्रस्ताव।
विधायक प्रत्याशी के रूप में- कम पैसे में, मेहनत करके, सादगी से अच्छा चुनाव लड़ने का उदाहरण प्रस्तुत किया।
पार्टी कार्यकर्ता के रूप में- संगठन में महिलाओं को उचित स्थान मिलने के लिए प्रयास, चुनाव समिति में योग्य महिलाओं को टिकट मिले इस हेतु प्रयास।
सामाजिक क्षेत्र में – महिला संगठनों संस्थाओं में प्रवचनों, व्याख्यान, विभिन्न क्षेत्रों में प्रतियोगिताओं, संस्कार शिविर का आयोजित करना। कला,भजन, नाटको के मंचन, लेखन आदि क्षेत्र में महिलाओं को आगे लाना।
एक सांसद के रूप में – क्षेत्र के विषयों के साथ साथ-साथ संसद में महिलाओं की समस्याओं पर प्रश्नों के माध्यम से, ध्यानाकर्षण, विशेष चर्चा के माध्यम से सतत लोकसभा में उठाना।
केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री के नाते – देश और समाज में महिलाओं के योगदान को प्रोत्साहित एवं सम्मानित करने के लिए पांच स्त्री शक्ति पुरस्कार की स्थापना की। जेन्डर बजटिंग का प्रयास किया। आंगनवाडी कार्यकताओं की समस्याओं का निदान किया। उनका मानदेय २५ साल में पहली बार डबल किया। राष्ट्रीय महिला कोष के कोॅरपस ङ्गंड १०० करोड़ रूपये किया। महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित करके अनेक कार्यक्रम घोषित किये।
आये दिन देश में महिलाओं के साथ अत्याचार की खबरें आती है। तब एक प्रभावशाली महिला के नाते मन में क्या विचार आते है?
महिलाओं के संबंध में अत्याचार निवारणार्थ कानून का सही उपयोग होना अत्यावश्यक है। समाज प्रबोधन, स्त्री व्यक्तिमत्व विकास का दृष्टिकोण देना जरूरी है। अच्छे विचारों का आदान-प्रदान, समाज में जागरण के और जागरूकता के उपाय करना अनिवार्य है। महिलाओं में निर्भीकता, स्वावलंबन, शिक्षा और संस्कार जैसे नेतृत्व क्षमताओं का संवर्धन करना।
स्त्री स्वतंत्रता के साथ स्त्री पुरूष संबंधो की परिभाषा बदल रही है। लिव इन रिलेशनशिप को महिलाएं भी स्वीकार रही है। इस बारे में आपके विचार स्पष्ट कीजिए?
स्वतंत्रता का मतलब स्वच्छंद आचारण नहीं होता, मर्यादायें स्त्री पुरूष दोनों के लिए होती हैं। महिला और पुरुष में समानता का यह मतलब नहीं कि महिलाएं पुरूषों जैसा आचारण व्यवहार करने लगें। स्त्री के पास एक स्त्री के रूप में ही अपार बल है, असीम शक्ति है। सहयोग, सहजीवन, सहविचार हमारे सामाजिक व्यवस्था की शक्ति है। हमारा विवाह संस्कार बहुत अच्छी परम्परा है।
संसदीय बजट में महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक स्तर को उठाने एवं जेंडर भेदभाव खत्म करने वाले कौन से प्रावधान हो रहे हैं?
आगामी मार्च माह में नई दिल्ली में मैंने लोकसभा एवं राज्यसभा की सभी महिला सांसदों, राज्यों के विधान सभाओं की महिला विधायक, सभी महिला मुख्यमंत्री, पूर्व में इन पदों पर आसीन रहीं महिलाओं को एक बृहद आयोजन में आमंत्रित किया है। इसकी थीम है ‘‘कैसे महिलाएं राष्ट्र के सशक्तीकरण में अपना योगदान दे सकती है’’। महिलाओं के लिए प्राथमिकता राष्ट्र का सशक्तीकरण है।
सरकारों द्वारा आर्थिक योजनाओं में महिलाओं की सहभागिता बढे इस हेतु प्रयास हो रहे हैं। स्किल डेव्हलपमेंट, जनधन योजना, मुद्रा योजना आदि के माध्यम से महिलाओं एवं उनके स्वसहायता समूहों को प्रशिक्षण, व्यवसाय हेतु आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। संसद एवं विधान सभाओं में इन विषयों पर चर्चाएं होती हैं। इनमें गुणात्मक और संख्यात्मक बढ़ोतरी हो, इस हेतु निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं। संवैधानिक पदों पर जैसे पंचायतो में आरक्षण भी महिलाओं को दिया जा रहा है।
आप लोकसभा अध्यक्ष रूपी एक उच्च पद पर आसीन है। सामान्य भारतीय महिला की स्थिति के बारे में आप क्या सोचती है?
मैं सामान्य पृृष्ठभ्ाूमि से आती हूं। समाज में कार्य करके अनुशासित रह कर मेहनत से अच्छा करने का प्रयास किया है। देवी अहिल्याबाई के आदर्शो को सामने रखते हुए सतत उनका पालन करती हूं। छोटे से छोटा कार्य भी पूरी तत्परता के साथ अपने पूरे सामर्थ्य से करने का प्रयास करती हूं।
सामान्य स्त्री में भी उसकी अपनी शक्ति है, गुण हैं, केवल उन्हें मार्गदर्षन, प्रोत्साहन एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। हर क्षेत्र में जैसे सामाजिक कार्य, जन प्रतिनिधित्व, सेना, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, उद्योग, कला, प्रशासन, पुलिस, खेल, सेवा, चिकित्सा, राजनीति इत्यादि सभी क्षेत्रों में महिलाएं अपना योगदान दे रही हैं।
आपके कार्यकाल में नया संसद भवन बनाने का विचार किया गया है, इसकी आवश्यकता तथा संकल्पना के बारे में बताए।
इस संदर्भ में मैंने एक पत्र शहरी विकास और संसदीय कार्य मंत्री वैंकैया नायडू जी को लिखा है। इसमें मैंने वर्तमान संसद भवन की स्थिति और भविष्य की आवश्यकताओं के बारे में जानकारी दी है।
आप आठ बार इंदौर से लोकसभा के चुनाव में निर्वाचित हुई है हर बार एक नया रिकार्ड आपके नाम से जुडा है। क्या कभी दिल में ये भावना आई कि मुझे मध्यप्रदेश का मुख्य मंत्री बनना है?
मैंने कभी भी मुख्यमंत्री बनना नहीं सोचा था। जो भी दायित्व या जिम्मेदारी मुझे दी गई है उसका सही ढंग से निवर्हन कर सकूं, यही मेरा प्रयास रहा है। एक सांसद के रूप में, एक मंत्री के रूप में और अब लोकसभा अध्यक्ष के रूप में मेरा हमेशा यही प्रयास रहा है कि समाज सशक्त बने, राष्ट्र मजबूत हो और सर्वे भवन्तु सुखिन: की भावना के साथ कार्य किया।

मो 9594961849

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