हिंदी विवेक : we work for better world...

भारतीय फिल्म संगीत के बारे में अगर कोई सोचे या इसके विकास के  बारे में कोई जानना चाहे तो सबसे पहला नाम आर सी बोरल का ही याद आता है। इसका अहम कारण यह है कि चलचित्रों में गायन और संगीत का साथ सबसे पहले आर सी बोरल ने ही प्रारंभ किया था। उन दिनों मूक फिल्मों का चलन था। आर सी बोरल सबसे पहले संगीतकार थे जिन्होंने संगीत और साज की संगत को चलचित्रों के साथ प्रारंभ किया। गायक कलाकार और साज दोनों ही स्टेज के सामने आकर इन मूक फिल्मों में संगीत और गायन का आनंद दर्शकों को दिया करते थे। जिससे मूक फिल्में बोलने लगी। अत: बैकग्राउंड म्यूजिक की शुरुआत का श्रेय  आर सी बोरल को जाता है।आर सी बोरल खुद एक अच्छे गायक थे और ध्रुपद में माहिर थे। उनकी रचनाएं और धुन पारंपरिक और आनुवंशिक हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत से उत्पन्न है। उनका दिया हुआ संगीत शास्त्रीय और लोक संगीत के आधार पर रचा हुआ है। उस समय फिल्मी संगीत पर मंदिर संगीत का प्रभाव काफी अधिक था और गायकों की गायन शैली ने इसको और गहराई दी। उनके संगीत में भक्ति और श्रृंगार दोनों ही रस देखने को मिले हैं। उनके तबले के ज्ञान ने उन्हें संगीत  रचनाओं पर नए अविष्कार करने के लिए प्रेरित किया जो कि अकल्पनीय रचनाओं और पैटर्न्स के रूप में सामने आए।

आर सी बोरल ने अपने साथी संगीतकार पंकज मलिक (जो कि स्वयं रवींद्र संगीत में माहिर थे) के साथ मिलकर कई गानों के लिए रवींद्र संगीत का आधार लिया। फिल्म संगीत के लिये प्लेबैक सिंगर्स के आगमन का श्रेय आर सी बोरल को ही जाता है। सुनहरी आवाज वाले कुंदनलाल सहगल और कानन देवी जैसे गायक उनकी छत्रछाया में निखर उठे।  उन्होंने अपने संगीत कैरियर में अनेक गानों को संगीत से सजाया है। उनमें से उल्लेखनीय गाने हैं –

1) भजूं मैं तो भाव से श्री गिरिधारी (पूरन भगत, 1933)

2) प्रेम नगर में बनाऊंगी घर मैं (चंडीदास, 1934)

3) तेरी गठरी में लागा चोर (धूप छांव, 1935)

4) एक बंगला बने न्यारा (प्रेसीडेंट, 1937)

5) अंबुआ की डाली डाली (बिद्यापति, 1937)

6) बाबुल मोर नैहर छूटो ही जाय (स्ट्रीटसिंगर 1938)

7) मस्त पवन शाखें लहराए (हार जीत 1940)

8) काहे को रा़र मचाई (लगान 1941)

9) राजा बेटा ….. (सौगंध 1942)

10) ना तो दिन वो रहे मेरे (दर्द-ए-दिल, 1953)

हिंदी सिनेमा में संगीत का आगमन एक अनोखा वक्त माना जाता है। पार्वश्वगायन के महत्व को ध्यान में रखते हुए आर सी बोरल और उनके साथी संगीतकार पंकज मलिक ने एक ऐसी प्रथा कायम की जिसका आनंद हम आज तक लेते आ रहे हैं। आर सी बोरल ने परदे पर चल रहे चलचित्र के साथ संगीत का उपयोग इस तरह से किया जिससे हर सीन का सही मतलब दर्शाने में और सिचुएशन के अनुसार सही मूड बनाने में वे कामयाब रहे। इस तरह फिल्म के हीरो या हीरोइन की भावनाएं सांग सिक्वेन्स के जरिये प्यार या दु:ख दर्शाने में कामयाब हो जाती थी। बं गाली फिल्म चंडीदास में आर सी बोरल सैला के जरिए हंसी की आवाज निकालने में कामयाब रहे थे, जिसे स्टेकॉटो साउंड कहते हैं। आर सी बोरल का सबसे बड़ा योगदान रहा है कि उन्होंने गजल को फिल्म म्यूजिक में समावेशित किया और  कुंदनलाल सहगल के माध्यम से इसे दुनिया के सामने पेश किया।  उनका साजों का प्रयोग भी अनोखा था। बड़े तार के साज जैसे वायलिन और सितार का वे बखूबी प्रयोग करते थे।

उनके 30 पीस आरकेस्ट्रा में जाने माने कलाकार जैसे पन्नालाल घोष, खेमचंद प्रकाश, जयदेव, पंकज मलिक ने वाद्य कलाकार के रूप में सहभाग लिया। उन्होंने ठुमरी, कीर्तन, अखारी और कालीगान जैसी गायन शैलियों का सुंदर मिश्रण किया था। आर सी बोरल को पारंपरिक हिन्दुस्तानी रागों का अच्छा ज्ञान था और उसी में वे अलग अलग प्रयोग किया करते थे। उन्होंने कुछ खास रागों का प्रयोग अलग मनोदशा और अवसरों को दर्शाने में किया और इसमें वे कामयाब रहे। इसके अलावा वे लाइट कैची रिदम का प्रयोग भी अपनी संगीत रचनाओं में लाए जिससे उनके संगीत ज्ञान की झलक मिलती है। इसी वजह से जाने माने संगीतकार अनिल बिस्वास ने आर सी बोरल को भारतीय फिल्म संगीत जगत के भीष्म पितामह की संज्ञा दी थी।

 

 

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu