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सहकारी बैंकों के प्रति सरकारों और राजनीतिक दलों का रवैया उदासीन दिखाई दे रहा है। यदि ऐसी ही स्थिति बनी रही तो ये बैंक नाममात्र के लिए अस्तित्व में रह जाएंगे। यह सहकारिता और देश दोनों के लिए अच्छा नहीं होगा।

सन 2017-18 का संसदीय बजट आने से पहले मुंबई के एक बड़े अख़बार में यह खबर छपी थी कि केन्द्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि, सहकारी बैंकों को आयकर में कोई भी सुविधा नहीं दी जाएगी। यह खबर पढ़कर ऐसा लगा कि संसद का बजट सत्र शुरू होने से पहले उन्होंने सहकारी बैंकों के पर ही काट दिए हैं। जब वर्ष 2018-2019 का बजट संसद में रखा गया तब सिर्फ सहकारी बैंकों को ही नहीं बल्कि पूरे सहकार क्षेत्र के लिए कोई भी सुविधा नहीं दी गई, न ही कहीं सहकार शब्द का प्रयोग किया गया। संसद में इस बार हंगामा होने के कारण बजट पर कोई चर्चा नहीं  हुई। किसी सांसद ने कोई सवाल नहीं किया और बजट ऐसे ही गड़बड़ी में सिर्फ 18 मिनटों में पारित करके एक नई मिसाल स्थापित की गई।

इस बजट में सहकार क्षेत्र से जुड़े प्रश्नों को सुलझाने के लिए सहकार क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने क्या प्रयास किए उन्हें जानने की मुझे उत्सुकता थी। इसलिए मैंने सहकार भारती के अध्यक्ष और NAFCUB के प्रभारी अध्यक्ष के साथ संपर्क करके कुछ जानकारी लेने का प्रयास किया। काफी विलम्ब के बाद उनसे जवाब मिला।

उन्होंने बताया कि NAFCUB ने बहुत बार मा. केन्द्रीय वित्त मंत्री से मुलाकात करने का प्रयास किया और जब उनसे मिलने का अवसर मिला तब सहकारी बैंकों के प्रश्नों पर कुछ तो सकारात्मक विचार करने की इच्छा व्यक्त की। सहकारी बैंकों पर 2007-2008 से जो आयकर शुरू हुआ है उसमें कुछ कटौती करने की मांग की और उनसे यह भी कहा, ‘अगर आप सहकारी बैंकों के बारे में नकारात्मक भूमिका लेते हैं तो कम से कम छोटी सहकारी बैंकों (नॉन शेड्यूल) का आयकर माफ करने का प्रयास करें। लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि सरकार का आयकर में कोई भी छूट देने का विचार नहीं हैं। सहकार क्षेत्र के बारे में वित्त मंत्री जी की यह प्रतिक्रिया सामने आने के बाद सहकार क्षेत्र को कोई भी सुविधा यह सरकार नहीं देगी और आर.बी.आई.को भी निर्देशित किया जाएगा की सभी बैंकों को आप एक ही तराजू में तौल सकते हैं।

फिर उन्होंने कहा कि NAFCUB अभी Umbrella Organisation या अन्य किसी सुविधा पर विचार कर रहे हैं जिससे छोटे बैंकों को कोई राहत मिल जाय। उनका यह निवेदन बहुत आश्चर्यजनक था। क्योंकि दामोदरन कमेटी ने उनकी 2013 की रिपोर्ट में जिस बात की सिफारिशें की थीं, वे भी कुछ ऐसी ही थीं जिनमें कुछ निम्न हैं-

  1. कवर जो आज रु.100000/- तक ही सीमित है उसे रु.500000/- तक करना।
  2. Umbrella Organisation को स्थापित करना।
  3. सहकार क्षेत्र की बैंकों को कुछ अलग सुविधा देना।

दामोदरन कमेटी की सिफारिशों को देखकर सहकार क्षेत्र में कुछ आशाएं उभर आई थीं लेकिन सिर्फ राष्ट्रीयकृत बैंकों द्वारा इस कमेटी की सिफरिशों का विरोध करने के कारण इस प्रतिवेदन को आर.बी.आई. और केंद्र सरकार ने किनारे कर दिया और इसकी कुछ बातों पर विचार करने के लिए NAFCUB और सहकार भारती को 5 साल लगे, यह बहुत आश्चर्य की बात है।

आगे और कितने साल सहकारी बैंकों के बारे में केंद्र और राज्य सरकारें सकारात्मक दृष्टिकोण रखने को लेंगे? यदि यही रवैया रहा तो सहकार क्षेत्र का ही अगले 10-15 सालों में विनाश हो जाएगा, ऐसी एक शंका मन में उभरती है। साल 2001 से लेकर 2018 तक सहकारी बैंकों की संख्या 2300 से घटकर 1500 तक आ पहुंची है। आर.बी.आई. और सरकार का यही दृष्टिकोण बना रहा तो आने वाले 20 सालों में लोगों को दिखाने के लिए एकाध सहकारी बैंक ही को जीवित रखना पड़ेगा। हमारे सभी राजनीतिक नेता जो सहकार के माध्यम से उच्च स्थान पर जाकर बैठे हैं, उन्हें तो पहले से ही सहकार क्षेत्र के बारे में संसद में मुंह खोलना नहीं आता है, यही अनुभवजन्य सत्य है।

2012 में सहकार क्षेत्र के दिग्गज नेता मा. शरद पवार केंद्र सरकार में कृषि मंत्री थे। उन्होंने 97वां संविधान संशोधन (अभी 112 कहलाता है) लाकर, सहकार को आम जनता का मूलभूत अधिकार बनाया था। इस आधार पर सभी राज्यों को उसी तरह का बदलाव अपने अपने राज्यों में करने के लिए सूचना दी थी। इस संशोधन के कारण सहकार क्षेत्र में बहुत बड़ा कार्य करने वाले बहुत से कार्यकर्ताओं के मन में एक ऐसी आशा का निर्माण हुआ था कि अभी सहकार क्षेत्र का अंधेरा दूर हो जाएगा और सहकार क्षेत्र में प्रकाश की किरणें आ जाएंगी। लेकिन यह भ्रम ही था क्योंकि आज तक किसी भी राजनीतिक दल ने इस के बारे में एक भी कदम उठाया नहीं है।

अभी 2019 में लोकसभा चुनाव आ रहे  हैं। इसके लिए कुछ दिनों पूर्व ही मा. शरद पवार ने एक वक्तव्य दिया है कि, “अभी केंद्र में जो सरकार है वह सहकार क्षेत्र के बारे में उदासीन है। और वह कुछ करेगी, ऐसा नहीं लगता।” छह साल के बाद उन्हें फिर से सहकार क्षेत्र की याद आई है। गत 6 सालों में उन्होंने या उनकी पार्टी ने या किसी अन्य पार्टी ने सहकार क्षेत्र की कठिनाइयों के बारे                                                                                                 में लोकसभा या राज्यसभा में सहकार के बारे में एक भी प्रश्न उपस्थित नहीं किया गया है और अभी वे जाग रहे हैं। उसका कारण आनेवाले चुनाव हैं। सहकार के बारे में प्रस्तावित सरकार और उसके वित्त मंत्री असंवेदनशील हैं। लेकिन गुजरात के लौह पुरुष को भी सहकार क्षेत्र का महत्त्व ध्यान में नहीं आ रहा हैं, यह बहुत दुःखद और वेदना देने वाली बात है। सहकार से ही इस देश के हर गांव सक्षम बनेगा और उससे देश भी सक्षम बनेगा। यह विचार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी और पंडित दीनदयालजी उपाध्याय की अर्थनीति में लिखा गया है। लेकिन वर्तमान नेता अगर उनका स्वार्थ होता है तो ही इस विचार का प्रयोग करते हैं। सहकारी क्षेत्र के अनेक उद्योग और सहकारी बैंकों का उपयोग वे अपनी-अपनी अलग रियासत बनाने के लिए कर रहे हैं, यही इस देश का दुर्भाग्य हैं।

 

 

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