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**कुमार हर्ष **

 

कोई एक तारीख या कोई एक हादसा किसी इंसान की ज़िन्दगी को किस हद तक बदल सकता है यह दिल्ली के उपनगर द्वारका के सेक्टर १९ के उस मकान में देखा जा सकता हैं जहां ज्योति की मां और पिता रहते हैं। ज्योति यानी वह ‘निर्भया’ जो देश में हैवानियत के सबसे घृणित वाकयों में से एक की शिकार थी। जिसकी आंखों में सुनहरे भविष्य के चमकीले सपने तैरते थे और जो अपने ५ सदस्यों वाले परिवार में खुशनुमा भविष्य की उम्मीद की सबसे चमकदार ‘ज्योति’ थी। खिलखिलाकर हंसने वाली वह लड़की जो १६ दिसंबर २०१२ की शाम बर्बर बलात्कारियों की नृशंस क्रूरता के बाद हमेशा के लिए चुप हो गई।
इस हादसे ने राजधानी ही नहीं देश की सभी सड़कों पर गुस्से के असंख्य ज्वालामुखी पैदा कर दिए थे। आक्रोशित युवा और उनके आक्रोश की आंच पर अपने राजनीतिक भविष्य की रोटियां सेंकने वाले शातिर नेताओं के चलते उस वक्त इस परिवार को भी लगा था कि उनकी बेटी की मौत बहुत सारी दूसरी बेटियों को मौत से बचा लेगी लेकिन जल्दी ही सड़कों पर उतरे लोग अपने-अपने पेशों और जिंदगियों में लौट गए। नेताओं ने नियमों की चादर ओढ़ ली और उन्हें अकेले जूझने के लिए छोड़ दिया। पर जूझने वाले हारे नहीं हैं। तब भी जबकि ज़िन्दगी की सारी शर्तें, यहां तक की जीने की वजहें भी बदल गई हैं।
ज्योति की मां आशा (५०) उस हादसे से पहले तक घर-परिवार तक ही सीमित उन आम स्त्रियों की तरह ही थीं जिनकी ज़िन्दगी का मकसद अपने पति की उम्र और बच्चों की बेहतरी के अलावा तीसरा कोई और सिरा नहीं खोजता था। उनके पति बद्री नाथ सिंह पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक छोटे से गांव मेड्वारा कलां से कोई तीस साल पहले इसीलिए दिल्ली आ गए थे ताकि बच्चों की परवरिश और पढ़ाई बेहतर ढंग से हो सके। पूरा घर मेरठ के पास आनंदपुर आश्रम के स्वामी स्वरूपानंद को गुरु मानता था और घर में पूजा अर्चना की परंपरा एक अलिखित कानून की तरह कायम थी।
मगर १६ दिसम्बर के बाद आशा देवी ने पूजा छोड़ दी है। उनके लिए अब पूजा के मायने बदल गए हैं। अब उन्हें हर पल भगवान् की बजाय अपनी बच्ची का ध्यान रहता है। किसी प्रार्थना या चालीसा के शब्दों की बजाय उन्हें अपने आखिरी क्षणों में कहे गए बिटिया के वे शब्द याद रहते हैं कि-मां! उन बदमाशों को सजा जरुर दिलाना। उन्हें फांसी पर लटकाना जरुर। उनकी आंखों में आंसू तीन साल से ठहर से गए हैं मगर वे नहीं ठहरीं हैं।
उनका ज़्यादातर समय अब अपनी बेटी के गुनाहगारों को मौत की सजा दिलवाने के लिए जरुरी दौडभाग में बीतता है। इसके अलावा वे बेटी की याद में बने निर्भया ज्योति ट्रस्ट के तत्वावधान में महिला सुरक्षा जागरूकता के अनेक कार्यक्रम चलाती हैं। स्कूलों और छोटी बड़ी झुग्गी बस्तियों में जाती हैं जहां वे बच्चों से लेकर बड़ों तक से एक ही गुज़ारिश करती हैं कि समाज में रेप जैसे नासूर को अकेले पुलिस या सरकार नहीं ख़त्म कर सकती। अपने बच्चों को शुरू से ही समझाइये। उन्हें बताइए की औरतों और लड़कियों के साथ उन्हें बुरा बर्ताव नहीं करना है।
उन्हें कभी ये ठीक नहीं लगा की उनकी बहादुर बेटी की तस्वीरों में चेहरा धुंधला कर दिया जाए और उसे उसके वास्तविक नाम की बजाय एक दूसरे नाम ‘निर्भया’ से संबोधित किया जाए या जाना जाए। वे स्पष्ट शब्दों में इसका प्रतिवाद करती हैं- मेरी बेटी का नाम ज्योति सिंह है और मुझे उसका नाम उजागर करने में जरा भी शर्मिंदगी नहीं है। आपको भी उसका नाम लेना चाहिए। मुझे तो अजीब लगता है और दुःख भी होता है कि हम ऐसा क्यों सोचते हैं। बलात्कार जैसा घिनौना काम करने वालों को अपना सिर शर्म से झुका लेना चाहिए। पीड़ित या उनके परिवार शर्मिंदा क्यों हो?
उनके दोनों बेटे सौरभ और गौरव डॉक्टरी और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पुणे और रायबरेली में हैं। दो बेडरूम वाले घर में आशा और उनके पति की ज़िन्दगी में ज्योति की यादों के अलावा अब कुछ भी स्थायी तौर पर नहीं रहता। आशा कहती हैं- इनके जैसा पिता भगवान सबको दे। वे ज्योति को सबसे ज्यादा मानते थे। उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे। उसकी पढ़ाई के लिए क़र्ज़-उधार सब लिया। इन्हें उदास देखती हूं तो लड़ाई का संकल्प और मज़बूत हो जाता है। इस घर में सब कुछ बदल गया है पर एक चीज़ नहीं बदली। आशा ने ज्योति की तस्वीर पर आज तक माला नहीं चढ़ने दी है। ऐसा करने की वजह साफ़ है-मैं कुछ भी भूलना नहीं चाहती। मैं उस हादसे को जिंदा रखना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि मेरा ज़ख्म हमेशा रिसता रहे……. नहीं तो मैं लड़ना भूल जाऊंगी। और मैं ऐसा करना नहीं चाहती क्योंकि मैंने ज्योति को वचन दिया है।
घर के कामों के बाद वे ऐसी वारदातों से खुद को बाखबर रखने के हर जतन करती हैं। वे उन युवाओं से भी मिलती-जुलती हैं जो ऐसे ही मिशन के लिए काम करते हैं। ये युवा उनके संघर्ष में सबसे ज्यादा भरोसेमंद हाथ हैं।
पिछले दिसम्बर में जब निर्भया काण्ड के एक किशोर (नाबालिग) अपराधी को रिहा किया जा रहा था तो आशा ने इन्ही युवाओं के साथ सड़कों पर संघर्ष किया था।
पैरामेडिकल की २३ वर्षीय छात्रा ज्योति के साथ दिल्ली में २०१२ में चलती बस में अमानवीय तरीके से सामूहिक दुष्कर्म किया गया था, जिसके चलते बाद में उसकी मौत हो गई थी। आपको याद होगा कि इस लोमहर्षक बलात्कार काण्ड के ६ दोषियों में से एक अपराध के समय लगभग १७ साल का था। २८ जनवरी २०१३ को अपने फ़ैसले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) ने नाबालिग़ को वयस्क मानकर मुक़दमा चलाने से इंकार कर दिया था। ३१ अगस्त २०१३ को नाबालिग़ को बलात्कार और क़त्ल का दोषी मानते हुए तब के क़ानून के तहत अधिकतम तीन साल की सज़ा दी गई थी। बीते वर्ष जब निर्भया की तीसरी बरसी मनाई जा रही थी तब उसे रिहा कर दिया गया था।
 वे कहती हैं- पहले लगता था की सिस्टम सुधरेगा, सरकार कुछ करेगी, कानून बदलेगा मगर अब लगता है कि हम गलत सोच रहे थे। सिस्टम खोखला हो चुका है। हम रोज़ तरह-तरह के लोगों से मिलते हैं-दौड़ते हैं। रोज़ उम्मीदें टूटती हैं पर हम हार नहीं मानेंगे। हमारी ज़िन्दगी में तो अंधेरा हो गया मगर दूसरों के साथ तो ऐसा न हो। हो सकता है हमारी ज़िन्दगी में भी ये न हो पाए पर ये नौजवान इस लड़ाई को आगे ले जाएंगे। अपनी बेटी के गुनाहगारों को सजा दिलाने की इस जंग में लक्ष्य बड़े हैं। आशा देवी की मांग है कि यौन उत्पीड़न की पीड़िताओं को त्वरित न्याय देने के लिए सभी अदालतों में फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित किए जाएं। यही नहीं सभी राज्यों में अत्याधुनिक फोरेंसिक प्रयोगशाला बनाने के लिए निर्भया कोष का इस्तेमाल किया जाए। उन्होंने निर्भया ज्योति ट्रस्ट की वेबसाइट भी बनाई है। फेसबुक पर भी ट्रस्ट का पेज है जो लगातार गतिविधियों की खबर देता है। मकसद एक ही है। युवाओं को इस जंग से जोड़ना। उन्हें मालूम है कि इस ठहरे हुए पानी में बदलाव की तरंगें पैदा करने वाले कंकड़ युवा ही बनेंगे।

                                                       मो. 9479845151

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