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 ***वीरेंद्र याज्ञिक ***

उद्यान ते पुरुष न अवयानं।
जीवातुं ते दक्षतातिं कृणो मि॥
      अथर्ववेद की उपयुक्त पंक्तियां आह्वान करती हैं कि ‘‘रे पुरुष, तू सदा उद्यमी बन, तू अवनति को न प्राप्त हो, तुझे जीवन में सदैव दक्षता की प्राप्ति हो, पुरूषार्थ करके अपनी कामना की पूर्ति कर।
        उद्यमशीलता, परिश्रम और पुरुषार्थ भारतीय जीवन मूल्यों के आधारभूत तत्व हैं। इसका बड़ा ही विशद वर्णन हमें वेदव्यास कृत महाभारत के शान्ति पर्व में प्राप्त होता है। महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था। कौरव और पांडवों की संपूर्ण १८ अक्षौणि सेना का संहार हो चुका था। केवल पांच पांडव, कृष्ण ही शेष बचे थे। तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को प्रेरित किया, कि वे उत्तम प्रशासन और राज्य व्यवस्था के लिए पितामह भीष्म के पास जाकर उनसे राजधर्म की शिक्षा ग्रहण करें तब युधिष्ठर अपने चारों भाइयों भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और श्रीकृष्ण के साथ पितामाह के पास जाते हैं। जो बाणों की शैये पर अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। पहले प्रणाम करते हैं और फिर निवेदन करते हैं, कि वे पांडवों को राजधर्म का उपदेश करें। कृष्ण पितामह से कहते हैं-
             राजानो हत शिष्ठात्वां राजन्नभित आसते।
             धर्मान नुयु युक्षन्त स्तेग्य: प्रब्रृहि भारत॥
     भारत! नरेश्वर, मरने से बच गए ये सभी राजा आपके पास धर्म की जिज्ञासा लेकर आए हैं। आप इन सबको धर्म का उपदेश करें। कृष्ण आगे निवेदन करते हैं-
             तेम्य: पितेव पुत्रेग्यो राजन बृ्रहि परं नयम
             ऋषयश्चैव देवाश्च त्वया नित्यमुपासिता:।
              तस्माद वक्तव्यमेवेदं त्वयावश्यमशेषत:।
      पितामह, आप इन्हें उसी प्रकार से श्रेष्ठ नीति का उपदेश करें जैसे पिता अपने पुत्र को संदर्भ की शिक्षा देता है। आपने देवताओं और ऋषियों की सदा उपासना की है, इसलिए आपको अवश्य ही सम्पूर्ण धर्मों का उपदेश देना चाहिए।
        तब पितामह भीष्म ने राजा के कर्तव्य तथा राजधर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि राजा का पहला धर्म है कि वह अपने पुरुषार्थ का सभी प्रकार से रंजन अर्थात हित संपादन करता है। अत: पुरुषार्थ के लिए सदैव तत्पर रहना।
              उत्थानेन सदा पुत्र प्रयतेथा युधिष्ठिर।
              न ध्यत्थानमृते देवं राज्ञामर्थ प्रसादयेत॥
       पुत्र युधिष्ठिर, तुम सदा पुरषार्थ के लिए प्रयत्नशील रहना, पुरुषार्थ के बिना केवल प्रारब्ध राजाओं का प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकता। पितामह भीष्म पुरुषार्थ पर अधिक बल देकर पुन: युधिष्ठिर का ध्यान आकर्षित करते हुए कहते हैं-
             साधारणं दुथं हृेतद देवभुत्थानमेव च
             पौरुष हि परं मन्ये दैव निश्चित मुच्यते
       यद्यपि कार्य की सिद्धि में प्रारब्ध और पुरूषार्थ-ये दोनों साधारण कारण माने गए हैं, तथापि, भीष्म कहते हैं, मैं पुरुषार्थ को ही प्रधान मानता हूं। प्रारब्ध तो पहले से ही निश्चित बताया गया है।
             विपन्ने च समारम्मे सेतापं मा स्म वै कृथा:
             घटस्वैव सद त्मानं राज्ञामेष परो नय:॥
     अत: यदि आरंभ किया हुआ कार्य पूरा न हो सके अथवा उसमें किसी प्रकार की रुकावट आ जाए तो इसके लिए तुम्हें अपने मन में दु:ख नहीं लाना चाहिए। तुम सदैव अपने आपको पुरुषार्थ में लगाए रखो। यही शासकों की सर्वोत्तम नीति है।
      प्रारंभ से ही भारत की मनीषा और चितंन परंपरा ने पुरूषार्थ को सर्वोपरि माना है। पुरुषार्थ का अर्थ है सतत -जागरूकता और अपने कर्तव्य का बोध तथा उसके प्रति अनन्य निष्ठा। यह पुरुषार्थ जब प्रकट होता है, फलित होता है तो उद्योग हो जाता है ‘‘उद्योगिनं पुरुषसिंह मुपैति लक्ष्मी’’- व्यक्ति की संकल्प शक्ति, उसका श्रम करने का सामर्थ्य, उसकी क्षमता और दक्षता ही उसके भाग्य को संवारती है और ऐश्वर्य प्रदान करती है और यही उद्योग का मूलभाव है। उद्योग के मूल में श्रम है, पुरूषार्थ है और वस्तुओं को बदलने का सामर्थ्य है। भारतीय की घोषणा है-
              अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगक्तर:।
              अयं मे विश्व मेषज: अयं शिवाभिमर्शन॥
      

 यह मेरा हाथ ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाला है, यह मेरा हाथ और भी अधिक क्षमतावान और सामर्थ्यवान बने। यह मेरा हाथ सभी प्रकार की न्यूनता को समाप्त करता है, रोगों को दूर करता है, बुराइयों को समाप्त करता है और सबका कल्याण करता है।
       उद्योग और परिश्रम की इस परंपरा ने वैदिक काल से लेकर ग्याहरवीं शताब्दी तक भारत को विश्व का सिरमौर बना कर रखा और भारत सोने की चिड़िया कहा जाने लगा। सुप्रसिद्ध विचारक मार्क ट्वेन ने भारत की बौद्धिक प्रतिमा तथा उद्यमशीलता को देख कर ही कहा था- ‘‘सारे संसार का प्रारंभ भारत से हुआ है, वहीं पहली सभ्यता का जन्म हुआ। वहीं पर भौतिक संपदा का संचय तथा संवर्धन सर्वप्रथम हुआ, वहां कठिन परिश्रम करने वाले विचारकों तथा ज्ञानियों की बडी संख्या थी, वंहा वन और खनिज संपदा थी और उसके साथ थी एक चैतन्य आत्मा’’। भारत की वैदिक ज्ञान परंपरा ने भारतीयों को कल्पनाशील और उद्यमशील बनाया, जिसके आधार पर उन्होंने शोध करके प्रकृति प्रदत्त विभिन्न तत्वों का परिष्करण करके उसका उपयोग मानव जीवन को और अधिक सुगम और सुविधापूर्ण बनाने के लिए किया।
        यजुर्वैद के रुद्रष्टाध्यायी के आठवें अध्याय में पदार्थों तथा खनिज तत्वों की प्राप्ति की प्रार्थना की गई है। यह अध्याय चमकाध्याय कहा जाता है। इसमें कुल २९ मंत्र हैं। प्रत्येक मंत्र के अंत में ‘यज्ञेन कल्पन्ताम’ यह पद आता है। यह कितना उल्लेखनीय तथ्य है कि हजारों बर्ष पहले भारतीय ऋषियों को लोहा, सीसा, चांदी, तांबा, सोना (स्वर्ण) रांगा आदि अष्ट धातुओं के उपयोग की भलीभांति जानकारी थी, और उसकी प्राप्ति के लिए वे प्रार्थना करते थे।
     अश्म्मा च मे, मृतिका च मे, गिरयवूच में, पर्वताश्च मे सिकताश्चमे वनस्पत्यश्चमे, हिरण्य चमे, यश्च मे श्यामं च मे लोह च मे सीस च मे त्रपु चमे यज्ञेन कल्पन्ताम
       अर्थात हे रुद्र, इस यज्ञ देवता के प्रसाद से मुझे पाषाण (पत्थर) मिट्टी, छोटे -छोटे पर्वत तथा बड़े पर्वत, बालुकाएं, विविध वनस्पति, सोना, तांबा, लोहा, सीसा एवं रांगा आदि अष्ट धातुएं प्राप्त होती रहें। ताकि हम उसका उपयोग करके समृद्ध हों।
      उपयुक्त के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वैदिक काल से ही भारतीयों को प्रकृति प्रदत्त अनेक प्रकार के तत्वों की जानकारी थी, और वे उसका बड़ा ही विवेकपूर्ण उपयोग तथा दोहन करना भी जानते थे।
      सुप्रसिद्ध प्रबंधन विशेषज्ञ श्री संदीप सिंह अपनी पुस्तक ‘भारत के समृद्ध चक्र’ के उद्योग अध्याय में बताते हैं कि भारतीय प्राचीन काल से ही उद्योग तथा व्यापार के मामले में बहुत ही आगे थे। ऋग्वेद में ऐसा वर्णन आता है कि हिन्दू व्यवसायी कई तरह की सामग्रियों का उत्पादन करते थे और समुद्र के रास्ते व्यापार करते थे। श्री संदीप सिंह आगे बताते हैं कि ‘‘अनेक स्रोतों से यह तथ्य सामने आया है कि हिन्दुओं को कई रासायनिक पदार्थों का बहुत पहले ही ज्ञान था और कई रासायनिक कलाओं का वे अभ्यास कर चुके थे।’’
        आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रबंधन विशेषज्ञ संदीप सिंह ने पुराणों में वर्णित ‘सागर मंथन’ की कथा को प्राचीन काल की सर्वप्रथम औद्योगिक घटना के रूप में माना है। सागर मंथन की यह कथा श्रीमद् भागवत महाभारत और विष्णु पुराण में बड़ी प्रमुखता से वर्णित है। यह सागर मंथन की प्रक्रिया देवताओं और असुरों द्वारा साझा परिश्रम करके प्राप्त किया गया फल है। उद्योग में भी यही कार्य होता है कि हम विभिन्न पदार्थों या तत्वों का सामूहिक रूप से परिष्करण करके उससे जो अंतिम रुप मिलता है, वही अंतिम उत्पाद होता है। तत्व या पदार्थों का मंथन या उसके रूप परिवर्तन की प्रक्रिया ही उत्पादन क्रिया कहलाती है। सागर मंथन भी पदार्थों को संस्कारित करने की प्रक्रिया थी, जिसमें सुर और असुर दोनों सम्मिलित हुए और उस मंथन प्रक्रिया से जो १४ वस्तुएं निकलीं उसका बड़ा ही सुंदर वर्णन निम्न श्लोक में किया गया है-
लक्ष्मी: कौस्तुभ पारिजातका सुर
             धन्वंतरेश्च चन्द्रमा गव: कामदुग्ध
             सुरेश्वरागजो रम्मादिदेवांगना:
             अश्व: सप्तमुखो षिम हरिधनु:
             शंखोमृतम चाम्बुद्ये: रतनि : चतुर्दला
              प्रतिदिनम कुर्वन्तु नो मंगलम
    उद्योग का मूल उदेश्य मनुष्य का अपनी बढ़ती हुई कामनाओं की पूर्ति के लिए किया गया आवश्यक उद्यम, परिश्रम और पुरुषार्थ है, ताकि उससे प्राप्त वस्तुओं से वह अपने जीवन को अधिक साधन संपन्न और सुखमय बना सके। इस दृष्टि से श्री संदीप सिंह का मानना है और जो सही भी प्रतीत होता है कि ‘‘शक्ति, सुख, स्वास्थ और समृद्धि की चाह के परिणामत: विष (हलाहल) भी उत्पन्न होगा और प्रकृति का नाश भी होगा तथा प्रदूषण भी फैलेगा।’’ जिस प्रकार कोई भी उत्तम वस्तु का निर्माण करते समय अवशिष्ट पदार्थ भी साथ साथ निकलते हैं, उसी प्रकार सागर मंथन की प्रक्रिया से प्राप्त लक्ष्मी के साथ साथ अलक्ष्मी अर्थात प्रदूषण तथा प्रकृति में दोष भी पैदा होगा जिसका ध्यान रखा जाना चाहिए।
        

वर्तमान समय में मनुष्य जिस प्रकार प्रकृति से प्राप्त पदार्थों तथा तत्वों का दोहन और शोषण कर रहा है और प्रकृति को नष्ट कर रहा है, वह चिंता का विषय बन चुका है। प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है, ग्लोबल वार्मिंग अर्थात वातावरण का बढ़ता तापमान, ओजोन की परत में छेद तथा उससे उत्पन्न प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या ने संपूर्ण मानवता की नींद उड़ा दी है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रकृति का पोषण करें और उसका दोहन करें। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार हम गौमाता की सेवा करते हैं, उसका पोषण करते हैं और फिर वही गौ हमें पौष्टिक दूध प्रदान करती है, जिससे हम सब पुष्ट होते हैं और स्वस्थ रहते हैं। औद्योगिक प्रक्रिया में भी हमें इसी सिद्धांत का अनुपालन करना होता है; किन्तु विकास की भेड़ चाल और अनियंत्रित कामनाओं की पूर्ति की अंधी दौड में हम सब शामिल होकर अपने अस्तित्व के लिए खतरा मोल ले रहे हैं।
          अंत में भारतीय मनीषा यह तो अवश्य कहती है और याचना करती है रायस्पोष स्थ रायस्पोष वो भक्षीय। जो अनेक गुणवान पदार्थ, संपदा व धन है उस श्री व समृद्धि में जो सर्वोत्तम है उसका हम सब सेवन करें। अर्थात यह जो पदार्थ का सर्वोत्तम रूप है, वही उद्योग है और उस उद्यमशीलता के गुण को विकल्पित करने के लिए भी भारत के ऋषि ने सदैव कामना की है-
               इबे त्वोर्जे त्व रथ्ये त्व पोषाय त्वा

        हे मेरी चैतन्य शक्ति! तू मेरी इच्छाओं की पूर्ति कर, तू हमें पराक्रमयुक्त ऊर्जा से संपन्न कर, तू हमें धनधान्य से भर दें और तू हमें पोषक तत्वों से पूर्ण कर दें। यह प्रार्थना उद्योग का मूलमंत्र है, जिसका निष्ठा से अनुपालन और उत्पादन प्रक्रिया का विवेकयुक्त संचालन आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

                                                           मो. 9829219181
 

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