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जब से सोशल मीडिया ने सूचना जगत में अपने पांव फैलाना शुरू किया है, लोगों में आत्म-मुग्धता (Narcissism) की भावना बढ़ती जा रही है. आत्ममुग्धता अर्थात केवल ‘मैं’, ‘मेरा’, ‘मुझे’ जैसी भावनाओं को वरीयता देना. हर समय अपने बारे में सोचना. दूसरों की परवाह न करना. आश्चर्य की बात यह है कि कोई व्यक्ति आत्ममुग्धता की इस भावना से ग्रस्त होकर ऊंचाई हासिल कर लेता है, तो कोई अन्य पतन की राह पर बढ़ जाता है. आत्ममुग्धता दरअसल एक प्रकार की मानसिक बीमारी है. आज के समय में हर दूसरा इंसान आत्ममुग्धता की भावना से ग्रसित है.

पौराणिक ग्रीक कथाओें में नार्सिसस नामक एक ऐसे राजा का जिक्र मिलता है, जिसे अपने आपसे प्यार हो जाता है. वह रोज घंटों खुद को आइने में निहारता रहता है. उसे अपने सामने हर इंसान तुच्छ या कुरूप नजर आता है. ‘आत्ममुग्धता’ या ‘नार्सिज्म’ शब्द की उत्पति भी उसी से हुई है. आधुनिक युग में जिस इंसान में ऐसी प्रवृति देखने को मिली, उसे मनोवैज्ञानिकों ने ‘आत्ममुग्ध’ (Narcissist) की संज्ञा दी.

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रॉयड ने अपने व्यक्तित्व मनोविश्लेषण सिद्धांत में व्यक्ति के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन करते हुए बताया है कि शैशवावस्था (3 साल से लेकर 7 साल तक) में बच्चों में आत्ममुग्धता की प्रवृति पहली बार देखने को मिलती है. उस दौरान उनका अहम उनके लिए सर्वोच्च होता है. वे केवल आत्म अथवा स्वयं (खुद) को प्यार करते हैं. जो उन्हें सही लगता है, उसे ही सच मानते हैं. जैसे- अगर उन्हें लगता है कि धरती चपटी है, तो मतलब ‘चपटी’ है. आप उन्हें लाख समझायें, पर वे यह मानने को तैयार ही नहीं होंगे कि धरती गोल है. उल्टा वे आपको ही बुद्धू साबित करने का प्रयास करेंगे. इस तरह उनकी प्रवृति आत्मकेन्द्रित होती है. शैशवावस्था में बच्चा अहम स्व एवं अन्य चीजों के मध्य उचित भेद नहीं कर पाता है. धीरे-धीरे उम्र बढ़ने के साथ-साथ जैसे-जैसे बच्चा बाहरी दुनिया के संपर्क में आता है, उसमें आत्ममुग्धता की यह भावना कम हो जाती है. मानव विकास की यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन कुछ लोगों में यह प्रवृति उम्र बढ़ने पर भी देखने को मिलती है. तब इसे सामान्य न मान कर एक मानसिक बीमारी माना जाता है.

 

आत्ममुग्धता के लक्षण

‘मेलिग्नेंट सेल्फ लव : ‘नार्सीसिज्म रीविजिटेड’ के लेखक सेम वेक्निन के अनुसार इस रोग के लक्षण आसानी से समझ में नहीं आते. फिर भी निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर काफी हद तक इनकी पहचान की जा सकती है.

 

– आत्ममुग्ध लोग अपनी आलोचना सुनना बिल्कुल भी पसंद नहीं करते. कोई अगर उनके बारे में थोड़ा-सा भी नकारात्मक कह दे, तो वे नाराज हो जाते हैं और मारपीट पर उतर जाते हैं.

– वे हमेशा खुद को और अपनी बातों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने का प्रयास करते हैं.

– अपनी क्षमताओं एवं खूबियों के बारे में निराधार कल्पना करते हैं और उन कल्पनाओं को ही सच मानते हैं.

– वे हर जगह, हर किसी से विशिष्ट सम्मान पाना चाहते हैं. उन्हें लगता है वे जहां भी जायें, सब उन्हें ही तवज्जो दें.

– वे खुद को सही साबित करने के लिए कई बार झूठ का सहारा लेने से भी नहीं हिचकते.

– दूसरों से अगर उनकी कुछ आदतें मिलती भी हों, तो वे उन्हें खुल कर स्वीकार करने से कतराते हैं.

– अपने मतलब के लिए दूसरों का इस्तेमाल करने में माहिर होते हैं.

– उनमें ईर्ष्या एवं श्रेष्ठता भाव की प्रबलता होती है.

– अपनी बात को साबित करने के लिए अड़ियल रवैया अपनाते हैं.

– इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने से गुरेज नहीं करते.

– निजी संबंधों के मामले में वे भावनात्मक रूप से शोषण करनेवाले होते हैं.

– दूसरों की खूबियों को कभी स्वीकार नहीं कर पाते. हमेशा दूसरों में बुराई ढूढ़ते रहते हैं.

 

आत्मविश्वासी और आत्ममुग्ध में अंतर

मनोवैज्ञानिकों की मानें, तो व्यक्तित्व के समुचित विकास के लिए इंसान का आत्मविश्वासी और स्वाभिमानी होना महत्वपूर्ण है, लेकिन कहावत है ‘अति सर्वत्र वर्जयते’ यानी अधिकता हर चीज की बुरी होती है. आत्मविश्वास और अतिविश्वास या घमंड के बीच अंतर की एक बड़ी महीन-सी सीमा रेखा होती है. हमें इसे ही पहचानने की जरूरत है. आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी और गर्व के भाव से भरा व्यक्ति निडर, साहसी और अपनी क्षमताओं से पूरी तरह परिचित होता है. साथ ही वह यह भी जानता है कि वह अंतिम व्यक्ति नहीं है जो सुन्दर, ज्ञानी, धनी और श्रेष्ठ है. उसके समान या उससे भी बेहतर कई लोग इस दुनिया में मौजूद हैं. इसके विपरीत आत्ममुग्ध व्यक्ति में ‘मैं’ भावना की प्रबलता होती है. ऐसे लोग किसी के अच्छे दोस्त नहीं हो सकते, न ही परिवार में इनका सम्मान होता है. इनमें ‘मैं’ भावना की प्रबलता होने की वजह से ये सभी को अपना गुलाम समझते हैं. इनका पारिवारिक और सामाजिक जीवन बिखरा हुआ रहता है.

 

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  1. हमारे धर्मग्रन्थों में इसका अलग ढंग से विशद वर्णन है। यथा:-
    “मैं अरु मोर तोर तैं माया”

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