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                                                                  – डॉ रविराज अहिरराव

घर की सुख-शांति के लिए छोटी-छोटी बातों की ओर ध्यान देना महत्वपूर्ण है, इसीलिए रसोईघर के निर्माण में भी वास्तुशास्र के नियमों का पालन करना जरूरी है। रसोईघर का वास्तु के अनुरूप बनाया जाना न सिर्फ गृहणी के लिए जरूरी है, बल्कि इससे परिवार के सभी सदस्यों का स्वास्थ्य भी जुड़ा हुआ है। घर के छोटी से छोटी बातों की ओर से बारीकी से विचार करना ही सुखी जीवन का मूलाधार है।बच्चों की शिक्षा, संस्कार, परिवार के प्रमुख व्यक्ति की प्रवृत्तियां, अतिथियों के आगमन पर उसका स्वागत कैसे किया जाता है, ऐसी अनेक बातों की ओर गृहिणी का सूक्ष्म चिंतन होता है।

प्राचीन काल की स्त्रियों का संबंध चूल्हे तथा बच्चों तक ही सीमित रहता था, परंतु आज की स्त्री रसोई, बच्चों के साथ-साथ घर के बाहर निकल कर धर्नाजन भी कर रही है। आज की स्त्री पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है, उसकी घर के अंदर और बाहर दोनों क्षेत्रों में सहभागिता है, इस कारण घर चलाने में उसका योगदान पहले की तुलना में और ज्यादा बढ़ गया है।

वास्तुशास्त्र के अनुरूप घर का निर्माण करते समय रसोईघर

आग्नेय ( दक्षिणोत्तर) दिशा में होना अत्यावश्यक है, जबकि मुख्य शयनकक्ष नैऋत्य ( दक्षिण-पश्चिम) की ओर होना जरूरी है, इसलिए वहां का निर्माण कार्य तथा वातावरण वहां रहने वाले  लोगों  के शारीरिक तथा मानसिक विकास के लिए पोषक हो, इस तरह का होना जरूरी है।वास्तु के नियमोें के अनुसार अगर सुबह  सूर्य की किरणें ४५ अंश से रसोईघर में प्रवेश करनी चाहिए। अगर ये किरणें घर में आती हैं तो रसोईघर में जो भी कीड़े-मकोड़े होते हैं, वे मर जाते हैं और रसोईघर शुद्व हो जाता है। इन किरणों से रसोईघर में अन्न पदार्थों के जैविक मूल्य बनाये रखने की शक्ति  पैदा होती है। सुबह से समय अधिकाधिक सूर्य किरणें घर में आ सकें, इस आधार पर गृह निर्माण करना आवश्यक है, ऐसी वास्तु में रहने वाले परिवार का जीवन बेहद सुखदायी होता है। रसोईघर  की खिड़की पूर्व दिशा की ओर होनी चाहिए।रसोईघर में खाना बनाने के गैस की शिगड़ी तथा सिलेंडर को इस तरह से व्यवस्थित किया जाए, जिससे रसोईघर में खाना बनाने वाली महिला का मुंह पूर्व दिशा की ओर हो।सुबह के समय सूर्य से निकलने वाली किरणें रसोईघर की शुद्धता के लिए पोषक होती हैं। इतना ही, नहीं ये किरणें महिलाओं के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक मानी जाती हैं।

रसोईगृह आवास के अन्य कमरों की तुलना में छोटा होता है, पर रचनात्मक दृष्टि से भरा हुआ होना चाहिए, इसमें  स्लैब, जलस्थान, गैस- चूल्हा, सिलेंडर, आलमारी, फ्रिज, बर्तन, डिब्बे, दीवार पर लगी आलमारी का समावेश होता है। ऐसे स्थल पर लगभग सात घंटे काम करना स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक भी हो सकता है, इसलिए अगर रसोईघर में पूर्व की ओर मुंह करके भोजन बनाया गया तो वह स्वास्थ्य पर होने वाले संभावित खतरे को टालने में सहायक साबित होता है। पूर्व की ओर से आने वाली पवित्र-सात्विक ऊर्जा वहां काम करने वाले व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करती है, जिससे उस व्यक्ति का मन स्वच्छ- पवित्र तथा प्रसन्न होता है, जिससे स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इस ऊर्जा के कारण स्वास्थ्य विरोधी परिस्थिति की तीव्रता नगण्य हो जाती है, इस कारण स्वाथ्य पर आने वाला खतरा टल जाता है। पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली हवा रसोईघर के दूषित वातावरण पूर्व की ओर स्थित खिड़की से बाहर निकल जाती है, जिससे रसोईघर का वातावरण प्रसन्न तथा सुखदायी हो जाता है। कोई व्यक्ति एक ही स्थान पर काफी समय तक काम करता है, तब वहां का वातावरण इस तरह का बनाता है कि वह ज्यादा से ज्यादा काम कर सके। उस स्थान से उनका शारीरिक तथा मानसिक रिश्ता जुड़ जाता है। अगर मानव शरीर का यकृत ठीक है, तो उसका स्वाथ्य ठीक है, उसी तरह यदि किसी का वास्तुशास्त्र ठीक है, तो सब कुछ ठीक है, अगर रसोईघर ठीक स्थान पर बना होगा, तो उस घर की गृहिणी का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। ग्राहकों की बढ़ती मांग के कारण वर्तमान में वास्तुशास्त्र के नियमोें के अनुसार गृह निर्माण करने का सिलसिला शुरु हो गया है।

नेऋत्य के रसोईघर से होता है आर्थिक नुकसान

रसोईघर अग्नेय दिशा में नहीं होगा तो वास्तुदोष निर्माण होता है। इसके परिणामस्वरूप प्रगति में बाधा आना शुरू हो जाती है। स्री के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। आग्नेय दिशा के साथ-साथ अगर ईशान्य दिशा में भी वास्तुदोष हो तो वहां कार्य करने वाली स्त्री का स्वास्थ्य लगातार गिरता चला जाता है। अग्नेय के स्थान पर रसोईघर अगर नेऋत्य दिशा में हो तो आर्थिक नुकसान होने की आशंका होती है।इतना ही नहीं नेऋत्य दिशा में स्थित रसोईघर में पकाये गये अन्न के व्यर्थ जाने की आशंका सदैव बनी रहती है, जबकि इस क्षेत्र में बने रसोईघर में काम करते समय चेहरे पर प्रसन्नता नहीं रह जाती। अगर रसोईघर वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा में हो तो घर में सदैव वाद- विवाद होता रहता है और उससे परिजनों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। रसोईघर अगर ईशान्य (उत्तर-पूर्व ) दिशा की ओर हो तो घ्ार के सदस्यों की स्वास्थ्य विषयक समस्याओं का विस्तार हो जाता है। बच्चों की शैक्षणिक तथा परिजनों की आर्थिक परिस्थिति परईशान्य (उत्तर-पूर्व ) दिशा की ओर स्थित रसोईघर से विपरित असर पड़ता है।

फ्लैट में तोड़फोड़ अगर करना संभव न हो तो योग्य वास्तुशास्त्र   विशेषज्ञ से सलाह लेकर बिना तोड़फोड़ के वास्तु दोष को दूर किया जा सकता है। प्रत्येक घर में कोई न कोई वास्तुदोष होता ही है और उसका मानव जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ता है, इस कारण वास्तुशास्त्र उपाययोजना के माध्यम से उस दोष का निराकरण करना जरूरी है। पूर्व में वास्तुशास्र के महत्व को ध्यान में रखकर  बहुत से घरों के रसोईघर, शयनकक्ष, दिवान खाना, भगवान का मंदिर, अध्ययन कक्ष का निर्माण किया जाता था।  आज के दौर में नए वास्तु के निर्माण में जो लोग वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुरूप घर का निर्माण कर रहे हैं, उनका जीवन तो सुखद है, पर जो वास्तु दोष निवारण को महत्व नहीं दे रहे, उनको दुखदायी जीवन जीना पड़ रहा है।

नए वास्तु को प्रवेश से पूर्व वास्तु दोष के निवारण से ज्यादा गृहप्रवेश, आंतरिक तथा वाह्य सजावट, पार्टी देने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाने के कारण ज्यादातर घरों में कलह, वाद-विवाद के प्रकरण हो रहे हैं। वास्तु दोष निवारण से घर की उन्नति, सदस्यों की प्रगति, सुख-शांति, स्वास्थ्य तथा परिजनों के बीच मृदुल संबंध स्थायी तौर पर बने रहते हैं, इसलिए सुखद तथा वैभवशाली जीवन जीने के लिए वास्तु दोष का निवारण करना जरूरी है। ये सभी बातें प्राप्त करने के लिए गृहस्वामिनी का सक्षम तथा स्वस्थ्य होना बहुत जरूरी है, इसलिए रसोईघर अग्नेय दिशा में होना नितांत जरूरी है। साथ ही नए वास्तु की ईशान्य दिशा भी वास्तु दोष से मुक्त होनी चाहिए।

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