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*** ओमप्रकाश मित्तल ***

    

 भारत जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के संदर्भ में विश्व की नौवीं सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है। यह अपने भौगोलिक आकार के संदर्भ में विश्व का सातवां और जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा देश है। हाल के वर्षों में भारत गरीबी और बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्याओं के बावजूद विश्व में सब से तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। सरकार का दावा है कि भारत का जीडीपी ७ फीसदी से भी तेज गति से बढ़ रहा है जो दुनिया में सब से तेजी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है।
     एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने अनुमान जताया है कि भारत की वृद्धि दर चीन (२०१६-१७) में अनुमानित सात प्रतिशत को पार कर अगले वित्त वर्ष २०१६-१७ में ८.२ प्रतिशत हो जाएगी। एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री शांग जिन वेइ ने कहा- ‘‘उम्मीद है कि भारत अगले कुछ वर्षों में चीन से अधिक तेजी से वृद्धि दर्ज करेगा।‘‘
      ऐतिहासिक रूप से भारत एक बहुत विकसित अर्थव्यवस्था थी जिसके विश्व के अन्य भागों के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध थे। औपनिवेशिक युग (१७७३-१९४७) के दौरान ब्रिटिश भारत से सस्ती दरों पर कच्ची सामग्री खरीदा करते थे और तैयार माल भारतीय बाजारों में सामान्य मूल्य से कहीं अधिक उच्च कीमत पर बेचा जाता था जिसके परिणामस्वारूप स्रोतों का   द्विमार्गी र्हास होता था।
      भारतीय दर्शन में सामाजिक व्यवस्था के प्रभाव के कारण उसकी अर्थव्यवस्था में व्यक्ति के स्वावलम्बन और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया गया है और साथ ही यह विकेन्द्रित रहे इसका भी ध्यान रखा गया है। इसके लिए कृषि और ग्रामोद्योग/कुटीर उद्योग हमारी अर्थवयवस्था के मूल आधार हैं, जो कि देश के लगभग ६ लाख गांवों में हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी अपने एकात्म मानवदर्शन में कहा है कि भारतीय समृद्धि का आधार स्वदेशी एवं विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था में ही है।
      लघु उद्योग क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। वर्तमान में कृषि लाभदायक व्यवसाय नहीं रहा तथा बड़े उद्योग रोजगारविहीन विकास कर रहे हैं। इस समय देश में दस लाख युवा प्रति माह रोजगार के लिए आ रहे हैं। तब उन्हें लघुद्योग क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र ही रोजगार उपलब्ध कराने में सक्षम होंगे।
    अतः हमें यह सोचना होगा कि पर्यावरण को क्षति पहुंचाए बिना औद्योगीकरण कैसे हो सकता है? ताकि रोजगार के अवसर बढ़ें और देश में समृद्धि आए। हम इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं और सत्रहवीं सदी की मानसिकता से हम देश का विकास नहीं कर सकते। नई स्थितियों में नई समस्याएं हैं और उनके समाधान हेतु नई दृष्टि से सोचना होगा। यदि हमें गरीबी, अशिक्षा से पार पाना है और देश का विकास करना है तो हमें इस विकास यात्रा में भारतीय दर्शन के आधार पर भागीदार होना पड़ेगा, जहां हम नए विचारों को भी आत्मसात कर सकें और समय के साथ साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें।
    

   देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने का मूलमंत्र ग्रामीण भारत की स्थिति में होने वाले सुधार में छिपा हुआ है। आगामी वर्ष चुनौती भरा होगा क्योंकि विगत दो वर्षों के दौरान किसानों को बुरी स्थिति का सामना करना पड़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक उत्पाद की मांग में काफी कमी आई है। सरकार के पास सब से बड़ी जिम्मेदारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार करने की है, क्योंकि इससे ही लघु औद्योगिक क्षेत्र का वास्तविक विकास सम्भव होगा। हमें यह समझना होगा कि ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता भी ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाली मांग पर निर्भर करती है एवं इसी निमित्त प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा उद्योग एवं कृषि से सम्बंधित क्षेत्रों में अनेकानेक सुविधांए दी जा रही हैं।
      सूक्ष्म, छोटे-मंझोले और नवांकुर उद्यमों के लिए विभिन्न प्रोत्साहनों के माध्यम से इस बजट ने मोदी सरकार की उस नीति को आगे बढ़ाया है, जिसमें एक तरफ मुद्रा जैसी योजना है, तो दूसरी तरफ स्टार्टअप इंडिया की पहल। अर्थव्यवस्था की गति तेज करने के लिए वित्त मंत्री ने बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च बढ़ाने का रास्ता चुना है। रेलवे और सड़क निर्माण के लिए २.१८ लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
      केंद्र सरकार ने स्किल इंडिया मिशन / प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) को २०१६ के लिए १,७०० करोड़ रुपये देने का फैसला किया है। सरकार की योजना अगले तीन सालों में एक करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित करने की है और यह काम १,५०० मल्टी स्किल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की मदद से किया जाएगा। साथ ही सरकार को यह भी सोचना होगा कि लघु उद्योग क्षेत्र एवं मनरेगा जैसी योजना सरकार के इस कौशल विकास में किस प्रकार से भागीदार हो सके।
     वर्तमान में आज़ादी के बाद सरकारों ने लघु उद्योगों को केवल पूंजी निवेश के आधार पर ही देखा है, इसलिए यह क्षेत्र नियम-कानूनों में अत्यधिक उलझा है। केंद्र सरकार ने तो १९९८ में देश में पृथक लघु उद्योग मंत्रालय बना लिया था, लेकिन वर्तमान में राज्य स्तर पर यह केवल १-२ राज्यों में ही है। लघु उद्यमियों को विभिन्न विभागों से जूझना पड़ता है। अतः आवश्यकता है कि केंद्रीय स्तर पर एक अधिकारयुक्त वैधानिक आयोग बने, जो इस क्षेत्र के सभी नियमों का ठीक तरह से पालन सुनिश्चित करवा सके।
    लघु उद्योग भारती द्वारा उद्योगों से सम्बंधित विभिन्न क्षेत्रों में अनेकानेक समस्याओं के निराकरण एवं नई नीतियां बनवाने हेतु समय-समय पर कई कार्य किए गए हैं। लघु उद्योग भारती द्वारा दिए गए समन्वित सुझावों के आधार पर केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों द्वारा लघु उद्योगों से सम्बंधित नीतियां बनाई जा रही हैं।
      लघु उद्योग भारती केन्द्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों जैसे वित्त, बैंकिंग, एम.एस.एम.इ, प्रदूषण, श्रम, स्टील एंड आयरन एवं उद्योग आदि में प्रतिनिधत्व करती है। लघु उद्योग भारती आज भारत के लघु उद्योगों का एकमात्र राष्ट्रीय संगठन है, जिसके भारत के लगभग सभी जिलों में सदस्य हैं। आज आवश्यकता है कि सूक्ष्म एवं लघु उद्योग क्षेत्र के सभी उद्यमी एक संगठित समूह के रूप में कार्य करें और भारतीय दर्शन के आधार पर, विश्व में विकास की अवधारणा को फलीभूत करें।

 आओ सभी साथ साथ चलें।

                                                        मो 9414051265

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