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***राजेश प्रभु सालगांवकर***

    मेक इन इंडिया के मुंबई इव्हेंट का उदघाटन करते
हुए भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तथा अन्य मान्यवर

    प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वर्ष पूर्व मेक इन इंडिया की घोषणा लाल किले से की थी तथा विश्व को आवाहन किया था कि आओ! भारत में अपने उत्पादनों का उत्पादन करो! मोदी जी के आवाहन के प्रतिसाद स्वरूप विश्व भर से भारत में आने वाला पूंजी निवेश भी बढ़ा। लेकिन मेक इन इंडिया योजना के परिणाम न सामान्य जनता को दिखे और न ही इसे प्रसार माध्यमों में योग्य स्थान मिला। प्रसार माध्यमों की यही उदासीनता अर्थव्यवस्था को गति देने वाली इस बड़ी योजना के लोगों तक न पहुंचने का कारण रही। सरकार ने भी इस महत्वाकांक्षी योजना की पुरजोर ‘मार्केटिंग’ नहीं की। इसी कमी को दूर करने के लिए उठाया गया अत्यावश्यक कदम था मुंबई में आयोजित मेक इन इंडिया सप्ताह तथा प्रदर्शनी।
विश्वभर के उद्योगों को भारत की क्षमता का दर्शन कराने वाले ऐसे महाआयोजन की जरूरत थी और इस आयोजन के प्रथम यजमान बनने का सम्मान महाराष्ट्र-मुंबई को मिला। आज के विज्ञापन युग में केवल क्षमता होने से काम नहीं चलता, उस क्षमता का योग्य प्रदर्शन करना भी उतना ही आवश्यक होता है। साथ ही ऐसी प्रदर्शनियों तथा परिसंवादों के आयोजनों के माध्यम से विविध उद्योगों, विशेषज्ञों, उद्योगपतियों, वैज्ञानिकों-संशोधकों का सरकार के साथ जो वैचारिक लेनदेन होता है, आपस में जो संपर्क निर्माण होता है, उसका एक अपना महत्व औद्योगिक विश्व में रहता है। इसी कारण १३ फरवरी से मुंबई में आयोजित मेक इन इंडिया सप्ताह यह एक साधारण प्रदर्शनी से कुछ ज्यादा थी। भारत की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी सकारात्मक परिणाम करने वाला यह आयोजन रहा।
क्या है मेक इन इंडिया की संकल्पना?
‘कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज’ अर्थात सीआयआय संस्थान के पश्चिम विभाग प्रमुख तथा किर्लोस्कर समुह के ‘किर्लोस्कर ब्रदर्स’ कंपनी के अध्यक्ष तथा प्रबंध निदेशक संजय किर्लोस्कर इस ’मेक इन इंडिया’ सप्ताह के संयोजक-समन्वयक के रूप में कार्यरत थे। ‘मेक इन इंडिया सप्ताह’ के अनावरण कार्यक्रम के समय उनके साथ हुई बातचीत में उन्होंने ’मेक इन इंडिया’ की संकल्पना बहुत कम शब्दों में परंतु प्रभावपूर्ण तरीके से बताई। उन्होंने कहा, कोई भी अर्थव्यवस्था स्थिर तथा मजबूत होने के लिए उसे उत्पादन पर आधारित होना चाहिए। आज की वैश्विक मंदी की स्थिति में शुद्ध रूप से उत्पादन पर आधारित अर्थव्यवस्था ही टिक पाएगी, जीवित रह पाएगी। आज की (मोदी संचालित) भारत सरकार को इस परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान है। उसी के साथ अगर भारत की जनता को रोजगार दिलाना है, तो भारत में बनी वस्तुओं का उत्पादन बढ़ना चाहिए। ये उत्पाद विश्व के बाजारों में बिकने चाहिए। ऐसी वैश्विक गुणवत्ता के तथा बड़ी संख्या में बनने वाले उत्पादों के लिए विदेशी पूंजी निवेश तथा विदेशी तकनीकी ज्ञान दोनों की आवश्यकता है। इसी कारण सरकार ने ’मेक इन इंडिया’ का नारा दिया। आज के वैश्विक उद्योग क्षेत्र को भारत से बहुत बड़ी उम्मीदे हैं, आशाएं हैं। लेकिन उनके मन में भारत के प्रति विश्वास दृढ़ करने की आवश्यकता है। यहां विद्युत आपूर्ति, सड़क तथा अन्य मार्ग से परिवहन तथा पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं, तंत्र कौशल्य, कुशल कारीगर, हुनरवाले उद्योजक अथा सहकार्य करने वाली सरकार है यह संज्ञान वैश्विक उद्योग क्षेत्र को कराना इस मेक इन इंडिया सप्ताह का उद्देश्य है।

किर्लोस्कर जी ने आगे कहा कि, भारत २५० वर्ष पहले तक वस्तुओं तथा धान के उत्पादन में विश्व में प्रथम क्रमांक पर था। विविध क्षेत्रों की कुशलता में प्रथम क्रमांक पर था। आज भारत सरकार ने जो कदम उठाए हैं, उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि निकट भविष्य में भारत फिर एक बार उस अव्वल स्थान पर दिखेगा, यह एक उद्योगपति होने के नाते मेरा विश्वास है। कुछ वर्ष पहले अमेरिकी लोग भारत में पूंजी निवेश करने वाले को मूर्ख समझते थे। आज की स्थिति बिलकुल उलटी है, और आज अमेरिकी लोग भारत में पूंजी निवेश न करने वाले उद्यमी, पूंजीपति को मूर्ख मानते हैं।
इसी कार्यक्रम में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा केंद्रीय वाणिज्य राज्यमंत्री निर्मला सीतारामन ने देश तथा राज्य में उपलब्ध निवेश तथा औद्योगिक अवसर तथा उपलब्ध क्षमताओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। मुंबई-दिल्ली इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, मराठवाडा तथा विदर्भ में शुरू हो रहे शेन्द्रा बिडकिन और मिहान जैसे औद्योगिक क्षेत्र के बारे में भी जानकारी दी गई। जहां जो उगता है, जहां जो कुछ उपलब्ध है, उस पर उसी स्थान पर प्रक्रिया करने वाले उद्योग लगाने का निर्णय केंद्र के मोदी तथा राज्य की फडणवीस सरकार ने लिया है। उदाहरण के तौर पर, जहां कपास उगती हो, उसी क्षेत्र में वस्त्रोद्योग और वस्त्र से जुड़े उद्योगों की शृंखला होनी चाहिए। अर्थव्यवस्था के जानकारों तथा सीआयआय से जुड़े उद्योगपतियों और विशेषज्ञों का कहना है कि यही सही प्रगतीशील तथा सत्य विकास के विकेंद्रीकरण की नीति है। इससे उत्पाद खर्च में १/३ कमी आएगी तथा विश्व स्तर पर भारतीय उत्पादन कीमतों की स्पर्धा में टिक पाएंगे। रोजगारों का भी विकेंद्रीकरण होगा। सही तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने वाली तथा दूरगामी सकारात्मक परिणाम देने वाली यह नीति है।
इसी नीति के अंतर्गत राज्य में तथा देश में उपलब्ध कच्ची सामग्री तथा उपलब्ध कौशल्यों की जिलावार- तहसीलवार मैपिंग किया गया है। जिस भौगोलिक क्षेत्र में जो कौशल्य होना आवश्यक है, वह कुशल मानव संसाधन उसी क्षेत्र में उपलब्ध हो, इसलिए विविध उपाय किए जा रहे हैं। इस तरीके से महानगरों तथा शहरों पर रोजगार के लिए पड़ने वाला तनाव कम हो जाएगा। संबधित क्षेत्र में बिजली, रास्ते, पानी की आपूर्ति स्थानीय प्रशासन के माध्यम से और कुछ क्षेत्रों में सीधे केंद्र सरकार के माध्यम से हो रही है। पिछले डेढ़ वर्ष से चली यह सब पूर्व तैयारियां एक विशिष्ट पड़ाव पर पहुंचने के बाद इस मेक इन इंडिया सप्ताह का आयोजन किया गया।
क्या था इस प्रदर्शनी में?
भारत को नेक्स्ट मैनुफैक्चरिंग डेस्टीनेशन के रूप में विश्व समुदाय के सामने प्रस्तुत करने के लिए जो जो आवश्यक था, वह सब कुछ इस प्रदर्शनी के माध्यम से तथा इस निमित्त से हुई संगोष्ठियों तथा परिषदों आदि के माध्यम से किया गया। मूलभूत संरचना का खाका बनाने की भारत की क्षमता अधोरेखित करने वाले भारतीय उत्पादों का (जैसे की इस्रो के उपग्रह नियंत्रक तथा प्रक्षेपक उत्पाद, कल्याणी ग्रुप (भारत फोर्ज) की बनाई हुई तोप, आदि सरकारी तथा निजी दोनों क्षेत्रों से आए उत्पाद) समावेश इस प्रदर्शनी में था। नौसेना गोदी, मझगांव गोदी, बीएआरसी, डीआरडीओ, इस्रो, हिंदुस्थान एरोनॉटिक्स, भारत फोर्ज, टाटा, भारत अर्थ मूवर्स, भेल, अशोक लेलैंड, महिन्द्रा, बजाज, किर्लोस्कर ग्रुप आदि विख्यात कंपनियां तथा ब्राण्ड इस आयोजन में शामिल हुए।
पूंजीगत आधारभूत वस्तुओं के उत्पादन में भारत की प्रगति दिखाने वाला, करने वाला एक स्वतंत्र विभाग इस प्रदर्शनी में था जैसे कि उच्च तकनीकी पर आधारित बिजली उत्पाद सेट की निर्मिति में आवश्यक विविध कलपुर्जों का आरेखन (डिजाइन) तथा निर्मिति का एक कक्ष इस प्रदर्शनी में था। किसी भी निवेशक को अपना निवेश पूर्ण सुरक्षित रहे, इसकी चिंता होना स्वाभाविक बात है। दीर्घ निवेश करने वाले उद्यमी को स्थानीय कुशलता तथा प्रशासन व्यवस्था पर विश्वास होना चाहिए। अपने नए उद्योग में कुछ तकनीकी या प्रबंधकीय खराबी उत्पन्न होने पर उस पर वैश्विक गुणवत्ता के उपाय भी स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध रहेंगे यह देखना किसी भी निवेशक के लिए सब से अधिक आवश्यक होता है, मानसिक शांति देने वाला होता है, जो इस प्रदर्शनी से साध्य हुआ है।

भारत के लघु-उद्योग तथा मध्यम उद्योगों पर एक स्वतंत्र विभाग भी इस प्रदर्शनी में था। किसी भी बड़े उद्योग में लगने वाले छोटे पुर्जों की निर्मिति इन लघु उद्योगों से ही होती है। देश का लघु उद्योग क्षेत्र जितना मजबूत, उतना ही बड़े उद्योगों पर तनाव कम होता है। देश में रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। खर्चा कम होने से उत्पाद सस्ते होते हैं। रबर के वॉशर बनाने वाले, कपड़े सिलने वाले, कपड़ा बुनने वाले, स्टेशनरी के निर्माता, औषधि निर्माता, ग्रामीण खाद्य प्रक्रिया उद्योग इन सभी का समावेश लघु उद्योग में हो सकता है।
विविध जोरदार कार्यक्रम
बान्द्रा कुर्ला संकुल के साथ मुंबई की विविध जगहों पर हुए इस आयोजन का उद्घाटन प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने १३ फरवरी को किया। दूसरे दिन से विविध देशों के सरकारी तथा औद्योगिक प्रतिनिधि मंडलों के साथ संगोष्ठियां, वार्तालाप, परस्पर संवाद, भारतीय तथा विश्व के औद्योगिक प्रतिनिधियों की परस्पर बातचीत, विविध बैठकों से यह सप्ताह बिल्कुल व्यस्त रहा।
विविध देशों के साथ तथा विविध देशों के प्रतिनिधि मंडलों के साथ केंद्रीय सरकार तथा विविध राज्यों की सरकारों ने एमओयू (सामंजस्य करार) किए। इस सप्ताह के आयोजन से विश्व स्तर पर भारत के उद्योग नीति तथा क्षमताओं पर, कुशलता पर विश्वास बढ़ेगा यह सरकारी तथा निजी कंपनियों के अधिकारियों का मानना है। भारत की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी परिणाम करने वाला यह आयोजन एक अत्यंत यशस्वी आयोजन रहा।

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