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         फिल्म संगीत के इतिहास में मास्टर गुलाम हैदर एक ऐसा नाम है जिसे हम बहुत इज्जत और आदर से लिया करते हैं। वे हिंदी फिल्म जगत में अपनी एक अमिट छाप छोड़ गये हैं। एक संगीतकार की पहचान उसकी रचनाओं की गुणवत्ता पर निर्भर होती है। मास्टर गुलाम हैदर एक ऐसे संगीतकार थे। जिनकी रचनाओं में रचानात्मक सौंदर्य और उनकी शैली दिखाई पड़ती है। जिससे उन्होंने अनेक रागों का मिलन करते हुए अपने संगीत में सामंजस्य स्थापित किया। उन्होंने रिदिम की प्रस्तावना  और अंतराल के रूप में और गायन को कोरस संगीत रूप में पेश किया इससे एक संगीतकार की निपुणता सामने आ जाती है। मास्टर गुलाम हैदर खुद एक अच्छे गायक और संगीत प्रशिक्षक थे। उन्होंने अपने साथी गायक कलाकरों को अच्छा प्रशिक्षण दिया और फिल्म जगत के जिम्मेदार सदस्य के नाते वे एक मिसाल सा साबित हुए। अपनी आनेवाले पीढ़ी के कलाकारों के लिए फिल्म जगत के स्टारडम में ऐसे अनेक संगीतकार अपनी छाप छोड़ गये हैं जो अपने संगीत के बल पर अपना ठप्पा जमा चुके हैं। इन सब संगीतकारों में से मास्टर गुलाम हैदर ही एक ऐसे संगीतकार हैं जो एक अच्छे संगीतकार ही नहीं बल्कि एक उम्दा इनसान भी थे। वे अपने साथी गायक कलाकार, साज कलाकार और संगीत कलाकारों के कल्याण के लिए गहराई से विचार करते थे। उनका संगीत का ज्ञान काफी व्यापक था और शास्त्रीय संगीत और रागों की अच्छी पहचान थी। उनमें नये और उभरते गायक कलाकारों को पहचानने का एक आसाधारण गुण था। मास्टर गुलाम हैदर जानते थे  कि किसी भी गाने की लोकप्रियता उसके बोल और गायक कलाकार की कौशल और गायन शैली पर निर्भर करता था। किसी भी गायक कलाकार की आवाज एक बार मास्टरजी सुन लेते थे तो उस कलाकार के लिए  अनुकूल धुन रचते थे। उन्हें ऐसा जरूरी महसूस हुआ कि गायक कलाकार अपने गायन कौशल से स्टेज पर चल रहे दृश्य को भावनात्मक रंग दे सकें।

मास्टर गुलाम हैदर ने अपने संगीत का कैरियर पाकिस्तान से शुरू किया था। उन्होंने हिन्दुस्तानी क्लासिकल म्युजिक में प्रशिक्षण लिया और कलकत्ता चले गये जो तब फिल्म इंडस्ट्री की राजधानी थी। उनकी शुरुआत एक हारमोनियम वादक के रूप में हुई। मास्टर गुलाम हैदर का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने पंजाबी रिदम और धुन का फिल्म संगीत में समावेश किया। उनका संगीत परंपरागत था  इसलिए उनका संगीत लोकप्रिय हो गया । उनका सबसे प्यारा साज था ढोलक और पंजाबी संगीत के आधार पर की गई उनकी रचनाओं में ढोलक का सही उपयोग देखने में आता हैं। एक अहम बात जो उनके कार्यशैली में देखने को मिलता है कि उन्होंने रिदम और मेलोडीस को बखूबी से लोगों के सामने फिल्म संगीत के माध्यम से पेश किया और उसमें उन्हें कामायाबी हासिल हुई। उनके कुछ लोकप्रिय गाने जिनमें उन्होंने संगीत दिया था उनका यहां उल्लेख करना बिलकुल उचित रहेगा।

1) तू कौन सी बदली में मेरे चांद है आजा (खानदान 1942)

2) मेरे लिये जहां में चैन है ना करार है (खानदान 1942)

3) साजन आ जा …..(भाई 1944)

4) चमको चमको बिजलिया, हां बिजलिया (चल चल रे नौजवान 1944)

5) मुझे मधुर लगता है उनसे (चल चल रे नौजवान 1944)

6) दाता तेरो दया से अब देस हमारा (हुमायूं 1945)

7) वो चांद चमका अंधेरे में आज है (हुमायूं 1945)

8) मेरे मन का पंछी क्या बोले (खानदान 1942)

9) नैनों के बाण की रीत  अनोखी (खजांची 1941)

10) रिमझिम बुंदनिया बरसन आय रे (बरसात की एक रात 1948)

मास्टर गुलाम हैदर का, सबसे बड़ा श्रेय है कि उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में शमशाद बेगम जैसे संगीत गायक कलाकारों को पहली बार गाने का मौका दिया और उन्होंने उनके संगीत के बल पर कामयाबी हासिल की। पंजाबी धुन का सही उपयोग उन्होंने नूरजहां के आवाज से लोगों के सामने पेश किया और उनके संगीत से जाने माने संगीतकार जैसे हुसनलाल भगतराम, नौशाद और ओ पी अय्यर भी प्रेरित रहे।  मास्टर गुलाम हैदर संपूर्ण रूप से एक अव्वल संगीतकार माने जाते हैं।

 

 

 

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