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*** रवींद्र सोनी ***

  

‘‘इआन हचिंसन के मुताबिक कर्मचारियों को अपने से जोड़ कर रखना भविष्य में संस्थान की उत्पादकता और प्रदर्शन को सुनिश्चित करना है।’’
      मैनेजमेंट के दिग्गज जानकारों से जब प्रबंधन जैसे विस्तृत विषय को एक वाक्य में व्यक्त करने को कहा जाता है तो वे सब एक ही जवाब देते हैं- समन्वय या तालमेल प्रबंध का सार है। कुछ का तो यह भी मानना है कि जितना बेहतर तालमेल उतना शक्तिशाली मैनेजमेंट। किसे कब, क्या, क्यों और कैसे करना है तालमेल शब्द को परिभाषित करता है। इसेे कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है कि एक अच्छी प्रकार से प्रस्तुत किया गया आर्केस्ट्रा श्रोताओं एवं दर्शकों को बहुत प्रभावित करता है। इसकी सफलता का रहस्य सटीक तालमेल होता है। इसमें आर्केस्ट्रा के मास्टर और उसकी टीम के सदस्यों की संयुक्त भूमिका शामिल होती है। दोनों मिलकर इसे संभव बनाते हैं। यह एक दिन का काम न होकर एक लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया है जो कि नियोजन से प्रारम्भ होती है और नियंत्रण तक चलती रहती है।
 जहां भी अलग-अलग व्यक्ति, व्यक्ति समूह, उद्देश्य, क्रिया होंगी, वहां समन्वय नामक प्रणाली की आवश्यकता जरूर होगी। औद्योगिक संगठन के क्षेत्र में इसका विशेष महत्व होता है। क्योंकि यदि समय पर उत्पादन नहीं होता या उसकी किस्म घटिया हो जाती है अथवा उत्पादन लागत अधिक आती है तो ऐसे में संगठन के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न लग जाता है। कर्मचारियों और मैनेजमेंट के बीच का रिश्ता बहुत नाजुक और चुनौतीपूर्ण होता है। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पति-पत्नी और माता-पिता व बच्चों के रिश्तों के बाद दुनिया में अगर तीसरा कोई बड़ा रिश्ता है तो वह है कर्मचारी और प्रबंधन। मूलतः अन्य रिश्तों की तरह यह रिश्ता भी मानवीय सम्बंधों पर आधारित होता है। इस रिश्ते को भी सम्मान और देखभाल की जरूरत होती है।
    एक लंबे समय तक हमारे देश में मैन्यूफैक्चरिंग, टेक्सटाइल्स, ऑटोमोबाइल तथा उससे जुड़ी कलपुर्जे बनाने वाली छोटी इकाइयां औद्योगिक अशांति का शिकार रही हैं। इसका एक बड़ा कारण मैनेजमेंट और कर्मचारियों के बीच कई मुद्दों पर तालमेल की कमी रही है। फिक्की द्वारा औद्योगिक अशांति विषय पर कुछ समय पहले जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक ९० के शुरूआती दशक में शुरू हुई मुक्त बाजार की नीति के बाद से देश की कारोबारी सोच व कामकाज के तरीकों में लगातार सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद रिपोर्ट यह भी कहती है कि बीते वर्षों में हुण्डई, होण्डा, नोकिया, बॉश, प्रिकॉल, मारुति-सुजुकी, नेस्ले व हल्दिया डॉक जैसी बड़ी

 ऐसे बनाएं
बेहतर तालमेल

 १. जानें अपने कर्मचारियों को
कुछ समय निकाल कर कर्मचारियों की रुचियों के बारे में जानें, समझें। इससे प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच रिश्तें मजबूत होंगे और कर्मचारियों में संस्थान के प्रति जुड़ाव पैदा होगा और वे अच्छा काम करने के लिए प्रेरित होंगे।
२. दें उचित प्रशिक्षण व मार्गदर्शन
कर्मचारी दी गई जिम्मेदारी को बेहतरीन ढंग से पूरा कर सकें इस हेतु उन्हें उनके काम से जुड़ा प्रशिक्षण अवश्य प्रदान करें। जब वे पूरी तरह से लैस होंगे तभी वे अपना सर्वश्रेष्ठ संस्थान को दे पाएंगे।
३. आगे बढऩे में करें मदद
जिन कर्मचारियों को अपना कौशल विकसित करने और आगे बढऩे के अवसर मिलते हैं वे ज्यादा समय तक एक ही संस्थान में काम करना पसंद करते हैं। इससे कंपनी का टेलेंट पूल विकसित होता है और काम करने के लिए अच्छी टीम मिलती है।
४. करें सराहना
अच्छे काम के बदले प्रबंधन की ओर से मिलने वाली सराहना कर्मचारियों का मनोबल बढ़ा देती है। इससे उनके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आता है और वे लंबे समय तक अपना श्रेष्ठ संस्थान को देते रहते हैं।
५. टीमवर्क को दें बढ़ावा
टीमवर्क जहां प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच में विश्वास को बढ़ावा देता है तो वहीं कर्मचारियों में खुलापन भी लाता है। जब कर्मचारियों को लगता है कि वे किसी कंपनी के भीतर एक टीम का हिस्सा हैं तो वे ज्यादा समय व ज्यादा ऊर्जा के साथ काम करते हैं।
६. टीम के कोच बनें
     प्रबंधन का काम कर्मचारियों को भरोसा देना, प्रोत्साहित करना तथा एक अच्छे प्रशिक्षक की तरह मार्गदर्शन देना होता है। ऐसा करने से उनमें जिम्मेदारी का भाव आता है और वे आपकी अपेक्षाओं के मुताबिक काम करते हैं।कंपनियों को कर्मचारियों की नाराजगी के चलते उत्पादन और आमदनी दोनों से हाथ धोना पड़ा है। इसकी जड़ में जहां वेतन और कामकाज के माहौल जैसे मुद्दे हैं तो वहीं समन्वय की भारी चूक भी शामिल है। 
     तीव्र प्रतिस्पर्धा के कारण औद्योगिक एवं व्यावसायिक संस्थाओं के जीवित रहने एवं विकास के लिए संचालन कुशलता एवं प्रबंधकीय कुशलता में वृद्धि करना तथा समयानुकूल परिवर्तन लाना आवश्यक हो गया है। अब यह निर्विवाद सत्य माना जाने लगा है कि न्यूनतम लागत पर ही अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इस उद्देश्य की सफलता के लिए व्यवसाय की समस्त क्रियाओं पर नियंत्रण तथा उनके संगठन एवं तालमेल जरूरी है। इस बात को ध्यान में रखते हुए प्रबंधन के क्षेत्र में एम्पलाइज रिलेशनशिप मैनेजमेंट, जिसे संक्षिप्त में ईआरएम कहते हैं, की अवधारणा पर खासा जोर दिया जाने लगा है। इस दोतरफा संवाद वाली अवधारणा में कर्मचारियों और प्रबंधन के सुझावों व चुनौतियों को सामने रख नए रास्ते ईजाद किए जा रहे हैं। नतीजतन टकराव कम होने के साथ साथ कामकाज का माहौल, आपसी भरोसा, उत्पादकता, ग्राहक संतोष, कंपनी की बैलेंस शीट में बढ़ता लाभ जैसे अनेक फायदे हो रहे हैं।
     भारत ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में हाल के वर्षों में मैनेजमेंट और कर्मचारियों के बीच सम्बंधों पर अनेक अध्ययनों की श्रृंखला आरंभ हुई है। इनमें से ज्यादातर अध्ययनों में एक ही बात पर जोर दिया जा रहा है कि कैसे प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच सकारात्मक, सहयोगात्मक और प्रबंधन संस्कृति के अनुरूप रिश्ते कायम हों। नार्वे में ३००० प्रबंधकों से की गई बातचीत के आधार पर दो वर्ष पूर्व एक सर्वेक्षण रिपोर्ट बनाई गई। इस रिपोर्ट में मैनेजरों में तनाव को लेकर पूछे गए सवालों के जवाब से पता चला कि वे मैनेजर, जिनके कर्मचारियों के साथ सकारात्मक संबंध थे, काम के बोझ व समय सीमा के दबाव के बावजूद तनाव के खतरनाक स्तर से कोसों दूर थे। इसी प्रकार अपने बॉस के कामकाज के तरीके, चुनौतियों के समाधान के प्रति सहयोगात्मक रुख, प्रोत्साहन, करियर ग्रोथ में सहायता, टीमवर्क को बढ़ावा और समस्याओं को साथ बैठ कर सुलझाने के रवैये वाले संस्थानों में कर्मचारी खुश और ज्यादा उत्पादक पाए गए। इआन हचिंसन के मुताबिक कर्मचारियों को अपने से जोड़ कर रखना भविष्य में संस्थान की उत्पादकता और प्रदर्शन को सुनिश्चित करना है। हेनरी फोर्ड ने भी कहा था कि साथ आना शुरूआत है। साथ बने रहना प्रगति है। साथ काम करना सफलता है।

                                                             मो 9893212061

 

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