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     डॉ. रविराज अहिरराव

पिरामिड भारत की ओर से समूचे विश्व को दिया गया एक धरोहर है। बहुमूल्य तथा बहुपयोगी पिरामिड अति प्राचीन काल से भारतीय जीवन पद्धति का एक अविभाज्य भाग रहा है। प्रत्येक वास्तु की रचना में प्राचीन काल से अब तक ( लगभग ७० से ८० वर्ष पूर्व तक) घर के ऊपर विभिन्न आकारों में ये पिरामिड लगाए जाते हैं। जो बात हम-आप सैकड़ों हजारों वर्षों से उपयोग में लाते रहते हैं, उसके बारे में हम सभी को कोई नवीनता नहीं दिखाई देती। अति प्राचीन काल से ऋषियों- मुनियों की पर्णकुटी की छत छाते की तरह ( साधारणतः चारों कोण एकत्र) ऊपर की ओर मुड़ी हुई होती है। मंदिर, राजप्रासाद अथवा बड़े- बड़े महल-हवेलीनुमा वास्तु में भी छत पृष्ठ भाग अथवा मध्य भाग में चार अथवा उससे अधिक सम संख्या में त्रिकोण एक दूसरे से  चिपके हुए आकाश की दिशा की ओर बढ़ते चले जाते हैं, इसी को पिरामिड कहा जाता है। इजिप्त के विश्व प्रसिद्ध पिरामिड से बहुत पहले से भारत में पिरामिड अस्तित्व में थे।

जब चार त्रिकोण एक विशिष्ट आकार तथा कोन में एकत्र हैं, तो उससे पिरामिड का निर्माण होता है। पिरामिड में उसके आकार के कारण एक ऐसा गुण- धर्म एकत्र होता है, जिसके कारण पिरामिड प्रकृति की वैश्विक ऊर्जा अपनी ओर आकर्षित करके उसके अंदर के हिस्से में कुल ऊंचाई के एक तिहाई भाग में अत्यंत प्रचंड ऊर्जा का निर्माण होता था। इस ऊर्जा से सैकड़ों प्रकार के लाभ होते हैं।

वस्तुतः पिरामिड की ऊर्जा केवल लाभ ही लाभ होता है, इससे नुकसान कुछ भी नहीं होता।

दूसरे शब्दों में कहें तो पिरामिड से प्राप्त होने वाली ऊर्जा सिर्फ सकारात्मक ही होती है।

भारतीय संस्कृति विश्व की अति प्राचीन संस्कृति मानी जाती है। मूलतः पिरामिड त्रिकोण का एक साथ आना ही माना जाता है। भारतीय संस्कृति में पिरामिड का उपयोग मुख्यतः मंदिरों में बहुतायत से होता है। इसके पीछे का मूल उद्देश्य यह है कि मंदिर का ईश्वर का स्थान निश्चित करना है। मानव ने ईश्वर भक्ति के लिए तय किया गया मनोहर संगम तथा मंदिर का कलशयुक्त पिरामिड छाते की तरह अंदर एकत्रित होने वाली वैश्विक ऊर्जा एक पवित्र प्रसन्नत अृमत अनुभव ही है। सार रूप में कहें तो भारतीय संस्कृति में मानव के आत्मिक विकास के लिए पिरमिड का उपयोग किया जाता है, क्योंकि आज भी कई स्थानों पर ध्यान के लिए इसका उपयोग होता है। इसमें आश्यर्च की बात यह है कि मानव का जीवित शरीर दोनों के लिए पिरामिड अच्छा परिणाम देता है।

पिरामिड किन चीजों से बनाया जाता है, इसके बारे में जब चर्चा करने पर यह पता चलता है कि यह प्राचीन काल से ही विभिन्न पदार्थों से बनाया जाता रहा है। अति प्राचीन काल के मंदिरों तथा राजप्रासादों का पिरामिड पत्थर, बालू, लोहे, चूना तथा राख इन विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के मिश्रण से बनाये जाते थे। इजिप्त के पिरामिडों में तीन टन से सत्तर टन वजन के २३ लाख छोटे- मोटे पत्थरों का उपयोग किया जाता था, इसके बाद के कालखंड में लकड़ी, धातु, लोहे तथा सीमेंट- क्रांकीट से पिरामिड बनाये जाने के प्रमाण मिलते हैं।

वर्तमान में प्लास्टिक का पिरामिड वास्तुदोष निराकरण के लिए उपयोग बढ़ गया है। प्लास्टिक का पिरामिड अत्यंत सुविधाजनक, किफायती, टिकाऊ तथा सबसे ज्यादा परिणामकारी होता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार प्रत्येक धातु पर विशिष्ट ग्रह का प्रभाव होता है, इस कारण वैश्विक ऊर्जा की खोज करते समय विशिष्ट ग्रहों का विशेष प्रभाव इस ऊर्जा शोषण के समय कम या अधिक होता रहता है। दूसरी ओर प्लास्टिक से बने पिरामिड के आकार में समानता होती है।वास्तुदोष के निवारण के लिए जो पिरामिड आमतौर पर  उपयोग में लाया जाता है, वह तीन स्तरीय होता है। इसमें सबसे नीचे के स्तर में हरेक में नौ पिरामिड की नौ छोटी प्लेटें होती हैं। नौ बड़े पिरामिड एक प्लेट के नीचे के खोखले हिस्से में

चिपके होते हैं। इस बड़ी प्लेट पर पूरी प्लेट को ढंक सके, इतना बड़ा पिरामिड रखा जाता है। इसका अर्थ यह है कि सबसे ऊपर एक बड़ा, उसके नीचे नौ मध्यम तथा सबसे नीचे ८१ छोटे पिरामिड लगाए जाते हैं। इस तरह कुल ९१ पिरामिडों के समूह से परिणामकारक पिरामिड  का निर्माण किया जाता है। इस त्रिस्तरीय रचना के कारण वैश्विक ऊर्जा के तीन स्तर पर शुद्धीकरण होता है। इसी तरह नीचे के स्तर के छोटे पिरामिडों से वैश्विक ऊर्जा पूरी वास्तु में वितरित होती है, जो वास्तु को दोष मुक्त करती है।

कुछ ग्रंथों के आधार पर ऐसा बताया जाता है कि शुक्राचार्य ने पिरामिड की खोज की थी। वास्तु रविराज द्वारा विकसित तथा वास्तुदोष निवारण के लिए उपयोग में लाये जाने वाले पिरामिड में एक अथवा तीन नौ स्फटिक पिरामिड अंतर्भूत कर उसे उपयोग में लाया जाता है। इसका कारण  पिरामिड के एक तिहाई ऊंचाई पर सकारात्मक ऊर्जा एकत्र होती है। इसी तरह ऊपरी भाग पर नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस ऊर्जा का समूल नाश करने के लिए स्फटिक पिरामिड से बाहर निकलने वाली ऊर्जा से होती है, इसका परिणाम वास्तुरविराज पिरामिड वास्तुदोष निवारण कार्य में अन्य पिरामिडों की तुलना में अधिक प्रभावशाली होता है।

पिरामिड सदैव अच्छी ऊर्जा देता है और इस ऊर्जा का अगर भंडारण हुआ तो भी उसका दुष्परिणाण नहीं होता। अब बड़े आकार के तथा धातु का आवश्यकता से अधिक प्रयोग पिरामिड के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। वास्तु में रहने वाला हो या फिर व्यावसायिक- औद्योगिक क्षेत्रों में रहने वाला हो, सभी प्रकार की वास्तु का दोष निवारण करने के लिए पिरामिड प्राचीन ऋषियों- मुनियों की ओर से मानव जाति को दी गई अमूल्य निधि है।

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